भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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४४६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ तृतीय परिच्छेद

तदा 'चतुर्ष्वाश्रमेषु संन्यासाश्रमपरिग्रहेणैव श्रवणादि निर्वर्तनीयम्' इति नियमोऽभ्युपेय इति ॥ ५ ॥

क्षत्रियादेरसन्न्यासाच्छ्रवणादि कथं भवेद् ।
संन्यास न होनेके कारण श्रवण क्षत्रियादिको कैसे हो सकता है ?

नन्वस्मिन् पक्षद्वये क्षत्रियवैश्ययोः कथं वेदान्तश्रवणाद्यनुष्ठानम् ; संन्यासस्य ब्राह्मणाधिकारित्वाद् 'ब्राह्मणो निर्वेदमायाद्' 'ब्राह्मणो व्युत्थाय' 'ब्राह्मणः प्रव्रजेद्' इति संन्यासविधिषु ब्राह्मणग्रहणात् ।
'अधिकारिविशेषस्य ज्ञानाय ब्राह्मणग्रहः ।
न संन्यासविधिर्यस्माच्छ्रुतौ क्षत्रियवैश्ययोः ॥' इति-
वार्त्तिकोक्तेश्चेति चेत्,
तत्र केचन सन्न्यासमाहुः क्षत्रियवैश्ययोः ॥ ११ ॥
इस विषय कोई लोग कहते हैं कि क्षत्रिय और वैश्योंका भी संन्यास है ॥११॥

सकती है, तो यह नियम मानना चाहिए कि चारों आश्रमोंमें संन्यास आश्रमका ग्रहण करके ही श्रवण आदिका सम्पादन करना चाहिए ॥५॥

अब शङ्का होती है कि इन दो पक्षोंमें अर्थात् संन्यासके अधिकारीके प्रति विशेषणत्व और श्रवणाङ्गत्व पक्षमें क्षत्रिय और वैश्य वेदान्तके श्रवण आदिका अनुष्ठान कैसे कर सकते हैं, क्योंकि ब्राह्मण ही संन्यासमें अधिकारी है, कारण कि 'ब्राह्मणो०' ( ब्राह्मण ही वैराग्यपूर्वक संन्यास करे ) 'ब्राह्मणो व्युत्थाय' (ब्राह्मण संन्यासका ग्रहण करके) 'ब्राह्मणः प्रव्रजेत्' ( ब्राह्मण संन्यासका ग्रहण करे ) इत्यादि संन्यासके विधायक वाक्योंमें ब्राह्मणका ही ग्रहण किया गया है ।

और 'अधिकारिविशेषस्य०' ( विशेष अधिकारीके परिज्ञानके लिए ब्राह्मणका ग्रहण किया गया है, क्योंकि श्रुतिमें कहींपर भी क्षत्रिय और वैश्यकी संन्यासविधि नहीं है ) ऐसा वार्त्तिकका वचन भी है ।


विक्षेपका अभाव है, वह संन्याससे भिन्न साधन द्वारा भी प्राप्त होता है, इसलिए विधित्सितं (विधानके लिए अभीष्ट) संन्यासकी श्रवणादिमें अपेक्षित विक्षेप-निवृत्तिके प्रति पक्षमें प्राप्ति और पक्षमें अप्राप्ति दोनों हो सकती है, अतः संन्यासविधिको अपूर्वविधि नहीं मानना चाहिए, किन्तु नियमविधि ही माननी चाहिए ।

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