भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 435, कुल 590 में से

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पृष्ठ 435

जीवके अणुत्वका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहिते ४०५


स्वस्य स्वाभेदः स्वांशाभेदश्च प्रत्यक्ष इति तद्द्रष्टुर्दुःखाद्यनुसन्धानम्, जीवान्तरेणाऽभेदसत्त्वेऽपि तस्याऽप्रत्यक्षत्वान्न तद्दुःखाद्यनुसन्धानम्। जातिस्मरस्य प्राग्भवीयात्मनाऽपि अभेदस्य प्रत्यक्षसत्त्वात् तद्वृत्तान्तानुसन्धानम्, अन्येषां तदभावाद् नेत्यादि सर्वं सङ्गच्छते इति चेत्, तर्ह्येकात्म्यवादेऽपि सर्वात्मतावरकाज्ञानावरणाच्चैत्रस्य न मैत्रात्माद्यभेदप्रत्यक्षमिति तत एव सर्वव्यवस्थोपपत्तेर्व्यर्थः श्रुतिविरुद्ध आत्मभेदाभ्युपगमः ।

न चेत्थमपि प्रपञ्चतत्त्ववादिनस्तव व्यवस्थानिर्वाहः, सर्वज्ञस्येश्वरस्य वस्तुसज्जीवान्तराभेदप्रत्यक्षावश्यंभावेन जीवेषु दुःखवत्सु 'अहं दुःखी'त्यनु-


अपने अंशोंका अभेद प्रत्यक्ष है, इसलिए अभेददर्शीको दुःख आदिका अनुसन्धान होता है और जीवान्तरके साथ अभेद होनेपर भी उसका प्रत्यक्ष नहीं है, अतः उसे अन्यका दुःख अनुभूत नहीं होता है, पूर्वकी जातिका स्मरण करनेवाले वामदेव प्रभृतिको प्राग्भवीय आत्माके साथ अभेदका प्रत्यक्ष है, इसलिए उनको पूर्ववृत्तान्तका अनुसन्धान होता है, दूसरोंको उसका प्रत्यक्ष न होनेसे अनुसन्धान नहीं होता है, इत्यादि सभी व्यवस्थाकी उपपत्ति हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस अवस्थामें एकात्मवादमें भी सर्वात्मताके आवारक अज्ञानका आवरण होनेसे चैत्रको मैत्रात्माके साथ अभेदका प्रत्यक्ष नहीं है, इसलिए उसीसे * सब व्यवस्थाकी यदि उपपत्ति हो सकती है, तो श्रुतिविरुद्ध आत्माके भेदकी कल्पना व्यर्थ ही है।

और † इस प्रकारकी कल्पनासे अर्थात् अभेदप्रत्यक्ष अनुसन्धानमें प्रयोजक है, इस कल्पनासे भी प्रपञ्चको तात्त्विक माननेवाले तुम्हारे मतमें व्यवस्थाका निर्वाह नहीं हो सकता है, क्योंकि ‡ सर्वज्ञ ईश्वरको वस्तुसत् अन्य जीवोंके अभेदका प्रत्यक्ष अवश्य होनेसे जीवोंके दुःखसे 'मैं दुःखी हूँ' इस प्रकार


* अर्थात् चैत्र, मैत्र आदि सभीको परस्परमें अभेदप्रत्यक्ष नहीं होनेसे ही व्यवस्थितिरूपसे सुख आदिके अनुसन्धानकी उपपत्ति हो सकती है, इसीसे, यह अर्थ है।

† अभेदप्रत्यक्षको अनुसन्धानका प्रयोजक मानकर अन्य मतमें आत्मभेदकल्पनामें गौरव और श्रुतिका विरोध कहा गया, अब इस ग्रन्थसे—आत्माके अभेदप्रत्यक्षको अनुसन्धान-प्रयोजक मान भी नहीं सकते हैं, यह कहते हैं।

‡ यदि ईश्वर अन्य जीवसे अन्य जीवका पारमार्थिक अभेदको जानता नहीं है, यह मान लिया जाय, तो ईश्वर सर्वज्ञ नहीं हो सकेगा, यह भाव है।

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