सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 445, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंज्ञानोत्पत्तिमें कर्मोंके उपयोगका विचार] भाषानुवादसहित ४१५
ॐ नमः परमात्मने
तृतीयः परिच्छेदः
ज्ञानेनैव कथं मुक्तिः कर्मभिश्चापि तत्स्मृतेः ।
नाविद्यकत्वाद् बन्धस्य नान्यः पन्था इति श्रुतेः ॥ १ ॥
यदि शङ्का हो कि ज्ञान ही से मुक्ति कैसे होगी ? क्योंकि कर्मसे भी मुक्ति होती है, ऐसी स्मृति है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि समग्रप्रपञ्च अविद्यासे होता है, और 'नान्यः पन्था' इत्यादि श्रुति है ॥ १ ॥
ननु कथं विद्ययैव ब्रह्मप्राप्तिः । यावता कर्मणामपि तत्प्राप्तिहेतुत्वं स्मर्यते—
'तत्प्राप्तिहेतुर्विज्ञानं कर्म चोक्तं महामुने !' इति ।
सत्यम्, 'नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय' इति श्रुतेः, नित्यसिद्ध-
ॐ अब शङ्का होती है कि विद्यासे ही ब्रह्मकी प्राप्ति होती है, ऐसा कैसे कहते हो जब कि कर्म भी ब्रह्मप्राप्तिके प्रति साधनरूपसे स्मृतिमें कहे गये हैं—
'तत्प्राप्तिहेतुर्विज्ञानम्०' ( हे महामुने ! ब्रह्मप्राप्तिके प्रति साधन कर्म और विज्ञान दोनों ही कहे गये हैं ) ।
ठीक है, ‡ तथापि शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि 'नान्यः पन्था०' ( मुक्तिके लिए ज्ञानको छोड़कर अन्य मार्ग ही नहीं है ) ऐसी श्रुति है†, और सर्वदा
ॐ पूर्व परिच्छेदके अन्तमें ब्रह्मप्राप्तिरूप मोक्ष केवल विद्यासे होता है, ऐसा कहा गया है, इस विषयमें समुच्चयवादी शङ्का करता है कि केवल विद्यासे ही मुक्ति होती है, यह नहीं हो सकता, क्योंकि कर्म भी साधनरूपसे स्मृति आदिमें बतलाए गये हैं, यह भाव है ।
† अर्थात् 'तेनैति ब्रह्मवित् पुण्यकृत्' ( ब्रह्मज्ञान और पुण्य दोनोंके समुच्चयमें ब्रह्मज्ञानी ब्रह्मको प्राप्त करता है ) इस श्रुतिमें कहा गया है, यह भाव है ।
‡ अर्थात् पूर्वपक्षीका समुच्चयवाद युक्त नहीं है, क्योंकि युक्तिसे उपबृंहित 'नान्यः पन्थाः' इत्यादि श्रुतिसे समुच्चयका बाध होता है, श्रुतिको अर्थ यह है, केवल ब्रह्मज्ञानसे अन्य—ज्ञानकर्म-समुच्चयरूप अथवा केवल कर्मरूप मार्ग मोक्षके लिए है ही नहीं । और मोक्ष तो आत्माका सर्वदा है ही, परन्तु उसमें अप्राप्तमात्र भ्रम है, इस भ्रमकी निवृत्ति ही मोक्ष है, अतः अज्ञान निवृत्ति केवल ज्ञानसे ही हो सकती है, कर्मसे नहीं हो सकती, यह लोकमें दृष्टचर है, जैसे कण्ठमें मालाके रहते हुए भी भ्रमसे वह अप्राप्तसी प्रतीत होती है, और भ्रमके निवृत्त होनेपर मनुष्य उसे