भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 517, कुल 590 में से

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अज्ञानके निवर्त्तकका निरूपण] भाषानुवादसहित ४८७

मताज्ञानसमानविषयत्वलक्षणं क्लृप्तं प्रयोजकमेव नाऽस्तीति वाच्यम्; तत्राऽवच्छेदकांशस्य कल्पितत्वेऽप्यवच्छेद्यांशस्याऽकल्पितमूलाज्ञानविषयचैतन्यरूपत्वात्, तस्य कल्पितत्वे घटवज्जडतया अवस्थाऽज्ञानं प्रत्यपि विषयत्वायोगाेनावस्थाऽज्ञानस्य मूलाज्ञानविषयाकल्पितचैतन्यविषयत्वस्य वक्तव्यतया तन्निवर्तकघटादिज्ञानस्याऽपि तद्विषयत्वावश्यम्भावेन तत्पक्षेऽपि ततो मूलाज्ञाननिवृत्तिप्रसङ्गस्याऽपरिहारात् ।

नैषमत्राहुराचार्या न सन्दृश इति श्रुतेः ।
चित् चक्षुराद्ययोग्यैव चिद्द्वाराऽस्त्यावृतिर्जडे ॥ २८ ॥

उक्त पूर्वपक्षके उत्तरमें आचार्य कहते हैं कि 'न सन्दृशे' इस श्रुतिसे ब्रह्मचैतन्य चक्षु आदिका अयोग्य ही है । जड़में चैतन्य द्वारा अज्ञानका आवरण होता है ॥ २८ ॥

अत्राऽऽहुराचार्याः—न चैतन्यं चक्षुरादिजन्यवृत्तिविषयः ।

अवच्छेदक अंशके कल्पित होने पर भी अवच्छेद्य अंश मूलाज्ञानका विषयीभूत अकल्पित ब्रह्मचैतन्यात्मक है, यदि अवच्छेद्य अंशको कल्पित माना जाय, तो घटके समान जड़ होनेसे अवस्थारूप अज्ञानके प्रति भी वह विषय नहीं हो सकता है, इसलिए अवस्थारूप अज्ञानको भी मूलभूत अज्ञानका विषयभूत अकल्पित चैतन्यविषयकं कहना होगा, इससे अवस्थारूप अज्ञानके निवर्तक घटादिज्ञानमें भी मूलाज्ञानका विषयीभूत ब्रह्मचैतन्यविषयकत्व अवश्य प्रसक्त होगा, अतः अवच्छेद्यांशके कल्पितत्वपक्षमें भी घटादिज्ञानसे मूलाज्ञानकी निवृत्तिका प्रसङ्ग हटा नहीं सकते हैं ।

इस विषयमें आचार्य कहते हैं कि * चक्षु आदिसे उत्पन्न हुई


* पूर्वोक्त आक्षेपकर्ताका भाव यही सिद्ध होता है कि घटादिज्ञान भी मूलाज्ञानका निवर्तक होगा, क्योंकि वह भी चैतन्यविषयक है, जैसे कि वेदान्तजन्यज्ञान चैतन्यविषयक होता है । परन्तु इस अनुमानमें हेतुकी सिद्धि नहीं है, इस अभिप्रायसे उक्त पूर्वपक्षका परिहार करते हैं, अर्थात् चक्षु आदिसे उत्पन्न होनेवाला विज्ञान यदि आत्माको विषय करनेवाला है, तो उससे मूलाज्ञानकी निवृत्तिका प्रसङ्ग आ सकता है, परन्तु चक्षुरादिजन्यज्ञान वेदान्तजन्यज्ञानके समान आत्माको विषय करनेवाला है ही नहीं, अतः उक्त अतिप्रसङ्ग नहीं है, इसमें प्रमाण भी 'न सन्दृशे' इत्यादि श्रुति है, इस श्रुतिका तात्पर्य यही है कि चक्षु आदि इन्द्रियोंकी सामर्थ्य पटादि जड़ पदार्थोंके अवगाहन करनेमें ही है, आत्माके अवगाहन करनेमें नहीं, इससे परमाणु आदिके ग्रहणमें जैसे चक्षुकी योग्यता नहीं है, वैसे आत्माके ग्रहणमें भी इसकी सामर्थ्य

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