सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 489, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंअमुख्याधिकारीके श्रवणमें जन्मान्तरीय-विद्योपयोगिता] भाषानुवादसहित ४५९
तन्नियमनिर्वर्तितवचनस्य निरालम्बनत्वात्, श्रवणावघाताद्युपक्रममात्रेण नियमनिष्पत्तौ तावतैव नियमशास्त्रानुष्ठानं सिद्धमिति तदनावृत्तावप्यवै-कल्यप्रसङ्गाच्चेत्याहुः।
कृच्छ्राशीतिफलस्मृत्याऽऽधानवत् कर्तृसंस्कृतेः । तद्द्वारा श्रवणं केचिज्जन्मान्तरफलं जगुः ॥ १७ ॥
श्रवणसे अस्सी कृच्छ्रका फल होता है, ऐसी स्मृति होनेके कारण आधानके समान कर्त्ताके संस्कारार्थ भी होनेसे उसी संस्कार द्वारा श्रवण जन्मान्तरका फल देनेवाला है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ १७ ॥
केचित्तु दृष्टार्थस्यैव वेदान्तश्रवणस्य— 'दिने दिने तु वेदान्तश्रवणाद् भक्तिसंयुतात् । गुरुशुश्रूषया लब्धात् कृच्छ्राशीतिफलं लभेद् ॥' इत्यादिवचनप्रामाण्यात् स्वतन्त्रादृष्टोत्पादकत्वमप्यस्ति । यथा अग्नि-
आवृत्तिगुणसे युक्त श्रवण ही अपने फलके प्रति जनक होता है, इससे फलके साधन पदार्थकी—आवृत्तियुक्त श्रवणकी—उत्पत्तिके पूर्वमें श्रवणनियम निष्पन्न हो जाता है—यह वाक्य निरालम्बन है और श्रवण एवं अवघात आदिके उपक्रममात्रसे यदि नियमकी उत्पत्ति मानी जाय, तो उसीसे नियमशास्त्रके अनुष्ठानकी सिद्धि होनेसे उसकी आवृत्ति न करनेपर भी वैकल्य प्रसक्त नहीं होगा।
† कुछ लोग तो कहते हैं कि दृष्टार्थ ही वेदान्तश्रवण—'दिने दिने०' (गुरुशुश्रूषासे प्राप्त भक्तियुक्त वेदान्तके श्रवणसे प्रतिदिन पुरुष अस्सी कृच्छ्रका ‡ पुण्य प्राप्त करता है) इत्यादि वचन प्रमाण होनेसे—स्वतन्त्र अदृष्ट-
इसी प्रकार आवृत्तितद्विशिष्ट श्रवण ही विद्यात्मक फलके प्रति जनक होगा, यदि इसे न माना जाय, तो 'फलपर्य्यन्त श्रवणसे ही अप्राप्तांश परिपूर्णरूप नियम सम्पन्न होता है, पूर्वमें नहीं, इस प्रकारका वचन निरालम्बन अर्थात् निर्विषयक हो जायगा, यह भाव है।
† मुख्य या अमुख्य अधिकारी द्वारा प्रतिदिन किया जानेवाला वेदान्तश्रवण जैसे प्रतिबन्धककी निवृत्तिरूप दृष्ट फल उत्पन्न करता है, वैसे ही अदृष्टकी उत्पत्ति भी करता है, इस-लिए अदृष्टके बलसे जन्मान्तरमें विचारकी विद्योपयोगिता घट सकती है, इस अभिप्रायसे यह 'केचित्तु' का मत है, यह भाव है।
‡ यह कृच्छ्रनामक व्रत अनेक प्रकारसे होता है, इसका निर्वचन मिताक्षरा आदि धर्मशास्त्रके निबन्धोंमें अनेक प्रकारसे मिलता है।