भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 439, कुल 590 में से

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पृष्ठ 439

जीवके अणुत्वका निराकरण-विचार ] भाषानुवादसहित ४०९


ननु 'आकाशवत् सर्वगतश्च नित्यः' 'ज्यायान् दिवो ज्यायानन्तरिक्षाद्' इत्यादिश्रवणात्, सर्वप्रपञ्चोपादानत्वाच्च परस्य सर्वगतत्वसिद्धेः तदणुत्वश्रुतयः उपासनार्थाः, दुर्ग्रहत्वाभिप्राया वा उन्नेयाः । प्रवेशश्रुतयश्च शरीराद्युपाधिना निर्वाह्याः । न च जीवोत्क्रान्त्यादिश्रुतयोऽपि बुद्ध्या उपाधिना निर्वोढुं शक्या इति शङ्क्यम् , 'तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूत्क्रामति'


यदि ‡ शङ्का हो कि 'आकाशवत्०' ( ईश्वर आकाशके समान सर्वगत और नित्य है ) 'ज्यायान् दिवो०' ( ईश्वर द्युलोक और अन्तरिक्षसे बड़ा है ) इत्यादि श्रुतिसे और सब प्रपञ्चके प्रति ईश्वरकी उपादानता श्रुत होनेसे परमात्मा व्यापक ही सिद्ध होता है । इससे ईश्वरमें अणुत्वकी प्रतिपादक श्रुतियाँ उपासनाके लिए अथवा ईश्वरमें दुर्ग्रहत्वके प्रतिपादनके लिए हैं । एवं प्रवेशश्रुतियोंका शरीर आदि उपाधिसे निर्वाह करना चाहिए । यदि शङ्का हो कि * जीवमें उत्क्रमण आदिकी प्रतिपादक श्रुतियोंका भी बुद्धिरूप उपाधिसे निर्वाह कर सकते हैं, तो फिर उक्त युक्तिसे जीवका अणुत्व सिद्ध नहीं होगा ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'तमुत्क्रामन्तम्०' ( जीवके उत्क्रान्त होनेपर प्राण उत्क्रमण करता है ) इत्यादि श्रुतिसे प्राणात्मक


‡ पूर्वपक्षी अपने मतकी स्थिरताके लिए कहता है कि अनेक श्रुतियां ईश्वरमें विभुत्वका प्रतिपादन करती हैं, अतः विभुत्व-प्रतिपादक श्रुतियोंके आधारपर अणुत्वबोधक श्रुतियाँ उपासनार्थ हैं अथवा ईश्वर साधारण प्रयत्नसे ज्ञात नहीं हो सकता है, अपि तु उसको जाननेके लिए अत्यन्त कठिन प्रयत्न करना चाहिए यह सूचन करती हैं । और जीवको अणु माननेमें अनेक प्रत्यक्ष श्रुतियाँ है, अतः जीव अणु और ईश्वर व्यापक ही सिद्ध होता है ।

* सिद्धान्तीकी बीचमें यह शङ्का है—जैसे ईश्वरमें विभुत्वका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियाँ औपचारिक नहीं हैं, और अणुत्वप्रतिपादक श्रुतियाँ मुख्य हैं, ऐसा तुल्ययुक्त्या क्यों न माना जाय ? इसपर 'तमुत्क्रामन्तम्' इत्यादिसे पूर्वपक्षी उत्तर देता है । इसमें फिर शङ्काकी जाय कि यद्यपि श्रुतिमें प्राणके उत्क्रमणके पूर्वमें जीवकी उत्क्रान्ति सुनी जाती है, तथापि केवल जीवकी उत्क्रान्ति नहीं होती है, परन्तु बुद्धिविशिष्ट जीवकी उत्क्रान्ति सुनी जाती है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि बुद्धि और प्राण अभिन्न-एक ही हैं, श्रुतिने कहा भी है—'यो वै प्राणः सा प्रज्ञा' ( जो प्राण है, वही बुद्धि है ) । अतः अनेक श्रुतियोंसे साक्षात् जीवकी उत्क्रान्ति, आदिका ज्ञान होता है, इससे जीवको अणु मानना ही युक्त है, विभु मानना युक्त नहीं है । इससे जीव और ईशका भेद सिद्ध हो सकता है, यह पूर्वपक्षीका भाव है ।

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