सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 511, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मज्ञानके शाब्दापरोक्षत्वका विचार ] भाषाअनुवादसहित ४८१
जीवापरोक्ष्यासम्भवादसर्वज्ञत्वापत्तिः, अज्ञानस्य ईश्वरं प्रत्यनावारकतया तं <sup>*</sup>प्रति जीवभेदानापादनात् । यद् अज्ञानं यं प्रत्यावरकम्, तस्य तं प्रत्येव स्वाश्रयभेदापादकत्वात् । अत एव चैत्रज्ञानेन तस्य घटाज्ञाने निवृत्ते अनिवृत्तं मैत्राज्ञानं मैत्रं प्रत्येव विषयचैतन्यस्य भेदापादकमिति न चैत्रस्य
यदि शङ्का हो कि अज्ञानकृत भेदके अभेदाभिव्यक्तिका प्रतिबन्धक होनेपर ब्रह्मको जीवका प्रत्यक्ष न होनेसे ईश्वरमें असर्वज्ञत्वकी प्रसक्ति <sup>*</sup> होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि <sup>†</sup> ईश्वरके प्रति अज्ञान आवरण नहीं करता है, अतः ईश्वरके प्रति जीवके भेदका वह अज्ञान आपादन नहीं करता है, क्योंकि जो अज्ञान <sup>‡</sup> जिसके प्रति आवरण करता हो वह उसीके प्रति अपने आश्रयके भेदका आपादन करता है। इसीसे <sup>×</sup> चैत्रके ज्ञानसे उसके घटाज्ञानके निवृत्त-होनेपर भी अनिवृत्त मैत्रका अज्ञान मैत्रके प्रति विषयचैतन्यके भेदका आपादक
<sup>*</sup> शङ्काका तात्पर्य यह है कि 'जीवका मैं साक्षात्कार करता हूँ' जीव मुझे अपरोक्ष है, इत्यादि जीवविषयक व्यवहारमें अनुकूल जो ब्रह्मका ज्ञान है, वह मायावृत्तिसे उपहित नहीं है, किन्तु ब्रह्मचैतन्य ही है, इस परिस्थितिमें ब्रह्मकर्तृक व्यवहारके विषयीभूत जीवका और ब्रह्मकर्तृक व्यवहारमें अनुकूल उक्त ब्रह्मचैतन्यका परस्पर अभेद होनेपर भी अभेदकी अभिव्यक्ति नहीं होनेसे ब्रह्मके प्रति जीव अपरोक्ष नहीं होगा, इसलिए ब्रह्मको सर्वज्ञत्व नहीं होगा, यदि कहा जाय कि ब्रह्मके जीवविषयक परोक्षज्ञानसे ही सर्वज्ञत्वकी उपपत्ति हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ईश्वरके परोक्षज्ञानका अङ्गीकार नहीं है ।
<sup>†</sup> जो अज्ञान है, वह जीवधर्मिक ब्रह्मप्रतियोगिक भेदका प्रयोजक है, क्योंकि जीवको ही 'मैं ब्रह्म नहीं हूँ' इस प्रकार अनुभव होता है, इसलिए ब्रह्मधर्मिक जीवप्रति-योगिक भेदका अज्ञान प्रयोजक नहीं है, क्योंकि 'मैं (ब्रह्म) जीव नहीं हूँ' इस प्रकारके ब्रह्मके अनुभवमें प्रमाण नहीं है । इस अवस्थामें ब्रह्मके प्रति जीवकी ब्रह्मके साथ अभेदाव्यक्तिमें प्रतिबन्धक अज्ञानकृत भेदके न होनेसे उक्त दोष नहीं है, इस अभिप्रायसे उक्त आक्षेपका परिहार करते हैं । और दूसरी बात यह भी है कि 'मैं अज्ञानी हूँ' इस प्रकार ईश्वरको अनुभव भी नहीं होता है, अतः ईश्वरके प्रति जीवका आवारक भी अज्ञान नहीं होता है ।
<sup>‡</sup> अर्थात् जिस जीवके प्रति जो अज्ञान विषयचैतन्यका आवारक है, उसी जीवके प्रति वह अज्ञान अपने आश्रयभूत विषयचैतन्यप्रतियोगिक भेदका प्रयोजक होता है, यह भाव है ।
<sup>×</sup> प्रकृतमें भाव यह है कि जैसे घटावच्छिन्न चैतन्यमें चैत्रके प्रति घटावच्छिन्न चैतन्यका आवारक अज्ञान रहता है, वैसे ही मैत्रके प्रति भी घटचैतन्यका आवारक अज्ञान भी उसमें रहता है । इससे चैत्रीय घटके ज्ञानसे चैत्रीय घटाज्ञानके—जो कि अपने आश्रय विषयचैतन्यके भेदका आपादक है—निवृत्त होनेपर भी चैत्रीय घटज्ञानसे अनिवृत्त घटचैतन्यमें रहनेवाला मैत्रके प्रति
६१