सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजीवके अणुत्वका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ४११
दुःखोपादानत्ववदणुत्वेऽपि जगदुपादानत्वसम्भवाच्च, ततस्तस्य सर्वगतत्वासिद्धेः । तत्प्रवेशश्रुतीनां शरीरोपाधिकत्वकल्पने जीवोत्क्रान्त्यादिश्रुतीनामपि बुद्ध्युपाधिकत्वोपगमसम्भवात् । 'पञ्चवृत्तिर्मनोवद्व्यपदिश्यते' (उ० मी० अ० २ पा० ४ सू० १२) इति सूत्रभाष्ये बुद्धिप्राणयोः कार्यभेदाद्भेदस्य प्रतिपादितत्वेन बुद्ध्युपाधिके जीवे प्रथममुत्क्रामति प्राणस्यानूत्क्रमणोपपत्तेः । नामरूपविमोक्षानन्तरं ब्रह्मप्राप्तिश्रवणस्य प्राप्तरि
समुदायमें विचित्र सुख, दुःख आदिके प्रति उसे उपादान मानते हो, वैसे ही वह जगत्का उपादान भी हो सकता है, अतः ईश्वरमें व्यापकत्वकी उपपत्ति नहीं हो सकती है* । ब्रह्मकी प्रवेशबोधक श्रुतियोंकी शरीररूप उपाधिसे जैसे उपपत्ति करते हो, वैसे ही जीवकी उत्क्रान्ति आदि बोधक श्रुतियोंकी भी बुद्धि आदि उपाधियोंसे उपपत्ति कर सकते हैं । † 'पञ्चवृत्तिर्मनोवद्व्यपदिश्यते' इस सूत्रके भाष्यमें कार्यके पार्थक्यसे प्राण और बुद्धिमें परस्पर भेदका प्रतिपादन किया गया है, अतः बुद्धिरूप उपाधिसे उपहित जीव प्रथम उत्क्रमण करता है, फिर प्राणका उत्क्रमण उपपन्न हो सकता है । नाम और रूपसे विमुक्त होनेके बाद ब्रह्मकी प्राप्तिकी जो श्रुति है, यह प्राप्त करनेवाले जीवमें
* इस ग्रन्थसे सिद्धान्तीने कहा कि पूर्वपक्षी ईश्वरमें विभुत्वका भी साधन नहीं कर सकता है, इससे सुतरां उसके मतमें जीव और ईश्वरभेद भी असिद्ध ही है, क्योंकि ईश्वरमें व्यापकत्व तभी हो सकता है, जब कि ईश्वर जगत् का उपादान हो परन्तु पूर्वपक्षीने ईश्वरको जगत्का उपादान नहीं माना है, किन्तु प्रकृतिको माना है, अतः ईश्वरमें व्यापकत्व सिद्ध नहीं हो सकता है, और जीवमें अणुत्वकी भी सिद्धि नहीं हो सकती है, क्योंकि सुखदुःखके प्रति जैसे जीवको उपादान तुमने माना है, वैसे ही युक्तिसे यह संसारका भी उपादान हो सकता है, इससे उपादान होनेके कारण जीवमें भी व्यापकत्वकी सिद्धि हो सकती है ।
† पञ्चवृत्तिर्मनोवद् व्यपदिश्यते इसका यह अर्थ है—मनके समान अर्थात् जैसे मनकी श्रोत्र, चक्षु आदिके भेदसे शब्द आदि विषयक पांच प्रकारकी वृत्तियाँ होती हैं, वैसे ही प्राणकी प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान रूपसे पाँच प्रकारकी वृत्तियाँ होती हैं, अतः प्राण मनके समान श्रुतिमें कहा गया है । इसमें दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिककी उपपत्तिके लिए अवश्य प्राण और मनका भेद मानना चाहिए, 'यो वै प्राणः सा प्रज्ञा' इत्यादिसे प्राण और प्रज्ञाका जो अभेद कहा गया है, वह प्रज्ञा और प्राणरूप उपाधिसे उपहित प्रत्यगात्माके एक होनेसे उपहित आत्माकी मुख्यतासे कहा गया है, यह समझना चाहिए ।