भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 519

अज्ञानके निवर्तकका निरूपण ] भाषानुवादसहित ४८९

पचारिकघटादिवृत्तिवेद्यत्वपरत्वात् । आवरणाभिभावकत्वं च घटादिज्ञा- नस्य घटादिविषयत्वादेव उपपन्नम्, घटादेरप्यज्ञानविषयत्वाद् 'घटं न जानामि' 'घटज्ञानेन घटाज्ञानं नष्टम्' इति अवस्थाऽज्ञानस्य घटादिविषय- त्वानुभवात् । न च तत्राऽऽवरणकृत्याभावादज्ञानाङ्गीकारो न युक्तः, तद्भा- सकस्य तदवच्छिन्नचैतन्यस्याऽऽवरणादेव तदप्रकाशोपपत्तेरिति वाच्यम् , उक्तभङ्ग्या जडस्य साक्षादज्ञानविषयत्वप्रतिषेधेऽपि जडावच्छिन्नचैतन्य-

घटादिज्ञानमें आवरणका अभिभावकत्व तो घटादिविषयत्वकी शक्ति होनेसे ही उपपन्न है, क्योंकि घट आदि भी अज्ञानका विषय होता है, कारण कि 'मैं घटको नहीं जानता हूँ' 'घटके ज्ञानसे घटका अज्ञान नष्ट हुआ' इस प्रकार अवस्थारूप अज्ञान घट आदिको विषय करनेवाला है, ऐसा अनुभव होता है। यदि शङ्का हो कि घटादि जड़ वस्तुओंमें आवरणरूप कार्य न होनेसे अज्ञानका अङ्गीकार युक्त नहीं है, † क्योंकि जड़वस्तुके अवभासक जड़ावच्छिन्न चैतन्यके आवरणसे ही जड़के अप्रकाशकी उपपत्ति हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त प्रणालीसे ‡ अर्थात् 'जड़में आवरणकार्य न होनेसे अज्ञानका अङ्गीकार युक्त


ज्ञानाज्ञानका परस्पर विरोध है, असमानविषयकका नहीं है, इसपर 'आवरणाभिभावकत्व'का निर्वचन करते हैं, अर्थात् अनुभवके अनुसार अज्ञानका विषय जड़ भी होता है, क्योंकि 'मैं घटको नहीं जानता हूँ' ऐसी लोकप्रसिद्धप्रतीति अबाधितरूपसे हुआ करती है, अतः उक्त अतिप्रसङ्ग नहीं है, यह भाव है ।

† तात्पर्य यह है कि अज्ञानाश्रय जड़ नहीं हो सकता है, क्योंकि जड़में आवरण ही नहीं है, कारण कि आवरणका कोई कार्य जड़ वस्तुमें देखा नहीं जाता । 'मैं घटको नहीं जानता हूँ' इस प्रकारकी प्रतीति घट और घटाधिष्ठान चैतन्यके परस्पर तादात्म्य होनेसे उपपन्न हो सकती है। यदि शङ्का हो कि जड़में यदि आवरण नहीं है, तो उसका सर्वदा प्रकाश होना चाहिए, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि घट आदिके प्रकाशक चैतन्यका उसके साथ सम्बन्ध नहीं है, अतः उसका प्रकाश नहीं होता है। आवरणके वलसे प्रकाश नहीं होता यह वात नहीं है। यदि कहो कि चैतन्यमें जड़का अध्यास होनेसे सर्वदा चैतन्यके साथ सम्बन्ध है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उस चैतन्यके आवरणसे घटका भी अप्रकाश हो सकता है, अतः जड़में अज्ञान क्यों माना जाय ? यह पूर्वपक्षीका मन्तव्य है ।

‡ समाधानका तात्पर्य यह है कि 'तत्रावरणकृत्याभावात्' इत्यादि ग्रन्थसे साक्षात् अज्ञान- विषयत्वका निषेध होनेपर भी, अनुभवके आधारपर परम्परया अज्ञानविषयता जड़में मानी जाती है, अतः साक्षात् या परम्परया जो अज्ञानका विषय है, तद्विषयक ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति होती है, इस प्रकार निवर्त्य-निवर्तक-भावका निर्वचन करनेसे सब दोषोंका निरास हो सकता है, इसी भावको 'उक्तभङ्ग्या' इत्यादि ग्रन्थसे कहते हैं ।,

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