सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 438, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४०८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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तदभेदवाद इव च न सर्वधर्मसङ्करापत्तिः' इति मतहानेश्च । तस्माज्जीवस्याऽणुत्वोपगमेन व्यवस्थोपपादनं न युक्तमिति ।
नाऽपि तेन तस्येश्वराद् भेदसाधनं युक्तम्, उत्क्रान्त्यादिश्रवणात्, साक्षादणुत्वश्रवणाच्च 'अणुर्जीवः' इति वदतः तव मते 'तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्' 'अन्तः प्रविष्टश्शास्ता जनानाम्' 'गुहां प्रविष्टौ परमे परार्ध्ये' इत्यादिश्रुतिषु प्रवेशादिश्रवणात्, 'स एषोऽणिमा एष म आत्माऽन्तर्हृदयेऽणीयान् व्रीहेर्वा यवाद्वा' इति श्रुतौ साक्षादणुत्वश्रवणाच्च परोऽप्यणुरेव सिध्येदिति कुतः परजीवयोर्विभुत्वाणुत्वाभ्यां भेदसिद्धिः ।
अभेदवादके समान सब धर्मोंका साङ्कर्य प्रसक्त नहीं है' इस प्रकारके अपने मतकी हानि भी प्रसक्त होगी, इससे जीवको अणु माननेपर भी व्यवस्थाका उपपादन नहीं हो सकता है ।
और जीवको अणु मानकर उसका ईश्वरसे भेद भी पूर्वपक्षी नहीं कर सकते हैं, क्योंकि उत्क्रान्ति आदिके और साक्षात् अणुत्वके श्रवणसे 'जीवको अणु माननेवाले पूर्वपक्षीके मतमें 'तत्सृष्ट्वा०' ( जगत्को बना करके परमात्माने जगत्में ही प्रवेश किया ) 'अन्तः०' ( शरीरके भीतर प्रविष्ट हुआ, परमात्मा जनोंका नियन्ता है ) 'गुहां०' ( परार्ध्य * हृदयाकाशमें जो बुद्धिरूप गुहा है, उसमें जीव और ईश्वर प्रविष्ट हैं ) इत्यादि श्रुतियोंसे जगत् आदिमें ईश्वरके प्रवेश प्रभृति सुने जाते हैं और 'स एषोऽणिमा०' ( यह परमात्मा अणु है, मेरे हृदयमें यही आत्मा है, जो व्रीहि और यवसे छोटा है, इस श्रुतिमें साक्षात् अणुत्वका कथन है, इससे ईश्वर भी अणु ही सिद्ध होगा, इसलिए पूर्वपक्षीके मतमें भी अणुत्व और विभुत्वसे जीव और ईश्वरका भेद कैसे सिद्ध होगा ? †
* परार्ध्य शब्दका अर्थ है—परस्य अर्धम्—स्थानम् अर्हतीति परार्ध्यम् अर्थात् ईश्वरके स्थानके लिए जो योग्य है, ऐसा हृदयाकाश ।
† पूर्वपक्षी श्रुतियोंके आधारपर जीवमें अणुत्वकी और ईश्वरमें व्यापकत्वकी सिद्धि करता है, और इन्हीं अणुत्व और विभुत्वरूप विरुद्ध धर्मोंसे जीव और ईश्वरके भेदका भी साधन करता है, परन्तु ईश्वरमें उक्त श्रुतियोंसे अणुत्वकी सिद्धि ही हुई, इसलिए पूर्वपक्षीके मतसे दोनोंमें रहनेवाले एक अणुत्वसे उन दोनोंका भेद कैसे सिद्ध हो सकता है ?, अर्थात् कभी नहीं होगा । अतः पूर्वपक्षी अपने अभीष्ट जीवेश्वरके भेदकी भी सिद्धि जीवको अणु मानकर नहीं कर सकता है, यह भाव है ।