सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 440, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४१० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
|---|
इति प्राणारूढ्यबुद्ध्युत्क्रान्तेः प्रागेव जीवोत्क्रान्तिवचनात् । तथा ‘विद्वा- न्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम्’ इति नामरूपविमोक्षानन्तर- मपि गतिश्रवणाच्च । ‘तद्यथाऽनस्सुसमाहितमुत्सर्जन् यायादेवमेवायं शारीर आत्मा प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढ उत्सर्जन् याति’ इति स्वाभाविक- गत्याश्रयशकटदृष्टान्तोक्तेश्चेति चेद्, नैतत्सारम्; ‘स वा एष महानज आत्मा योऽयं विज्ञानमयः ।’
‘घटसंवृतमाकाशं नीयमाने घटे यथा ।
घटो नीयेत नाकाशं तद्वज्जीवो नभोपमः ॥’
इत्यादिश्रुतिषु जीवस्यापि विभुत्वश्रवणात् । त्वन्मते प्रकृतेरेव जगदु- पादानत्वेन ब्रह्मणो जगदुपादानत्वाभावाज्जीवस्य कायव्यूहगतविचित्रसुख-
बुद्धिकी उत्क्रान्तिसे पूर्व ही जीवकी उत्क्रान्ति ज्ञात होती है, इसी प्रकार ‘विद्वान्नाम०’ (आत्मतत्त्वज्ञानी नाम और रूपसे * विमुक्त होकर दिव्य पर पुरुषके प्रति जाता है) इत्यादि श्रुतिसे नाम और रूपसे मोक्ष होनेके बाद भी जीवकी गति सुनी जाती है। और ‘तद्यथा०’ (जैसे अनेक सामानोंसे भरपूर बैलगाड़ी शब्द करती हुई जाती है, वैसे ही शरीरमें रहनेवाला यह जीव ईश्वरकी प्रेरणासे प्रेरित होकर जाता है) इस प्रकारकी श्रुतिसे जीवमें गाड़ीके दृष्टान्तसे स्वाभाविक गति कही भी गई है ? तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि ‘स वा एष०’ (वह विज्ञानमय जीव बड़ा व्यापक है) ‘घटसंवृतमाकाशं’ (घटसे सम्बद्ध आकाश जैसे घटके ले जानेपर जाता है, परन्तु स्वतः नहीं जाता है, वैसे ही जीव भी उपाधिके गमनसे जाता है, स्वतः नहीं जाता है, अर्थात् आकाशके समान है) इत्यादि श्रुतियोंसे जीवमें भी विभुत्वका श्रवण है। तुम्हारे मतमें † माया ही जगत्की उपादान होनेसे ब्रह्म जगत्का उपादान नहीं है और जीवको अणु माननेपर भी जैसे शरीर-
* नाम और रूपसे अर्थात् अज्ञानसे होनेवाले सम्पूर्ण संसारसे मुक्त होकर परमात्माके प्रति जाता है, यह भाव है।
† सिद्धान्ती उक्त पूर्वपक्षीके मतका खण्डन करता है, भाव यह है कि जैसे परमात्माके प्रकरणमें प्रतिपादित परमेश्वरका विभुत्व औपचारिक नहीं हो सकता है, वैसे ही जीवप्रकरणमें सुना गया जीवका विभुत्व भी औपचारिक नहीं हो सकता है, अतः जीवप्रकरणमें पठित अनेक वाक्य ‘स वा’ इत्यादिसे बतलाये हैं।