सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
जीवके अणुत्वका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ४११
दुःखोपादानत्ववदणुत्वेऽपि जगदुपादानत्वसम्भवाच्च, ततस्तस्य सर्वगतत्वासिद्धेः । तत्प्रवेशश्रुतीनां शरीरोपाधिकत्वकल्पने जीवोत्क्रान्त्यादिश्रुतीनामपि बुद्ध्युपाधिकत्वोपगमसम्भवात् । 'पञ्चवृत्तिर्मनोवद्व्यपदिश्यते' (उ० मी० अ० २ पा० ४ सू० १२) इति सूत्रभाष्ये बुद्धिप्राणयोः कार्यभेदाद्भेदस्य प्रतिपादितत्वेन बुद्ध्युपाधिके जीवे प्रथममुत्क्रामति प्राणस्यानूत्क्रमणोपपत्तेः । नामरूपविमोक्षानन्तरं ब्रह्मप्राप्तिश्रवणस्य प्राप्तरि
समुदायमें विचित्र सुख, दुःख आदिके प्रति उसे उपादान मानते हो, वैसे ही वह जगत्का उपादान भी हो सकता है, अतः ईश्वरमें व्यापकत्वकी उपपत्ति नहीं हो सकती है* । ब्रह्मकी प्रवेशबोधक श्रुतियोंकी शरीररूप उपाधिसे जैसे उपपत्ति करते हो, वैसे ही जीवकी उत्क्रान्ति आदि बोधक श्रुतियोंकी भी बुद्धि आदि उपाधियोंसे उपपत्ति कर सकते हैं । † 'पञ्चवृत्तिर्मनोवद्व्यपदिश्यते' इस सूत्रके भाष्यमें कार्यके पार्थक्यसे प्राण और बुद्धिमें परस्पर भेदका प्रतिपादन किया गया है, अतः बुद्धिरूप उपाधिसे उपहित जीव प्रथम उत्क्रमण करता है, फिर प्राणका उत्क्रमण उपपन्न हो सकता है । नाम और रूपसे विमुक्त होनेके बाद ब्रह्मकी प्राप्तिकी जो श्रुति है, यह प्राप्त करनेवाले जीवमें
* इस ग्रन्थसे सिद्धान्तीने कहा कि पूर्वपक्षी ईश्वरमें विभुत्वका भी साधन नहीं कर सकता है, इससे सुतरां उसके मतमें जीव और ईश्वरभेद भी असिद्ध ही है, क्योंकि ईश्वरमें व्यापकत्व तभी हो सकता है, जब कि ईश्वर जगत् का उपादान हो परन्तु पूर्वपक्षीने ईश्वरको जगत्का उपादान नहीं माना है, किन्तु प्रकृतिको माना है, अतः ईश्वरमें व्यापकत्व सिद्ध नहीं हो सकता है, और जीवमें अणुत्वकी भी सिद्धि नहीं हो सकती है, क्योंकि सुखदुःखके प्रति जैसे जीवको उपादान तुमने माना है, वैसे ही युक्तिसे यह संसारका भी उपादान हो सकता है, इससे उपादान होनेके कारण जीवमें भी व्यापकत्वकी सिद्धि हो सकती है ।
† पञ्चवृत्तिर्मनोवद् व्यपदिश्यते इसका यह अर्थ है—मनके समान अर्थात् जैसे मनकी श्रोत्र, चक्षु आदिके भेदसे शब्द आदि विषयक पांच प्रकारकी वृत्तियाँ होती हैं, वैसे ही प्राणकी प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान रूपसे पाँच प्रकारकी वृत्तियाँ होती हैं, अतः प्राण मनके समान श्रुतिमें कहा गया है । इसमें दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिककी उपपत्तिके लिए अवश्य प्राण और मनका भेद मानना चाहिए, 'यो वै प्राणः सा प्रज्ञा' इत्यादिसे प्राण और प्रज्ञाका जो अभेद कहा गया है, वह प्रज्ञा और प्राणरूप उपाधिसे उपहित प्रत्यगात्माके एक होनेसे उपहित आत्माकी मुख्यतासे कहा गया है, यह समझना चाहिए ।
| ४१२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
|---|
जीव इव प्राप्तव्ये ब्रह्मण्यपि विभुत्वविरोधित्वात् । प्राकृतनामरूपविमोक्षा- नन्तरमपि अप्राकृतलोकविग्रहाद्युपधानेन ब्रह्मणः प्राप्तव्यत्ववादिमते प्राप्तुर्जीवस्याऽप्यप्राकृतदेहेन्द्रियादिसत्त्वेन तदुपधानेन ब्रह्मप्राप्तिश्रवणा- विरोधात् स्वाभाविकगत्याश्रयशकटदृष्टान्तश्रवणमात्राद् जीवस्य स्वाभा- विकप्रवेशाश्रयजीवसमभिव्याहारेण ब्रह्मणोऽपि स्वाभाविकप्रवेशसिद्धिसम्भ- वाद् । ब्रह्मजीवोभयान्वयिन एकस्य प्रविष्टपदस्य एकरूपप्रवेशपरत्वस्य
जैसे विभुत्वकी विरोधी है, वैसे ही प्राप्तव्य ब्रह्ममें भी विभुत्वकी विरोधी हो सकती है । और दूसरी बात यह भी है कि * प्राकृत नाम और रूपसे विमोक्ष होनेके अनन्तर भी अप्राकृत लोक-विग्रह आदि उपाधिसे ब्रह्ममें प्राप्तव्यता है, इस प्रकार कहनेवाले तुम्हारे मतमें ब्रह्मप्राप्ति करनेवाले जीवको भी अप्राकृत शरीर, इन्द्रिय आदि हैं, अतः उन उपाधियोंके आधारपर ब्रह्म- प्राप्तिका विरोध भी नहीं है, इससे स्वाभाविक गमनक्रियाके आश्रय शकटके दृष्टान्तमात्रसे जीवमें स्वाभाविक गति आदिकी सिद्धि होनेपर 'गुहां प्रविष्टौ' इससे स्वाभाविक प्रवेश करनेवाले जीवके सान्निध्यसे ब्रह्ममें भी स्वाभाविक प्रवेशकी भी सिद्धि हो सकती है † । क्योंकि ब्रह्म और जीव दोनोंमें सम्बन्ध रखनेवाले एक प्रविष्टपदकी एकरूपप्रवेशबोधकता ही कहनी चाहिए * ।
* अर्वाचीनोंके मतमें व्यापकत्वरूपसे ब्रह्म मुक्तोंका प्राप्य नहीं है, किन्तु लोकविशेष आदि उपहितत्वरूपसे ब्रह्म मुक्तोंका प्राप्य है, अतः उपहितत्वरूपसे ब्रह्ममें रहनेवाली प्राप्तव्यता ब्रह्मकी स्वरूपतः व्यापकत्वविरोधी नहीं है, ऐसी आशङ्का करके जीवमें भी तुल्ययुक्त्या यह प्रकार हो सकता है, ऐसा 'प्राकृत' इत्यादि ग्रन्थसे कहते हैं । तात्पर्य यह है कि 'विद्वान् नाम रूपाद्विमुक्तः' इस श्रुतिमें 'प्राकृतनामरूपसे विमुक्त' इस अर्थकी कल्पना करके अर्वाचीन ज्ञानी जीवके अप्राकृत नाम-रूपका स्वीकार करते हैं, इसलिए स्वतः विभु जीव, जो कि अप्राकृत नाम-रूप उपाधिसे परिच्छिन्न है, ब्रह्मके प्रति गन्ता (गमनकर्त्ता) हो सकता है, अतः जीवविषयक विभुत्व-श्रुतियोंका बाध न करना उचित नहीं है, यह भाव है ।
† तात्पर्य यह है—एक वार कहा गया पद अनेकार्थक नहीं होता है, यह नियम है, इससे 'गुहां प्रविष्टौ' इसमें एक प्रविष्टशब्दकी जीवमें स्वाभाविकार्थकता और ब्रह्ममें औपाधिकार्थकता माननी अयुक्त है, अतः ब्रह्ममें पूर्वपक्षीको स्वाभाविक गति प्राप्त होगी, यदि ईश्वरमें विभुत्वप्रतिपादक श्रुतिके अनुरोधसे प्रविष्टश्रुतिका सामान्यप्रवेश अर्थ मानते हो, तो जीवमें भी विभुत्वप्रतिपादक श्रुतिके आधारपर शकटदृष्टान्तमें गमनादिका साम्यमात्र प्रदर्शित है, स्वाभाविकगत्याश्रयत्व प्रतिपादित नहीं है, ऐसा मान सकते हैं; यह भाव है ।
जीवके अणुत्वका निराकरण-विचार ] भाषानुवादसहित ४१३
वक्तव्यत्वात् । तस्मात् परमते ब्रह्मजीवयोर्विभुत्वाणुत्वव्यवस्थित्यसिद्धेर्न ततो भेदसिद्धिं प्रत्याशा । अस्मन्मते ब्रह्मात्मैक्यपरमहावाक्यानुरोधेनाऽवान्तरवाक्यानां नेयत्वात् स्वरूपेण जीवस्य विभुत्वम्, औपाधिकरूपेण परिच्छेद इत्यादिप्रकारेण जीवब्रह्मभेदग्राहकश्नुतीनामुपपादनं भाष्यादिषु व्यक्तम् ।
इससे पर-जीवाणुवादीके मतमें जीव और ब्रह्ममें अणुत्व और विभुत्वकी व्यवस्था नहीं हो सकती है, अतः उससे भेदसिद्धिकी आशा नहीं करनी चाहिए। हमारे मतमें ब्रह्म और जीवके ऐक्यबोधक 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यके अनुरोधसे अवान्तर * वाक्योंका अर्थ करना चाहिए, अतः जीव स्वरूपतः † व्यापक है और औपाधिकरूपसे परिच्छिन्न है, इत्यादिरूपसे जीव और ब्रह्मके भेदका बोध करानेवाली श्रुतियोंकी उपपत्ति भाष्य आदिमें स्पष्ट है।
* जैसे अर्वाचीनोंके पक्षमें—जीव और ईश्वर दोनोंमें विभुत्व और अणुत्व प्रतिपादक श्रुतियोंके समान होनेसे और उन दोनों श्रुतियोंकी अन्यथासिद्धिके समान होनेके कारण उनमें अणुत्व और विभुत्व समान रूपसे ही सिद्ध होंगे, एक अणु और दूसरा विभु, इस प्रकार व्यवस्था सिद्ध नहीं होगी—यह दोष दिया गया है। वैसे ही दोष सिद्धान्तमें भी आ सकते हैं, क्योंकि जीवके परिच्छिन्नत्व और विभुत्वका प्रतिपादक श्रुतिलिङ्ग समान ही है, अतः जीवमें विभुत्व स्वाभाविक है और परिच्छिन्नत्व औपाधिक है, इस प्रकार व्यवस्था नहीं हो सकती है, इसपर सिद्धान्ती 'अस्मन्मते' इत्यादिसे कहते हैं कि नहीं—हमारे मतमें अव्यवस्था नहीं हो सकती है, क्योंकि महावाक्यके अनुसार ही अवान्तर वाक्योंका अर्थ होता है, प्रकृतमें महावाक्य 'तत्त्वमसि' आदि वाक्य हैं, क्योंकि मुक्तिका साधनीभूत जो ब्रह्मात्मैक्यज्ञान है, उसके प्रति तत्त्वमस्यादि वाक्य जनक हैं, और अवान्तर वाक्य 'स एषोऽणिमा' इत्यादि हैं, क्योंकि वे महावाक्यार्थज्ञानके कारणीभूत तत् और त्वम् पदार्थके ज्ञानके प्रति साधन हैं, और जितने पदार्थप्रतिपादकवाक्य होते हैं, वे सब के सब महावाक्यके अङ्ग होते हैं, अतः सिद्धान्तमें अव्यवस्था नहीं है, यह भाव है।
† यदि स्वरूपतः जीव व्यापक न हो, तो महावाक्यसे प्रतिपाद्य ब्रह्मके साथ भेद अनुपपन्न होगा, अतः जीवको स्वरूपतः व्यापक ही मानना चाहिए।
| ४१४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
|---|
तस्मात् प्रपञ्चमिथ्यात्वात् पराभेदाच्च देहिनः ।
मानान्तराविरोधेन सिद्धोऽद्वैते समन्वयः ॥६८॥
इससे प्रपञ्चके मिथ्या होनेसे, परमात्माके साथ जीवका अभेद होनेसे और अन्य किसी प्रमाणके साथ विरोध न होनेसे अद्वैत ब्रह्ममें वेदान्तोंका समन्वय सिद्ध ही है ॥६८॥
इति श्रीमद्गङ्गाधरसरस्वतीविरचितायां वेदान्तसिद्धान्तसूक्तिमञ्जर्यां
द्वितीयः परिच्छेदः समाप्तः ।
तस्मादचेतनस्य प्रपञ्चस्य मिथ्यात्वात् चेतनप्रपञ्चस्य ब्रह्माभेदाच्च न वेदान्तानामद्वितीये ब्रह्मणि विद्यैकप्राप्ये समन्वयस्य कश्चिद्विरोध इति ॥
इति सिद्धान्तलेशसंग्रहे द्वितीयः परिच्छेदः समाप्तः ।
इससे अचेतन प्रपञ्चके मिथ्या होनेसे और चेतनप्रपञ्चका ब्रह्मके साथ अभेद होनेसे केवल विद्यासे प्राप्य अद्वितीय ब्रह्ममें वेदान्तोंका तात्पर्य है, इसमें कोई विरोध नहीं है ।
इति पं० मूलशङ्करव्यासविरचित सिद्धान्तलेशसंग्रहके भाषानुवादमें
द्वितीय परिच्छेद समाप्त
ज्ञानोत्पत्तिमें कर्मोंके उपयोगका विचार] भाषानुवादसहित ४१५
ॐ नमः परमात्मने
तृतीयः परिच्छेदः
ज्ञानेनैव कथं मुक्तिः कर्मभिश्चापि तत्स्मृतेः ।
नाविद्यकत्वाद् बन्धस्य नान्यः पन्था इति श्रुतेः ॥ १ ॥
यदि शङ्का हो कि ज्ञान ही से मुक्ति कैसे होगी ? क्योंकि कर्मसे भी मुक्ति होती है, ऐसी स्मृति है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि समग्रप्रपञ्च अविद्यासे होता है, और 'नान्यः पन्था' इत्यादि श्रुति है ॥ १ ॥
ननु कथं विद्ययैव ब्रह्मप्राप्तिः । यावता कर्मणामपि तत्प्राप्तिहेतुत्वं स्मर्यते—
'तत्प्राप्तिहेतुर्विज्ञानं कर्म चोक्तं महामुने !' इति ।
सत्यम्, 'नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय' इति श्रुतेः, नित्यसिद्ध-
ॐ अब शङ्का होती है कि विद्यासे ही ब्रह्मकी प्राप्ति होती है, ऐसा कैसे कहते हो जब कि कर्म भी ब्रह्मप्राप्तिके प्रति साधनरूपसे स्मृतिमें कहे गये हैं—
'तत्प्राप्तिहेतुर्विज्ञानम्०' ( हे महामुने ! ब्रह्मप्राप्तिके प्रति साधन कर्म और विज्ञान दोनों ही कहे गये हैं ) ।
ठीक है, ‡ तथापि शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि 'नान्यः पन्था०' ( मुक्तिके लिए ज्ञानको छोड़कर अन्य मार्ग ही नहीं है ) ऐसी श्रुति है†, और सर्वदा
ॐ पूर्व परिच्छेदके अन्तमें ब्रह्मप्राप्तिरूप मोक्ष केवल विद्यासे होता है, ऐसा कहा गया है, इस विषयमें समुच्चयवादी शङ्का करता है कि केवल विद्यासे ही मुक्ति होती है, यह नहीं हो सकता, क्योंकि कर्म भी साधनरूपसे स्मृति आदिमें बतलाए गये हैं, यह भाव है ।
† अर्थात् 'तेनैति ब्रह्मवित् पुण्यकृत्' ( ब्रह्मज्ञान और पुण्य दोनोंके समुच्चयमें ब्रह्मज्ञानी ब्रह्मको प्राप्त करता है ) इस श्रुतिमें कहा गया है, यह भाव है ।
‡ अर्थात् पूर्वपक्षीका समुच्चयवाद युक्त नहीं है, क्योंकि युक्तिसे उपबृंहित 'नान्यः पन्थाः' इत्यादि श्रुतिसे समुच्चयका बाध होता है, श्रुतिको अर्थ यह है, केवल ब्रह्मज्ञानसे अन्य—ज्ञानकर्म-समुच्चयरूप अथवा केवल कर्मरूप मार्ग मोक्षके लिए है ही नहीं । और मोक्ष तो आत्माका सर्वदा है ही, परन्तु उसमें अप्राप्तमात्र भ्रम है, इस भ्रमकी निवृत्ति ही मोक्ष है, अतः अज्ञान निवृत्ति केवल ज्ञानसे ही हो सकती है, कर्मसे नहीं हो सकती, यह लोकमें दृष्टचर है, जैसे कण्ठमें मालाके रहते हुए भी भ्रमसे वह अप्राप्तसी प्रतीत होती है, और भ्रमके निवृत्त होनेपर मनुष्य उसे
| ४१६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
|---|
ब्रह्मावाप्तौ कण्ठगतविस्मृतकनकमालाऽवाप्तितुल्यायां विद्यातिरिक्तस्य साधनत्वासम्भवाच्च । ब्रह्मावाप्तौ परम्परया कर्मापेक्षामात्रपरा तादृशी स्मृतिः, क्व तर्हि कर्मणामुपयोगः ?
कर्मणामुपयोगस्तु भामतीकृन्मते स्थितः ।
तमेतमिति वाक्येन मुख्ये विविदिषोद्भवे ॥ २ ॥
भामतीकारके मतमें कर्मोंका उपयोग 'तमेतम्' इत्यादि वाक्यसे मुख्य विविदिषामें है ॥ २ ॥
अत्र भामतीमतानुवर्तिन आहुः—'तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन' इति श्रुतेर्विद्यासम्पादनद्वारा ब्रह्मावाप्त्युपायभूतायां विविदिषायामुपयोगः । ननु इष्यमाणविद्याया-
सिद्ध ( प्राप्त ) ब्रह्मकी प्राप्तिमें, जो कि गलेमें होते हुए भी विस्मृत सुवर्ण-मालाकी प्राप्तिके समान है, विद्यासे ( ज्ञानसे ) भिन्न कोई साधन हो ही नहीं सकता । अतः उक्त श्रुति ब्रह्मकी प्राप्तिमें केवल परम्परासे कर्मोंकी अपेक्षा ही बतलाती है, तो कर्मोंका उपयोग कहाँ है ?
इस विषयमें भामतीकारके अनुयायी कहते हैं कि 'तमेतं वेदा०' ( ब्रह्माभिन्न जीवको स्वाध्याय, यज्ञ, दान और अनाशक * तपसे ब्राह्मण लोग जाननेकी इच्छा करते हैं ) इस श्रुतिसे विद्याकी प्राप्ति द्वारा ब्रह्मप्राप्तिकी हेतुभूत विविदिषामें † कर्मोंका उपयोग है । यदि शङ्का हो कि ‡ इष्यमाण विद्यामें ही कर्मोंका उप-
प्राप्त हुई समझता है, वैसे ही मोक्षके प्राप्त होनेपर भ्रमकी निवृत्तिसे अप्राप्त वस्तु प्राप्त हुई, ऐसा समझता है, अतः समुच्चयवाद असङ्गत ही है, यह भाव है ।
* अर्थात् ऐसा तप करना चाहिए जिससे कि शरीरका विनाश न हो, इसलिए हित, मित, तथा पवित्र अशन करके ही तप करना चाहिए, अनशन आदि शरीरनाशक तप नहीं करना चाहिए, यह भाव है ।
† ब्रह्मज्ञानकी इच्छा, जो कि रुचिरूप है उसमें, यह अर्थ है ।
‡ शङ्काका बीज यह है कि विद्या ही साक्षात् मुक्तिके प्रति कारण है, इसलिए उसके प्रति ही यज्ञ आदिको कारण क्यों न माना जाय, जैसे अन्यत्र स्वर्गादिके प्रति, जो इष्यमाण-इच्छाके विषय हैं, यज्ञ आदिका विनियोग किया जाता है, प्रकृतमें इच्छाकी विषय विद्या है, इसलिए उसीमें यज्ञादिका अन्वय होना अभीष्ट है, यह भाव है ।
ज्ञानकी उत्पत्तिमें कर्मोंके उपयोगका विचार ] भाषानुवादसहित ४१७
मेवोपयोगः किं न स्यात् ? न स्याद् ; प्रत्ययार्थस्य प्राधान्यात् । 'विद्यासंयोगात् प्रत्यासन्नानि विद्यासाधनानि शमदमादीनि, विविदिषासंयोगात्तु बाह्यतराणि यज्ञादीनि' इति सर्वापेक्षाधिकरणभाष्याच्च ( उ० मी० अ० ३ पा० ४ अधि० ६ सू० २७ ) । ननु विविदिषार्थं यज्ञाद्यनुष्ठातुर्वेदनगोचरेच्छावत्त्वे विविदिषायाः सिद्धत्वेन तदभावे वेदनोपायविविदिषायां कामनाऽसम्भवेन च विविदिषार्थं यज्ञाद्यनुष्ठानायोगाद् न यज्ञादीनां विविदिषायां
योग क्यों नहीं होता, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रकृत्यर्थ और प्रत्ययार्थमें प्रत्ययार्थ ही × प्रधान होता है। और 'विद्याके साक्षात् साधन होनेसे शम, दम आदि विद्याके अन्तरङ्ग कारण विद्याकी उत्पत्ति तक अनुष्ठेय हैं। तथा ब्रह्मज्ञानेच्छाके साधन होनेके कारण बहिरङ्ग यज्ञ आदि साधन विविदिषाकी उत्पत्ति तक ही अनुष्ठेय हैं, इस प्रकारका सर्वापेक्षाधिकरण-भाष्य † भी है। यदि शङ्का हो कि विविदिषाके लिए यज्ञ आदिका अनुष्ठान करनेवाले पुरुषको ज्ञानविषयक यदि पूर्वसे इच्छा विद्यमान है, तो विविदिषा सिद्ध ही है, यदि ज्ञानविषयिणी इच्छा उसे नहीं है, तो ज्ञानकी कारण विविदिषामें भी इच्छा नहीं हो सकती, अतः उभय था विविदिषाके लिए यज्ञादिका अनुष्ठान हो ही नहीं सकता है*, इसलिए विविदिषामें यज्ञ आदिका विनियोग युक्ति-युक्त नहीं है, तो
× तात्पर्य यह है कि 'स्वर्गकामो ज्योतिष्टोमेन यजेत' इत्यादि स्थलमें याग आदिमें विधिप्रत्ययसे इष्ट-साधनता बोधित होती है, वह इष्ट क्या है? इस प्रकारकी विशेष जिज्ञासा होनेपर पुरुषके विशेषणरूपसे श्रुत कामना और स्वर्ग दोनोंमें से किसी एककी भी शब्दतः प्रधानता प्रतीत न होनेसे आर्थिक प्रधानताका आश्रयण किया जाता है, और अर्थतः प्रधान है—स्वर्ग, इसलिए फलरूपसे उसीका अन्वय किया गया है—याग स्वर्गका साधन है। प्रकृतमें ज्ञानेच्छाका ही फलरूपसे अन्वय होता है, क्योंकि शब्दसे वही प्रधान प्रतीत होती है, इसलिए फलप्रत्यासत्ति आदि अकिञ्चित्कर हैं। प्रकृतमें भगवान् भाष्यकारकी भी सम्मति है।
† विविदिषामें ही कर्मोंका विनियोग है, इसमें भाष्य भी प्रमाण है, 'सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत्', इस सूत्रसे यह सर्वापेक्षाधिकरण आरब्ध है, देखिए—पृ० २२२२ अच्युतग्रन्थमालामुद्रित शाङ्करभाष्य।
* प्रकारान्तरसे विविदिषाविनियोगका आक्षेप करते हैं, भाव यह है कि यदि ज्ञानेच्छा यज्ञ आदिका फल है, तो ज्ञानेच्छाविषयक ज्ञानसे यज्ञ आदिका अनुष्ठान करना चाहिए और ज्ञानेच्छाके स्वतः फलत्व न होनेसे ज्ञान द्वारा ही उसमें मुक्तिफलकत्व होगा, इससे यह क्रम प्राप्त होगा कि पहले मुक्तिमें स्वतः पुरुषार्थत्वके ज्ञानसे इच्छा होगी, उसके बाद ब्रह्मज्ञानमें मुक्ति-
५३
| ४१८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
|---|
विनियोगो युक्त इति चेद्, न; अन्नद्वेषेण कार्श्यं प्राप्तस्य तत्परिहारायाऽन्नविषयोत्कण्ठ्यलक्षणायामिच्छायां सत्यामप्युत्कटाजीर्णादिप्रयुक्तधातुवैषम्यदोषात् तत्र प्रवृत्तिपर्यन्ता रुचिर्न जायते इति तद्रोचकौषधविधिवद् निरतिशयानन्दरूपं ब्रह्म तत्प्राप्तौ विद्यासाधनमित्यर्थे प्राचीनबहुजन्मानुष्ठितानभिसंहितफलकनित्यनैमित्तिककर्मोपसञ्जातचित्तप्रसादमहिम्ना सम्पन्नविश्वासस्य पुरुषस्य ब्रह्मावाप्तौ विद्यायां च तदोन्मुख्यलक्षणायामिच्छायां सत्यामप्यनादिभवसञ्चितानेकदुरितदोषेणाऽऽस्तिककामुकस्य हेयकर्मणीव
यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे अन्नमें द्वेषसे अर्थात् किसी दोषवशसे अन्न न खानेसे जिसको शरीरमें कृशता प्राप्त है, उसे अपने शरीरके दौर्बल्यका परिहार करनेके लिए अन्नमें उत्कण्ठारूप इच्छा, तो अवश्य होती है, परन्तु बड़े उत्कट अजीर्णरूप दोषसे उत्पन्न धातुवैषम्यसे अन्न-खानेमें प्रवृत्ति करानेवाली रुचि नहीं होती है, इसलिए अन्नमें रुचिके सम्पादक औषधका उपचार किया जाना आवश्यक होता है, वैसे ही 'ब्रह्म निरतिशय आनन्दरूप है और उसकी प्राप्तिका साधन विद्या है' इस विषयमें पहलेके अनेक जन्मोंमें फलकी इच्छाके बिना अनुष्ठित अनेक नित्य, नैमित्तिक कर्मोंसे उत्पन्न हुई चित्तकी प्रसन्नतासे जिस पुरुषको—विश्वास हुआ है, उस पुरुषको ब्रह्मकी प्राप्तिमें और विद्यामें उत्सुकतारूप इच्छा तो अवश्य होती है, परन्तु जैसे आस्तिक † कामी पुरुषकी निन्दित कर्ममें प्रवृत्ति होती है, वैसे ही विषय-
साधनत्वके ज्ञानसे इच्छा होगी, उसके बाद वेदनेच्छामें वेदनसाधनत्वज्ञानसे इच्छा होगी, इस इच्छाके अनन्तर यज्ञ आदिका अनुष्ठान होगा, इस परिस्थितिमें वेदनेच्छारूप विविदिषाके उद्देश्यसे यज्ञादिमें प्रवृत्त पुरुषको विविदिषाके फलभूत ब्रह्मज्ञानमें इच्छा है, या नहीं है ? प्रथम पक्षमें यज्ञ आदिका अनुष्ठान व्यर्थ होगा, द्वितीय पक्षमें यज्ञ आदिका अनुष्ठान ही नहीं प्रसक्त होगा, क्योंकि विविदिषाके फलमें (वेदनमें) कामनाके न रहनेसे विविदिषामें भी इच्छा नहीं है, अतः विविदिषामें यज्ञादिका विनियोग नहीं हो सकता है, यह पूर्वपक्षका भाव है।
† जिस पुरुषने पूर्वके अनेक जन्मोंमें अनेक कर्मोंका अनुष्ठान किया है, उन्हीं कर्मोंसे जब उसकी चित्तशुद्धि हुई है, और ब्रह्मविद्यामें जिसका विश्वास भी हुआ है, तो कैसे वह विषयभोगमें प्रवृत्त होगा ? इस शङ्काके परिहारमें यह 'आस्तिककामुकस्य' दृष्टान्त है, सारांश यह है कि जिसको कि वेदविहित कर्मोंके करनेसे अवश्य कल्याण होता है,
ज्ञानकी उत्पत्तिमें कर्मोंके उपयोगका विचार ] भाषानुवादसहित ४१९
विषयभोगे प्रावण्यं सम्पादयता प्रतिबन्धाद्विद्यासाधने श्रवणादौ प्रवृत्ति- पर्यन्ता रुचिर्न जायत इति प्रतिबन्धनिरासपूर्वं तत्सम्पादकयज्ञादिविधा- नोपपत्तेरिति ।
स्वर्गवत्काम्यमाने तं ज्ञाने विवरणानुगाः ।
जिज्ञासितव्यं श्रुतिभिर्ब्रह्मेत्यत्र श्रुतेरिव ॥३॥
विवरणानुसारी कहते हैं कि स्वर्गके समान अभिलषित ज्ञानमें ही कर्मोंका उपयोग है, जैसे कि 'श्रुतियोंसे ब्रह्म जानना चाहिए' इसमें श्रुतियोंका ब्रह्मज्ञानमें उपयोग है ॥३॥
भोगमें दक्षताका सम्पादन करानेवाले अनेक जन्मोंके सञ्चित पापोंके प्रभावसे प्रतिबन्ध होनेके कारण विद्याके साधन श्रवण आदिमें पुरुषकी प्रवृत्ति करानेवाली रुचिलक्षण इच्छा नहीं होती है, अतः प्रतिबन्धके निरासपूर्वक विविदिपाशब्दसे कहलानेवाली श्रवणादिमें प्रवृत्तिपर्यन्त रुचिकी उत्पत्तिके लिए यज्ञादिका अनुष्ठान करना चाहिए । [ सारांश यह है कि ज्ञानकी इच्छा दो प्रकारकी है—एक तो विद्यामें उत्कण्ठारूप और दूसरी रुचिरूप, पहली इच्छा, यज्ञ आदिके अनुष्ठानके पूर्वमें भी है, अतः उसीको लेकर ज्ञानकी कारण विविदिपामें कामना होती है, इससे विविदिपाके लिए यज्ञ आदिका अनुष्ठान होता है, दूसरी रुचिरूप इच्छा यज्ञ आदिके अनुष्ठानके वाद होती है, अतः उस रुच्यात्मक विविदिपामें यज्ञ आदिका विनियोग कर सकते हैं, इसलिए पूर्वपक्षीकी उक्त शङ्का उपपत्तिशून्य है * ] ।
'और उनका अनुष्ठान न करनेसे पाप होता है, इस प्रकार शास्त्रपरिशीलनसे ज्ञान है, ऐसे किसी पुरुषको भी कामोद्रेक होता है और पापविशेषसे निषिद्धाचरण करता है, वैसे मुमुक्षुको भी पापविशेषसे विषयमें प्रवृत्ति हो सकती है, यह भाव है ।
* इस भामतीकारके अनुसारी मतमें—‘अस्यार्थः—‘विविदिपन्ति यज्ञेन’ इति तृतीयाश्रुत्या यज्ञादीनामङ्गत्वेन ∙ ब्रह्मज्ञाने विनियोगात्••••••∙∙∙नित्यस्वाध्यायेन ब्राह्मणा विविदिपन्ति, न तु-विन्दन्ति, वस्तुतः प्रधानस्यापि वेदनस्य प्रकृत्यर्थतया शब्दतो गुणत्वाद्, इच्छायाश्च प्रत्ययार्थतया प्राधान्यात्, प्रधानेन च कार्यसम्प्रत्ययात्’ यह साक्षात् वाचस्पतिकी उक्ति—प्रमाणभूत है, तात्पर्य यह है कि ‘विविदिपन्ति यज्ञेन’ इसमें ‘यज्ञेन’ इस तृतीयाविभक्त्यन्तश्रुतिसे ब्रह्मज्ञानमें यज्ञ आदिका अङ्गत्वरूपसे विनियोग होता है••••••••नित्य स्वाध्यायसे ब्राह्मण ब्रह्मज्ञानकी इच्छा करते हैं, न कि जानते हैं, यद्यपि वस्तुतः वेदन ( ज्ञान ) प्रधान है, तथापि शब्दमर्यादासे वह अप्रधान है, और इच्छा प्रत्ययार्थ होनेके कारण प्रधान है, और प्रधानमें अन्यका सम्बन्ध होता है, [ द्रष्टव्य—पृ० ५१ और ६१ कल्पतरुसहित भामती निर्णयसागर प्रेसमें मुद्रित ] ।
| ४२० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
|---|
विवरणानुसारिणस्त्वाहुः—‘प्रकृतिप्रत्ययार्थयोः प्रत्ययार्थस्य प्राधान्यम्’ इति सामान्यन्यायाद् ‘इच्छाविषयतया शब्दबोध्ये एव शब्दसाधनतान्वयः’ इति स्वर्गकामादिवाक्ये क्लृप्तविशेषन्यायस्य बलवत्त्वात् । ‘अश्वेन जिगमिषति’ ‘असिना जिघांसति’ इत्यादिलौकिकप्रयोगे अश्वादिरूपसाधनस्य, ‘तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यं’ ‘मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः’ इत्यादिवैदिकप्रयोगे तव्यार्थभूतविधेश्च सन्प्रत्ययाभिहितेच्छाविषये एव गमनादा-
विवरणानुसारी लोग कहते हैं कि † ‘प्रकृति०’ ( प्रकृति और प्रत्ययके अर्थोंमें प्रत्ययका ‡ अर्थ ही प्रधान होता है ) इस सामान्य नियमसे स्वर्गकामादि वाक्यमें क्लृप्त ‘इच्छाविषय होनेसे शब्दबोध्य अर्थमें ही शब्दसाधनताका अन्वय होता है’ यह न्याय बलवान् है । और ‘घोड़ेसे जानेकी इच्छा करता है, तलवारसे मारनेकी अभिलाषा करता है’ इत्यादि लौकिकप्रयोगमें अश्व आदिरूपसाधनका और ‘तदन्वेष्टव्यम् ०’ ( उसकी — परमात्माकी — खोज करनी चाहिए, उसकी जिज्ञासा करनी चाहिए, आत्माका मनन करना चाहिए, निदिध्यासन करना चाहिए ) इत्यादि वैदिकप्रयोगमें तव्यार्थभूत विधिका सन्प्रत्ययसे कही गई इच्छाके विषयभूत गमन आदिमें ही अन्वय
† भामत्यादि नवटीकोपेत शाङ्करभाष्यके पृ० ६८३ में इस मतकी पोषक विवरणकी पंक्तियाँ हैं—'नित्यनैमित्तिककर्मानुष्ठानैः संस्कृतस्याऽऽत्मनो यदि श्रवणमननध्यानाभ्यासादीनि ज्ञानसाधनानि सम्पद्यन्ते, तदा संस्कारकर्माणि सहकारिविशेषादात्मज्ञानमवतारयन्ति—इत्यादि । इसी प्रकार और अनेक वाक्योंसे भी इसी अर्थका प्रतिपादन श्रुति और स्मृतिके विरोधपरिहारपूर्वक किया गया है ।
‡ ‘विविदिषन्ति यज्ञेन’ इसमें सनरूप प्रत्ययका अर्थ है—इच्छा और विद्धातुरूप प्रकृतिका अर्थ है—ज्ञान, इनमें प्रत्ययार्थ इच्छा ही प्रधान है, इसलिए शब्दतः प्रधानरूपसे प्रतीत होनेवाली इच्छामें ही यज्ञादिका विनियोग प्राप्त है, परन्तु इस नियमका औत्सर्गिक होनेसे बाध हो सकता है । अतः ‘स्वर्गकामो यजेत’ इस विधिवाक्यमें विधायकप्रत्ययसे इष्टसाधनत्वरूपसे अवगत यागके इष्ट विशेषकी आकाङ्क्षामें शब्दतः स्वर्गके प्रधान न होनेपर भी फलत्वरूपसे अन्वय किया गया है, इसलिए ‘इष्यमाणसमभिव्याहारे इष्यमाणस्यैव प्राधान्यम्’ न तु इच्छायाः’ ( इच्छा और इच्छाविषयके सामीप्य रहते इच्छाका विषय ही प्रधान होता है, इच्छा नहीं ) इस प्रकारका विशेषनियम, जो कि पूर्व सामान्यनियमका बाधक है, बलवान् है, यह भाव है ।
ज्ञानकी उत्पत्तिमें कर्मोंके उपयोगका विचार] भाषानुवादसहित ४२१
वन्वयस्य व्युत्पन्नतयाच प्रकृत्यभिहितायां विद्यायां यज्ञादीनां विनियोगः । ननु तथा सति यावद्विद्योदयं कर्मानुष्ठानापत्त्या 'त्यजतैव हि तज्ज्ञेयम्' इत्यादिश्रुतिप्रसिद्धं कर्मत्यागरूपस्य सन्न्यासस्य विद्यार्थत्वं पीड्येतेति चेद्, न ; प्राग् बीजावापात् कर्षणम्, तदनन्तरमकर्षणमिति कर्पणाकर्षणाभ्यां व्रीह्यादिनिष्पत्तिवद्—
'आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥'
इत्यादिवचनानुसारेण चेतः शुद्धौ विविदिषादिरूपप्रत्यक्प्रावण्यो-
व्युत्पन्न है, अतः प्रकृतिसे अभिहित ( कथित ) विद्यामें ही यज्ञ आदिका × विनियोग है ।
यदि शङ्का हो कि ऐसा होनेपर विद्याकी उत्पत्ति तक कर्मानुष्ठानकी प्रसक्ति होनेसे 'त्यजतैव०' ( सब कर्मोंका त्याग करके ही पुरुषको ) प्रत्यगात्मरूप ब्रह्मका साक्षात्कार करना चाहिए, त्याग किये बिना नहीं ) इत्यादि श्रुतिसे* सिद्ध कर्मत्यागरूप संन्यासमें विद्यार्थता बाधित होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे बीज बोनेके पूर्वमें हल जोतना पड़ता है, उसके बाद नहीं, इससे कर्षण और अकर्षणसे व्रीहिकी उत्पत्ति होती है, वैसे ही—
'आरुरुक्षोर्मु०' ( योगकी सिद्धि होनेके पूर्वमें उसके प्रति कर्म कारण हैं और योगसिद्ध होनेके बाद उन कर्मोंका शम ( संन्यास ) कारण है, ऐसा कहा जाता है ) इस वचनके अनुसार अन्तःकरणकी शुद्धिमें विविदिषारूप प्रत्यक्प्रावण्य
× यदि इसमें कोई शङ्का करे कि उदाहृत वाक्योंमें अर्थात् 'अश्वेन जिगमिषति' इत्यादि वाक्योंमें अश्व आदिका इच्छामें अन्वय नहीं हो सकता है, इसलिए इच्छान्वयका परित्याग किया ? तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि तुल्ययुक्तिसे यह भी कह सकते हैं कि वेदनेच्छाके भी यज्ञान्वयमें अयोग्य होनेसे उसमें यज्ञादिका विनियोग नहीं हो सकता है और ब्रह्मवेदनका, जो कि ब्रह्मानन्दसाक्षात्काररूप है, फलरूपसे अन्वय हो सकता है, यह भाव है ।
* 'अथ परिव्राट्' इस प्रकारसे उपक्रम करके 'ब्रह्मभूयाय कल्पते' इत्यादि कही गई अन्य श्रुतिसे परिव्राट्शब्दसे कथित संन्यास ब्रह्मसाक्षात्कारका कारण बतलाया गया है, इसी प्रकार अन्य श्रुतियोंमें भी कहा गया है, यह अभिप्राय है ।
४२२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ तृतीय परिच्छेद
दयपर्यन्तं कर्मानुष्ठानम्, ततः कर्मतत्सन्न्यासाभ्यां विद्यानिष्पत्त्यभ्युपगमात् । उक्तं हि नैष्कर्म्यसिद्धौ—
‘प्रत्यक्प्रवणतां बुद्धेः कर्माण्युत्पाद्य शुद्धितः । कृतार्थान्यस्तमायान्ति प्रावृडन्ते घना इव ॥’ इति
कर्मणां विद्यार्थत्वपक्षेऽपि विविदिषापर्यन्तमेव कर्मानुष्ठाने विविदिषार्थत्वपक्षात् को भेद इति चेद्, अयं भेदः—कर्मणां विद्यार्थत्वपक्षे द्वारभूतविविदिषासिद्ध्यनन्तरमुपरतावपि फलपर्यन्तानि विशिष्टगुरुलाभानिर्विघ्नश्रवणमननादिसाधनानि निवृत्तिप्रमुखानि सम्पाद्य विद्योत्पादकत्वनियमोऽस्ति । विविदिषार्थत्वपक्षे तु श्रवणादिप्रवृत्तिजननसमर्थोत्कटेच्छासम्पादनमात्रेण कृतार्थतेति नावश्यं विद्योत्पादकत्वनियमः । ‘यस्यैतेचत्वारिंशत्
( योग ) के उदयतक कर्मोंका अनुष्ठान और उसके बाद संन्यास है, इस रीतिसे कर्म और कर्मके त्यागसे विद्याकी उत्पत्ति होती है, ऐसा माना है।
नैष्कर्म्यसिद्धिमें भी कहा है— ‘प्रत्यक्प्रवणताम्०’ (चित्तशुद्धिद्वारा बुद्धिमें विविदिषा, वैराग्य आदि प्रत्यक्प्रावण्यकी प्राप्ति करनेके बाद कर्मोंका प्रयोजन प्राप्त हो जानेसे वे कर्म वर्षाकालके बाद मेघके समान अस्त हो जाते हैं ।) यदि शङ्का हो कि कर्मोंके विद्यार्थत्वपक्षमें भी विविदिषातक ही उनका अनुष्ठान होनेसे कर्मोंके विविदिषार्थत्वपक्षसे क्या भेद हुआ ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि भेद इस प्रकारसे है—कर्मोंके विविदिषार्थत्वपक्षमें द्वारभूत विविदिषाकी सिद्धिके बाद उनका त्याग होनेपर भी अदृष्टद्वारा फलकी उत्पत्तितक विशिष्ट गुरुकी प्राप्तिसे निवृत्तिप्रमुख ( निवृत्तिसहित ) श्रवण, मनन आदिका सम्पादन करके वे कर्म विद्याके उत्पादक होते हैं, ऐसा नियम है और विविदिषार्थत्वपक्षमें, तो अर्थात् जिस पक्षमें कर्मोंका प्रयोजन केवल ब्रह्मज्ञानकी इच्छा पैदा करना है, उस पक्षमें तो श्रवण आदिमें प्रवृत्ति करानेमें समर्थ, ऐसी उत्कट इच्छाके सम्पादनमात्रसे कृतार्थता है, इसलिए उनमें अवश्य विद्योत्पादकत्व * है,
* विविदिषार्थत्वपक्षमें यज्ञ आदिसे उत्पन्न अदृष्ट श्रवण आदिमें प्रवृत्ति तक रुचिका (विविदिषाका) उत्पादन करके नष्ट हो जाता है, क्योंकि अदृष्टका फलोत्पत्तिके बाद विनाश होता है, यह नियम है। और विविदिषाकी उत्पत्तिके अनन्तर श्रवण आदिके प्रति बाधक न
श्रुतिसे विनियुक्त कर्मविशेषोंका कथन] भाषानुवादसहित ४२३
संस्काराः' इति स्मृतिमूले कर्मणामात्मज्ञानयोग्यतापादकमलापकर्षणगुणा- धानलक्षणसंस्कारार्थत्वपक्षे इवेति वदन्ति ॥ १ ॥ तत्रोपयोगः कथितः कैश्चिदाश्रमकर्मणाम् ।
कोई लोग कहते हैं कि आश्रम-कर्मोंका ब्रह्मविद्या आदिमें उपयोग है ।
ननु केषां कर्मणामुदाहृतश्रुत्या विनियोगो बोध्यते ? अत्र कैश्चिदुक्तम्- 'वेदानुवचनेन' इति ब्रह्मचारिधर्माणाम्, 'यज्ञेन दानेन' इति गृहस्थधर्मा- णाम्, 'तपसाऽनाशकेन' इति वानप्रस्थधर्माणां च उपलक्षणमित्याश्रमधर्मा-
ऐसा नियम नहीं है । जैसे कि 'यस्यैते०' ( जिस पुरुषके श्रौत, स्मार्त आदि चालीस संस्कार हैं ) इत्यादि स्मृतिसे प्रतिपादित कर्मोंके संस्कारार्थत्वपक्षमें, जो कि संस्कार आत्मज्ञानकी योग्यताके सम्पादक मलापकर्षणरूप और गुणके आधानरूप हैं, उक्त नियम नहीं है ॥ १ ॥
अब शङ्का होती है कि पूर्वोक्त श्रुतिसे किन कर्मोंका विनियोग ज्ञात होता है ? इस शङ्काके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि 'वेदानुवचनेन' * यह ब्रह्मचारीके धर्मोंका, 'यज्ञेन दानेन' यह गृहस्थ धर्मोंका और 'तपसाऽनाशकेन' यह वानप्रस्थधर्मोंका उपलक्षण है, इसलिए सभी आश्रमधर्म विद्यामें उपयुक्त
रहनेसे विविदिषासे ही श्रवणादि द्वारा ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता है, श्रवण आदिके प्रतिबन्धक पापके रहनेपर यत्न करनेपर भी श्रवण आदि नहीं होते हैं, इसलिए दुरितसत्ताका निश्चय करके उसकी निवृत्तिका उपाय करता है, प्रायः निवर्तक उपायके न करनेसे श्रवण आदि नहीं हो सकते हैं, इसलिए ज्ञान भी नहीं होता है, जैसे औषधसे अन्नके भक्षणमें रुचिकी उत्पत्ति करके यदि अन्न प्राप्त हो, तो उसके भक्षणसे कृशता निकल जाती है, परन्तु यदि यत्न करनेपर भी अन्न नहीं मिला, तो कृशता ज्योंकी त्यों बनी रहती है, इसलिए उनमें अवश्य विद्योत्पादकता है, यह नियम नहीं है, यह भाव है । इसीमें दृष्टान्त है—जो लोग कर्मोंका संस्काररूप फल मानते हैं, उनके पक्षमें यदि कर्मोंसे संस्कृत पुरुषको श्रवणादिसाधन मिले, तो उसे तत्त्वज्ञान द्वारा ब्रह्मकी प्राप्ति होती है, यदि न मिले तो पुण्यलोककी प्राप्ति होती है, यह सिद्धान्त किया गया है, इसलिए कर्मोंके संस्कारार्थत्वपक्षमें कर्मोंमें विद्योत्पादकता अवश्य ही है, ऐसा नियम नहीं है, वैसे विविदिषार्थत्ववादियोंके मतमें भी है, यह भाव है ।
* शिष्य वेदका उच्चारण गुरुवचनके अनन्तर करता है, अतः वेदानुवचनशब्दसे वेदाध्ययनका ग्रहण किया जाता है, वह ब्रह्मचारीके धर्मोंमें प्रधान ही है, इसलिए वेदाध्ययनसे ब्रह्मचारीके सम्पूर्ण धर्मोंका ग्रहण किया जाता है । इसी प्रकार उत्तरोत्तर उपलक्षणमें बीज समझना चाहिए ।
| ४२४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
|---|
णामेव विद्योपयोगः । अत एव 'विहितत्वाच्चाश्रमकर्मापि' ( उ० मी० अ० ३ पा० ४ सू० ३२ ) इति शारीरकसूत्रे विद्यार्थकर्मस्वाश्रमकर्मपदप्रयोग इति ॥
'परैस्तु वैधुरादीनामपि कल्पतरूक्तितः ॥४॥
कोई लोग कल्पतरुकी उक्तिके अनुसार आश्रमरहित विधुर आदिकोंके कर्मोंका भी उपयोग कहते हैं ॥ ४ ॥
कल्पतरौ तु नाऽऽश्रमधर्माणांमेव विद्योपयोगः, 'अन्तरा चाऽपि तु तद्-दृष्टेः' (उ० मी० अ० ३ पा० ४ सू० ३६) इत्यधिकरणे आश्रमरहितविधुराद्यनुष्ठितकर्मणामपि विद्योपयोगनिरूपणात् । न च विधुरादीनामनाश्रमिणां प्राग्जन्मानुष्ठितयज्ञाद्युत्पादितविविदिषाणां विद्यासाधनश्रवणादावधिकारनिरूपणमात्रपरं तदधिकरणम्, न तु तदनुष्ठितकर्मणां विद्योपयोगनिरूपणपरमिति शङ्क्यम् । 'विशेषानुग्रहश्च' इति (उ० मी० अ० ३ पा० ४ सू० ३८)
हैं, इसीलिए 'विहितत्वाच्चाश्रमकर्माऽपि'* इस शारीरिकसूत्रमें विद्याके उपयोगी कर्मोंमें 'आश्रमकर्म' पदका प्रयोग किया गया है ।
कल्पतरुमें † तो कहा है कि आश्रमधर्मोंका ही विद्यामें उपयोग है, ऐसा नियम नहीं है, क्योंकि 'अन्तरा चाऽपि' इस अधिकरणमें आश्रमरहित विधुर आदिसे अनुष्ठित कर्मोंका भी विद्यामें उपयोगनिरूपण किया गया है । यदि शङ्का हो कि पूर्वजन्ममें अनुष्ठित यज्ञ आदिसे जिन्होंने विविदिषाकी उत्पत्ति की है, ऐसे अनाश्रमी विधुरोंका विद्याके साधन श्रवण आदिमें अधिकार है, इसीका निरूपण उक्त अधिकरणमें किया गया है, न कि विधुरोंसे इसी जन्ममें अनुष्ठित कर्मोंका विद्यामें उपयोगका निरूपण किया गया है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'विशेषानुग्रहश्च'‡
* सूत्रका यह अर्थ है कि कर्मफलोंकी अभिलाषा न करनेवाले आश्रमीको भी आश्रम-कर्मोंका अनुष्ठान करना चाहिए, क्योंकि आश्रमीके प्रति उन कर्मोंका शास्त्रोंमें विधान है, अन्यथा प्रत्यवाय होगा, यह भाव है ।
† इस सूत्रका यह अर्थ है—आश्रमके बिना रहे हुए पुरुषोंका भी ब्रह्म-विद्यामें अधिकार है, क्योंकि रैक्वप्रभृति अनाश्रमी पुरुषोंको भी ब्रह्मविद्या हुई है, यह भाव है ।
‡ देवताराधन आदि विशेषधर्मोंसे चित्तशुद्धिद्वारा रैक्वप्रभृतिको आश्रमधर्मोंके समान विद्याका अनुग्रह देखा गया है, अतः अनाश्रमियोंका कर्म भी विद्याका साधन है, इसीलिए—
'जप्येनैव संसिद्धयेत् ब्राह्मणो नाऽत्र संशयः ।
कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान् मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ॥'
अर्थात् जपसे भी ब्राह्मण सिद्धि प्राप्त करता है, उसमें तनिक भी संशय नहीं है । वह अन्य कर्म करे या न करे, क्योंकि ब्राह्मण दयावान् कहलाता है, यह भाव है ।
श्रुतिसे विनियुक्त कर्मविशेषोंका कथन ] भाषानुवादसहित ४२५
तदधिकरणसूत्रतद्भाष्ययोस्तदनुष्ठितानां जपादिरूपवर्णमात्रधर्माणामपि विद्योपयोगस्य कण्ठत उक्तेः । 'विहितत्वाच्चाश्रमकर्मापि' इति सूत्रे आश्रमकर्मपदस्य वर्णधर्माणामप्युपलक्षणत्वादित्यभिप्रायेणोक्तम्—
तत्र क्लृप्तफलत्वेन नित्यानामेव कैश्चन ।
कोई लोग कहते हैं कि क्लृप्त फल होनेसे नित्य कर्म ही विद्याके उपयोगी हैं ।
आश्रमधर्मव्यतिरिक्तानामप्यस्ति विद्योपयोगः, किन्तु नित्यानामेव । तेषां हि फलं दुरितक्षयं विद्याऽपेक्षते, न काम्यानां फलं स्वर्गादि । तत्र यथा प्रकृतौ क्लृप्तोपकाराणामङ्गानामतिदेशे सति न प्राकृतोपकारा-
इस प्रकारके उसके अधिकरणके सूत्र और भाष्यमें जपादिरूप सम्पूर्ण धर्मोंका उपयोग साक्षात् कहा गया है । 'विहितत्वाच्चाश्रमकर्माऽपि' इस सूत्रमें 'आश्रमकर्मशब्द सभी वर्णधर्मोंका उपलक्षण है' अर्थात् आश्रमकर्मसे भिन्न इतर वर्णधर्मोंका भी ग्रहण करना चाहिए, यह भाव है—इसी अभिप्रायसे कल्पतरुमें पंक्तियां भी हैं—
यद्यपि आश्रमधर्मसे *इतर धर्म भी विद्याके उपयोगी हैं, तथापि वे नित्यधर्म ही हैं, क्योंकि उनका दुरितक्षयरूप जो फल है, उसीकी अपेक्षा विद्या करती है, काम्यकर्मोंसे होनेवाले स्वर्ग आदि फलकी अपेक्षा नहीं करती है, इस परिस्थितिमें अर्थात् विद्यामें उपयोगी उपकारकी हेतुताके काम्यकर्मोंमें न होनेसे जैसे प्रकृतियागमें † प्रसिद्ध उपकारी अङ्गोंका विकृतिमें अतिदेश होनेपर प्रकृतिमें किये हुए उनके उपकारसे
* इन पंक्तियोंको कल्पतरुमें, जिसके प्रणेता अमलानन्दस्वामी हैं, देखिए पृ० ६२ भामतीकल्पतरुसहित शाङ्करभाष्य । इससे यही सिद्ध होता है कि 'विविदिषन्ति' इत्यादि विविदिषाश्रुतिसे जिन यज्ञ आदि धर्मोंका विद्यामें उपयोग कहा गया है, वे नित्य ही धर्म लेने चाहिएँ, काम्य नहीं, क्योंकि काम्योंका यदि ग्रहण किया जायगा, तो काम्य कर्मोंके स्वाभाविक फलका परित्याग करके उनका नित्यसाधारण पापक्षयरूप फल मानना होगा, कारण कि विद्या पापक्षयकी अपेक्षा रखती है, स्वर्ग आदिकी नहीं, इससे केवल गौरव होगा, यह भाव है ।
† प्रकृतियाग उसे कहते हैं, जो अतिदिश्यमान अङ्गका प्रतियोगी हो । प्रतियोगी उसे कहना चाहिए कि जिस यागके अङ्ग अतिदिष्ट होते हों, और विकृतियागका अर्थ है अतिदिश्यमान अङ्गोंका अनुयोगी, जिसमें अङ्ग अतिदिष्ट हों, वह अनुयोगी है । प्रकृतियागमें श्रुत पदार्थकी विकृतिमें कल्पना करना अतिदेश कहलाता है। दर्शपूर्णमास प्रकृतियाग है, क्योंकि इसके पदार्थोंका विकृतिभूत सौर्य पशुयाग आदिमें अतिदेश होता है, और सौर्य पशुयाग आदि विकृतियाग हैं, क्योंकि वे अतिदिश्यमान दर्शपूर्णमासयागके पदार्थोंके अनुयोगी हैं, यह भाव है ।
५४
| ४२६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
|---|
तिरिक्तोपकारकल्पनम्, एवं ज्ञाने विनियुक्तानां यज्ञादीनां क्लृप्तनित्यफलपापक्षयातिरेकेण न नित्यकाम्यसाधारणविद्योपयोग्यपकारकल्पनमिति ।
काम्यानामपि संक्षेपशारीरककृतां नये ॥ ५ ॥
न चोपकारसंक्लप्तिद्वारं वाक्यं प्रतीक्षते ।
प्राप्तैर्वचनवैयर्थ्यं द्वारभेदेऽविशिष्टता ॥ ६ ॥
संक्षेपशारीरककारके मतमें काम्यकर्म भी विद्याके उपयोगी हैं, वाक्य उपकारसंक्लप्तिरूप द्वारकी अर्थात् अन्यत्र जिस उपकार की प्राप्ति हुई हो, उसकी अपेक्षा नहीं करता है, क्योंकि उसकी प्राप्ति होनेसे वाक्य ही व्यर्थ होगा, यदि द्वारभेद मानेंगे, तो समानता ही प्रसक्त होगी ॥ ५ ॥ ६ ॥
संक्षेपशारीरके तु नित्यानां काम्यानां च कर्मणां विनियोग उक्तः, यज्ञादिशब्दाविशेषात् । प्रकृतौ क्लृप्तोपकाराणां पदार्थानां क्लृप्तप्राकृतो-
भिन्न उपकारकी कल्पना नहीं की जाती है, वैसे ही ज्ञानमें विनियुक्त [ नित्य ] यज्ञोंका नित्यकर्मोंके फलरूपसे प्रसिद्ध पापविनाशसे अतिरिक्त नित्य और काम्यकर्मोंके साधारण विद्यामें उपयुक्त उपकारकी कल्पना नहीं की जाती है, कारण कि वैसी कल्पना करनेमें गौरव है।
* संक्षेपशारीरकमें तो नित्य और काम्य 'दोनों कर्मोंका विद्यामें विनियोग कहा है, क्योंकि 'तमेतम्' इत्यादि श्रुतिमें सामान्यरूपसे यज्ञ आदि शब्दोंका कथन किया गया है। † प्रकृतियागमें जिनका उपकार प्रसिद्ध है, ऐसे पदार्थोंका—क्लृप्त प्रकृतियागीयके उपकारके अतिदेशसे ही विकृतियागमें अतिदेशसे—
* संक्षेपशारीरककारका यह भाव है कि 'विविदिषन्ति यज्ञेन' इसमें यज्ञशब्द जैसे 'नित्य यज्ञोंमें रूढ है, वैसे ही काम्ययज्ञोंमें भी रूढ है, इसलिए नित्य कर्मोंके समान काम्य-कर्मोंका भी विद्यामें उपयोग प्रतीत होता है, अतः नित्यकाम्य साधारण किसी उपकारविशेषकी कल्पनामें कोई विरोध नहीं है।
† नित्यकाम्यसाधारण विद्यामें उपयुक्त उपकारकी यदि कल्पना की जाय, तो पूर्वमीमांसाके न्यायके साथ विरोध होगा, ऐसा समझ कर कल्पतरुमें विकृतिमें अतिदिष्ट अङ्गोंका दृष्टान्त दिया गया है, उसका परिहार इस ग्रन्थसे करते हैं। तात्पर्य यह है कि प्रकृतियागमें जिन पदार्थोंका उपकार क्लृप्त है, उनका पहले अतिदेश होता है, अनन्तर उन पदार्थोंके उपकारका विकृतिमें अतिदेश होता है, पहले प्राकृतिके पदार्थोंके अतिदेशसे विकृतिमें विनियोग करनेके बाद इनके उपकारकी कल्पना नहीं की जाती है, इसलिए प्रकृतिविकृतिस्थलमें क्लृप्त उपकारका
श्रुतिसे विनियुक्त कर्मविशेषोंका कथन ] भाषानुवादसहित ४२७
पकारातिदेशमुखेनैव विकृतिष्वतिदेशेन सम्बन्धः, न तु पदार्थानामपि- देशानन्तरमुपकारकल्पनेति न तत्र प्राकृतोपकारातिरिक्तोपकारकल्पना- प्रसक्तिः । इह तु प्रत्यक्षश्रुत्या प्रथममेव विनियुक्तानां यज्ञादीनामुप- दिष्टनामङ्गानामिव पश्चात् कल्पनीय उपकारः प्रथमावगतविनियोग- निर्वाहायाक्लृप्तोऽपि सामान्यशब्दोपात्तसकलनित्यकाम्यसाधारणः कथं न कल्प्यः । अध्वरेषु अध्वरमीमांसकैरपि हि ‘उपकारमुखेन पदार्थान्वये एव क्लृप्तोपकारनियमः, पदार्थान्वयानन्तरम् उपकारकल्पने त्वकॢप्तोऽपि विनियुक्तपदार्थानुगुण एव उपकारः कल्पनीयः’ इति सम्प्रतिपद्यैव बाध-
सम्बन्ध होता है, पदार्थोंके अतिदेशके बाद उपकारकी कल्पना नहीं की जाती है, इसलिए विकृतिस्थलमें प्रकृतिस्थपदार्थोंके उपकारसे पृथक् उपकारकी कल्पना प्रसक्त नहीं है, प्रकृतस्थलमें⁺ तो साक्षात् ‘यज्ञेन’ इस श्रुतिसे पहले ही विनियुक्त यज्ञ आदिके—जैसे* उपदिष्ट अङ्गोंका प्रथम अवगत विनियोगके निर्वाहके लिए अक्लृप्त दृष्टादृष्टरूप उपकारकी कल्पना की जाती है, वैसे ही प्रथम अवगत विनियोगका निर्वाह करनेके लिए अक्लृप्त होनेपर भी सामान्य यज्ञशब्दसे नित्यकाम्य साधारण पश्चात् कल्पनीय—उपकारकी कल्पना क्यों न की जाय ? अर्थात् अवश्य की जाय, यह भाव है । प्रथम उपकारके अतिदेशके अनन्तर जहाँ पदार्थोंका अन्वय किया जाता है, वहींपर क्लृप्त अर्थात् प्रथमतः ज्ञात उपकारकी कल्पना होती है, अन्य की नहीं, यह नियम है और जहाँपर पदार्थोंके अन्वयके पीछे उपकारकी कल्पना की जाती है, वहींपर अक्लृप्त होनेपर भी विनियुक्त पदार्थोंके अनुकूल ही उपकारकी कल्पना की
⁺ परित्याग करके अन्य उपकारकी कल्पना नहीं की जाती है, इसलिए दृष्टान्त विषम है अर्थात् प्रकृतस्थलमें तो पहले यज्ञ आदिका विनियोग करनेके बाद उपकारकी कल्पना की जाती है और अतिदेशस्थलमें प्रकृतिमें उपकारकी कल्पना करनेके बाद प्रकृतियज्ञके पदार्थोंका विकृतिमें विनियोग होता है ।
* दर्शपूर्णमासके प्रकरणमें अथवा अन्य स्थलमें जो पदार्थ उपदिष्ट हैं अर्थात् साक्षात् श्रुतिसे बोधित हैं उनका श्रुति, लिङ्ग आदि प्रमाणोंसे पहले ही दर्श, पूर्णमास आदिमें विनियोग हो जाता है, अनन्तर इस विनियोगके निर्वाहके लिए दृष्ट और अदृष्टरूप किसी फलरूप द्वारकी कल्पना-की जाती है, इसी प्रकार ‘विविदिषन्ति यज्ञेन’ इत्यादि श्रुतिसे प्रथमतः ही यज्ञ आदिका विविदिषामें विनियोग हो जाता है, इसलिए इस विनियोगको सफल करनेके लिए अक्लृप्त उपकारकी यदि कल्पना की जाय, तो भी कोई हानि नहीं है, यह भाव है ।
| ४२८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
|---|
लक्षणारम्भसिद्धयर्थमुपकारमुखेन विकृतिषु प्राकृतान्वयो दशमाद्ये समर्थितः । किञ्च ‘क्लृप्तोपकारालभान्नित्यानामेवाऽयं विनियोगः’ इत्यभ्युपगमे नित्येभ्यो दुरितक्षयस्य तस्माच्च ज्ञानोत्पत्तेरन्यतः सिद्धौ व्यर्थोऽयं
जाती है, इस प्रकार कर्मोंके विषयमें अङ्गीकार करके ही पूर्वमीमांसकों ने बाधाध्यायके आरम्भके लिए उपकारका अतिदेश करनेके बाद विकृतिमें प्रकृतिस्थ पदार्थोंका सम्बन्ध * दशम अध्यायके प्रथम पादमें बतलाया है। किञ्च, क्लृप्त उपकारकी काम्योंमें प्राप्ति न होनेसे नित्य कर्मोंका ही यह विद्यामें विनियोग है, ऐसा माननेपर नित्य कर्मोंसे पापका विनाश और विविदिषावाक्यसे भिन्न वाक्यसे ज्ञानोत्पत्ति यदि सिद्ध है, तो यह विनियोग ही
* प्रकृतिभागके अङ्गभूत पदार्थोंकी, अतिदेशसे विकृतियागमें, प्राप्ति दिखलाई गई है। तात्पर्य यह है कि पूर्वमीमांसाके दशम अध्यायमें विकृतिमें अतिदिष्ट अङ्गोंका प्रकृतिमें क्लृप्त उपकारका सम्भव न होनेपर बाधका निरूपण किया गया है। उस बाधनिरूपणकी, यदि विकृतिमें अतिदेशसे पदार्थप्राप्तिके बाद उपकारकी कल्पना की जाय, तो सिद्धि नहीं होगी, क्योंकि जैसे प्रकृतिमें श्रुति आदिसे विनियुक्त पदार्थोंका दृष्ट फल न रहनेपर अदृष्ट उपकारकी कल्पना की जाती है, वैसे ही अतिदेशसे विकृतियागमें विनियुक्त पदार्थोंका दृष्ट उपकारके न रहनेपर अदृष्ट उपकारकी भी कल्पना हो सकनेसे उसकी सिद्धिके लिए सभी अङ्गोंका अनुष्ठान अवश्यम्भावी होनेके कारण कुछ अङ्गोंका अनुष्ठान या उसके अंशातिदेशप्रामाण्यरूप बाधका असम्भव है, इसलिए बाधनिरूपणकी सिद्धिके लिए प्रकृतिमें क्लृप्त उपकारके अतिदेशसे ही विकृतिमें प्रकृतिस्थ पदार्थोंका अन्वय है, इस प्रकार दशम अध्यायके प्रथम अधिकरणमें निश्चित किया गया है; इसलिए जहांपर पदार्थोंके विनियोगके अनन्तर उपकारकी कल्पना की गई हो, वहाँपर उन पदार्थोंकी अपनी सामर्थ्यके अनुसार प्रथमतः ज्ञात विनियोगके निर्वाहके लिए अक्लृप्त उपकारकी कल्पना मीमांसक सम्मत है, ऐसा प्रतीत होता है। यदि विनियोगके बाद जहाँ उपकारकी कल्पना की गई हो, उस स्थलमें भी क्लृप्त उपकारका सम्भव न होनेपर विनियुक्त पदार्थका परित्याग ही इष्ट हो, अक्लृप्त उपकारकी कल्पना इष्ट न हो, ऐसा माना जाय, तो ‘उपकारमुखेन’ इत्यादि निरूपण करनेवाला अधिकरण ही व्यर्थ होगा, क्योंकि श्रपण, अवघात आदि पदार्थोंका अतिदेशसे विनियोग होनेपर भी विकृतियागस्थ कृष्णल आदिमें श्रपण आदिके विक्लेत्ति;- तुषविमोक आदि लोकसिद्ध दृष्टोपकारका अभाव होनेसे और अक्लृप्त उपकारकी कल्पनाका स्वीकार न होनेसे श्रपणादिका अननुष्ठानलक्षण बाध, जिसका कि दशम-अध्यायमें निरूपण किया गया है, हो सकता है, फिर उसके लिए ‘उपकारमुखेन’ इत्यादि-निरूपण करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। इससे विविदिषावाक्यसे सामान्यतः नित्यकाम्यसाधारण विनियोगके प्रथम अवगत होनेपर उसकी उपपत्तिका लिए अक्लृप्त उपकारकी कल्पना युक्त ही है, यह भाव है।
श्रुतिसे विनियुक्त कर्मविशेषोंका कथन] भाषानुवादसहित ४२९
विनियोगः; अन्यतस्तदसिद्धौ ज्ञानापेक्षितोपकारजनकत्वं तेष्वक्लृप्तमित्य- विशेषाद् नित्यकाम्यसाधारणो विनियोगो दुर्वारः । ननु नित्यानां दुरितक्षयमात्रहेतुत्वस्यान्यतः सिद्धावपि विशिष्य ज्ञानोत्पत्तिप्रतिबन्धक- दुरितनिर्वर्हकत्वं न सिद्धम्, किन्तु अस्मिन् विनियोगे सति ज्ञानो- द्देशेन नित्यान्यनुतिष्ठतोऽवश्यं ज्ञानं भवति; इतरथा शुद्धिमात्रम्, न नियता ज्ञानोत्पत्तिरिति सार्थकोऽयं विनियोग इति चेत्, तर्हि नित्याना-
व्यर्थ है, यदि दूसरेसे सिद्ध नहीं है, तो ज्ञानके लिए अपेक्षित उपकार जनकता नित्यमें क्लृप्त ही नहीं है, इसलिए ? नित्य और काम्य कर्मोंके साधारण विनियोगका निवारण कर ही नहीं सकते हैं। यदि शङ्का हो कि * नित्य कर्मोंमें केवल दुरितक्षयकी हेतुताकी अन्यसे सिद्धि होनेपर भी ज्ञानकी उत्पत्तिमें प्रतिबन्धक पापक्षयहेतुता अन्य प्रमाणसे विशेषरूपतया सिद्ध नहीं है; किन्तु इस विनियोगसे ही यह सिद्ध होता है कि ज्ञानके उद्देश्यसे यदि पुरुष नित्य कर्मोंका अनुष्ठान करे, तो अवश्य ज्ञान उत्पन्न होता है; इस विनियोगके † न रहते केवल शुद्धिमात्र ही होती है, नियमसे ज्ञानकी उत्पत्ति नहीं होती, इसलिए यह विनियोग सार्थक है ? तो यह भी युक्त
* शङ्काका तात्पर्य यह है कि दुरित दो प्रकारके हैं—एक तो ज्ञानकी उत्पत्तिमें प्रतिबन्धक और दूसरा ज्ञानकी उत्पत्तिमें उदासीन होकर नरकादि देनेवाला। इस अवस्थामें यदि नित्य- कर्मोंका ज्ञानमें विनियोग न किया जाय, तो नित्यकर्मोंसे ज्ञानप्रतिबन्धक दुरितका क्षय होता है, इसमें प्रमाण नहीं है, 'धर्मेण पापमपनुदति' (धर्मसे पाप हट जाता है) 'यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्' (यज्ञ, दान और तप मनीषियोंको पावन करनेवाले हैं) इस प्रकारके श्रुति-स्मृति-वचन भी नित्य कर्मोंमें सामान्यपापक्षयकी हेतुताका प्रतिपादन करते हैं। इससे नित्य कर्मोंमें नियमतः ज्ञानप्रतिबन्धकदुरितक्षयहेतुता दूसरेसे प्राप्त ही नहीं है, इसलिए उसकी प्राप्ति करानेके लिए यह विनियोग है, अर्थात् यह बात अन्यतः सिद्धिपक्षका अवलम्बन करके विनियोगकी सार्थकता बतलाती है, यह भाव है।
† तात्पर्य यह है कि यज्ञ आदिका ज्ञानमें विनियोग न होनेपर नित्य आदिके अनुष्ठानसे दुरितविनाशरूप शुद्धि ही प्राप्त होती है, परन्तु ज्ञानकी उत्पत्तिमें प्रतिबन्धक दुरित क्षयरूप शुद्धि प्राप्त नहीं होती, क्योंकि ज्ञानके उद्देश्यसे नित्यकर्मोंका अनुष्ठान नहीं है, इस अवस्थामें अनेक जन्मोंसे जिसने नित्यकर्मोंका अनुष्ठान किया है, उसको भी नियमतः ज्ञानकी उत्पत्ति नहीं होगी, क्योंकि कदाचित् दैवयोगसे ज्ञानप्रतिबन्धक दुरितसमूहका सम्पूर्ण क्षय होनेपर भी ज्ञान कदाचित् होता है, इस प्रकार अनियत ज्ञानोत्पत्ति होगी।
| ४३० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
|---|
मपि अक्लृप्तमेव ज्ञानोत्पत्तिप्रतिबन्धकदुरितनिर्वहणत्वम्, ज्ञानसाधनविशिष्टगुरुलाभश्रवणमननादिसम्पादकापूर्वं च द्वारं कल्पनीयमित्यक्लृप्तोपकारकल्पनाऽविशेषाच्च सामान्यश्रुत्यापादितो नित्यकाम्यसाधारणो विनियोगो भञ्जनीय इति ॥ २ ॥
ब्राह्मणग्रहणं चाऽत्र त्रैवर्णिकानिदर्शनम् ।
वार्त्तिकोक्तेस्तथोद्देश्यगतत्वेनाऽविवक्षणात् ॥ ७ ॥
'विविदिषन्ति ब्राह्मणाः' इस श्रुतिमें ब्राह्मणग्रहण त्रैवर्णिकका उपलक्षण है, क्योंकि इस अर्थका पोषक वार्त्तिककारका वचन है और ब्राह्मणपदकी उद्देश्यविशेषणतया भी विवक्षा नहीं है ॥ ७ ॥
नहीं है, क्योंकि * नित्य कर्मोंमें ज्ञानोपकारकत्वनियमके असिद्ध होनेपर नित्यकर्मोंमें भी ज्ञानकी उत्पत्तिमें अक्लृप्त ही प्रतिबन्धक दुरितके विनाशकारणतारूप और † ज्ञानके प्रति साधनभूत श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरुका लाभ, श्रवण, मनन आदिको प्राप्त करानेवाले अदृष्टरूप द्वारकी कल्पना करनी होगी, इसलिए अक्लृप्त कल्पनाके सामान्य होनेसे 'यज्ञेन' इस सामान्यश्रुतिसे प्राप्त नित्य और काम्यकर्मोंके साधारण विनियोगको नहीं हटाना चाहिए ॥२॥
* 'ज्ञानमें अपेक्षित उपकार नित्योंमें क्लृप्त है' यह मत प्रमाणशून्य है, ऐसा मानकर काम्योंके समान नित्यमें भी अक्लृप्त उपकारकी कल्पना समान है, इस अभिप्रायसे दूषित करते हैं, यह भाव है ।
† यदि प्रकृतमें शङ्का हो कि नित्यकर्मोंके विनियोग पक्षमें ही विधिका लाघव है, क्योंकि पक्षमें उनकी ज्ञानप्रतिबन्धकपापविनाशकी जनकता अन्य वचनसे प्राप्त होनेके कारण केवल नियम विधिसे लभ्य है, और काम्यकर्मोंकी ज्ञानप्रतिबन्धकदुरितविनाशकारणता किसीसे प्राप्त नहीं है, अतः ज्ञानमें काम्य कर्मोंके विनियोग पक्षमें विधिका गौरव अपरिहार्य है, तो यह शङ्का युक्त नहीं है,—क्योंकि इस परिस्थितिमें भी यज्ञ आदि श्रुतियोंके सङ्कोचरूप बाधके परिहारके लिए काम्य कर्मोंका भी विनियोग अवश्य है, इसीमें तात्पर्य है । यद्यपि नित्यकर्मोंसे ज्ञान-प्रतिबन्धक दुरित-विनाशरूप विशेषशुद्धिका लाभ होनेपर भी उतने मात्रसे ज्ञानकी उत्पत्ति नहीं होती है। क्योंकि प्रमाणप्रमेयासम्भावना आदि प्रत्यक्ष प्रतिबन्धक हैं, तथापि उन प्रतिबन्धकोंके निरासके लिए नित्योंमें उक्त गुरु तथा उनसे श्रवण आदिके सम्पादक अक्लृप्त अदृष्टकारणताकी विविदिषावाक्यके बलसे कल्पना करनी चाहिए, यह भाव है ।