भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 433, कुल 590 में से

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पृष्ठ 433

जीवके अणुत्वका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहितं ४०३


तेत्यादि वदता त्वया तदभिन्नाभिन्नस्य तदभेदनियमभ्युपगमात् ।

न च जीवान्तरसाधारणचेतनत्वादिधर्मैकरूप्यैकसमूहान्तर्गतत्वादि-प्रयुक्ताभेदविलक्षणमभेदान्तरमंशांशिनोरस्ति भेदेऽप्यनुसन्धानप्रयोजकम्, यद्वानतिप्रसङ्गाय विवक्षेत । तथा सति तस्यैव विशिष्य निर्वक्तव्यत्वा-


भिन्नस्य ‡ तदभिन्नत्वम्' यह नियम माना है।

* और अंश और अंशीका भेद रहनेपर भी अनुसन्धानका प्रयोजक—अन्य जीवोंमें रहनेवाले चेतनत्व आदि धर्मोंसे होनेवाले तथा एक समूहान्तर्गतत्वरूपसे होनेवाले अभेदसे विलक्षण—अन्य—अभेद भी उनका नहीं है, जिसकी कि अतिप्रसङ्गके वारणके लिए विवक्षा की जाय, क्योंकि अंश और अंशीका विलक्षण भेद माननेपर उसका भी विशेषरूपसे निर्वचन करना पड़ेगा। यदि कहो कि अंश और अंशीके अभेदमें धर्मोंसे होनेवाली एकरूपता आदि अभेदप्रयोजक नहीं हैं, यही विशेष है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जीव और उसके अंशोंमें चेतनत्वादि धर्मोंसे एकरूपता और एक शरीरावच्छेदमें एवम् कार्य-समूहके मेलनमें उनका समूह † होनेसे जीव और उसके अंशोंके अभेदमें


‡ 'तदभिन्नाभिन्नस्य तदभिन्नत्वनियमः' इस नियमको नैयायिक लोगोंने माना है, अपनेसे अभिन्न पदार्थसे जो अभिन्न पदार्थ है, वह आपसे भी अभिन्न होता है, यह उक्त नियमका अर्थ है, जैसे गुण और गुणीका जो अभेद मानते हैं, उनके मतमें उक्त नियमके आधारपर नैयायिकोंने दोष दिया कि घटसे अभिन्न संयोग है और उससे अभिन्न पट है, अतः घट और पटका भी अभेद प्रसक्त हो सकता है, यह भाव है।

* प्रकृतमें शङ्काका यह कारण है कि जीव और ईश्वर तथा जीवांशोंका एवं समूहाभिन्न जीवोंका जो चेतनत्वादि धर्मप्रयुक्त अभेद है, उससे विलक्षण ही जीव और उसके अंशोंका अभेद है, इसलिए जीव और उसके अंशोंका भेद होनेपर भी परस्पर अनुसन्धान होता है, जीव और ईश्वरका चेतनत्वादि धर्मोंसे अभेद होनेपर भी उक्त विलक्षण अभेदके न रहनेसे परस्पर अनुसन्धानकी प्रवृत्ति नहीं है, अतः भिन्नाभिन्नद्रव्यत्वासङ्कीर्ण भेद शुद्धभेद है, और वह अनुसन्धानका प्रयोजक है, इसमें जो अभेद प्रविष्ट है, वह जीव और उसके अंशोंका अनुसन्धानप्रयोजक विलक्षण अभेद है, इसलिए उक्त भिन्नाभिन्नद्रव्यत्वासङ्कीर्ण भेदरूप शुद्धभेदमें दोष नहीं है, यह भाव है।

† जैसे जीव और उसके अंशोंकी चेतनत्वादिसे एकरूपता है, वैसे जीव और उसके अवयवोंका एक शरीरमें अनुप्रवेश कालमें उस शरीरावच्छेदेन समूह भी है, वैसे योगीके जीवके अवयवोंका कायव्यूहसे कहलानेवाले अनेक शरीरोंमें प्रवेश होनेसे कदाचित् उन शरीरी जीवोंका मेल न


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