सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 434, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें४०४. । सिद्धान्तलेशसंग्रहे । [ द्वितीय परिच्छेद
पत्तेः । धर्मैकरूप्याद्यप्रयुक्तत्वमंशांशिनोरभेदे विशेष इति चेत्, न ; जीवत्तदंशयोश्चेतनत्वादिधर्मैकरूप्यसत्त्वेन एकशरीरावच्छेदे कायव्यूहमेलने च समूहत्वेन च तयोरभेदे धर्मैकरूप्यादिप्रयुक्तत्वस्यापि सद्भावात् । धर्मैकरूप्यादिप्रयुक्ताभेदान्तरसत्त्वेऽपि जीवत्तदंशयोरंशांशिभावप्रयोजकाभेदो न तत्प्रयुक्त इति चेद् , न ; तयोरभेदद्वयाभावात् तन्मतेऽधिकरणैक्ये सति भेदस्याऽभेदस्य वा प्रतियोगिभेदेन तदाकारभेदेन वा अनेकत्वानभ्युपगमात् । तस्मादाद्यपक्षे सुस्थोऽतिप्रसङ्गः ।
एतेनैव द्वितीयपक्षोऽपि निरस्तः । अभेदासहचरितभेदस्याऽननुसन्धानप्रयोजकत्वे उक्तरीत्या तन्मते जीवब्रह्मणोर्जीवानां चाऽभेदस्यापि सत्त्वेनातिप्रसङ्गस्य दुर्वारत्वात् ।
ननु 'अभेदप्रत्यक्षमनुसन्धाने प्रयोजकम्' इति तदभावेऽननुसन्धानम् ।
धर्मैक्यरूप आदि प्रयोजक हैं । यदि शङ्का हो कि जीव और उसके अंशोंमें धर्मैक्यरूप्यसे होनेवाला कोई दूसरा अभेद भले ही रहे, परन्तु जीव और उसके अंशोंमें रहनेवाला अंशांशिभावप्रयोजक अभेद धर्मैकरूप्य आदिसे नहीं होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अंश और अंशीमें दो अभेद रह ही नहीं सकते हैं, तुम्हारे मतमें भी अधिकरणकी एकता होनेपर भेद और अभेद प्रतियोगीके भेदसे या प्रतियोगीके आकारके भेद अनेक नहीं माने जाते हैं । इससे प्रथम पक्षमें (भेदके अंशांशिभावासहचरितत्वरूप शुद्धत्व पक्षमें) अतिप्रसङ्ग विद्यमान ही है ।
इसीसे द्वितीय पक्ष भी निरस्त हुआ ही समझना चाहिए, क्योंकि अभेदसे असहकृत भेद अननुसन्धानका प्रयोजक माना जाय, तो उक्त रीतिसे चेतनत्वादि धर्मैक्यरूप्य आदि पङ्क्तिसे कही गई रीतिसे) तुम्हारे मतमें भी जीव और ब्रह्म और जीवोंका भी परस्पर अभेद होनेके कारण अतिप्रसङ्ग दुर्वार ही है ।
यदि शङ्का हो कि 'अभेदप्रत्यक्ष अनुसन्धानमें प्रयोजक है' इसलिए अभेदप्रत्यक्षके न होनेपर अननुसन्धान होगा। अंशीका अपना अभेद और
होनेपर योगी जीवके अंशियोंके साथ समूह भी है, इसलिए धर्मैकरूप्यप्रयुक्त अभेद होनेसे तदप्रयुक्तत्वका असम्भव है, यह भाव है ।