सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 432, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें४०२ . सिद्धान्तलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद
भिन्नद्रव्यत्वमंशत्वमभिमतमिति चेद्, न; तथा सति जीवेश्वरयोर्जीवानां च भोगसाङ्कर्यप्रसङ्गात् । स्वतो भिन्नानां तेषां चेतनत्वादिना अभेदस्यापि त्वयाऽङ्गीकारात्, समूहसमूहिनोर्भेदाभेदवादिनस्तव मते एकसमूहान्तर्गतजीवानां परस्परमप्यभेदसत्त्वाच्च स्वाभिन्नसमूहाभिन्नेन स्वस्याऽप्यभेदस्य दुर्वारत्वात् । यदि संयोगादीनां जातेश्चाऽनेकाश्रितत्वं स्यात्, तदा गुणगुण्यादेरभेदाद् घटाभिन्नसंयोगाभिन्नपटादेरपि घटाभेदः प्रसज्ये-
हो सकता है, जिससे कि प्रदेशत्व और खण्डत्वरूप जीवके अंशोंमें मुख्यांशत्व हो । यदि कहो कि भिन्नाभिन्नद्रव्यत्वरूप अंशत्व प्रकृतमें अभिमत है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा होनेपर जीव और ईश्वरका और जीवोंका परस्पर भोगसाङ्कर्य प्रसक्त होगा, क्योंकि जीव और ईश्वर तथा अनेक जीव स्वरूपतः परस्पर भिन्न * हैं, तथापि वे चेतनत्व आदि धर्मोंसे अभिन्न हैं, ऐसा तुम मानते हो और दूसरी बात यह है कि तुम समूह और समूहीका भेदाभेद मानते हो, इसलिए तुम्हारे मतमें एक समूहमें विद्यमान सम्पूर्ण जीवोंका † परस्पर अभेद भी है, कारण कि अपनेसे अभिन्न समूहके साथ अभेद होनेसे अपना भी दूसरेके साथ अभेद है, इसका निवारण नहीं कर सकते हैं, क्योंकि गुण और गुणीका अभेद मानकर यदि संयोग, विभाग आदि अनेकाश्रित माने जाँय, तथा जाति और व्यक्तिका अभेद मान कर यदि जातिको अनेकाश्रित माना जाय, तो गुण और गुणीका अभेद होनेसे घटाभिन्न संयोगसे अभिन्न पटमें भी घटाभेद प्रसक्त होगा, ऐसा कहते हुए तुमने 'तदभिन्ना-
* अननुसन्धानमें प्रयोजकीभूत जो भिन्नाभिन्नद्रव्यत्वासहकृत भेद है, वह जीव और ईश्वरमें भी है, अतः जीव और ईश्वरके भोगका साङ्कर्य प्रसक्त होगा, क्योंकि घट और पटका परस्पर घटत्वादि विशेष धर्मोंसे भेद होनेपर भी द्रव्यत्वरूप व्यापक धर्मसे जैसे अभेद है, वैसे ही जीवत्व और ईश्वरत्वरूप धर्मोंसे उनका परस्पर भेद होनेपर भी सत्त्व, द्रव्यत्व, चेतनत्व आदि धर्मोंसे उनका अभेद है, यह भाव है।
† तात्पर्य यह है कि समूह और समूही का स्वरूपतः भेद और व्यापक धर्मोंसे अभेद तुम मानते हो, इस अवस्था में उत्सवमें एकत्र मिलित मनुष्योंका परस्पर भेदाभेद होनेके कारण भिन्नाभिन्नद्रव्यत्वासहकृत शुद्धभेदके न रहनेसे उस उत्सवमें संमिलित यावत् व्यक्तियोंके भोगका साङ्कर्य प्रसक्त होगा, क्योंकि एक समूही देवदत्तसे अभिन्न समूहका यज्ञदत्तके साथ अभेद होनेसे देवदत्तका यज्ञदत्तके साथ अभेद निरस्त नहीं हो सकता है,.. अर्थात् समूहको लेकर देवदत्तका यज्ञदत्तके साथ अवश्य अभेद है, इसलिए भोगसाङ्कर्यका प्रसङ्ग है ही।