सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
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संस्कारार्थस्याऽऽधानस्य पुरुषसंस्कारेषु परिगणनात् तदर्थत्वमपि, एवं वचनबलादुभयार्थत्वोपपत्तेः । तथा च प्रतिदिनश्रवणजनितादृष्टमहिम्नैवाऽऽमुष्मिकविद्योपयोगित्वं श्रवणमननादिसाधनानामित्याहुः ॥ ७ ॥
श्रवणादेरिव ज्ञानसाधनत्वं समर्थितम् ।
प्रमाणैर्भारतीतीर्थैर्निर्गुणोपास्तिकर्मणः ॥ १८ ॥
अनेक श्रुत्यादि प्रमाणोंके आधारपर श्रीभारतीतीर्थ मुनिजीने श्रवण आदिके समान निर्गुण उपासनामें भी ज्ञानकी साधनता मानी है ॥ १८ ॥
एवं 'श्रवणमननादिसाधनानुष्ठानप्रणाल्या विद्याऽवाप्तिः' इत्यस्मिन्नर्थे सर्वसम्प्रतिपन्ने स्थिते भारतीतीर्था ध्यानदीपे विद्याऽवाप्तौ उपायान्तरमप्याहुः । 'तत् कारणं साङ्ख्ययोगाभिपन्नम्' 'यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं
की उत्पत्ति करता है, जैसे × अग्निके संस्कारके लिए किया हुआ आधान पुरुषके संस्कारोंमें परिगणित होनेसे पुरुषार्थ भी है, वैसे प्रकृतमें भी अनेक वचन मिलते हैं, अतः उभयार्थता हो सकती है, इसलिए प्रतिदिन श्रवणसे उत्पन्न अदृष्टकी सामर्थ्यसे ही श्रवण, मनन आदि आमुष्मिक विद्याके प्रति उपयोगी हैं ॥ ७ ॥
उक्त प्रकारसे श्रवण, मनन और निदिध्यासनके अनुष्ठान द्वारा विद्याकी प्राप्ति होती है, इस प्रकारसे सब श्रुति और स्मृतियोंसे सम्मत अर्थके निश्चित होनेपर विद्याकी प्राप्तिमें अन्य उपायका भी ध्यानदीपमें * भारतीतीर्थ स्वामीजीने निरूपण किया है—'तत् कारणं०' (वह कारणत्वरूपसे उपलक्षित ब्रह्म साङ्ख्य और योगसे † विद्या द्वारा प्राप्त होता है) 'यत् साङ्ख्यैः०' (जिस
× जैसे 'अग्नीनादधीत' इत्यादि वाक्योंसे विहित आधान अग्निके संस्कारके लिए है, वैसे ही 'अग्न्याधेयमग्निहोत्रम्' इत्यादि पुरुष संस्कारके बोधक सूत्रमें अग्न्याधानका भी पाठ होनेसे पुरुषसंस्कारार्थ भी है, यह प्रतीत होता है, इसी प्रकार श्रवण भी उभयार्थ हो सकता है, यह भाव है।
* पञ्चदशीके नवम ध्यानदीपप्रकरणमें 'संवादिभ्रमवद् ब्रह्म' इत्यादि श्लोकोंसे योगशब्दसे कहलानेवाली उपासनासे भी ब्रह्मतत्त्वका साक्षात्कार होता है, इसका सविस्तर निरूपण किया गया है, अतः इस विचारका विस्तार वहींपर देखना चाहिए।
† सांख्यशब्दका अर्थ है—मनन आदिसे संस्कृत वेदान्तविचार अथवा उस विचारसे युक्त पुरुष, योगशब्दार्थ है—निर्गुण ब्रह्मकी उपासना अथवा उसका उपासक।