सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ४८६ | सिद्धान्तलेशसंग्रहं | [ तृतीय परिच्छेद |
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तत्राऽखण्डत्वमानन्दत्वं वा कश्चिदस्ति प्रकारः । वेदान्तानां संसर्गागोचर-प्रमाजनकत्वलक्षणाखण्डार्थत्वहानापत्तेः । न च वेदान्तजन्यज्ञानादेव तन्निवृत्तिनियम इति वाच्यम्, क्लृप्तसाज्ञाननिवर्तकत्वप्रयोजकस्य रूपस्य ज्ञानान्तरेऽपि सद्भावे तथा नियन्तुमशक्यत्वात् । न च घटाद्याकारवृत्ति-विषयस्याऽवच्छिन्नचैतन्यस्याऽपि कल्पितत्वेन यन्मूलाज्ञानविषयभूतं सत्य-मनवच्छिन्नं चैतन्यम्, तद्विषयत्वाभावाद् घटादिवृत्तीनां निवर्त्यत्वाभि-
अखण्डत्व, आनन्दत्वादि माने जाँय, तो संसर्गाविषयकप्रमाजनकत्वरूप अखण्डार्थत्वका व्याघात होगा । यदि शङ्का हो कि वेदान्तजन्य ज्ञानसे ही मूलाज्ञानकी निवृत्ति होती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अज्ञाननिवर्तकत्वमें प्रयोजकीभूत क्लृप्त स्वरूपका अन्यज्ञानमें भी अवस्थान होनेसे वैसा नियम कर ही * नहीं सकते हैं । यदि शङ्का हो कि घटाद्याकारवृत्तिके विषय अवच्छिन्न चैतन्यके कल्पित होनेसे सत्य अनवच्छिन्न चैतन्य उसका विषय नहीं है, अतः घटादि वृत्तियोंमें निवर्त्यत्वरूपसे अभिमत अज्ञानसमानविषयत्वरूप क्लृप्त प्रयोजक ही नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उसमें अर्थात् अवच्छिन्न चैतन्यमें †
* वेदान्तजन्य ज्ञानमें क्लृप्त मूलाज्ञानसमानविषयकत्वरूप सत्तानिश्चयत्वरूप अप्रतिबद्धत्वात्मक जो मूलाज्ञाननिवर्तकत्वरूप प्रयोजकत्व है, वह निदिध्यासनके परिपाककालमें चक्षु आदिसे उत्पन्न होनेवाली घटादि वृत्तिमें भी है, अतः वेदान्तजन्य ज्ञानसे ही मूलाज्ञानकी निवृत्ति होती है, घटादि ज्ञानसे नहीं होती है, इस प्रकार नियमन नहीं कर सकते हैं, क्योंकि सत्तानिश्चयत्वके समान वेदान्तजन्यत्वको प्रयोजकके विशेषण करनेमें गौरव है, यह भाव है ।
† अवच्छेद्य चैतन्यांश भी, जो कि घटादिवृत्तिका विषय है, अकल्पित मूलाज्ञानका विषयीभूत ब्रह्मचैतन्यात्मक ही है, अतः घटाद्यवच्छिन्न चैतन्यविषयक वृत्तिमें भी—निवर्त्यत्वेन अभिमत जो अज्ञान है, उसका समानविषयकत्वरूप वेदान्तजन्य ज्ञानमें क्लृप्त—प्रयोजक है, तात्पर्य यह है कि घटाद्यवच्छिन्न चैतन्य कल्पित है, इसमें चैतन्यको अकल्पित मानने पर यह दोष है, यदि कल्पित मानेंगे, तो घट आदिके समान उक्त अवच्छिन्न चैतन्य जड़ ही होगा, इस परिस्थितिमें उसके अज्ञानविषयत्व न होनेसे अवस्थारूप अज्ञानके प्रति मूलाज्ञानका विषयभूत ब्रह्मचैतन्य ही विषय कहना होगा, क्योंकि निर्विषयक अज्ञान नहीं होता, इस अवस्थामें ब्रह्मचैतन्यविषयक अवस्थारूप अज्ञानके निवर्तकत्वकी उपपत्तिके लिए घटादिवृत्तियोंमें भी मूलाज्ञानविषय ब्रह्मचैतन्यविषयकत्व मानना पड़ेगा, क्योंकि घटादिवृत्तियोंके सत्यब्रह्मविषयक न होनेसे अवस्थारूप अज्ञानके साथ समानविषयकत्वके न होनेसे आवृत्तियोंमें अवस्थारूप अज्ञाननिवर्तकत्वकी प्रसक्ति नहीं होगी ।