भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 436
४०६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

भवापत्तेः । अस्मन्मते त्वीश्वरः स्वाभिन्ने जीवे संसारं प्रतिबिम्बमुखे मालिन्यमिव पश्यन्नपि मिथ्यात्वनिश्चयान्न शोचतीति नैष प्रसङ्गः ।

स्यादेतत्—मा भूदंशभेदः करशिरश्चरणादीनां कायव्यूहस्य चाऽधिष्ठानम्, आत्मदीपस्यानपायिनी ज्ञानप्रभाऽस्ति व्यापिनीति सैव सर्वाधिष्ठानं

ईश्वरको भी दुःखित्वका अनुभव प्रसक्त होगा । हम वेदान्तियोंके मतमें तो ब्रह्माभिन्न जीवमें—प्रतिबिम्बभूत मुखमें दर्पणकी मलिनता देखनेपर भी उसे जैसे मिथ्या मानते हैं, वैसे ही—संसारको देखता हुआ भी ईश्वर उसे मिथ्या मानता है, अतः उसके विषयमें कुछ नहीं सोचता है, अतः उक्त दोष नहीं * है।

अब इस प्रकार जीवाणुवादियोंकी शङ्का है कि जीवके अंशविशेष—हाथ, सिर, पैर आदिका और कायव्यूहका—अधिष्ठान ( प्रेरक ) भले ही न हो, परन्तु आत्मारूप दीपककी अविनाशिनी ज्ञानात्मक व्यापक प्रभा है, *


* कुछ लोगोंने कहा है कि जीवोंके सांश होनेसे हाथ, सिर, पैर आदिमें जीवांशोंके अनुगत होनेपर सुख, दुःख आदिका यौगपद्य हो सकता है, और कायव्यूहमें योगीके जीवावयवोंके जानेपर योगियोंको भी युगपत् सुख, दुःख आदिके भोगका वैचित्र्य हो सकता है, अतः कोई अनुपपत्ति नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, जीवके प्रति उसके अंशोंमें मुख्य अंशत्व नहीं है, इसका निराकरण हो चुका है, और जीवाणुवादमें जीवसदृश होकर जीवसे न्यूनपरिमाणत्वरूप औपचारिक अंशत्वका भी बाध है, क्योंकि जीवका अणुपरिमाण होनेसे उससे न्यूनपरिमाण ही नहीं हो सकता है, और सदृशत्व होकर न्यूनपरिमाणत्वरूप जो औपचारिक अंशत्व है, वह तो चन्द्रबिम्ब और गुरुबिम्बके समान जीवांशोंके अत्यन्त भेदका प्रयोजक है, अतः जीवको अपने अंशगत दुःखादिके प्रति अनुसन्धातृत्व भी नहीं हो सकता है, वैसे ही योगके जीवांश कायव्यूहके अधिष्ठाता हैं, तथापि उनसे अत्यन्त भिन्न योगीका जीव कायव्यूहका अधिष्ठाता नहीं हो सकता है, इसी प्रकार शरीराधिष्ठाता जीव और अवयवोंके अधिष्ठाता अंश अत्यन्त भिन्न-भिन्न हैं । अतः एक ही शरीरमें अनेक भोक्ताओंकी प्रसक्ति होगी, और जीवको सांश माननेमें कोई प्रमाण भी नहीं है, 'द्रोणं बृहस्पतेर्भागम्' इत्यादि वाक्य—उक्त प्रकारसे अंशपरक न होनेसे बृहस्पति आदि अपने योग-प्रभावसे पृथ्वीका भार हरण करना आदि देवताओंके कार्यके लिए अन्य शरीरका परिग्रहण करते हैं—यही बोध कराता है । इससे यह भी खण्डित हुआ समझना चाहिए कि राम, कृष्ण आदि विष्णुके अंश हैं ।

* जीव स्वयं अणु भले ही हो, परन्तु उसकी नित्य और व्यापक ज्ञानात्मक प्रभा है, इससे उसके एकदेशमें रहनेपर भी अपनेमें रहनेवाले ज्ञानके प्रभावसे हाथ आदि शरीरके सम्पूर्ण अवयवोंमें और कायव्यूहमें वह अधिष्ठित होता है, अतः निरंश जीवके अधिष्ठातृत्व आदिकी अनुपपत्ति नहीं है, यह शङ्काका तात्पर्य है ।