भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 447

ज्ञानकी उत्पत्तिमें कर्मोंके उपयोगका विचार ] भाषानुवादसहित ४१७


मेवोपयोगः किं न स्यात् ? न स्याद् ; प्रत्ययार्थस्य प्राधान्यात् । 'विद्यासंयोगात् प्रत्यासन्नानि विद्यासाधनानि शमदमादीनि, विविदिषासंयोगात्तु बाह्यतराणि यज्ञादीनि' इति सर्वापेक्षाधिकरणभाष्याच्च ( उ० मी० अ० ३ पा० ४ अधि० ६ सू० २७ ) । ननु विविदिषार्थं यज्ञाद्यनुष्ठातुर्वेदनगोचरेच्छावत्त्वे विविदिषायाः सिद्धत्वेन तदभावे वेदनोपायविविदिषायां कामनाऽसम्भवेन च विविदिषार्थं यज्ञाद्यनुष्ठानायोगाद् न यज्ञादीनां विविदिषायां


योग क्यों नहीं होता, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रकृत्यर्थ और प्रत्ययार्थमें प्रत्ययार्थ ही × प्रधान होता है। और 'विद्याके साक्षात् साधन होनेसे शम, दम आदि विद्याके अन्तरङ्ग कारण विद्याकी उत्पत्ति तक अनुष्ठेय हैं। तथा ब्रह्मज्ञानेच्छाके साधन होनेके कारण बहिरङ्ग यज्ञ आदि साधन विविदिषाकी उत्पत्ति तक ही अनुष्ठेय हैं, इस प्रकारका सर्वापेक्षाधिकरण-भाष्य † भी है। यदि शङ्का हो कि विविदिषाके लिए यज्ञ आदिका अनुष्ठान करनेवाले पुरुषको ज्ञानविषयक यदि पूर्वसे इच्छा विद्यमान है, तो विविदिषा सिद्ध ही है, यदि ज्ञानविषयिणी इच्छा उसे नहीं है, तो ज्ञानकी कारण विविदिषामें भी इच्छा नहीं हो सकती, अतः उभय था विविदिषाके लिए यज्ञादिका अनुष्ठान हो ही नहीं सकता है*, इसलिए विविदिषामें यज्ञ आदिका विनियोग युक्ति-युक्त नहीं है, तो


× तात्पर्य यह है कि 'स्वर्गकामो ज्योतिष्टोमेन यजेत' इत्यादि स्थलमें याग आदिमें विधिप्रत्ययसे इष्ट-साधनता बोधित होती है, वह इष्ट क्या है? इस प्रकारकी विशेष जिज्ञासा होनेपर पुरुषके विशेषणरूपसे श्रुत कामना और स्वर्ग दोनोंमें से किसी एककी भी शब्दतः प्रधानता प्रतीत न होनेसे आर्थिक प्रधानताका आश्रयण किया जाता है, और अर्थतः प्रधान है—स्वर्ग, इसलिए फलरूपसे उसीका अन्वय किया गया है—याग स्वर्गका साधन है। प्रकृतमें ज्ञानेच्छाका ही फलरूपसे अन्वय होता है, क्योंकि शब्दसे वही प्रधान प्रतीत होती है, इसलिए फलप्रत्यासत्ति आदि अकिञ्चित्कर हैं। प्रकृतमें भगवान् भाष्यकारकी भी सम्मति है।

† विविदिषामें ही कर्मोंका विनियोग है, इसमें भाष्य भी प्रमाण है, 'सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत्', इस सूत्रसे यह सर्वापेक्षाधिकरण आरब्ध है, देखिए—पृ० २२२२ अच्युतग्रन्थमालामुद्रित शाङ्करभाष्य।

* प्रकारान्तरसे विविदिषाविनियोगका आक्षेप करते हैं, भाव यह है कि यदि ज्ञानेच्छा यज्ञ आदिका फल है, तो ज्ञानेच्छाविषयक ज्ञानसे यज्ञ आदिका अनुष्ठान करना चाहिए और ज्ञानेच्छाके स्वतः फलत्व न होनेसे ज्ञान द्वारा ही उसमें मुक्तिफलकत्व होगा, इससे यह क्रम प्राप्त होगा कि पहले मुक्तिमें स्वतः पुरुषार्थत्वके ज्ञानसे इच्छा होगी, उसके बाद ब्रह्मज्ञानमें मुक्ति-

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