सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 442, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४१२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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जीव इव प्राप्तव्ये ब्रह्मण्यपि विभुत्वविरोधित्वात् । प्राकृतनामरूपविमोक्षा- नन्तरमपि अप्राकृतलोकविग्रहाद्युपधानेन ब्रह्मणः प्राप्तव्यत्ववादिमते प्राप्तुर्जीवस्याऽप्यप्राकृतदेहेन्द्रियादिसत्त्वेन तदुपधानेन ब्रह्मप्राप्तिश्रवणा- विरोधात् स्वाभाविकगत्याश्रयशकटदृष्टान्तश्रवणमात्राद् जीवस्य स्वाभा- विकप्रवेशाश्रयजीवसमभिव्याहारेण ब्रह्मणोऽपि स्वाभाविकप्रवेशसिद्धिसम्भ- वाद् । ब्रह्मजीवोभयान्वयिन एकस्य प्रविष्टपदस्य एकरूपप्रवेशपरत्वस्य
जैसे विभुत्वकी विरोधी है, वैसे ही प्राप्तव्य ब्रह्ममें भी विभुत्वकी विरोधी हो सकती है । और दूसरी बात यह भी है कि * प्राकृत नाम और रूपसे विमोक्ष होनेके अनन्तर भी अप्राकृत लोक-विग्रह आदि उपाधिसे ब्रह्ममें प्राप्तव्यता है, इस प्रकार कहनेवाले तुम्हारे मतमें ब्रह्मप्राप्ति करनेवाले जीवको भी अप्राकृत शरीर, इन्द्रिय आदि हैं, अतः उन उपाधियोंके आधारपर ब्रह्म- प्राप्तिका विरोध भी नहीं है, इससे स्वाभाविक गमनक्रियाके आश्रय शकटके दृष्टान्तमात्रसे जीवमें स्वाभाविक गति आदिकी सिद्धि होनेपर 'गुहां प्रविष्टौ' इससे स्वाभाविक प्रवेश करनेवाले जीवके सान्निध्यसे ब्रह्ममें भी स्वाभाविक प्रवेशकी भी सिद्धि हो सकती है † । क्योंकि ब्रह्म और जीव दोनोंमें सम्बन्ध रखनेवाले एक प्रविष्टपदकी एकरूपप्रवेशबोधकता ही कहनी चाहिए * ।
* अर्वाचीनोंके मतमें व्यापकत्वरूपसे ब्रह्म मुक्तोंका प्राप्य नहीं है, किन्तु लोकविशेष आदि उपहितत्वरूपसे ब्रह्म मुक्तोंका प्राप्य है, अतः उपहितत्वरूपसे ब्रह्ममें रहनेवाली प्राप्तव्यता ब्रह्मकी स्वरूपतः व्यापकत्वविरोधी नहीं है, ऐसी आशङ्का करके जीवमें भी तुल्ययुक्त्या यह प्रकार हो सकता है, ऐसा 'प्राकृत' इत्यादि ग्रन्थसे कहते हैं । तात्पर्य यह है कि 'विद्वान् नाम रूपाद्विमुक्तः' इस श्रुतिमें 'प्राकृतनामरूपसे विमुक्त' इस अर्थकी कल्पना करके अर्वाचीन ज्ञानी जीवके अप्राकृत नाम-रूपका स्वीकार करते हैं, इसलिए स्वतः विभु जीव, जो कि अप्राकृत नाम-रूप उपाधिसे परिच्छिन्न है, ब्रह्मके प्रति गन्ता (गमनकर्त्ता) हो सकता है, अतः जीवविषयक विभुत्व-श्रुतियोंका बाध न करना उचित नहीं है, यह भाव है ।
† तात्पर्य यह है—एक वार कहा गया पद अनेकार्थक नहीं होता है, यह नियम है, इससे 'गुहां प्रविष्टौ' इसमें एक प्रविष्टशब्दकी जीवमें स्वाभाविकार्थकता और ब्रह्ममें औपाधिकार्थकता माननी अयुक्त है, अतः ब्रह्ममें पूर्वपक्षीको स्वाभाविक गति प्राप्त होगी, यदि ईश्वरमें विभुत्वप्रतिपादक श्रुतिके अनुरोधसे प्रविष्टश्रुतिका सामान्यप्रवेश अर्थ मानते हो, तो जीवमें भी विभुत्वप्रतिपादक श्रुतिके आधारपर शकटदृष्टान्तमें गमनादिका साम्यमात्र प्रदर्शित है, स्वाभाविकगत्याश्रयत्व प्रतिपादित नहीं है, ऐसा मान सकते हैं; यह भाव है ।