सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 446, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४१६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
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ब्रह्मावाप्तौ कण्ठगतविस्मृतकनकमालाऽवाप्तितुल्यायां विद्यातिरिक्तस्य साधनत्वासम्भवाच्च । ब्रह्मावाप्तौ परम्परया कर्मापेक्षामात्रपरा तादृशी स्मृतिः, क्व तर्हि कर्मणामुपयोगः ?
कर्मणामुपयोगस्तु भामतीकृन्मते स्थितः ।
तमेतमिति वाक्येन मुख्ये विविदिषोद्भवे ॥ २ ॥
भामतीकारके मतमें कर्मोंका उपयोग 'तमेतम्' इत्यादि वाक्यसे मुख्य विविदिषामें है ॥ २ ॥
अत्र भामतीमतानुवर्तिन आहुः—'तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन' इति श्रुतेर्विद्यासम्पादनद्वारा ब्रह्मावाप्त्युपायभूतायां विविदिषायामुपयोगः । ननु इष्यमाणविद्याया-
सिद्ध ( प्राप्त ) ब्रह्मकी प्राप्तिमें, जो कि गलेमें होते हुए भी विस्मृत सुवर्ण-मालाकी प्राप्तिके समान है, विद्यासे ( ज्ञानसे ) भिन्न कोई साधन हो ही नहीं सकता । अतः उक्त श्रुति ब्रह्मकी प्राप्तिमें केवल परम्परासे कर्मोंकी अपेक्षा ही बतलाती है, तो कर्मोंका उपयोग कहाँ है ?
इस विषयमें भामतीकारके अनुयायी कहते हैं कि 'तमेतं वेदा०' ( ब्रह्माभिन्न जीवको स्वाध्याय, यज्ञ, दान और अनाशक * तपसे ब्राह्मण लोग जाननेकी इच्छा करते हैं ) इस श्रुतिसे विद्याकी प्राप्ति द्वारा ब्रह्मप्राप्तिकी हेतुभूत विविदिषामें † कर्मोंका उपयोग है । यदि शङ्का हो कि ‡ इष्यमाण विद्यामें ही कर्मोंका उप-
प्राप्त हुई समझता है, वैसे ही मोक्षके प्राप्त होनेपर भ्रमकी निवृत्तिसे अप्राप्त वस्तु प्राप्त हुई, ऐसा समझता है, अतः समुच्चयवाद असङ्गत ही है, यह भाव है ।
* अर्थात् ऐसा तप करना चाहिए जिससे कि शरीरका विनाश न हो, इसलिए हित, मित, तथा पवित्र अशन करके ही तप करना चाहिए, अनशन आदि शरीरनाशक तप नहीं करना चाहिए, यह भाव है ।
† ब्रह्मज्ञानकी इच्छा, जो कि रुचिरूप है उसमें, यह अर्थ है ।
‡ शङ्काका बीज यह है कि विद्या ही साक्षात् मुक्तिके प्रति कारण है, इसलिए उसके प्रति ही यज्ञ आदिको कारण क्यों न माना जाय, जैसे अन्यत्र स्वर्गादिके प्रति, जो इष्यमाण-इच्छाके विषय हैं, यज्ञ आदिका विनियोग किया जाता है, प्रकृतमें इच्छाकी विषय विद्या है, इसलिए उसीमें यज्ञादिका अन्वय होना अभीष्ट है, यह भाव है ।