सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 518, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४८८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
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‘न सन्दृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम् ।
पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयंभूस्तस्मात् पराङ् पश्यति नान्तरात्मन्’ ॥
इत्यादिश्रुत्या तस्य परमाण्वादिवत् चक्षुराद्ययोग्यत्वोपदेशाद्, ‘औ-
पनिषदम्’ इति विशेषणाच्च । न च—
‘सर्वप्रत्ययवेद्ये वा ब्रह्मरूपे व्यवस्थिते’ ।
इत्यादिवार्त्तिकविरोधः ; तस्य घटाद्याकारवृत्त्युदये सति आवरणा-
भिभवात् स्वप्रभं सद्रूपं ब्रह्म ‘घटस्सन्’ इति घटवद् व्यवहार्यं भवतीत्यौ-
वृत्तिका विषय चैतन्य नहीं है, क्योंकि ‘न सन्दृशे०’ (आत्माका स्वरूप चक्षुके योग्य नहीं है, इसलिए आत्माको कोई भी चक्षुसे नहीं देखता है, इन्द्रियाँ ईश्वरसे जड़ अर्थोंके ग्रहण करनेके लिए ही बनाई गई है, अतः बाह्य पदार्थोंका ही इन्द्रियाँ ग्रहण करती हैं, अन्तरात्माका—चैतन्यका—ग्रहण नहीं करती हैं) इत्यादि श्रुतिसे परमात्माको परमाणु आदिके समान चक्षुका अयोग्य ही बतलाया है और ‘औपनिषदम्’ (केवल उपनिषत्प्रमाणसे गम्य) ऐसा आत्मामें विशेषण भी दिया गया है ।
यदि शङ्का हो कि ‘सर्वप्रत्ययवेद्ये०’ (सब प्रत्ययोंमें वेद्यरूपसे व्यवस्थित ब्रह्मरूप वस्तुमें) इत्यादि वार्त्तिकके साथ विरोध होगा? नहीं, नहीं होगा, क्योंकि उस वार्त्तिकवचनका तात्पर्य यह है—घटाद्याकारवृत्तिके उदित होने पर आवरणके विनष्ट होनेसे स्वप्रकाश सद्रूप ब्रह्म ‘घटः सन्’ इस प्रकार घटके समान व्यवहृत किया जाता है, इसलिए वह गौणरूपसे .वृत्तिसे वेद्य है*।
नहीं है, अतः पूर्वोक्त प्रसङ्ग अनुचित है, यदि ‘सर्वप्रत्ययवेद्ये’ इत्यादि वार्त्तिकके आधारपर शंका की जाय कि सभी घटादिज्ञानोंमें ब्रह्मका प्रकाश होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त श्रुतिके जबरदस्त प्रमाण होनेसे उक्त वार्त्तिक गौणार्थक है, अर्थात् जैसे घटमें घटविषयक वृत्तिके अधीन व्यवहारकी विषयता है, वैसे ही घट आदिका अधिष्ठानभूत सद्रूप ब्रह्म भी घटादिके आकारमें परिणत अन्तःकरणकी वृत्तिके अधीन व्यवहारका विषय है, इसलिए ‘सद्रूप ब्रह्म घटादिज्ञानसे वेद्य है’ इस प्रकारका औपचारिक व्यवहार होता है । यदि शङ्का हो कि परोक्षवृत्तियोंमें आवरणाभिभावकत्वका अभाव होनेसे वहां पर उक्त व्यवस्था नहीं घट सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त वार्त्तिकमें उक्त प्रत्ययशब्दका अर्थ है—आवरणाभिभावक वृत्ति, अतः पूर्वोक्त आक्षेप सर्वथा अनुपपन्न है, यह समझना चाहिए ।
* इसका प्रकृतमें तात्पर्य यह है कि उक्त प्रकारसे घटादि वृत्तिको यदि चैतन्यविषयक न माना जाय, तो घटज्ञानसे घटावच्छिन्न चैतन्यावारक अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होगी, क्योंकि समानविषयक