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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ
४३०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

मपि अक्लृप्तमेव ज्ञानोत्पत्तिप्रतिबन्धकदुरितनिर्वहणत्वम्, ज्ञानसाधनविशिष्टगुरुलाभश्रवणमननादिसम्पादकापूर्वं च द्वारं कल्पनीयमित्यक्लृप्तोपकारकल्पनाऽविशेषाच्च सामान्यश्रुत्यापादितो नित्यकाम्यसाधारणो विनियोगो भञ्जनीय इति ॥ २ ॥

ब्राह्मणग्रहणं चाऽत्र त्रैवर्णिकानिदर्शनम् ।
वार्त्तिकोक्तेस्तथोद्देश्यगतत्वेनाऽविवक्षणात् ॥ ७ ॥

'विविदिषन्ति ब्राह्मणाः' इस श्रुतिमें ब्राह्मणग्रहण त्रैवर्णिकका उपलक्षण है, क्योंकि इस अर्थका पोषक वार्त्तिककारका वचन है और ब्राह्मणपदकी उद्देश्यविशेषणतया भी विवक्षा नहीं है ॥ ७ ॥


नहीं है, क्योंकि * नित्य कर्मोंमें ज्ञानोपकारकत्वनियमके असिद्ध होनेपर नित्यकर्मोंमें भी ज्ञानकी उत्पत्तिमें अक्लृप्त ही प्रतिबन्धक दुरितके विनाशकारणतारूप और † ज्ञानके प्रति साधनभूत श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरुका लाभ, श्रवण, मनन आदिको प्राप्त करानेवाले अदृष्टरूप द्वारकी कल्पना करनी होगी, इसलिए अक्लृप्त कल्पनाके सामान्य होनेसे 'यज्ञेन' इस सामान्यश्रुतिसे प्राप्त नित्य और काम्यकर्मोंके साधारण विनियोगको नहीं हटाना चाहिए ॥२॥


* 'ज्ञानमें अपेक्षित उपकार नित्योंमें क्लृप्त है' यह मत प्रमाणशून्य है, ऐसा मानकर काम्योंके समान नित्यमें भी अक्लृप्त उपकारकी कल्पना समान है, इस अभिप्रायसे दूषित करते हैं, यह भाव है ।

† यदि प्रकृतमें शङ्का हो कि नित्यकर्मोंके विनियोग पक्षमें ही विधिका लाघव है, क्योंकि पक्षमें उनकी ज्ञानप्रतिबन्धकपापविनाशकी जनकता अन्य वचनसे प्राप्त होनेके कारण केवल नियम विधिसे लभ्य है, और काम्यकर्मोंकी ज्ञानप्रतिबन्धकदुरितविनाशकारणता किसीसे प्राप्त नहीं है, अतः ज्ञानमें काम्य कर्मोंके विनियोग पक्षमें विधिका गौरव अपरिहार्य है, तो यह शङ्का युक्त नहीं है,—क्योंकि इस परिस्थितिमें भी यज्ञ आदि श्रुतियोंके सङ्कोचरूप बाधके परिहारके लिए काम्य कर्मोंका भी विनियोग अवश्य है, इसीमें तात्पर्य है । यद्यपि नित्यकर्मोंसे ज्ञान-प्रतिबन्धक दुरित-विनाशरूप विशेषशुद्धिका लाभ होनेपर भी उतने मात्रसे ज्ञानकी उत्पत्ति नहीं होती है। क्योंकि प्रमाणप्रमेयासम्भावना आदि प्रत्यक्ष प्रतिबन्धक हैं, तथापि उन प्रतिबन्धकोंके निरासके लिए नित्योंमें उक्त गुरु तथा उनसे श्रवण आदिके सम्पादक अक्लृप्त अदृष्टकारणताकी विविदिषावाक्यके बलसे कल्पना करनी चाहिए, यह भाव है ।

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विद्यार्थ कर्मोंमें त्रैवर्णिकोंका अधिकार ] भाषानुवादसहित ४३१

नन्वेवमपि कथम्— ‘कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।’ इत्यादिस्मरणनिर्वाहः ? न च तस्य विद्यार्थकर्मानुष्ठानपरत्वम्, विविदिषावाक्ये ब्राह्मणग्रहणेन ब्राह्मणानामेव विद्यार्थकर्मण्यधिकारप्रतीतेः । अतो जनकाद्यनुष्ठितकर्मणां साक्षादेव मुक्त्युपयोगो वक्तव्यः, मैवम्; विविदिषावाक्ये ब्राह्मणग्रहणस्य त्रैवर्णिकोपलक्षणत्वात् ।

अब शङ्का होती है कि यद्यपि ‘तत्प्राप्तिहेतुर्विज्ञानं कर्म चोक्तं महामुने’ इत्यादि ज्ञान और कर्मके समुच्चयका प्रतिपादन करनेवाली स्मृतिका विविदिषावाक्यके साथ विरोध न हो, इसलिए ‘ज्ञान साक्षात् मुक्तिका साधन है और कर्म विद्याकी प्राप्ति द्वारा मुक्तिमें साधन है, इस प्रकार क्रमसमुच्चयसे निरूपण किया गया, तो भी

‘कर्मणैव’ ( जनक प्रभृति महानुभावोंने कर्मोंके द्वारा ही मुक्ति प्राप्त की ) इत्यादि स्मृतिकी उपपत्ति कैसे हो सकती है, [ क्योंकि इसमें ‘कर्मणैव’ ( कर्मसे ही ) इस अवधारणसे मुक्तिके प्रति कर्मातिरिक्त साधनताका खण्डन किया गया है, इसलिए साक्षात् मुक्तिके प्रति ही कर्मोंका उपयोग प्रतीत होता है ] । यदि शङ्का हो कि ‘कर्मणैव’ इत्यादि स्मृतिका तात्पर्य विद्याके लिए कर्मोंके अनुष्ठानमें ही है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ‘ब्राह्मणाः विविदिषन्ति’ इत्यादि विविदिषाश्रुतिमें ‘ब्राह्मण’ शब्दके कथनसे यही प्रतीत होता है—ब्राह्मणोंका ही विद्याके प्रयोजक कर्मोंमें अधिकार है । इसलिए * जनक आदि द्वारा अनुष्ठित कर्मोंका साक्षात् ही मुक्तिमें उपयोग है, ऐसा कहना चाहिए ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त विविदिषावाक्यमें ब्राह्मणका ग्रहण त्रैवर्णिकोंका † उपलक्षण है ।


* अर्थात् ‘विविदिषन्ति’ इत्यादि श्रुतिसे ज्ञात विद्यासाधन कर्मोंमें त्रैवर्णिक अधिकृत नहीं है, इसलिए, यह अर्थ है।

† जब विविदिषावाक्यमें ब्राह्मणग्रहण उपलक्षण है, तब विद्याके प्रयोजक कर्मोंमें जनक आदिका भी अधिकार है, अतः ‘कर्मणैव’ इत्यादि स्मृतिका वचन विद्याप्रयोजक कर्मके अनुष्ठानमें ही पर्यवसित है, इसलिए उक्त वचनसे ‘तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय’ ( आत्मसाक्षात्कारसे ही मृत्युका—संसारका—अतिक्रमण कर सकते हैं, उससे अन्य संसारके अतिक्रमणके लिए मार्ग नहीं है ) इस श्रुतिसे विरुद्ध साक्षात् कर्मोंमें मुक्तिसाधनता बोधित नहीं होती है, यह भाव है।

४३२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद


यथाऽऽहुरत्रभवन्तो वार्तिककाराः—

‘ब्राह्मणग्रहणं चाऽत्र द्विजानामुपलक्षणम् ।
अविशिष्टाधिकारित्वात् सर्वेषामात्मबोधने ॥’ इति ।

नहि ‘विद्याकामो यज्ञादीननुतिष्ठेद्’ इति विपरिणमिते विद्याकामाधिकारविधौ ब्राह्मणपदस्याऽधिकारिविशेषसमर्पकत्वं युज्यते; उद्देश्ये विशेषणायोगात् ।


इस विषयमें पूजनीय वार्त्तिककार कहते हैं—
‘ब्राह्मणग्रहणं चाऽत्र०’ ( विविदिषावाक्यमें ब्राह्मण-ग्रहण द्विजोंका अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यका उपलक्षण है, क्योंकि आत्मज्ञानके साधनभूत कर्मोंमें ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्यका अधिकार सामान्यरूपसे सुना गया है ※) ।

और ‘विद्याकामो यज्ञादीननुतिष्ठेत्’ ( विद्याका अभिलाषी यज्ञ आदिका अनुष्ठान करे ) इस प्रकार † विपरिणत विद्याकामकी अधिकार ‡ विधिमें ब्राह्मण पद अधिकारीका समर्थक ( बोधक ) है, ऐसा नहीं कह सकते हैं, कारण कि विद्याकामरूप उद्देश्यमें विशेषणका सम्बन्ध नहीं हो सकता है ।


※ इस वार्त्तिकको सुरेश्वराचार्य विरचित वार्त्तिकके १८८९ पृष्ठमें चतुर्थ अध्याय चतुर्थ ब्राह्मणमें देखना चाहिए ।

† क्योंकि विद्याप्रयोजक कर्मोंका ही अधिकार प्रकृत है, यह भाव है, यदि इस विषयमें किसीको शङ्का हो कि विविदिषावाक्यमें ब्राह्मणशब्दमें त्रैवर्णिकोपलक्षणत्वके सिद्ध होनेपर तीनों वर्णोंका सामान्यरूपसे विद्याप्रयोजक कर्मोंमें अधिकार सिद्ध होगा और तीनों वर्णोंका सामान्यतः कर्मोंमें अधिकार सिद्ध होनेपर उसके अनुरोधसे ब्राह्मणग्रहणको उपलक्षण मान सकते हैं, इसलिए अन्योऽन्याश्रय होगा, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि ब्राह्मणपदमें सामान्यतः द्विजोपलक्षणताका अनाश्रय करके ही सभी द्विजोंका विद्यार्थकर्मोंमें अधिकार वार्त्तिक वचनमें कहा गया है ।

‡ तात्पर्य यह है कि किसीको यदि शङ्का हो—विविदिषावाक्यमें ब्राह्मण शब्दके ग्रहणसे ब्राह्मणका ही विद्यार्थ कर्मोंमें अधिकार प्रतीयमान होता है, तो फिर वर्णत्रयसाधारण अधिकारकी सिद्धि कैसे होती है ? तो इसपर कहना चाहिए कि क्या ब्राह्मणशब्द यज्ञ आदि विधिके उद्देश्यमें विशेषणके समर्पकरूपसे ब्राह्मणमात्रकी अधिकारिताका बोधक है, अथवा विधेयभूत कर्त्ताके समर्पकरूपसे अथवा इन दोनोंके समर्थक न होते हुए भी अन्य गति न होनेसे अपनी केवल सन्निधिमात्रसे ब्राह्मणमात्रके अधिकारका बोधक है ? इस प्रकार तीन विकल्पोंमें प्रथम

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विद्यार्थ कर्मोंमें त्रैवर्णिकोंका अधिकार ] भाषानुवादसहित ४३३


नापि 'राजा स्वाराज्यकामो राजसूयेन यजेत' इति स्वाराज्यकामा- धिकारे राजसूयविधौ 'स्वाराज्यकामो राजकर्तृकेण राजसूयेन यजेत' इति कर्तृतया यागविशेषणत्वेन विधेयस्य राज्ञो राजकर्तृकराजसूयस्याऽराज्ञा सम्पादयितुमशक्यत्वाद् अर्थादधिकारिकोटिनिवेशवद्, इह यज्ञादिकर्तृतया विधेयस्य ब्राह्मणस्याऽर्थादधिकारिकोटिनिवेश इति युज्यते । 'सर्वथाऽपि त एवोभयलिङ्गाद्' इति सूत्रे (उ० मी० अ० ३ पा० ४ सू० ३४)

यदि शङ्का हो कि जैसे 'राजा स्वाराज्यकामो०' (स्वाराज्यको चाहनेवाला राजा राजसूयनामक यज्ञ करे) स्वाराज्य चाहनेवालेकी अधिकार- बोधिका* इस राजसूयविधिमें 'स्वाराज्यके अभिलाषी राजा द्वारा किये जानेवाले राजसूय यज्ञसे अपना अभीष्ट सम्पादन करे' इस प्रकार कर्तृत्वरूपसे यागके विशेषण विधेयभूत राजाका—केवल राजासे किये जानेवाले राजसूयका राजासे इतर अनुष्ठान नहीं कर सकता है, इससे अर्थतः—अधिकारी कोटिमें विशेषणरूपसे निवेश होता है, वैसे ही प्रकृतमें 'विद्याका अभिलाषी पुरुष ब्राह्मणकर्तृक याग आदिका अनुष्ठान करे, इस प्रकार विधेयभूत ब्राह्मणका अर्थतः अधिकारी कोटिमें निवेश होगा ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'सर्वथाऽपि त एवोभयलिङ्गात्'† इस ब्रह्मसूत्रमें इस प्रकारकी व्यवस्था


विकल्पका इस ग्रन्थसे परिहार करते हैं। विद्यामें यज्ञ आदिका विनियोगबोधक विधिमें विद्याभिलाषीका अधिकार सिद्ध ही है, इसलिए ब्राह्मण्यविशिष्ट विद्याकामका अधिकार विवक्षित है, ऐसा स्वीकार कर ब्राह्मणपदमें विशेष अधिकारिसमर्पकताका अङ्गीकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि विधेयभूत यज्ञ आदिकी उद्देश्यत्ता केवल विद्याभिलाषीमें ही प्रतीत होती है, अतः ब्राह्मण्यरूप विशेषणकी आकाङ्क्षा नहीं है, इसलिए अनाकाङ्क्षितका विद्याकामके प्रति विशेषण रूपसे अन्वय नहीं हो सकता है। यदि विशिष्टको उद्देश्य मानें, तो गौरव होगा, विद्याकाम और ब्राह्मण्य प्रत्येकको उद्देश्य मानें, तो वाक्यभेद प्रसक्त होगा अर्थात् विद्याका अभिलाषी यज्ञ आदि करे' और 'ब्राह्मण यज्ञ आदि करे' इस प्रकार वाक्यभेद होगा, यह भाव है।

* उक्त तीन विकल्पोंमें से द्वितीय विकल्पका इस ग्रन्थसे शङ्कापूर्वक परिहार करते हैं, तात्पर्य यह है कि स्वाराज्यकाम वाक्यमें स्वाराज्याभिलाषीके प्रति राजपदका पूर्वोक्त रीतिसे विशेषणत्वरूपसे सम्बन्ध नहीं हो सकता है, इसलिए कर्तृविधायकताका अङ्गीकार करके यदि स्वाराज्यकामी राजा हो, तो राजसूय यज्ञ करे, ऐसा प्रतिपादन किया गया है। इससे अर्थात् जैसे राजाका अधिकारी कोटिमें प्रवेश हुआ है वैसे ही ब्राह्मण्यका अधिकारीकी कुक्षिमें प्रवेश क्यों नहीं, यह शङ्काका भाव है।

† 'सर्वथापि त एवोभयलिङ्गात्' इस सूत्रका अर्थ यों है—सर्वथा अपि—यज्ञ आदिके

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४३४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद


'अन्यत्र विहितानामेव यज्ञादीनां विविदिषावाक्ये फलविशेषसम्बन्धविधिः, नापूर्वयज्ञादिविधिः' इति व्यवस्थापितत्वेन प्राप्तयज्ञाद्यनुवादेन एकस्मिन् वाक्ये 'कर्तृरूपगुणविधिः, फलसम्बन्धविधिश्च' इत्युभयविधानाद्वाक्यभेदापत्तेः ।

नापि राजसूयवाक्ये राज्ञः कर्तृतया विधेयत्वाभावपक्षे राजपदसमभिव्याहारमात्राद्विशिष्टकर्तृत्वलाभद्वद् इह वाक्यभेदाय कर्तृतया ब्राह्मणविधानेऽपि ब्राह्मणपदसमभिव्याहारमात्रेण ब्राह्मणकर्तृत्वलाभात् तदधि-


की गई है कि 'कर्मकाण्डमें विहित यज्ञ आदिको उद्देश्य करके ही विविदिषावाक्यमें फलविशेषके सम्बन्धकी विधि है, अपूर्व यज्ञ आदिकी विधि नहीं है, और यदि पूर्वसे प्राप्त यज्ञ आदिका अनुवाद कर एक वाक्यमें कर्तृरूप गुण और फलसम्बन्ध इन दोनोंकी विधि मानें, तो वाक्यभेदकी आपत्ति होगी* ।

† यदि शङ्का हो कि जैसे राजसूयवाक्यमें कर्तृरूपसे राजामें विधेयत्वके अभाव पक्षमें ‡ राजपद्के सान्निध्यमात्रसे विशिष्ट कर्तृताका लाभ होता है, वैसे ही प्रकृतमें वाक्यभेदके परिहारके लिए कर्तृरूपसे ब्राह्मणका विधान न होनेपर भी ब्राह्मणपदके समभिव्याहारमात्रसे (सान्निध्यमात्रसे) ब्राह्मणकी कर्तृताका


आश्रमकर्मत्वपक्षमें या उनके विद्यासहकारित्वपक्षमें एवं—'यावज्जीवमग्निहोत्रं जुहुयात्' इत्यादि वाक्योंमें जो अग्निहोत्र आदि धर्म हैं, वे ही विहित हैं, क्योंकि 'उभयलिङ्गात्' अर्थात् श्रुति और स्मृति—दोनों प्रमाण हैं, श्रुतिसे 'विविदिषन्ति यज्ञेन' इत्यादि श्रुति लेनी चाहिए और स्मृतिसे 'अनाश्रितः कर्मफलम्' (कर्मफलकी अभिलाषा न करके जो यज्ञ आदिका अनुष्ठान करता है, उसे विद्या-प्राप्ति होती है) इत्यादिका ग्रहण करना चाहिए ।

* राजसूयवाक्यमें कर्त्रादिगुणविशिष्ट अपूर्व कर्मकी ही विधि मानी गई है, अतः वाक्यभेद प्रसक्त नहीं है, अतः उसमें राजशब्दकी कर्तृरूप गुणविधायकता युक्त है, यह भाव है ।

† पूर्वोक्त तीन विकल्पोंमें से तृतीय विकल्पका इस ग्रन्थसे परिहार करते हैं। कर्तृत्वरूपसे राजामें विधेयताके न होनेपर भी राजाका ही राजसूय यज्ञमें अधिकार सिद्ध होता है, क्योंकि राजशब्दकी सन्निधिसे स्वाराज्यकामशब्द क्षत्रियपरक है, ऐसा स्वभावतः ज्ञात हो सकता है, अन्यथा राजपद व्यर्थ होगा, इस अभिप्रायसे जिनके मतमें राजाकी कर्तृत्वरूपसे विधि नहीं मानी जाती है, उनके मतमें, यह अर्थ है ।

‡ क्योंकि विद्याके हेतु यज्ञ आदिमें जैसे शूद्रका निषेध है, वैसे क्षत्रिय और वैश्यका निषेध नहीं है, अतः ब्राह्मणके समान उनका भी अधिकार है, यह भाव है ।


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विद्यार्थ कर्मोंमें शूद्रका अनधिकार] भाषानुवादसहित ४३५


कारपर्यवसानमित्युपपद्यते । अन्यत्र त्रैवर्णिकाधिकारिकत्वेन क्लृप्तानामिहापि त्रैवर्णिकाधिकारात्मविद्यार्थत्वेन विधीयमानानां यज्ञादीनां त्रैवर्णिकाधिकारित्वस्य युक्ततया विधिसंसर्गहीनब्राह्मणपदसमभिव्याहारमात्रादधिकारसंकोचासम्भवेन ब्राह्मणपदस्य यथाप्राप्तविद्याधिकारिमात्रोपलक्षणत्वौचित्यात् ॥ ३ ॥

वैदिकत्वात्तु विद्यायाः शूद्रस्यानधिकारिता ।

विद्याके वैदिक होनेसे—वेदगम्य होनेसे—उसमें शूद्रका अधिकार नहीं है ।

ननु विद्याधिकारिमात्रोपलक्षणत्वे शूद्रस्यापि विद्यायामर्थित्वादि-


लाभ होता है अतः ब्राह्मणका† ही अधिकार फलतः सिद्ध.होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जिन यज्ञोंमें तीनों वर्णोंका अधिकार कर्मकाण्डमें निश्चित किया गया है, वे ही यज्ञ प्रकृत विविदिषा वाक्यमें आत्मज्ञानके, जिनमें कि तीनों वर्ण अधिकृत हैं, उत्पादन के लिए—विधीयमान हैं, अतः उनमें तीनों वर्णोंका अधिकार युक्तियुक्त होनेसे विधिसंसर्गसे* हीन ब्राह्मणपदकी सन्निधिसे अधिकारका सङ्कोच नहीं हो सकता है, अतः 'ब्राह्मणा विविदिषन्ति' इस श्रुतिमें ब्राह्मणशब्द यथाप्राप्त सामान्य विद्याधिकारीका उपलक्षण है, यही मानना उचित है ॥ ३ ॥

† अब शङ्का होती है कि यदि विविदिषावाक्यमें ब्राह्मणशब्दको विद्याधिकारीमात्रका उपलक्षण माना जाय, तो शूद्र भी विद्यामें अभिलाषा आदि कर सकता है, अतः वह भी विद्याके उपयुक्त कर्मोंमें अधिकृत होगा ?


* विधिसंसर्गहीन अर्थात् उद्देश्यके समर्पण द्वारा अथवा विधेयके समर्पण द्वारा विधि-वाक्यार्थके अन्वयबोधमें ब्राह्मणशब्द अनुपयोगी है, राजसूय यज्ञका अन्यत्र विधान न होनेसे वर्णत्रयाधिकारता उसमें क्लृप्त नहीं है, अतः विधिसंसर्गहीन राजपदके समभिव्याहारसे राजसूयवाक्यमें राजकर्तृताका नियम है। यदि शङ्का हो कि उक्त प्रकारसे विद्यार्थ कर्मोंमें क्षत्रिय और वैश्यके समान ब्राह्मणका भी अधिकार सिद्ध ही है, तो ब्राह्मण ग्रहण व्यर्थ है, तो युक्त नहीं है, क्योंकि विद्यार्थ कर्मोंमें ब्राह्मणका मुख्य अधिकार है, ऐसा सूचित करनेके लिए ब्राह्मणका ग्रहण है, यह भाव है ।

† शङ्काका तात्पर्य यह है कि विद्या तो विधेय नहीं है, अतः उसमें अधिकार विद्यार्थित्वरूप ही होगा, और यह अर्थित्वरूप अधिकार शूद्रको भी हो सकता है, इसलिए क्षत्रिय आदिके समान शूद्रका भी विद्यार्थ कर्मोंमें अधिकार निवृत्त नहीं कर सकते हैं ।

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४३६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

सम्भवनेन तस्यापि विद्यार्थकर्माधिकारप्रसङ्ग इति चेद्, न; ‘अध्ययन-गृहीतस्वाध्यायजन्यतदर्थज्ञानवत एव वैदिकेष्वधिकारः’ इत्यपशूद्राधिकरणे (उ० मी० अ० १ पा० ३ सू० ३४) अध्ययनवेदवाक्यश्रवणादिविधुरस्य शूद्रस्य विद्याधिकारनिषेधात् । ‘न शूद्राय मतिं दद्याद्’ इति स्मृतेरपाततोऽपि तस्य विद्यामहिम्नावगत्युपायासम्भवेन तदर्थित्वानुपपत्तेश्च तस्य विद्यायामनधिकारादिति केचित् ।

केचित् पौराणिके ज्ञाने तस्याप्याहुरधिक्रियाम् ॥ ८ ॥

कोई लोग पौराणिक ज्ञानमें शूद्रका भी अधिकार मानते हैं ॥ ८ ॥

अन्ये त्वाहुः—शूद्रस्याप्यस्त्येव विद्यार्थकर्माधिकारः, तस्य वेदानु-

तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि विधिवत् अध्ययनसे [ वेदसे ] उत्पन्न होनेवाले ज्ञानसे युक्त पुरुषको ही वैदिक कर्मोंमें अधिकार है, अन्यका नहीं, इस प्रकार अध्ययनसे प्राप्त वेदवाक्योंके श्रवणसे रहित शूद्रका अपशूद्राधिकरणमें † ॰ विद्यामें अधिकारनिषेध किया गया है और ‘न शूद्राय मतिं दद्यात्’ (शूद्रको शास्त्रार्थ ज्ञान नहीं देना चाहिए) इस प्रकार की स्मृतिसे साधारणरूपसे भी विद्याकी महिमासे अर्थात् विद्यारूप ब्रह्मप्राप्तिके साधनसे ज्ञानसाधनका असम्भव होनेसे शूद्रमें विद्यार्थिता ही नहीं हो सकती है, अतः शूद्रका विद्यामें अधिकार है ही नहीं, ऐसा कुछ लोग कहते हैं ।

※अन्य कुछ लोग कहते हैं कि शूद्रका भी विद्याके उपयोगी कर्मोंमें अधिकार है । यद्यपि शूद्रका वेदाध्ययन और अग्निहोत्र आदिमें अधिकार नहीं


  • • 'शुगस्य तदनादरश्रवणात्तदाद्रवणात् सूच्यते हि' इस सूत्रसे आरब्ध अधिकरण अपशूद्राधिकरण कहलाता है, इसमें निर्णय किया गया है कि शूद्रका श्रुतिप्रतिपादित सगुण विद्यामें और निर्गुण ब्रह्मविद्याके साधन यज्ञ आदिमें अधिकार नहीं है, क्योंकि उसने वेदाध्ययन नहीं किया है। और वेदार्थानुष्ठानमें अध्ययनविधिसे सम्पादित वेदजन्य ज्ञान अपेक्षित है, अतः सगुण और निर्गुण ब्रह्मविद्यामें शूद्रका अधिकार है ही नहीं, इसीलिए तस्माच्छूद्रो यज्ञेऽनवक्लृप्तः (तै—सं) 'शूद्रो विद्यायामनवक्लृप्तः' ये उक्तार्थमें प्रमाणभूत भी हैं।
  • † 'शूद्रका भी विद्यार्थ कर्मोंमें अधिकार प्रसक्त होगा' इसे इष्टापत्ति मानकर उक्त आक्षेपका समाधान करते हैं।

विद्यार्थ कर्मामें शूद्रका अनधिकार ] भाषानुवादसहित ४३७


वचनाग्निहोत्राद्यसम्भवेऽपि कण्ठोक्तसर्ववर्णाधिकारश्रीपञ्चाक्षरमन्त्रराजविद्या-दिजपपापक्षयहेतुतपोदानपाकयज्ञादिसम्भवाद्; 'वेदानुवचनेन यज्ञेन दानेन' इत्यादिपृथक्कारकविभक्तिश्रुतेः विधुरादीनां विद्यार्थजपदानादिमात्रानुष्ठाना-नुमतेश्च वेदानुवचनादिसमुच्चयानपेक्षणात् । न च शूद्रस्य विद्याया-मर्थित्वासम्भवः ।


है, तथापि † जिनमें सब वर्णोंके अधिकारका प्रतिपादन किया गया है, ऐसे श्रीपञ्चाक्षररूप मन्त्राधिराज विद्या आदिका जप, पापक्षयके हेतुभूत-तप, दान, पाकयज्ञ आदिमें अधिकार है और 'वेदानुवचनेन' ( वेदाध्ययनसे ), 'यज्ञेन' ( यज्ञसे ) 'दानेन' ( दानसे ) इत्यादि अलग अलग कारकविभक्तिका श्रवण होनेसे विधुर आदिको विद्यार्थ जप, दान आदिके अनुष्ठानकी अनुमति होनेसे वेदानुवचन आदिके ‡ समुच्चयकी अपेक्षा नहीं है। और शूद्रकी विद्यामें अर्थिता ( अधिकारिता ) नहीं है, ऐसा भी नहीं कह सकते हैं, क्योंकि


† किं तस्य बहुभिर्मन्त्रैः किं तीर्थैः किं तपोऽध्वरैः ।
यस्यो नमः शिवायेति मन्त्रो हृदयगोचरः ॥
मन्त्राधिराजराजो यस्तार्यवेदान्तशेखरः ।
सर्वज्ञाननिधानश्च सोऽयं शैवषडक्षरः ॥
प्रणवेन विना मन्त्रः सोऽयं पञ्चाक्षरः स्मृतः ।
स्त्रीभिशूद्रैश्च सङ्कीर्णैर्ध्यायते मुक्तिकांक्षिभिः ॥ ( ब्रह्मोत्तर खण्ड )

अर्थात् इन प्रमाणोंसे यह प्रतीत होता है कि जिसके हृदयमें ॐ नमः शिवाय यह मन्त्र है, उसको अनेक मन्त्रोंसे, अनेक तीर्थोंसे एवं अनेक प्रकारके तप और यज्ञोंसे कुछ भी प्रयोजन नहीं है। यह सब मन्त्रोंका अधिराज है, सब वेदान्तोंका मूर्धन्य है, सब ज्ञानोंका खजाना है। और यह 'ॐ नमः शिवाय' मन्त्र यदि प्रणव ( ॐ कार ) से रहित हो, तो इसे पञ्चाक्षर कहते हैं, इसी पञ्चाक्षर मन्त्रको मुक्तिके अभिलाषी स्त्री, शूद्र आदि तथा सङ्कीर्ण जातिके लोग मुक्तिके लिए भजते हैं ।

‡ 'वेदानुवचनेन विविदिषन्ति' 'यज्ञेन विविदिषन्ति' इत्यादि रूपसे प्रत्येकमें साधनताकी प्रतीति होनेसे समुच्चयकी अपेक्षा नहीं है, यदि समुच्चयकी विवक्षा होती, तो 'वेदानुवचनयज्ञदान-तपोभिर्विविदिषन्ति' ऐसा वाक्य होता और पृथक् कारकविभक्तिके श्रवणमें भी वेदानुवचनेन च, यज्ञेन च, इत्यादि चकारघटित वाक्य होता, अतः समुच्चयकी विवक्षा नहीं है, यह भाव है ।

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४३८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद ]


'श्रावयेच्चतुरो वर्णान् कृत्वा ब्राह्मणमग्रतः' ।

इतीतिहासपुराणश्रवणे चातुर्वर्ण्याधिकारस्मरणेन पुराणाद्यवगतविद्यामाहात्म्यस्य तस्यापि तदर्थित्वसम्भवात् । 'न शूद्राय मतिं दद्याद्' इति स्मृतेश्च तदनुष्ठानानुपयोग्निहोत्रादिकर्मज्ञानदाननिषेधपरत्वात् । अन्यथा तस्य स्ववर्णधर्मस्याप्यवगत्युपायासम्भवेन 'शूद्रश्चतुर्थो वर्ण एकजातिस्तस्यापि सत्यमक्रोधश्शौचमाचमनार्थे पाणिपादक्षालनमेवैके श्राद्धकर्म भृत्यभरणं स्वदारतुष्टिः परिचर्या चोत्तरेषाम्' इत्यादितद्धर्मविभाजक-


'श्रावयेत्०' (ब्राह्मण चार वर्णोंको पुराण आदि सुनावे, यदि क्षत्रिय आदिको पुराण आदि सुनाना हो तो ब्राह्मणको आगे करे) इस प्रकार स्मृति, पुराण और इतिहासके श्रवणमें चारों वर्णोंका अधिकार प्रतिपादित होनेसे जिस शूद्रने पुराण आदिसे विद्याका माहात्म्य जाना है, ऐसे शूद्रको भी विद्याकी अधिकारिता प्राप्त हो सकती है। 'न शूद्राय' इस प्रकारकी पूर्वोक्त स्मृति शूद्रके अनुष्ठानके अनुपयोगी अग्निहोत्रादि कर्म, ज्ञान और दानका निषेध करनेवाली है। यदि सम्पूर्ण शास्त्रविषयक ज्ञानके निषेधमें ही 'न शूद्राय' इत्यादि वचनका तात्पर्य माना जाय, तो उसको अपने वर्णधर्मके ज्ञानका साधन भी नहीं रहेगा, इससे 'शूद्रश्चतुर्थो वर्णः०' * अर्थात् शूद्र चौथा वर्ण है, उसका एक ही जन्म है (क्योंकि उपनयनरूप द्वितीय जन्म उसका नहीं है) उसका भी सत्य, अक्रोध, शुद्धता किसीके मतसे आचमनकी जगहमें हाथ और पैरका प्रक्षालनमात्र, श्राद्धकर्म, भृत्य, स्त्री आदिका पोषण, अपनी समानजातीय भार्यासे निर्वाह और ऊपरके ब्राह्मण आदि तीन वर्णोंकी


* गौतम धर्मसूत्रके दशम अध्यायमें ४९ वें सूत्रसे इस शूद्रधर्मका विभाग किया गया है, तात्पर्य यह है कि यद्यपि 'न शूद्राय मतिं दद्यात्' इत्यादि शास्त्रसे शूद्रोंको शास्त्रार्थज्ञानका दान निषिद्ध भासता है, तथापि

वृद्धौ च मातापितरौ भार्या साध्वी सुतः शिशुः ।
अप्यकार्यशतं कृत्वा भर्तव्या मनुरब्रवीत् ॥

इत्यादि वचनके अनुसार जो ब्राह्मण अपने माता, पिता, सती स्त्री, और पुत्र आदिका पोषण करनेके लिए शूद्रोंके प्रति पुराण आदिके पठनमें प्रवृत्त होते हैं उनसे शूद्रोंको अपना कर्तव्य और विद्यामाहात्म्य अवश्य ज्ञात हो सकता है, अतः कोई अनुपपत्ति नहीं हैं, यह भाव है।

विद्यार्थ कर्मोंमें शूद्रका अनधिकार] भाषानुवादसहित ४३९


वचनानामननुष्ठानलक्षणाप्रामाण्यापत्तेः । न चैवं सत्यपशूद्राधिकरणस्य निर्विषयत्वम् । तस्य— 'न शूद्रे पातकं किंचित् न च संस्कारमर्हति ।' इत्यादिस्मृतेर्गुरूपसदनाख्यविद्याङ्गोपनयनसंस्कारविधुरस्य शूद्रस्य सगुणविद्यासु निर्गुणविद्यासाधनवेदान्तश्रवणादिषु चाधिकारनिषेधपरत्वाद् निर्गुणविद्यायां शूद्रस्यापि विषयसौन्दर्यप्रयुक्तार्थित्वस्य निषेद्धुमशक्य-

सेवा ) इत्यादि शूद्रधर्मोंके विभाजक वचनोंका अननुष्ठानात्मक अप्रामाण्य प्रसक्त होगा । यदि शङ्का हो कि उक्त प्रकारसे यदि शूद्रका भी विद्याके उपयोगी कर्मोंमें अधिकार माना जाय, तो अपशूद्राधिकरण निर्विषयक अर्थात् व्यर्थ-सा होगा ? तो यह भी युक्त नहीं † है, क्योंकि उस अधिकरणका— 'न शूद्रे पातकं किञ्चित्०' (शूद्रको अभक्ष्यभक्षण आदिसे कोई पाप नहीं होता है और अध्ययनाङ्ग उपनयनात्मक संस्कार अथवा विद्याङ्ग उपगमना- त्मक संस्कार भी उसके नहीं होते हैं) इत्यादि स्मृतिसे गुरूपसदनात्मक* विद्याके प्रति अङ्गभूत उपनयनरूप संस्कारसे रहित शूद्रका सगुण विद्यामें और निर्गुण विद्याके साधन वेदान्तके श्रवण आदिमें—अधिकारके निषेधमें ही तात्पर्य है, इससे निर्गुण विद्यामें विषयकी सुन्दरतासे होनेवाली शूद्रकी अर्थिताका निषेध नहीं कर सकते हैं । निर्गुण विद्याके विधेय† न होनेसे उससे भिन्न अधिकारिताकी प्रसक्ति नहीं है, अतः निर्गुण विद्यामें विषयसौन्दर्यप्रयुक्त अर्थित्वका निषेध


† अपशूद्राधिकरणमें शूद्रका विद्यामें अनधिकार बतलाया गया है, विद्यामें उपयुक्त कर्मोंमें शूद्रका अधिकार नहीं है, यह बतलानेके लिए नहीं है, किन्तु वेदान्तके श्रवण आदिमें शूद्रका अधिकार नहीं है, इस प्रकार प्रतिपादन करता है, इस अभिप्रायसे 'तस्य न शूद्रे' इत्यादि ग्रन्थसे परिहार करते हैं ।

* शिष्यरूपसे अङ्गीकार करके अपने समीपमें स्थापनरूप विद्याङ्ग उपनयन आचार्य करता है, इस उपनयनको गुरूपसदन इसलिए कहते हैं कि वह शिष्यकर्तृक गुरूपसदनपूर्वक है, 'तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्' (ब्रह्मको जाननेके लिए गुरुजीके पास जाना चाहिए।) इस श्रुतिसे विद्याङ्गरूपसे गुरूपसदनका विधान है 'तं होपनिन्ये' (उसका उपनयन किया) इस श्रुतिसे विद्याङ्ग उपनयन भी प्रतीत होता है ।

† स्वर्गानुभवके समान ब्रह्मानन्दरूप निर्गुण विद्याके फलरूप होनेसे उसमें विधेयता नहीं है, क्योंकि जो फल होता है, वह विधेय नहीं होता, इसलिए जैसे स्वर्गानुभव आदि फलमें स्वर्गार्थितामात्र अधिकार है, वैसे निर्गुण विद्यामें भी निर्गुणविद्यार्थितारूप ही अधिकार है,

४४०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

त्वात्। अविधेयायां च तस्यां तदतिरिक्ताधिकाराप्रसक्त्या तन्निषेधायोगाच्च। न च तस्य वेदान्तश्रवणासम्भवे विद्यार्थकर्मानुष्ठानसम्भवेऽपि विद्यानुत्पत्तेस्तस्य तदर्थकर्मानुष्ठानं व्यर्थमिति वाच्यम्, तस्य वेदान्तश्रवणाधिकाराभावेऽपि भगवत्पादैः-‘श्रावयेच्चतुरो वर्णान्’ इति चेतिहासपुराणाधिगमे चातुर्वर्ण्याधिकारस्मरणाद् वेदपूर्वस्तु नास्त्यधिकारः शूद्राणामिति स्थितम्’ इति अपशूद्राधिकरणोपसंहारभाष्ये ब्रह्मात्मैक्यपरपुराणादिश्रवणे विद्यासाधनेऽधिकारस्य दर्शितत्वाद्। विद्योत्पत्तियोग्य-

नहीं कर सकते हैं। यदि शङ्का हो कि शूद्रका वेदान्तके श्रवणमें अपशूद्राधिकरणन्यायसे अधिकार न होनेके कारण विद्यार्थ जपादि कर्मोंका अनुष्ठान करनेपर भी विद्याकी उत्पत्ति नहीं होगी, इसलिए विद्याके लिए किया गया कर्म निरर्थक ही है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि यद्यपि वेदान्त श्रवणमें शूद्रका अधिकार नहीं है, तथापि ‘श्रावयेत् चतुरो वर्णान्’ इस प्रकार इतिहास और पुराणके ज्ञानमें चारों वर्णोंके अधिकारप्रतिपादक स्मृतिवचन होनेसे शूद्रोंका वेदपूर्वक ही अधिकार नहीं है, यह बात ज्ञात होती है, इस प्रकारके अपशूद्राधिकरणके उपसंहारभाष्यमें भगवान् श्रीशङ्कराचार्यने जीव-ब्रह्मके ऐक्यबोधक पुराण आदिके श्रवणमें, जो कि ब्रह्मज्ञानका साधन है, अधिकार बतलाया है। विद्याकी उत्पत्तिमें योग्य‡ शुद्ध दिव्य शरीरके


उसका निषेध नहीं कर सकते हैं, क्योंकि विधेयभूत उपासना आदिमें अन्य अधिकारि विशेषणकी अपेक्षा होती है, इसलिए दृष्टान्त विषम है, यह भाव है।

‡ यद्यपि ‘श्रावयेत् चतुरो वर्णान्’ इस वचनसे शूद्रको पुराण आदिके श्रवणमें आज्ञा मिलती है, तथापि, मनन आदिमें आज्ञाके न होनेसे मनन आदिका अनुष्ठान नहीं हो सकता है, यदि शङ्का हो कि मनन आदि तो श्रवणके अङ्ग ही हैं, अतः उनका अङ्गीके अभ्यनुज्ञानसे ही अभ्यनुज्ञान होगा ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रयाज और दर्शपूर्णमासके समान प्रकृतमें अङ्गाङ्गिभाववोधक प्रमाणके न रहनेसे श्रवण, मनन आदिमें परस्पर अङ्गाङ्गिभावव्यवहार केवल औपचारिक ही प्रतीत होता है, इसलिए शूद्रका अद्वैतवेदान्तश्रवणमें अधिकारके न रहनेपर भी उससे विद्याकी उत्पत्ति नहीं होनेके कारण विद्यार्थ कर्मोंके अनुष्ठानका नैरर्थक्य ज्यों का त्यों है, इस अस्वरससे इस ग्रन्थका उपक्रम है। अथवा ‘इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत्’ (इतिहास और पुराणोंसे वेदका उपबृंहण करे अर्थात् मीमांसानुसारी इतिहास और पुराणोंके वचनानुसार यथार्थ निर्णीतार्थमें वेदका स्थापन करे) इत्यादि वचनोंसे इतिहास आदिका ब्रह्मात्मैक्यवोधकभाग वेदान्तश्रवणजनित वेदान्तार्थ ज्ञानका उपकारकमात्र प्रतीत होता है, वेदान्तश्रवणकी उपेक्षा करके स्वतन्त्ररूपसे ब्रह्मात्मैक्यज्ञानजनक प्रतीत नहीं होता है, इसीसे

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विद्यामें संन्यासकी उपयोगिताका निरूपण] भाषानुवादसहित ४४१


विमलदेवशरीरनिष्पादनद्वारा मुक्त्यर्थत्वं भविष्यतीति त्रैवर्णिकानां क्रममुक्तिफलकसगुणविद्यार्थकर्मानुष्ठानवद् वेदान्तश्रवणयोग्यत्रैवर्णिकशरीरनिष्पादनद्वारा विद्योत्पत्त्यर्थत्वं भविष्यतीति शूद्रस्य विद्यार्थकर्मानुष्ठानाविरोधाच्च। तस्मात् विविदिषावाक्ये ब्राह्मणपदस्य यथाप्राप्तविद्याधिकारिमात्रविषयत्वेन शूद्रस्याऽपि विद्यार्थकर्माधिकारः सिध्यत्येवेति ॥ ४ ॥

संन्यासस्याऽत्र किन्द्वारेणोपयोगः—
विद्यामें संन्यासका किस द्वारा उपयोग है ?

नन्वस्तु कर्मणां चित्तशुद्धिद्वारा विद्योपयोगः, सन्न्यासस्य किंद्वारा तदुपयोगः ? ।


उत्पादन द्वारा सगुण ब्रह्मकी उपासना भी मुक्तिके लिए होगी, इस प्रकारके निश्चयसे तीनों वर्णोंका सगुण विद्याके लिए जिसका क्रमिक मुक्ति ही फल है, कर्मानुष्ठान जैसे होता है, वैसे ही वेदान्तश्रवणके लिए योग्य त्रैवर्णिक शरीरके निष्पादन द्वारा हमारे द्वारा किये गये धर्म विद्याकी उत्पत्तिमें हेतु होंगे, इस प्रकारके निश्चयसे शूद्रका विद्याके लिए कर्मोंके अनुष्ठानमें कोई विरोध नहीं है। इससे विविदिषावाक्यमें ब्राह्मणशब्द सामान्यतः प्राप्त सम्पूर्ण विद्याधिकारीके लिए ही प्रयुक्त है, इसलिए शूद्रका भी ब्रह्मज्ञानमें हेतुभूत कर्मोंमें अधिकार सिद्ध ही है ॥ ४ ॥

अब शङ्का होती है कि कर्म चित्तशुद्धिके द्वारा ब्रह्मविद्यामें उपयोगी भले ही हों, परन्तु संन्यासका ब्रह्मविद्यामें किस द्वारा उपयोग है ? [ अर्थात् अदृष्ट


उक्त वचनका पूर्वार्ध—‘बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरेदिति’ सङ्गत होता है। इस पूर्वार्धका यह भाव है—जिस पुरुषने केवल वेदका ही विचार किया है और इतिहास तथा पुराण नहीं देखे हैं, ऐसे पुरुषसे वेद डरता है कि यह अल्पश्रुत पुरुष मुझे मार डालेगा अर्थात् मेरे विचाररूप मीमांसामें न्यायाभासत्वादिशाङ्काये हमारा अन्य अर्थ करेगा। इस अवस्थामें वेदान्तश्रवणसे रहित शूद्र कदाचित् पुराणादि विज्ञान सम्पादन करे, तथापि उससे उसको ज्ञान नहीं हो सकता है। ‘श्रावयेत् चतुरो वर्णान्’ इत्यादि वचन भी शूद्रके अद्वैतपरक पुराण आदिका श्रवण अदृष्टार्थक है इस अभ्यनुज्ञापरक हैं। अपशूद्राधिकरणके भाष्यमें भी शूद्रका अद्वैत प्रतिपादक पुराणादिश्रवणमें अधिकारका वर्णन ‘बिभेत्यल्पश्रुताद्’ इत्यादि वचन नहीं है, यह मान कर ही किया गया है, अतः भाष्यसे विरोध भी नहीं है। इसलिए वेदान्तश्रवणमात्रसे साध्य विद्या श्रवण आदिके अभावमें शूद्रको सिद्ध नहीं हो सकती है, इस अस्वरससे यह ‘विद्योत्पत्तियोग्य’ इत्यादि ग्रन्थ है, यह भाव है।

५६

४४२सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

अत्र केचन ।

कर्माविनाश्यदुरितनाशद्वारेति चक्षते ॥ ९ ॥

इस विषयमें कुछ लोग कहते हैं कि जिस पापका कर्मसे विनाश नहीं होता है, उस पापके विनाश द्वारा संन्यास विद्यामें उपयोगी है ॥ ९ ॥

केचिदाहुः—विद्योत्पत्तिप्रतिबन्धकदुरितानामनन्तत्वात् किञ्चिद् यज्ञाद्यनुष्ठाननिवर्त्यम्, किञ्चित् सन्न्यासापूर्वनिवर्त्यमिति कर्मवच्चित्तशुद्धिद्वारैव सन्न्यासस्याऽपि तदुपयोगः । तथा च गृहस्थादीनां कर्मच्छिद्रेषु श्रवणाद्यनुतिष्ठतां न तस्मिन् जन्मनि विद्यावाप्तिः, किं जन्मान्तरे


द्वारा संन्यास ब्रह्मविद्यामें उपयोगी है या दृष्टद्वारा ? प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि विद्याकी उत्पत्तिमें प्रतिबन्धक पापोंकी यज्ञ आदिके अनुष्ठानसे उत्पन्न अदृष्टसे ही निवृत्ति होती है, अतः संन्यास निरर्थक ही है, द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि कोई दृष्ट द्वार देखा ही नहीं जाता है, अतः संन्यासका विद्यामें कोई उपयोग नहीं है, यह आक्षेपकर्ताका अभिप्राय है । ]

ॐ इस आक्षेपके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं—ब्रह्मविद्याके प्रादुर्भावमें प्रतिबन्धक अनेक पाप हैं, अतः उनमें से कई एक यज्ञ आदिके अनुष्ठानसे निवृत्त होते हैं और कई एक संन्यासजनित अपूर्वसे निवृत्त होते हैं, † इसलिए संन्यास भी चित्तकी शुद्धि द्वारा ही ब्रह्मविद्यामें उपयोगी है । इस परिस्थितिमें गृहस्थ आदि कर्मोंके अवकाश कालमें श्रवण आदिका अनुष्ठान भले ही करें, तथापि उस जन्ममें उनको ब्रह्मविद्याकी प्राप्ति नहीं होती है, किन्तु


* अदृष्ट द्वारा संन्यास विद्यामें उपयोगी है, इस मतका इस ग्रन्थसे समर्थन करते हैं ।

† यदि इसमें किसीको शङ्का हो कि संन्यासजन्य अपूर्व विद्याकी उत्पत्तिमें हेतु नहीं है, क्योंकि जिन्होंने संन्यास नहीं लिया है, उनमें से कोई एक विद्याके उद्देश्यसे श्रवण आदिका अनुष्ठान करते हैं, और कई एकको संन्यासके बिना ही विद्या भी हुई है, ऐसा देखा जाता है । इस शङ्काका 'तथा च' इससे परिहार किया जाता है । विद्याके प्रति संन्यासका दृष्ट द्वार नहीं देखा जाता है, अतः संन्यासविधिसे अदृष्ट द्वारा ही विद्याप्राप्तिके प्रति संन्यासकी हेतुता सिद्ध होनेसे, यह अर्थ है । यदि शङ्का हो कि संन्यासका भी चित्तविक्षेपनिवृत्तिरूप दृष्ट द्वार हो सकता है, क्योंकि विक्षिप्तचित्त पुरुषको ब्रह्मज्ञान नहीं हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि लौकिकवैदिक-कर्म करनेवाले पुरुषका भी चित्तविक्षेप प्रायः नहीं देखा जाता है, अतः संन्यास ही चित्तविक्षेपकी निवृत्तिमें कारण नहीं हो सकता है, यह भाव है ।

विद्यामें संन्यासकी उपयोगिताका निरूपणं ] भाषानुवादसहित ४४३


सन्न्यासं लब्ध्वैव। येषां तु गृहस्थानामेव सतां जनकादीनां विद्या विद्यते, तेषां पूर्वजन्मनि सन्न्यासात् विद्याऽवाप्तिः। अतो न विद्यायां सन्न्यासापूर्वव्यभिचारशङ्काऽपीति।

अन्ये त्वदृष्टद्वारेण श्रवणेऽस्याऽङ्गतां जगुः।

कुछ लोग कहते हैं कि अदृष्ट द्वारा संन्यास श्रवणमें अङ्ग है।

अन्ये तु 'शान्तो दान्त उपरतः' इत्यादिश्रुतौ उपरतशब्दगृहीततया सन्न्यासस्य साधनचतुष्टयान्तर्गतत्वात्, 'सहकार्यन्तरविधिः' इति (उ० मी० अ० ३ पा० ४ सू० ४७) सूत्रभाष्ये 'तद्वतो विद्यावतः सन्न्या-


दूसरे जन्ममें संन्यास लेकर ही ब्रह्मविद्याकी प्राप्ति होती है। जिन जनक प्रभृति गृहस्थाश्रमियोंको ही ब्रह्मविद्याकी प्राप्ति हुई है, उनको पूर्व जन्मके संन्याससे ब्रह्मविद्याकी प्राप्ति हुई है, ऐसा समझना चाहिए। इसलिए संन्यासजनित अपूर्वका ब्रह्मविद्यामें व्यभिचार नहीं है।

* कुछ लोग कहते हैं कि 'शान्तो दान्त उपरतः' (शमसे युक्त, दमसे युक्त, और नित्यकर्मोंके त्यागसे युक्त) इत्यादि श्रुतिमें संन्यासका उपरतशब्दसे कथन होनेके कारण, वह साधनचतुष्टयके अन्तर्गत ही है, अतः 'सहकार्यन्तरविधिः' इस सूत्रके भाष्यमें—'तद्वतो' अर्थात् श्रवण आदिके अनुष्ठानमें उपयोगी सामान्यज्ञानसे युक्त संन्यासीके लिए बाल्य और पाण्डित्यकी


• संन्यासके अदृष्टद्वारकात्वपक्षका अवलम्बन करके ही संन्यासपूर्वक श्रवण आदिके अधिकारीके विशेषणरूपसे विद्यामें उपयोग है, इसे सप्रमाण साबित करते हैं। 'शान्तो दान्त उपरतः' के आगे 'तितिक्षुः समाहितः श्रद्धावित्तो भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्येत्' इतना और श्रुतिका भाग है। शमः—आन्तर इन्द्रियोंका निग्रह, दमः—बाह्य इन्द्रियोंका निग्रह, उपरतिः—नित्यकर्मोंका त्याग, तितिक्षुः—शीतोष्णादि-द्वन्द्वसहिष्णु अर्थात् शीतोष्णजन्य दुःखदिका सहन करनेवाला, समाहितः—श्रवण आदिके लिए अपेक्षित चित्तकी एकाग्रता, श्रद्धावित्त—देवता, वेदान्तवाक्य आदिमें विश्वास ही द्रव्य जिसका है, ऐसा होकर अपने कार्यकारणसंघातमें कार्यकारणसंघातके साक्षीरूप आत्माको 'मैं आत्मा हूँ' इस प्रकार देखे, यह उक्त श्रुतिका अर्थ है। यद्यपि 'शान्तो दान्तः' इस प्रकार शम और दमकी विधायक श्रुतिसे ही कर्ममात्रका निवारण हो सकता है, इससे उपरतिविधायक अग्रिम श्रुति व्यर्थसी भासती है, तथापि वह व्यर्थ नहीं है, क्योंकि शम, दम विधायकश्रुतिके सामान्य होनेसे उसका नित्यकर्मविधायक विशेषशास्त्रसे बाध हो सकता है, अतः उपरतिविधायकश्रुतिकी आवश्यकता है।

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४४४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

सिनो बाल्यपाण्डित्यापेक्षया तृतीयमिदं मौनं विधीयते, 'तस्मात् ब्राह्मणः पाण्डित्यम्' इत्यादिश्रुतौ ततः प्राग् 'भिक्षाचर्यं चरन्ति' इति 'सन्न्यासाधिकाराद्' इति प्रतिपादनात्,

'त्यक्ताशेषक्रियस्यैव संसारं प्रजिहासतः ।
जिज्ञासोरेव चैकात्म्यं त्रय्यन्तेष्वधिकारिता ॥'

इति वार्त्तिकोक्तेश्च सन्न्यासापूर्वस्य ज्ञानसाधनवेदान्तश्रवणाद्यधिकारि-विशेषणत्वमिति तस्य विद्योपयोगमाहुः ।

दृष्टेन निर्विक्षेपेण नियमं त्वितरे बुधाः ॥ १० ॥

कई एक विद्वान् कहते हैं कि विक्षेपाभावरूप दृष्ट द्वारा अर्थात् अनन्यव्यापारता-रूप दृष्टद्वारा संन्यासका विद्यामें उपयोग है ॥ १० ॥

अपरे तु 'श्रवणाद्यङ्गतयाऽऽत्मज्ञानफलता सन्न्यासस्य सिद्धा' इति

(श्रवण और मननकी) अपेक्षा तीसरे निदिध्यासनका विधान किया जाता है, क्योंकि 'भूतकालीन ब्राह्मणोंने साधारणरूपसे आत्माको जानकर तत्त्वसाक्षात्कारके लिए संन्यासका ग्रहण किया था, इससे आधुनिक मुमुक्षु ब्राह्मण भी संन्यासका ग्रहण करके श्रवण आदिका अनुष्ठान करें' इस प्रकारकी श्रुतिमें 'तस्मात् ब्राह्मणः' इसके पूर्व 'भिक्षाचर्यां चरन्ति' (भिक्षावृत्तिका अनुष्ठान करते हैं) इस तरह संन्यासका अधिकार है—ऐसा प्रतिपादन किया गया है।

और * 'त्यक्ताशेष०' (जो ऐहिक आमुष्मिक विषयभोगका त्याग करनेकी इच्छा रखता है, जो सम्पूर्ण नित्यनैमित्तिक क्रियाओंका परित्याग करके स्थित है और जो जीव ब्रह्मके ऐक्यको जाननेकी इच्छा करता है, उसीका वेदान्तशास्त्रोंमें अधिकार है) इस प्रकार वार्त्तिककारकी उक्तिसे ज्ञात होता है कि संन्यासजनित अपूर्वका ज्ञानके प्रति साधनभूत वेदान्तके श्रवण आदिमें अधिकारीके विशेषणरूपसे कथन है, अतः संन्यासका विद्यामें ही उपयोग है।

† कुछ लोग कहते हैं कि 'श्रवण आदिके अङ्ग होनेके कारण संन्यासका


* सम्बन्ध वार्त्तिकके १० वें पृष्ठमें यह श्लोक है [ आनन्दाश्रम, पूना मुद्रित ] ।
† संन्यासका दृष्ट द्वारा विद्यामें उपयोग है, इस द्वितीय पक्षका अवलम्बन करके उसका समर्थन करते हैं। 'श्रवणाद्यङ्गतया' इत्यादि विवरणका तात्पर्य यह है कि कुछ समयके लिए अनुष्ठित श्रवण विद्योदयद्वारा अमृतत्वका साधन नहीं हो सकता, किन्तु सर्वदा किया हुआ

विद्यामें संन्यासकी उपयोगिताका निरूपण ] भाषानुवादसहित ४४५


विवरणोक्तेरनन्यव्यापारतया श्रवणादिनिष्पादनं कुर्वतस्तस्य विद्यायामु-
पयोगः, दृष्टद्वारे सम्भवति अदृष्टकल्पनायोगात् । यदि त्वनलसस्य धीमतः पुरुषधौरेयस्याऽऽश्रमान्तरस्थस्याऽपि कर्मच्छिद्रेषु श्रवणादि सम्पद्यते,


फल ब्रह्मज्ञान सिद्ध ही है' इस प्रकारकी विवरणकारकी उक्तिसे अनन्य-व्यापाररूपसे श्रवण आदिकी उत्पत्ति कराता हुआ सन्न्यास विद्यामें ही उपयोगी है, जब दृष्ट द्वार मिल सकता है, तब तो अदृष्ट द्वारकी कल्पना करना अयुक्त ही है। यदि अन्य आश्रमस्थ होते हुए भी आलस्यरहित किसी बुद्धिमान् † धीर पुरुषको कर्मजालमें रहते श्रवण आदिकी उत्पत्ति हो


श्रवण ही अमृतत्वका (मोक्षका) साधन होता है, क्योंकि 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' 'आसुप्तेरामृतेः कालं नयेद्वेदान्तचिन्तया' इत्यादि अनेक श्रुति और स्मृतियाँ हैं' इसलिए अनन्यव्यापाररूपसे श्रवण आदिके अनुष्ठानका विधान करनेवाला शास्त्र संन्यासकी अवश्य अपेक्षा रखता है, अतः गृहस्थाश्रमी-प्रभृति अपने आश्रमस्य कर्मोंमें सदा व्यग्र होनेके कारण श्रवण आदिका अनुष्ठान नहीं कर सकते हैं, इसी प्रकार विद्याके साधनरूपसे संन्यासका विधान करनेवाला शास्त्र भी द्वाररूपसे निरन्तर श्रवण आदिकी अपेक्षा करता है, क्योंकि संन्यास साक्षात् विद्याका साधन नहीं है, और यह भी कारण है कि जब दृष्ट द्वार मिलता हो, तो अदृष्ट द्वारकी कल्पना भी नहीं की जाती है, इसमें भी श्रवण आदि तत्त्वके व्यञ्जक होनेसे अर्थतः प्रधान हैं और तत्त्वका व्यञ्जक न होनेसे संन्यास गौण है, इस रीतिसे श्रवण आदिकी विधि और संन्यासकी विधिकी परस्पर अपेक्षा होनेके कारण एकवाक्यता होनेसे उन दो वाक्योंसे संन्यासरूप अङ्गसे युक्त मनन-निदिध्यासनसहित श्रवणका विधान होता है, अतः संन्यासके श्रवणाङ्गत्वबोधक शास्त्रके न होनेपर भी कोई हानि नहीं है।

अथवा उक्त विवरणकारके कथनका भाव यह है कि श्रवणविधि अपने साधनरूपसे विक्षेपकी निवृत्ति और विक्षेपनिवृत्तिके प्रति साधन संन्यासकी अपेक्षा करती है, क्योंकि विक्षिप्तचित्त पुरुषकी श्रवण आदिके अनुष्ठानमें प्रवृत्ति नहीं हो सकती है। गृहस्थ आदि भी अपने विहित कर्मोंके अनुष्ठान कालके अतिरिक्त कालमें भी अनेक विषयोंसे व्यग्र होनेके कारण विक्षिप्त ही रहते हैं, और संन्यासविधिसे भी, जो कि विक्षेपनिवृत्तिरूप दृष्ट द्वारा श्रवण आदिका सम्पादन कराकर विद्याका सम्पादन कराती है, संन्यासका विधान होनेसे उसका चरितार्थ हो सकता है, तो अदृष्टद्वारा विद्याके साधनीभूत संन्यासका विधान नहीं हो सकता, इसलिए पूर्वप्रतिपादनप्रकारके अनुसार विद्याके अङ्गरूपसे संन्यासकी ही विद्या फल है, अदृष्ट द्वारा नहीं है, यह सिद्ध है, इस पक्षमें 'अनन्यव्यापारतया' इसका विक्षेपनिवृत्तिद्वारा, यह अर्थ विवक्षित है।

† विषयोंसे इन्द्रियोंको हटानेकी अर्थात् इन्द्रियनिग्रह करनेकी सामर्थ्य जिस पुरुषमें है, और जो सत्त्वगुणप्रधान है एवं विषयोंमें दोषदर्शन जिसने किया है, ऐसे पुरुषको सांसारिक पदार्थोंसे गृहस्थाश्रममें रहनेपर भी विक्षेप नहीं हो सकता है, अतः संन्यासका फल जो

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४४६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ तृतीय परिच्छेद

तदा 'चतुर्ष्वाश्रमेषु संन्यासाश्रमपरिग्रहेणैव श्रवणादि निर्वर्तनीयम्' इति नियमोऽभ्युपेय इति ॥ ५ ॥

क्षत्रियादेरसन्न्यासाच्छ्रवणादि कथं भवेद् ।
संन्यास न होनेके कारण श्रवण क्षत्रियादिको कैसे हो सकता है ?

नन्वस्मिन् पक्षद्वये क्षत्रियवैश्ययोः कथं वेदान्तश्रवणाद्यनुष्ठानम् ; संन्यासस्य ब्राह्मणाधिकारित्वाद् 'ब्राह्मणो निर्वेदमायाद्' 'ब्राह्मणो व्युत्थाय' 'ब्राह्मणः प्रव्रजेद्' इति संन्यासविधिषु ब्राह्मणग्रहणात् ।
'अधिकारिविशेषस्य ज्ञानाय ब्राह्मणग्रहः ।
न संन्यासविधिर्यस्माच्छ्रुतौ क्षत्रियवैश्ययोः ॥' इति-
वार्त्तिकोक्तेश्चेति चेत्,
तत्र केचन सन्न्यासमाहुः क्षत्रियवैश्ययोः ॥ ११ ॥
इस विषय कोई लोग कहते हैं कि क्षत्रिय और वैश्योंका भी संन्यास है ॥११॥

सकती है, तो यह नियम मानना चाहिए कि चारों आश्रमोंमें संन्यास आश्रमका ग्रहण करके ही श्रवण आदिका सम्पादन करना चाहिए ॥५॥

अब शङ्का होती है कि इन दो पक्षोंमें अर्थात् संन्यासके अधिकारीके प्रति विशेषणत्व और श्रवणाङ्गत्व पक्षमें क्षत्रिय और वैश्य वेदान्तके श्रवण आदिका अनुष्ठान कैसे कर सकते हैं, क्योंकि ब्राह्मण ही संन्यासमें अधिकारी है, कारण कि 'ब्राह्मणो०' ( ब्राह्मण ही वैराग्यपूर्वक संन्यास करे ) 'ब्राह्मणो व्युत्थाय' (ब्राह्मण संन्यासका ग्रहण करके) 'ब्राह्मणः प्रव्रजेत्' ( ब्राह्मण संन्यासका ग्रहण करे ) इत्यादि संन्यासके विधायक वाक्योंमें ब्राह्मणका ही ग्रहण किया गया है ।

और 'अधिकारिविशेषस्य०' ( विशेष अधिकारीके परिज्ञानके लिए ब्राह्मणका ग्रहण किया गया है, क्योंकि श्रुतिमें कहींपर भी क्षत्रिय और वैश्यकी संन्यासविधि नहीं है ) ऐसा वार्त्तिकका वचन भी है ।


विक्षेपका अभाव है, वह संन्याससे भिन्न साधन द्वारा भी प्राप्त होता है, इसलिए विधित्सितं (विधानके लिए अभीष्ट) संन्यासकी श्रवणादिमें अपेक्षित विक्षेप-निवृत्तिके प्रति पक्षमें प्राप्ति और पक्षमें अप्राप्ति दोनों हो सकती है, अतः संन्यासविधिको अपूर्वविधि नहीं मानना चाहिए, किन्तु नियमविधि ही माननी चाहिए ।

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क्षत्रिय और वैश्यका श्रवण आदिमें अधिकार ] भाषानुवादसहित ४४७


अत्र केचित्—'यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद्, गृहाद्वा, वनाद्वा' इत्याद्यविशेषश्रुत्या,

'ब्राह्मणः क्षत्रियो वाऽपि वैश्यो वा प्रव्रजेद् गृहात् ।
त्रयाणामपि वर्णानाममी चत्वार आश्रमाः॥'

इति स्मृत्यनुगृहीततया क्षत्रियवैश्ययोरपि सन्न्यासाधिकारसिद्धेः श्रुत्यन्तरेषु ब्राह्मणग्रहणं त्रयाणामुपलक्षणम् ; अत एव वार्त्तिकेऽपि 'अधिकारिविशेषस्य' इति श्लोकेन भाष्याभिप्रायमुक्त्वा—

'त्रयाणामविशेषेण सन्न्यासः श्रूयते श्रुतौ ।
यदोपलक्षणार्थं स्यात् ब्राह्मणग्रहणं तदा ॥'

इत्यनन्तरश्लोकेन स्वमते क्षत्रियवैश्ययोरपि सन्न्यासाधिकारो दर्शित इति तयोः श्रवणाद्यनुष्ठानसिद्धिं समर्थयन्ते ।

अन्ये तु ब्राह्मणस्यैव सन्न्यासो बहुधा श्रुतेः ।
देवादिवदसन्न्यासश्रवणं क्षत्रवैश्ययोः ॥ १२ ॥

कुछ लोग कहते हैं कि अनेक श्रुतियोंसे संन्यास केवल ब्राह्मणके लिए है, क्षत्रिय और वैश्यको देवादिके समान संन्यासके बिना श्रवण है ॥ १२ ॥


इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते है कि 'यदि वेतरथा०' (यदि ब्रह्मचर्य अवस्थामें ही वैराग्य उत्पन्न हुआ, तो ब्रह्मचर्यावस्थासे ही संन्यासका परिग्रहण करना चाहिए अथवा गृहस्थाश्रमसे या वानप्रस्थसे संन्यास लेना चाहिए) इस श्रुतिसे,

'ब्राह्मणः क्षत्रियो वाऽपि०' (ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य गृहस्थाश्रमसे संन्यासी हो सकते हैं, क्योंकि तीनों वर्णोंके लिए ये चार आश्रम हैं) इस स्मृतिके अनुगृहीत रूपसे, क्षत्रिय और वैश्यका भी संन्यासमें अधिकार सिद्ध है, अतः अन्य श्रुतियोंमें ब्राह्मणग्रहण तीनों वर्णोंका उपलक्षण है, इसीलिए वार्त्तिकमें 'अधिकारिविशेषस्य' इत्यादिसे भाष्यके अभिप्रायको कहकर—

'त्रयाणाम्०' (जब कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तीनोंका श्रुतिमें सामान्यरूपसे श्रवण होता है, तब ब्राह्मणशब्द तीनों वर्णोंका उपलक्षण ही है) इस प्रकारके पीछेके श्लोकसे अपने मतमें वार्त्तिककारने क्षत्रिय और वैश्यके भी श्रवण आदिके अनुष्ठानमें अधिकारका समर्थन किया है।

४४८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

अन्ये त्वनेकेषु सन्न्यासविधिवाक्येषु ब्राह्मणग्रहणात् उदाहृतजावालश्रुतौ सन्न्यासविधिवाक्ये ब्राह्मणग्रहणाभावेऽपि श्रुत्यन्तरसिद्धं ब्राह्मणाधिकारमेव सिद्धं कृत्वा 'सन्न्यासावस्थायाममयज्ञोपवीती कथं ब्राह्मणः' इति ब्राह्मणपरामर्शाच्च ब्राह्मणस्यैव सन्न्यासाधिकारः । विरोधाधिकरणन्यायेन ( पू० मी० अ० १ पा० ३ अधि० २ ) श्रुत्यविरुद्धस्यैव स्मृत्यर्थस्य


-भाष्यका अनुसरण करनेवाले कई लोग कहते हैं कि संन्यासके विधायक अनेक वाक्योंमें ब्राह्मणशब्दके ग्रहणसे 'यदि वेतरथा' इत्यादि जावालश्रुतिके संन्यासविधायक वाक्यमें ब्राह्मणग्रहणके न होनेपर भी अन्य श्रुतिसे सिद्ध अर्थात् 'ब्राह्मणो व्युत्थाय' इत्यादि श्रुतिसे ब्राह्मणका अधिकार निश्चित करके 'संन्यासावस्थायाम्' ( संन्यासावस्थामें यज्ञोपवीत न होनेके कारण वह कैसे ब्राह्मण* हो सकता है ? ) इस प्रकार ब्राह्मणका परामर्श करके संन्यासमें ब्राह्मणके ही अधिकारका प्रतिपादन किया गया है । क्योंकि विरोधाधिकरणन्यायसे† उसी स्मृतिके अर्थका परिग्रहण करना चाहिए, जो श्रुतिसे विरुद्ध


* अर्थात् तन्तुनिर्मित यज्ञोपवीत आदि ही ब्राह्मणत्वके व्यञ्जक हैं, अतः तन्तुनिर्मित यज्ञोपवीत आदिके न होनेसे यह परमहंस संन्यासी ब्राह्मण कैसे हो सकता है, यह आक्षेपका अभिप्राय है, यदि प्रकृतमें क्षत्रिय और वैश्यका भी संन्यास विवक्षित होता, तो 'कथं ब्राह्मणः' इसके समान 'कथं क्षत्रियः' 'कथं वैश्यः' ऐसा भी सुना जाता, परन्तु नहीं सुना जाता है, अतः उनका संन्यासमें अधिकार नहीं है, यह समुदितका भाव है ।

† इस अधिकरणमें श्रुति और स्मृतिके विरोधमें श्रुतिका ही प्रामाण्य अङ्गीकार किया गया है, जैसे कि ऐन्द्र यागमें सुना जाता है कि 'औदुम्बरीं स्पृष्ट्वोद्गायेत्' और 'औदुम्बरी सर्वा वेष्टयितव्या' पूर्वोक्त श्रुति है और दूसरी कात्यायनस्मृति है। औदुम्बरीसे उदुम्बरकी शाखा अथवा उदुम्बरकी बनाई हुई पशु बन्धनके लिए स्थूणा—यूप—विवक्षित है, इस अवस्थामें दोनोंका एक समय यागमें अनुष्ठान नहीं हो सकता, क्योंकि यदि स्मृतिके अनुसार औदुम्बरीका वस्त्रसे वेष्टन करेंगे, तो उसका स्पर्श नहीं हो सकेगा, श्रुतिके अनुसार स्पर्श माने, तो वेष्टन नहीं होगा, इसपर सिद्धान्त किया गया है—'श्रुत्या स्मृतिर्बाध्यते' अर्थात् श्रुतिसे स्मृतिका बाध होता है, इससे कात्यायनस्मृतिका उक्त श्रुतिसे बाध होगा, क्योंकि स्मृतिका प्रामाण्य श्रुतिमूलक है, स्वतः नहीं, और उक्त स्मृतिसे श्रुतिकी कल्पना भी नहीं कर सकते, क्योंकि प्रत्यक्ष 'औदुम्बरीं स्पृष्ट्वोद्गायेत्' इत्यादि श्रुतिसे उसकी कल्पकत्वशक्ति व्याहत होगी, प्रकृतमें भी 'तस्माद् ब्राह्मणः' इत्यादि श्रुतिमें संन्यासके अनुरोधसे 'ब्राह्मण संन्यास लेकर पाण्डित्य आदिका अनुष्ठान करे' इस प्रकारके वाक्यार्थका लाभ होनेसे 'विविदिषु द्वारा क्रियमाण विद्धार्थ संन्यासमें ब्राह्मणका ही अधिकार है' यह भगवान् वार्तिककारका मत है, यदि वार्तिकवचनका तात्पर्य

क्षत्रिय और वैश्यका श्रवणादिमें अधिकार ] भाषानुवादसहित ४४९


सङ्ग्राह्यत्वात् । यत्तु सन्न्यासस्य सर्वाधिकारित्वेन वार्त्तिकवचनं तत् 'विद्वत्संन्यासविषयम्, न तु आतुरविविदिषासन्यासे भाष्याभिप्रायविरुद्ध-सर्वाधिकारप्रतिपादनपरम् । 'सर्वाधिकारविच्छेदि विज्ञानं चेदुपैयते । कुतोऽधिकारनियमो व्युत्थाने क्रियते बलात् ॥' इत्यनन्तरश्लोकेन ब्रह्मज्ञानोदयानन्तरं जीवन्मुक्तिकाले विद्वत्संन्यास


नहीं हो। और जो कि 'संन्यासमें सभी त्रैवर्णिकोंका अधिकार है' इस अर्थकी पुष्टिमें पूर्वमें वार्त्तिककारका वचन दिया गया है' वह तो विद्वत्संन्यासविषयक है, आतुर और विविदिषासंन्यासमें भाष्यसे असम्मत सभीके‡ अधिकारका प्रतिपादनविषयक नहीं है।

※'सर्वाधिकार०' (क्षत्रिय और वैश्यको यदि सर्वाधिकारविच्छेदी विज्ञान हो जाय, तो सम्पूर्ण कर्मकी निवृत्तिरूप विद्वत्संन्यासमें भी विविदिषासंन्यासके समान ब्राह्मणोंका अधिकार है, यह नियम किस बलसे कर सकते हैं? अर्थात् किसी प्रमाणके बलसे नहीं कर सकते हैं' इस प्रकारके पीछेके श्लोकसे ब्रह्मज्ञानकी उत्पत्तिके बाद जीवन्मुक्तिकालमें विद्वत्संन्यासमें ही अधिकारके


भाष्यविरुद्ध अर्थमें माना जाय, तो संन्यासका सर्वसाधारणरूपसे प्रतिपादन करनेवाले स्मृतिवचनके समान वार्त्तिकवचन भी हेय-त्याज्य होगा, अतः वार्त्तिकवचन भी भाष्यके अविरुद्ध अर्थमें ही पर्यवसन्न है, इसी अभिप्रायसे 'तद् विद्वत्संन्यासविषयम्' इस अग्रिम मूलका उल्लेख किया गया है।

* विविदिषासंन्यासमें सभीका अधिकार नहीं है, इसमें यह दूसरा भी हेतु है, तात्पर्य यह है—क्षत्रिय और वैश्यके तत्त्वज्ञानका अधिकार है या नहीं? यदि नहीं है, तो जनक प्रभृतिके तत्त्वज्ञानके प्रतिपादक अनेक वचन विरुद्ध होंगे। यदि है, तो तत्त्वज्ञानसे कर्माधिकार प्रयोजक वर्णाश्रमादि अध्यासकी निवृत्ति होनेसे सकलकर्मनिवृत्तिरूप विद्वत्संन्यासमें क्षत्रिय और वैश्यके अधिकारका वारण नहीं कर सकते हैं, अतः विविदिषासंन्यासके समान विद्वत्संन्यासमें भी ब्राह्मणका ही अधिकार है, यह नियम नहीं बनेगा, विविदिषासंन्यास उसको कहते हैं—जिसका कि इस जन्ममें या जन्मान्तरमें अनुष्ठित वेदानुवचन आदिसे उत्पन्न ब्रह्मज्ञानकी इच्छासे ग्रहण किया जाय अर्थात् जिसमें दण्ड आदिका ग्रहण किया जाता है, ऐसा परमहंसाश्रम। और विद्वत्संन्यास उसे कहते हैं—जिसका कि श्रवण, मनन और निदिध्यासनसे परतत्त्वको जानकर ग्रहण किया जाता है, जैसे कि याज्ञवल्क्य प्रभृतिने ग्रहण किया था !

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