भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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अज्ञानके निवर्त्तकका निरूपण] भाषानुवादसहित ४८५

ब्रह्मविषयत्वोपगमात् । न च तत्र घटाद्याकारवृत्त्या तदज्ञाननिवृत्तौ स्वतः स्फुरणादेव तदवच्छिन्नं चैतन्यं सदिति प्रकाशते, न तस्य घटाद्याकारवृत्तिविषयत्वमिति वाच्यम्, तदभावे घटविषयं ज्ञानं तदवच्छिन्नचैतन्यविषयमज्ञानमिति भिन्नविषयेण ज्ञानेन तदज्ञाननिवृत्तेरयोगाद्, जडे आवरणकृत्याभावेन घटस्याऽज्ञानाविषयत्वात् । न च घटादिवृत्तेस्तदवच्छिन्नचैतन्यविषयत्वेऽपि अखण्डानन्दाकारत्वाभावाद् न ततो मूलाज्ञाननिवृत्तिरिति वाच्यम्, वेदान्तजन्यसाक्षात्कारेऽपि तदभावात् । न हि

युक्त नहीं है, क्योंकि 'घटः सन्' ( घट सत् है ) इत्यादि अन्तःकरणकी वृत्तिको भी सद्रूप ब्रह्मविषयक माना गया है। यदि शङ्का हो कि घटादिस्थलमें घटाकारवृत्तिसे घटाज्ञानकी निवृत्ति होनेपर स्वतः स्फुरणसे ही घटावच्छिन्न चैतन्यका सद्रूपसे प्रकाश होता है, अतः ब्रह्ममें घटाकारवृत्तिविषयता नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि चैतन्यको यदि घटादिवृत्तिका विषय न माना जाय, तो ज्ञान घटविषयक होगा और अज्ञान घटावच्छिन्नचैतन्यविषयक होगा, इसलिए भिन्नविषयक ज्ञानसे घटाज्ञानकी निवृत्ति नहीं होगी, और जड़में † आवरण कार्यका अभाव होनेके कारण घट अज्ञानका विषय ही नहीं होगा। यदि शङ्का हो कि घटादिके आकारमें परिणत वृत्ति घटाद्यवच्छिन्न चैतन्यको अवश्य विषय करती है, तथापि वह अखण्ड आनन्दाकार नहीं है, इसलिए घटज्ञानसे मूलाज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि वेदान्तजन्य साक्षात्कारमें भी अनवच्छिन्नानन्दाकारत्व नहीं भासता है, अतः उससे भी मूलाज्ञानकी निवृत्ति नहीं होगी, क्योंकि वेदान्तज्ञानमें अखण्डत्व ( अनवच्छिन्नत्व ) या आनन्दाकारत्व कोई धर्म है ही नहीं। यदि वेदान्तजन्य ज्ञानमें


† यदि शङ्का हो कि केवल घटविषयक ज्ञानसे घटावच्छिन्न चैतन्यविषयक अज्ञानकी निवृत्ति नहीं हो सकती है, क्योंकि ज्ञान और अज्ञान समानविषयक नहीं हैं, अतः घटज्ञानके साथ अज्ञानकी समानविषयकता लानेके लिए अज्ञानको भी केवल घटादि जड़विषयक मानना चाहिए, इसपर 'जडे आवरणकृत्याभावेन' इससे पूर्वपक्षी कहता है कि जड़में तो स्वतः जड़त्व हेतुसे प्रमाणकी अप्रवृत्तिदशामें अप्रकाशकी उपपत्ति हो सकती है, फिर जड़के अप्रकाशके लिए आवरणकी कल्पना व्यर्थ है, इस अवस्थामें वेदान्तजन्य ज्ञानके समान घटादिज्ञान भी ब्रह्मचैतन्यविषयक होनेसे मूलाज्ञानका समानविषयक है, अतः उससे भी अज्ञानकी निवृत्तिका प्रसङ्ग आ सकता है, यह भाव है।