सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 520, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४९० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
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प्रकाशस्याऽज्ञानेनाऽऽवरणम्, ततो नित्यचैतन्यप्रकाशसंसर्गेऽपि जडस्य 'नास्ति', 'न प्रकाशते' इत्यादिव्यवहारयोग्यत्वमिति परम्परया अज्ञान-विषयत्वाभ्युपगमात् साक्षात् परम्परया वा यदज्ञानावरणीयम्, तद्विषय-त्वस्यैव ज्ञानस्य तदज्ञाननिवर्तकत्वप्रयोजकशरीरे निवेशात् । न चैवं घटा-दीनामुक्तरीत्या मूलाज्ञानविषयत्वमपीति घटादिसाक्षात्कारादेव मूला-ज्ञाननिवृत्त्यापातः, फलबलात्तदज्ञानकार्यातिरिक्ततद्विषयविषयकत्वस्यैव तन्निवर्तकत्वे तन्त्रत्वात् ।
नहीं है' इत्यादि वाक्यसे जड़में साक्षात् अज्ञानविषयताका निषेध करनेपर भी जड़ावच्छिन्न चैतन्यके प्रकाशका अज्ञानसे आवरण है, इससे नित्य चैतन्य प्रकाशका सम्बन्ध होनेपर भी जड़में 'नहीं है, प्रकाशित नहीं है' इस प्रकारका व्यवहारयोग्यतारूप आवरण है' इस प्रकार परम्परासे जड़में अज्ञानकी विषयताका स्वीकार होनेसे साक्षात् या परम्परासे जो अज्ञानसे आवृत है तद्विषयकत्वका ही ज्ञानके (तद्) अज्ञाननिवर्तकत्वप्रयोजक शरीरमें निवेश करना चाहिए । यदि शङ्का हो कि उक्त रीतिसे * घट आदि भी मूलाज्ञानके विषय हैं, इसलिए घट आदिके साक्षात्कारसे मूलाज्ञानकी निवृत्तिका प्रसङ्ग होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि फलके बलसे† अज्ञाननिवर्तकत्वमें अज्ञानकार्या-तिरिक्ततद्विषयकत्व ही प्रयोजक है।
* शङ्काका तात्पर्य यह है कि जैसे अवस्थारूप अज्ञानके प्रति परम्परासे विषयीभूत जड़ पदार्थके साक्षात्कारसे घटाद्यवच्छिन्न चैतन्यनिष्ठ अवस्थारूप अज्ञानकी निवृत्ति होती है, वैसे ही मूलाज्ञानमें परम्परया विषयीभूत जड़के साक्षात्कारसे भी ब्रह्मचैतन्यनिष्ठ मूला-ज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त होगी।
† समाधानका तात्पर्य यह है कि उक्त आपत्ति नहीं हो सकती है, अर्थात् घटसाक्षा-त्कारसे ब्रह्मचैतन्यनिष्ठ अज्ञानकी निवृत्ति नहीं हो सकती है, क्योंकि घट आदिका साक्षात्कार होनेपर भी मूलाज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती है, यह अनुभव है, इससे मूलाज्ञान और मूलाज्ञानके कार्यसे अतिरिक्त जो मूलाज्ञानका विषयीभूत चैतन्यमात्र है, तद्विषयक ज्ञान ही मूलाज्ञानका निवर्तक है, ऐसी कल्पना की जायगी, इसलिए घटादिज्ञानके उक्त अज्ञानतत्कार्यातिरिक्त-चैतन्यमात्र विषय न होनेसे उससे मूलाज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त नहीं होगी।