सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 431, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंजीवके अणुत्वका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित • ४०१
'चन्द्रबिम्बस्य गुरुबिम्बः शतांशः' इतिवत् 'सदृशत्वे सति ततो न्यूनत्वमात्रम्' औपचारिकोंशत्वमिति चेत्, किं तदतिरेकेण मुख्यांशत्वं जीवांशानां जीवं प्रति, यदत्राननुसन्धानप्रयोजकशरीरे निवेश्यते ? न तावत् पटं प्रति तन्तूनामिवारम्भकत्वम् । जीवस्याऽनादित्वात् । नाऽपि महाकाशं प्रति घटाकाशादीनामिव प्रदेशत्वम्, टङ्कोच्छिन्नपाषाणशकलादीनामिव खण्डत्वं वा, अणुत्वेन निष्प्रदेशत्वादच्छेद्यत्वाच्च । भिन्ना-
प्रति जीव मुख्य अंश नहीं है, किन्तु 'चन्द्रबिम्बका गुरुबिम्ब शतांश है' यहांपर जैसे गुरुबिम्बमें चन्द्रबिम्बका औपचारिक अंशत्व प्रतीत होता है, वैसे ही प्रकृतमें जीव ईश्वरके सदृश तथा उससे न्यून है, अतः जीवमें औपचारिक अंशत्व भासित होता है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इसमें यह प्रश्न होता है कि जीवके प्रति जीवांशोंमें मुख्यांशत्व, जो कि औपचारिक अंशत्वसे भिन्न है †, क्या है, जिसका कि अननुसन्धानके प्रयोजकीभूत शरीरमें ( नियमस्वरूपमें ) विशेषणरूपसे निवेश करते हो ? यदि कहो कि जैसे पटके प्रति तन्तु आरम्भक हैं, अत एव वे पटके मुख्य अंश कहे जाते हैं, वैसे ही प्रकृतमें आरम्भकत्वरूप मुख्य अंशत्व है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि जीव अनादि है, [ अर्थात् जीवांशोंमें जीवके प्रति मुख्य अंशत्व है, ऐसा पूर्वमें जो तुमने कहा है, यह नहीं हो सकता है, क्योंकि जीव अनादि है, इसलिए वे जीवांश जीवके आरम्भक नहीं हो सकते हैं, अतः उनमें आरम्भकत्वरूप मुख्य अंशत्व नहीं हो सकता है, यह भाव है । ] यदि कहो कि महाकाशके प्रति घटाकाश आदिमें जैसे प्रदेशत्वरूप अंशत्व है, वैसे ही प्रकृतमें प्रदेशत्वरूप अथवा टङ्कसे तोड़े हुए पत्थरके टुकड़ोंके समान खण्डत्वरूप मुख्यांशत्व है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जीव अणु है, अतः उसका प्रदेश नहीं है और इसीसे उसका टुकड़ा भी नहीं
जीव और ईश्वरका अंशांशिभाव मुख्य नहीं है, किन्तु गौण है, इसलिए उनका शुद्ध भेद होनेसे परस्पर अनुसन्धानका साङ्कर्य नहीं है और जीव और उसके अंशोंमें मुख्यांशांशिभावत्वके होनेसे शुद्ध भेद उनका नहीं है, अतः अनुसन्धानकी उपपत्ति भी हो सकती है, यह भाव है ।
† अर्थात् आरम्भकावयवत्व, प्रदेशत्व, खण्डत्व अथवा भिन्नाभिन्नत्वरूप मुख्यांशत्व है ? यह प्रश्नका आशय है, इनमें प्रत्येक पक्षका मूलकारने ही क्रमशः खण्डन किया है ।
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