भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 437, कुल 590 में से

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पृष्ठ 437

जीवके अणुत्वका निराकरण-विचार ] भाषानुवादसहित ४०७


भविष्यतीति चेद्, न; ज्ञानवद् आत्मधर्मस्य सुखदुःखभोगस्य ज्ञान- माश्रित्य उत्पत्त्यसम्भवेन करचरणाद्यवयवभेदेनाऽवयविनः, कायव्यूहवतः कायभेदेन च भोगवैचित्र्याभावप्रसङ्गात् । 'सुखदुःखभोगादि ज्ञानधर्म एव, नात्मधर्मः' इत्यभ्युपगमे तद्वैचित्र्येण आत्मगुणस्य ज्ञानस्य भेद- सिद्धावप्यात्मनो भेदासिद्ध्या भोगवैचित्र्यादिनाऽऽत्माभेदप्रतिक्षेपायोगात् । 'भोगाद्याश्रयस्याऽऽत्मनोऽणुत्वेन प्रतिशरीरं विच्छिन्नतया तद्व्यापित्ववाद् इव .


अतः वही प्रभा हाथ आदिकी प्रेरक होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि † ज्ञानके समान आत्मामें रहनेवाले सुख-दुःखात्मक भोगकी ज्ञानको आश्रय करके—ज्ञानमें—उत्पत्ति नहीं हो सकती है, अतः हाथ, पैर आदि अवयवोंके भेदसे अवयवी जीवको और अनेक शरीरवाले योगीको, शरीरोंके भेदसे, विचित्र भोग. नहीं हो सकते हैं। सुख-दुःखात्मक भोग आदि ज्ञानके ही धर्म हैं, आत्माके धर्म नहीं हैं, ऐसा यदि मानो, तो उक्त भोगके वैचित्र्यसे आत्माके गुणभूत ज्ञानका भेद सिद्ध होनेपर भी आत्माका भेद सिद्ध नहीं हो सकता है, इससे भोगके वैचित्र्यसे आत्माके अभेदका अपाकरण नहीं कर सकते हैं। और 'भोग आदिका आश्रय आत्मा अणु होनेसे प्रत्येक शरीरमें विच्छिन्न-भिन्न है, अतः जीवके व्यापकवादके समान और जीव और ईशके


† समाधानकर्ताका भाव यह है—पूर्वपक्षीके मतसे ज्ञान ही व्यापक ठहरा, यदि व्यापक ज्ञानमें सुखादिकी उत्पत्ति मानी जाय, तो शरीरके प्रत्येक अवयवमें और कायव्यूहमें युगपत् सुखादिका अनुभव हो सकता है, परन्तु पूर्वपक्षी सुखादिको ज्ञानधर्म नहीं मानता, किन्तु अणु आत्माका ही धर्म मानता है, इसलिए ज्ञानके व्यापक' होनेपर भी हाथ आदि अवयवोंमें और कायव्यूहमें युगपत् भोगके वैचित्र्यकी उपपत्ति नहीं हो सकती है।
और योगियोंके भोगका वैचित्र्य हे इसमें स्मृति प्रमाण भी है—

आत्मनां च सहस्राणि बहूनि भरतर्षभ।
योगी कुर्यात् बलं प्राप्य तैश्च सर्वां महीं चरेत् ॥
प्राप्नुयात् विषयान् कैश्चित् कैश्चिदुग्रं तपश्चरेत्।
सङ्क्षिपेच्च पुनस्तानि सूर्यो रश्मिगणानिव ॥

अर्थात् योगी योगके प्रभावसे अनेक शरीरोंको धारणकर सम्पूर्ण पृथ्वीमें जा सकता है, कुछ शरीरोंसे वह अनेक भोग करता है और कई एक शरीरोंसे उग्र तप भी करता है, और उन शरीरोंको पुनः अपनेमें लीन भी कर लेता है जैसे सूर्य अपनी किरणोंको समेट लेता है, यह उपर्युक्त श्लोकोंका भाव है !