भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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४८४ • सिद्धान्तलेशसंग्रहे [ तृतीय परिच्छेद

मनननिदिध्यासननियमविध्यर्थानुष्ठानस्याऽर्थवत्त्वाद्, भवान्तरीयमननाद्यनुष्ठाननिरस्तचित्तविक्षेपस्य उपदेशमात्राद् ब्रह्मापरोक्ष्यस्य इष्यमाणत्वाच्चेत्याहुः ॥ १० ॥

नन्वेवं वृत्त्यभिव्यक्तचिदंशे विषयैक्यतः ।
श्रवणादिमतो नश्येन्मूलाज्ञानं घटेक्षणात् ॥ २७ ॥

अब शङ्का होती है कि वृत्तिसे अभिव्यक्त चैतन्यांशमें विषयका ऐक्य होनेसे श्रवणादिसे युक्त पुरुषको घटके ज्ञानसे भी मूलाज्ञानका विनाश होना चाहिए ॥२७॥

अथैवमपि कृतनिदिध्यासनस्य वेदान्तजन्यब्रह्मज्ञानेनेव घटादिज्ञानेनाऽपि ब्रह्माज्ञाननिवृत्तिः किं न स्यात् । न च तस्य ब्रह्माविषयत्वाद् न ततो ब्रह्माज्ञाननिवृत्तिरिति वाच्यम्, 'घटस्सन्' इत्यादिवुद्धिवृत्तेः सद्रूप-


करनेके लिए मनन और निदिध्यासनकी नियमविधिसे प्राप्त अर्थके अनुष्ठानकी अवश्य अपेक्षा है, और जन्मान्तरीय † मनन आदिके अनुष्ठानसे जिसके चित्तकी अस्थिरता ( विक्षेप ) निवृत्ति हुई है, ऐसे पुरुषको केवल उपदेशमात्रसे भी ब्रह्मापरोक्ष इष्ट ही है ॥१०॥

* अब शङ्का होती है कि विक्षेपदोषकी निवृत्तिके लिए मनन आदिकी अपेक्षा होनेपर भी जिसने निदिध्यासन किया है, ऐसे पुरुषको वेदान्तोंसे उत्पन्न ब्रह्मज्ञानसे जैसे ब्रह्मविषयक अज्ञानकी निवृत्ति होती है, वैसे ही उसके घटादिज्ञानसे भी अज्ञानकी निवृत्ति क्यों नहीं होती है ? यदि कहो कि घटविषयक ज्ञान ब्रह्मविषयक नहीं है, अतः वह ब्रह्माज्ञानका निवर्तक नहीं है, तो यह भी

† तात्पर्य यह है कि यदि मनन आदिका प्रयोजन विक्षेपशब्दसे कहलानेवाले असम्भावना, विपरीत भावना आदिकी निवृत्ति है, तो जिस अधिकारी पुरुषका जन्मान्तरीय मनन आदिके सहित श्रवणके अनुष्ठानसे समस्त विक्षेपदोष निवृत्त हो गया है, उस पुरुषको उपदेशमात्रसे भी सत्तानिश्चयात्मक और अप्रतिबद्ध ब्रह्मज्ञान उत्पन्न होता है, इसलिए उसको इस जन्ममें 'श्रवण, मनन, आदिके अनुष्ठानके विना भी मूलाज्ञानकी निवृत्ति और ब्रह्मका अपरोक्षज्ञान हो सकता है,' इसलिए उक्त पुरुषको श्रवणादिके अनुष्ठानके विना ही यदि ब्रह्मज्ञान माना जाय, तो भी कोई हानि नहीं है ।

* शङ्काका अभिप्राय यह है कि जिसने निदिध्यासन किया है, ऐसे पुरुषको ब्रह्मज्ञानसे जैसे मूलाज्ञानकी निवृत्ति होती है, वैसे ही घटज्ञानसे भी मूल अज्ञानकी निवृत्ति होनी चाहिए, क्योंकि घटादिवृत्ति भी मूलाज्ञानके विषयभूत चैतन्यको ही विषय करती है ।


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