सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 443, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंजीवके अणुत्वका निराकरण-विचार ] भाषानुवादसहित ४१३
वक्तव्यत्वात् । तस्मात् परमते ब्रह्मजीवयोर्विभुत्वाणुत्वव्यवस्थित्यसिद्धेर्न ततो भेदसिद्धिं प्रत्याशा । अस्मन्मते ब्रह्मात्मैक्यपरमहावाक्यानुरोधेनाऽवान्तरवाक्यानां नेयत्वात् स्वरूपेण जीवस्य विभुत्वम्, औपाधिकरूपेण परिच्छेद इत्यादिप्रकारेण जीवब्रह्मभेदग्राहकश्नुतीनामुपपादनं भाष्यादिषु व्यक्तम् ।
इससे पर-जीवाणुवादीके मतमें जीव और ब्रह्ममें अणुत्व और विभुत्वकी व्यवस्था नहीं हो सकती है, अतः उससे भेदसिद्धिकी आशा नहीं करनी चाहिए। हमारे मतमें ब्रह्म और जीवके ऐक्यबोधक 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यके अनुरोधसे अवान्तर * वाक्योंका अर्थ करना चाहिए, अतः जीव स्वरूपतः † व्यापक है और औपाधिकरूपसे परिच्छिन्न है, इत्यादिरूपसे जीव और ब्रह्मके भेदका बोध करानेवाली श्रुतियोंकी उपपत्ति भाष्य आदिमें स्पष्ट है।
* जैसे अर्वाचीनोंके पक्षमें—जीव और ईश्वर दोनोंमें विभुत्व और अणुत्व प्रतिपादक श्रुतियोंके समान होनेसे और उन दोनों श्रुतियोंकी अन्यथासिद्धिके समान होनेके कारण उनमें अणुत्व और विभुत्व समान रूपसे ही सिद्ध होंगे, एक अणु और दूसरा विभु, इस प्रकार व्यवस्था सिद्ध नहीं होगी—यह दोष दिया गया है। वैसे ही दोष सिद्धान्तमें भी आ सकते हैं, क्योंकि जीवके परिच्छिन्नत्व और विभुत्वका प्रतिपादक श्रुतिलिङ्ग समान ही है, अतः जीवमें विभुत्व स्वाभाविक है और परिच्छिन्नत्व औपाधिक है, इस प्रकार व्यवस्था नहीं हो सकती है, इसपर सिद्धान्ती 'अस्मन्मते' इत्यादिसे कहते हैं कि नहीं—हमारे मतमें अव्यवस्था नहीं हो सकती है, क्योंकि महावाक्यके अनुसार ही अवान्तर वाक्योंका अर्थ होता है, प्रकृतमें महावाक्य 'तत्त्वमसि' आदि वाक्य हैं, क्योंकि मुक्तिका साधनीभूत जो ब्रह्मात्मैक्यज्ञान है, उसके प्रति तत्त्वमस्यादि वाक्य जनक हैं, और अवान्तर वाक्य 'स एषोऽणिमा' इत्यादि हैं, क्योंकि वे महावाक्यार्थज्ञानके कारणीभूत तत् और त्वम् पदार्थके ज्ञानके प्रति साधन हैं, और जितने पदार्थप्रतिपादकवाक्य होते हैं, वे सब के सब महावाक्यके अङ्ग होते हैं, अतः सिद्धान्तमें अव्यवस्था नहीं है, यह भाव है।
† यदि स्वरूपतः जीव व्यापक न हो, तो महावाक्यसे प्रतिपाद्य ब्रह्मके साथ भेद अनुपपन्न होगा, अतः जीवको स्वरूपतः व्यापक ही मानना चाहिए।