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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

अज्ञानके निवर्त्तकका निरूपण] भाषानुवादसहित ४८५

ब्रह्मविषयत्वोपगमात् । न च तत्र घटाद्याकारवृत्त्या तदज्ञाननिवृत्तौ स्वतः स्फुरणादेव तदवच्छिन्नं चैतन्यं सदिति प्रकाशते, न तस्य घटाद्याकारवृत्तिविषयत्वमिति वाच्यम्, तदभावे घटविषयं ज्ञानं तदवच्छिन्नचैतन्यविषयमज्ञानमिति भिन्नविषयेण ज्ञानेन तदज्ञाननिवृत्तेरयोगाद्, जडे आवरणकृत्याभावेन घटस्याऽज्ञानाविषयत्वात् । न च घटादिवृत्तेस्तदवच्छिन्नचैतन्यविषयत्वेऽपि अखण्डानन्दाकारत्वाभावाद् न ततो मूलाज्ञाननिवृत्तिरिति वाच्यम्, वेदान्तजन्यसाक्षात्कारेऽपि तदभावात् । न हि

युक्त नहीं है, क्योंकि 'घटः सन्' ( घट सत् है ) इत्यादि अन्तःकरणकी वृत्तिको भी सद्रूप ब्रह्मविषयक माना गया है। यदि शङ्का हो कि घटादिस्थलमें घटाकारवृत्तिसे घटाज्ञानकी निवृत्ति होनेपर स्वतः स्फुरणसे ही घटावच्छिन्न चैतन्यका सद्रूपसे प्रकाश होता है, अतः ब्रह्ममें घटाकारवृत्तिविषयता नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि चैतन्यको यदि घटादिवृत्तिका विषय न माना जाय, तो ज्ञान घटविषयक होगा और अज्ञान घटावच्छिन्नचैतन्यविषयक होगा, इसलिए भिन्नविषयक ज्ञानसे घटाज्ञानकी निवृत्ति नहीं होगी, और जड़में † आवरण कार्यका अभाव होनेके कारण घट अज्ञानका विषय ही नहीं होगा। यदि शङ्का हो कि घटादिके आकारमें परिणत वृत्ति घटाद्यवच्छिन्न चैतन्यको अवश्य विषय करती है, तथापि वह अखण्ड आनन्दाकार नहीं है, इसलिए घटज्ञानसे मूलाज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि वेदान्तजन्य साक्षात्कारमें भी अनवच्छिन्नानन्दाकारत्व नहीं भासता है, अतः उससे भी मूलाज्ञानकी निवृत्ति नहीं होगी, क्योंकि वेदान्तज्ञानमें अखण्डत्व ( अनवच्छिन्नत्व ) या आनन्दाकारत्व कोई धर्म है ही नहीं। यदि वेदान्तजन्य ज्ञानमें


† यदि शङ्का हो कि केवल घटविषयक ज्ञानसे घटावच्छिन्न चैतन्यविषयक अज्ञानकी निवृत्ति नहीं हो सकती है, क्योंकि ज्ञान और अज्ञान समानविषयक नहीं हैं, अतः घटज्ञानके साथ अज्ञानकी समानविषयकता लानेके लिए अज्ञानको भी केवल घटादि जड़विषयक मानना चाहिए, इसपर 'जडे आवरणकृत्याभावेन' इससे पूर्वपक्षी कहता है कि जड़में तो स्वतः जड़त्व हेतुसे प्रमाणकी अप्रवृत्तिदशामें अप्रकाशकी उपपत्ति हो सकती है, फिर जड़के अप्रकाशके लिए आवरणकी कल्पना व्यर्थ है, इस अवस्थामें वेदान्तजन्य ज्ञानके समान घटादिज्ञान भी ब्रह्मचैतन्यविषयक होनेसे मूलाज्ञानका समानविषयक है, अतः उससे भी अज्ञानकी निवृत्तिका प्रसङ्ग आ सकता है, यह भाव है।

४८६सिद्धान्तलेशसंग्रहं[ तृतीय परिच्छेद

तत्राऽखण्डत्वमानन्दत्वं वा कश्चिदस्ति प्रकारः । वेदान्तानां संसर्गागोचर-प्रमाजनकत्वलक्षणाखण्डार्थत्वहानापत्तेः । न च वेदान्तजन्यज्ञानादेव तन्निवृत्तिनियम इति वाच्यम्, क्लृप्तसाज्ञाननिवर्तकत्वप्रयोजकस्य रूपस्य ज्ञानान्तरेऽपि सद्भावे तथा नियन्तुमशक्यत्वात् । न च घटाद्याकारवृत्ति-विषयस्याऽवच्छिन्नचैतन्यस्याऽपि कल्पितत्वेन यन्मूलाज्ञानविषयभूतं सत्य-मनवच्छिन्नं चैतन्यम्, तद्विषयत्वाभावाद् घटादिवृत्तीनां निवर्त्यत्वाभि-


अखण्डत्व, आनन्दत्वादि माने जाँय, तो संसर्गाविषयकप्रमाजनकत्वरूप अखण्डार्थत्वका व्याघात होगा । यदि शङ्का हो कि वेदान्तजन्य ज्ञानसे ही मूलाज्ञानकी निवृत्ति होती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अज्ञाननिवर्तकत्वमें प्रयोजकीभूत क्लृप्त स्वरूपका अन्यज्ञानमें भी अवस्थान होनेसे वैसा नियम कर ही * नहीं सकते हैं । यदि शङ्का हो कि घटाद्याकारवृत्तिके विषय अवच्छिन्न चैतन्यके कल्पित होनेसे सत्य अनवच्छिन्न चैतन्य उसका विषय नहीं है, अतः घटादि वृत्तियोंमें निवर्त्यत्वरूपसे अभिमत अज्ञानसमानविषयत्वरूप क्लृप्त प्रयोजक ही नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उसमें अर्थात् अवच्छिन्न चैतन्यमें †


* वेदान्तजन्य ज्ञानमें क्लृप्त मूलाज्ञानसमानविषयकत्वरूप सत्तानिश्चयत्वरूप अप्रतिबद्धत्वात्मक जो मूलाज्ञाननिवर्तकत्वरूप प्रयोजकत्व है, वह निदिध्यासनके परिपाककालमें चक्षु आदिसे उत्पन्न होनेवाली घटादि वृत्तिमें भी है, अतः वेदान्तजन्य ज्ञानसे ही मूलाज्ञानकी निवृत्ति होती है, घटादि ज्ञानसे नहीं होती है, इस प्रकार नियमन नहीं कर सकते हैं, क्योंकि सत्तानिश्चयत्वके समान वेदान्तजन्यत्वको प्रयोजकके विशेषण करनेमें गौरव है, यह भाव है ।

† अवच्छेद्य चैतन्यांश भी, जो कि घटादिवृत्तिका विषय है, अकल्पित मूलाज्ञानका विषयीभूत ब्रह्मचैतन्यात्मक ही है, अतः घटाद्यवच्छिन्न चैतन्यविषयक वृत्तिमें भी—निवर्त्यत्वेन अभिमत जो अज्ञान है, उसका समानविषयकत्वरूप वेदान्तजन्य ज्ञानमें क्लृप्त—प्रयोजक है, तात्पर्य यह है कि घटाद्यवच्छिन्न चैतन्य कल्पित है, इसमें चैतन्यको अकल्पित मानने पर यह दोष है, यदि कल्पित मानेंगे, तो घट आदिके समान उक्त अवच्छिन्न चैतन्य जड़ ही होगा, इस परिस्थितिमें उसके अज्ञानविषयत्व न होनेसे अवस्थारूप अज्ञानके प्रति मूलाज्ञानका विषयभूत ब्रह्मचैतन्य ही विषय कहना होगा, क्योंकि निर्विषयक अज्ञान नहीं होता, इस अवस्थामें ब्रह्मचैतन्यविषयक अवस्थारूप अज्ञानके निवर्तकत्वकी उपपत्तिके लिए घटादिवृत्तियोंमें भी मूलाज्ञानविषय ब्रह्मचैतन्यविषयकत्व मानना पड़ेगा, क्योंकि घटादिवृत्तियोंके सत्यब्रह्मविषयक न होनेसे अवस्थारूप अज्ञानके साथ समानविषयकत्वके न होनेसे आवृत्तियोंमें अवस्थारूप अज्ञाननिवर्तकत्वकी प्रसक्ति नहीं होगी ।

अज्ञानके निवर्त्तकका निरूपण] भाषानुवादसहित ४८७

मताज्ञानसमानविषयत्वलक्षणं क्लृप्तं प्रयोजकमेव नाऽस्तीति वाच्यम्; तत्राऽवच्छेदकांशस्य कल्पितत्वेऽप्यवच्छेद्यांशस्याऽकल्पितमूलाज्ञानविषयचैतन्यरूपत्वात्, तस्य कल्पितत्वे घटवज्जडतया अवस्थाऽज्ञानं प्रत्यपि विषयत्वायोगाेनावस्थाऽज्ञानस्य मूलाज्ञानविषयाकल्पितचैतन्यविषयत्वस्य वक्तव्यतया तन्निवर्तकघटादिज्ञानस्याऽपि तद्विषयत्वावश्यम्भावेन तत्पक्षेऽपि ततो मूलाज्ञाननिवृत्तिप्रसङ्गस्याऽपरिहारात् ।

नैषमत्राहुराचार्या न सन्दृश इति श्रुतेः ।
चित् चक्षुराद्ययोग्यैव चिद्द्वाराऽस्त्यावृतिर्जडे ॥ २८ ॥

उक्त पूर्वपक्षके उत्तरमें आचार्य कहते हैं कि 'न सन्दृशे' इस श्रुतिसे ब्रह्मचैतन्य चक्षु आदिका अयोग्य ही है । जड़में चैतन्य द्वारा अज्ञानका आवरण होता है ॥ २८ ॥

अत्राऽऽहुराचार्याः—न चैतन्यं चक्षुरादिजन्यवृत्तिविषयः ।

अवच्छेदक अंशके कल्पित होने पर भी अवच्छेद्य अंश मूलाज्ञानका विषयीभूत अकल्पित ब्रह्मचैतन्यात्मक है, यदि अवच्छेद्य अंशको कल्पित माना जाय, तो घटके समान जड़ होनेसे अवस्थारूप अज्ञानके प्रति भी वह विषय नहीं हो सकता है, इसलिए अवस्थारूप अज्ञानको भी मूलभूत अज्ञानका विषयभूत अकल्पित चैतन्यविषयकं कहना होगा, इससे अवस्थारूप अज्ञानके निवर्तक घटादिज्ञानमें भी मूलाज्ञानका विषयीभूत ब्रह्मचैतन्यविषयकत्व अवश्य प्रसक्त होगा, अतः अवच्छेद्यांशके कल्पितत्वपक्षमें भी घटादिज्ञानसे मूलाज्ञानकी निवृत्तिका प्रसङ्ग हटा नहीं सकते हैं ।

इस विषयमें आचार्य कहते हैं कि * चक्षु आदिसे उत्पन्न हुई


* पूर्वोक्त आक्षेपकर्ताका भाव यही सिद्ध होता है कि घटादिज्ञान भी मूलाज्ञानका निवर्तक होगा, क्योंकि वह भी चैतन्यविषयक है, जैसे कि वेदान्तजन्यज्ञान चैतन्यविषयक होता है । परन्तु इस अनुमानमें हेतुकी सिद्धि नहीं है, इस अभिप्रायसे उक्त पूर्वपक्षका परिहार करते हैं, अर्थात् चक्षु आदिसे उत्पन्न होनेवाला विज्ञान यदि आत्माको विषय करनेवाला है, तो उससे मूलाज्ञानकी निवृत्तिका प्रसङ्ग आ सकता है, परन्तु चक्षुरादिजन्यज्ञान वेदान्तजन्यज्ञानके समान आत्माको विषय करनेवाला है ही नहीं, अतः उक्त अतिप्रसङ्ग नहीं है, इसमें प्रमाण भी 'न सन्दृशे' इत्यादि श्रुति है, इस श्रुतिका तात्पर्य यही है कि चक्षु आदि इन्द्रियोंकी सामर्थ्य पटादि जड़ पदार्थोंके अवगाहन करनेमें ही है, आत्माके अवगाहन करनेमें नहीं, इससे परमाणु आदिके ग्रहणमें जैसे चक्षुकी योग्यता नहीं है, वैसे आत्माके ग्रहणमें भी इसकी सामर्थ्य

४८८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

‘न सन्दृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम् ।
पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयंभूस्तस्मात् पराङ् पश्यति नान्तरात्मन्’ ॥
इत्यादिश्रुत्या तस्य परमाण्वादिवत् चक्षुराद्ययोग्यत्वोपदेशाद्, ‘औ-
पनिषदम्’ इति विशेषणाच्च । न च—
‘सर्वप्रत्ययवेद्ये वा ब्रह्मरूपे व्यवस्थिते’ ।
इत्यादिवार्त्तिकविरोधः ; तस्य घटाद्याकारवृत्त्युदये सति आवरणा-
भिभवात् स्वप्रभं सद्रूपं ब्रह्म ‘घटस्सन्’ इति घटवद् व्यवहार्यं भवतीत्यौ-

वृत्तिका विषय चैतन्य नहीं है, क्योंकि ‘न सन्दृशे०’ (आत्माका स्वरूप चक्षुके योग्य नहीं है, इसलिए आत्माको कोई भी चक्षुसे नहीं देखता है, इन्द्रियाँ ईश्वरसे जड़ अर्थोंके ग्रहण करनेके लिए ही बनाई गई है, अतः बाह्य पदार्थोंका ही इन्द्रियाँ ग्रहण करती हैं, अन्तरात्माका—चैतन्यका—ग्रहण नहीं करती हैं) इत्यादि श्रुतिसे परमात्माको परमाणु आदिके समान चक्षुका अयोग्य ही बतलाया है और ‘औपनिषदम्’ (केवल उपनिषत्प्रमाणसे गम्य) ऐसा आत्मामें विशेषण भी दिया गया है ।

यदि शङ्का हो कि ‘सर्वप्रत्ययवेद्ये०’ (सब प्रत्ययोंमें वेद्यरूपसे व्यवस्थित ब्रह्मरूप वस्तुमें) इत्यादि वार्त्तिकके साथ विरोध होगा? नहीं, नहीं होगा, क्योंकि उस वार्त्तिकवचनका तात्पर्य यह है—घटाद्याकारवृत्तिके उदित होने पर आवरणके विनष्ट होनेसे स्वप्रकाश सद्रूप ब्रह्म ‘घटः सन्’ इस प्रकार घटके समान व्यवहृत किया जाता है, इसलिए वह गौणरूपसे .वृत्तिसे वेद्य है*।


नहीं है, अतः पूर्वोक्त प्रसङ्ग अनुचित है, यदि ‘सर्वप्रत्ययवेद्ये’ इत्यादि वार्त्तिकके आधारपर शंका की जाय कि सभी घटादिज्ञानोंमें ब्रह्मका प्रकाश होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त श्रुतिके जबरदस्त प्रमाण होनेसे उक्त वार्त्तिक गौणार्थक है, अर्थात् जैसे घटमें घटविषयक वृत्तिके अधीन व्यवहारकी विषयता है, वैसे ही घट आदिका अधिष्ठानभूत सद्रूप ब्रह्म भी घटादिके आकारमें परिणत अन्तःकरणकी वृत्तिके अधीन व्यवहारका विषय है, इसलिए ‘सद्रूप ब्रह्म घटादिज्ञानसे वेद्य है’ इस प्रकारका औपचारिक व्यवहार होता है । यदि शङ्का हो कि परोक्षवृत्तियोंमें आवरणाभिभावकत्वका अभाव होनेसे वहां पर उक्त व्यवस्था नहीं घट सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त वार्त्तिकमें उक्त प्रत्ययशब्दका अर्थ है—आवरणाभिभावक वृत्ति, अतः पूर्वोक्त आक्षेप सर्वथा अनुपपन्न है, यह समझना चाहिए ।

* इसका प्रकृतमें तात्पर्य यह है कि उक्त प्रकारसे घटादि वृत्तिको यदि चैतन्यविषयक न माना जाय, तो घटज्ञानसे घटावच्छिन्न चैतन्यावारक अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होगी, क्योंकि समानविषयक

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अज्ञानके निवर्तकका निरूपण ] भाषानुवादसहित ४८९

पचारिकघटादिवृत्तिवेद्यत्वपरत्वात् । आवरणाभिभावकत्वं च घटादिज्ञा- नस्य घटादिविषयत्वादेव उपपन्नम्, घटादेरप्यज्ञानविषयत्वाद् 'घटं न जानामि' 'घटज्ञानेन घटाज्ञानं नष्टम्' इति अवस्थाऽज्ञानस्य घटादिविषय- त्वानुभवात् । न च तत्राऽऽवरणकृत्याभावादज्ञानाङ्गीकारो न युक्तः, तद्भा- सकस्य तदवच्छिन्नचैतन्यस्याऽऽवरणादेव तदप्रकाशोपपत्तेरिति वाच्यम् , उक्तभङ्ग्या जडस्य साक्षादज्ञानविषयत्वप्रतिषेधेऽपि जडावच्छिन्नचैतन्य-

घटादिज्ञानमें आवरणका अभिभावकत्व तो घटादिविषयत्वकी शक्ति होनेसे ही उपपन्न है, क्योंकि घट आदि भी अज्ञानका विषय होता है, कारण कि 'मैं घटको नहीं जानता हूँ' 'घटके ज्ञानसे घटका अज्ञान नष्ट हुआ' इस प्रकार अवस्थारूप अज्ञान घट आदिको विषय करनेवाला है, ऐसा अनुभव होता है। यदि शङ्का हो कि घटादि जड़ वस्तुओंमें आवरणरूप कार्य न होनेसे अज्ञानका अङ्गीकार युक्त नहीं है, † क्योंकि जड़वस्तुके अवभासक जड़ावच्छिन्न चैतन्यके आवरणसे ही जड़के अप्रकाशकी उपपत्ति हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त प्रणालीसे ‡ अर्थात् 'जड़में आवरणकार्य न होनेसे अज्ञानका अङ्गीकार युक्त


ज्ञानाज्ञानका परस्पर विरोध है, असमानविषयकका नहीं है, इसपर 'आवरणाभिभावकत्व'का निर्वचन करते हैं, अर्थात् अनुभवके अनुसार अज्ञानका विषय जड़ भी होता है, क्योंकि 'मैं घटको नहीं जानता हूँ' ऐसी लोकप्रसिद्धप्रतीति अबाधितरूपसे हुआ करती है, अतः उक्त अतिप्रसङ्ग नहीं है, यह भाव है ।

† तात्पर्य यह है कि अज्ञानाश्रय जड़ नहीं हो सकता है, क्योंकि जड़में आवरण ही नहीं है, कारण कि आवरणका कोई कार्य जड़ वस्तुमें देखा नहीं जाता । 'मैं घटको नहीं जानता हूँ' इस प्रकारकी प्रतीति घट और घटाधिष्ठान चैतन्यके परस्पर तादात्म्य होनेसे उपपन्न हो सकती है। यदि शङ्का हो कि जड़में यदि आवरण नहीं है, तो उसका सर्वदा प्रकाश होना चाहिए, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि घट आदिके प्रकाशक चैतन्यका उसके साथ सम्बन्ध नहीं है, अतः उसका प्रकाश नहीं होता है। आवरणके वलसे प्रकाश नहीं होता यह वात नहीं है। यदि कहो कि चैतन्यमें जड़का अध्यास होनेसे सर्वदा चैतन्यके साथ सम्बन्ध है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उस चैतन्यके आवरणसे घटका भी अप्रकाश हो सकता है, अतः जड़में अज्ञान क्यों माना जाय ? यह पूर्वपक्षीका मन्तव्य है ।

‡ समाधानका तात्पर्य यह है कि 'तत्रावरणकृत्याभावात्' इत्यादि ग्रन्थसे साक्षात् अज्ञान- विषयत्वका निषेध होनेपर भी, अनुभवके आधारपर परम्परया अज्ञानविषयता जड़में मानी जाती है, अतः साक्षात् या परम्परया जो अज्ञानका विषय है, तद्विषयक ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति होती है, इस प्रकार निवर्त्य-निवर्तक-भावका निर्वचन करनेसे सब दोषोंका निरास हो सकता है, इसी भावको 'उक्तभङ्ग्या' इत्यादि ग्रन्थसे कहते हैं ।,

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४९०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

प्रकाशस्याऽज्ञानेनाऽऽवरणम्, ततो नित्यचैतन्यप्रकाशसंसर्गेऽपि जडस्य 'नास्ति', 'न प्रकाशते' इत्यादिव्यवहारयोग्यत्वमिति परम्परया अज्ञान-विषयत्वाभ्युपगमात् साक्षात् परम्परया वा यदज्ञानावरणीयम्, तद्विषय-त्वस्यैव ज्ञानस्य तदज्ञाननिवर्तकत्वप्रयोजकशरीरे निवेशात् । न चैवं घटा-दीनामुक्तरीत्या मूलाज्ञानविषयत्वमपीति घटादिसाक्षात्कारादेव मूला-ज्ञाननिवृत्त्यापातः, फलबलात्तदज्ञानकार्यातिरिक्ततद्विषयविषयकत्वस्यैव तन्निवर्तकत्वे तन्त्रत्वात् ।


नहीं है' इत्यादि वाक्यसे जड़में साक्षात् अज्ञानविषयताका निषेध करनेपर भी जड़ावच्छिन्न चैतन्यके प्रकाशका अज्ञानसे आवरण है, इससे नित्य चैतन्य प्रकाशका सम्बन्ध होनेपर भी जड़में 'नहीं है, प्रकाशित नहीं है' इस प्रकारका व्यवहारयोग्यतारूप आवरण है' इस प्रकार परम्परासे जड़में अज्ञानकी विषयताका स्वीकार होनेसे साक्षात् या परम्परासे जो अज्ञानसे आवृत है तद्विषयकत्वका ही ज्ञानके (तद्) अज्ञाननिवर्तकत्वप्रयोजक शरीरमें निवेश करना चाहिए । यदि शङ्का हो कि उक्त रीतिसे * घट आदि भी मूलाज्ञानके विषय हैं, इसलिए घट आदिके साक्षात्कारसे मूलाज्ञानकी निवृत्तिका प्रसङ्ग होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि फलके बलसे† अज्ञाननिवर्तकत्वमें अज्ञानकार्या-तिरिक्ततद्विषयकत्व ही प्रयोजक है।


* शङ्काका तात्पर्य यह है कि जैसे अवस्थारूप अज्ञानके प्रति परम्परासे विषयीभूत जड़ पदार्थके साक्षात्कारसे घटाद्यवच्छिन्न चैतन्यनिष्ठ अवस्थारूप अज्ञानकी निवृत्ति होती है, वैसे ही मूलाज्ञानमें परम्परया विषयीभूत जड़के साक्षात्कारसे भी ब्रह्मचैतन्यनिष्ठ मूला-ज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त होगी।

† समाधानका तात्पर्य यह है कि उक्त आपत्ति नहीं हो सकती है, अर्थात् घटसाक्षा-त्कारसे ब्रह्मचैतन्यनिष्ठ अज्ञानकी निवृत्ति नहीं हो सकती है, क्योंकि घट आदिका साक्षात्कार होनेपर भी मूलाज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती है, यह अनुभव है, इससे मूलाज्ञान और मूलाज्ञानके कार्यसे अतिरिक्त जो मूलाज्ञानका विषयीभूत चैतन्यमात्र है, तद्विषयक ज्ञान ही मूलाज्ञानका निवर्तक है, ऐसी कल्पना की जायगी, इसलिए घटादिज्ञानके उक्त अज्ञानतत्कार्यातिरिक्त-चैतन्यमात्र विषय न होनेसे उससे मूलाज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त नहीं होगी।

अज्ञानके निवर्तकका निरूपण ] भाषानुवादसहितं ४९१


मूलाज्ञानस्याऽविषयो जड एवाऽथवाऽन्यथा ।
चक्षुषा सौरभं भायाद् वृत्तिव्यक्ताचिदन्वयात् ॥ २९ ॥

अथवा मूलाज्ञानका ही जड़ विषय नहीं होता है, अवस्थाऽज्ञानका तो तत्तत् जड़ ही विषय होता है, यदि ऐसा न माना जाय, तो चक्षुसे चन्दनखण्डवृत्ति सौगन्ध्यका भी प्रत्यक्ष होने लगेगा, क्योंकि चन्दनाकार वृत्तिसे अभिव्यक्त चैतन्यका उसमें भी अन्वय है ॥ २९ ॥

अथवा मूलाज्ञानस्यैव जडं न विषयः । अवस्थाऽज्ञानानां त्ववच्छिन्नचैतन्याश्रितानां तत्तज्जडमेव विषयः । अन्यथा चाक्षुषवृत्त्या चन्दनखण्डचैतन्याभिव्यक्तौ तत्संसर्गिणो गन्धस्याप्यापरोक्ष्यापत्तेः । तदनभिव्यक्तौ चन्दनतद्रूपयोरप्यप्रकाशापत्तेः । न च चाक्षुषवृत्त्या चन्दनतद्रूपावच्छिन्नचैतन्योरभिव्यक्त्या तयोः प्रकाशः, गन्धाकारवृत्त्यभावेन गन्धावच्छिन्नचैतन्यस्यानभिव्यक्त्या तस्याप्रकाशश्चेति वाच्यम्, चैतन्यस्य

अथवा ‡ मूलाज्ञानका ही जड़ विषय नहीं होता है । अवच्छिन्नचैतन्यमें आश्रित अवस्थारूप अज्ञानोंके तो तत्-तत् जड़ पदार्थ ही विषय होते हैं । यदि जड़ अनावृत माना जाय, तो चक्षुरिन्द्रियजन्य वृत्तिसे चन्दनखण्डावच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यक्ति होनेपर चन्दनखण्डके साथ सम्बन्ध रखनेवाले गन्धका भी अपरोक्ष अनुभव हो जायगा । यदि चन्दनखण्डावच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यक्ति न मानी जाय, तो चन्दन और चन्दनके रूपका भी प्रकाश नहीं होगा । यदि शङ्का की जाय कि चाक्षुषवृत्तिसे चन्दन और उसके रूपसे अवच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यक्ति होनेसे उनका प्रकाश होता है, और गन्धाकार वृत्तिके न होनेसे गन्धावच्छिन्न


‡ जड़मात्रविषयक वृत्तिसे अवच्छिन्न चैतन्यके आवारक अज्ञानका विनाश कैसे होता है, क्योंकि वे भिन्नविषयक हैं, इस प्रकारकी शङ्काके होनेपर अवस्थारूप अज्ञान अवच्छिन्न चैतन्यके आवरण द्वारा जड़को भी आवृत्त करता है, अतः जड़मात्रविषयक वृत्ति भी अवस्थारूप अज्ञानको निवृत्ति कर सकती है, ऐसा समाधान किया गया है। अब उक्त शङ्काका प्रकारान्तरसे भी 'अथवा' इत्यादि ग्रन्थसे समाधान करते हैं, इस पक्षमें जितने जड़ पदार्थ हैं, वे सबके सब मूलाज्ञानके विषय नहीं हैं, तथापि अवस्थारूप अज्ञानके विषय हैं, क्योंकि 'मैं घटको नहीं जानता हूँ' इस प्रकार भी प्रतीति होती है, यदि जड़ अवस्थारूप अज्ञानका विषय न माना जाय, तो चन्दनके टुकड़ेके आकारमें परिणत चाक्षुषवृत्तिसे अभिव्यक्त चैतन्यसे चन्दनमें रहनेवाले गन्धका भी प्रकाश होने लगेगा, अतः तत्-तत् जड़ पदार्थोंको अवश्य अवस्थारूप अज्ञानोंसे आवृत्त मानना चाहिए, इसीसे 'जड़ अज्ञानका विषय नहीं होता' इस सिद्धान्तके साथ विरोध भी नहीं है, क्योंकि यह सिद्धान्त मूलाज्ञानमात्रविषयक है, यह भाव है।

४९२सिद्धान्तलेशसंग्रहे[ तृतीय परिच्छेद

द्विगुणीकृत्य वृत्त्ययोगेन चैकद्रव्यगुणानां स्वाश्रये सर्वत्र व्याप्य वर्तमानानां पृथक् पृथक् गगनावच्छेदकत्वस्येव चैतन्यावच्छेदकत्वस्याप्यसम्भवात्, तेषां स्वाश्रयद्रव्यावच्छिन्नचैतन्येनैव शुक्तीदंमंशावच्छिन्नचैतन्येन शुक्तिरजतवत् प्रकाश्यतया तस्याभिव्यक्तौ गन्धस्यापि प्रकाशस्य, अनभिव्यक्तौ रजतादेरप्यप्रकाशस्य चापत्तेः । न च गन्धाकारवृत्त्युपरक्ते एव चैतन्ये गन्धः प्रकाशते इति नियमः, प्रकाशसंसर्गस्यैव प्रकाशमानशब्दार्थत्वेनाऽसत्यामपि तदाकारवृत्तावनावृतप्रकाशसंसर्गे


चैतन्यकी अभिव्यक्ति न होनेके कारण गन्धका प्रकाश नहीं होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि चैतन्यकी द्विगुणित * वृत्तिके न होनेसे तथा अपने आश्रयमें व्याप्यवृत्तित्वरूपसे वर्तमान एक द्रव्यमें अवस्थित गुणों का गगनावच्छेदकत्वके समान पृथक्-पृथक् चैतन्यावच्छेदत्वका भी सम्भव न होनेसे जैसे शुक्तिके इदमंशावच्छिन्न चैतन्यसे शुक्तिरजतका † प्रकाश होता है, वैसे ही उन गुणोंका भी अपने आश्रय द्रव्यावच्छिन्न चैतन्यसे ही प्रकाश होता है, इससे द्रव्यावच्छिन्न चैतन्यके अभिव्यक्त होनेपर गन्धका प्रकाश भी प्रसक्त होगा, और यदि उक्त चैतन्यकी अभिव्यक्ति न मानी जाय, तो रजत आदिका भी प्रकाश नहीं होगा । यदि शङ्का हो कि गन्धाकार वृत्तिसे उपरक्त चैतन्यके प्रकाशित होनेसे ही गन्धका प्रकाश होता है, यह नियम है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रकाशसंसर्गके ही प्रकाशमानशब्दका अर्थ


* तात्पर्य यह है कि चैतन्य निरवयव है, इसलिए निरवयव चैतन्यमें द्रव्यावच्छेदेन एक और गुणावच्छेदेन दूसरी वृत्ति नहीं हो सकती है, और एक ही द्रव्यमें गन्ध आदि गुणोंका प्रदेशके भेदसे यदि अवस्थान माना जाय, तो एक द्रव्यमें गन्धादिके भेदसे चैतन्यका भी भेद प्रसक्त होगा, परन्तु गन्ध आदि गुण अव्याप्यवृत्ति नहीं हैं, किन्तु व्याप्यवृत्ति हैं, अतः उक्त शङ्का भी नहीं हो सकती है । और घट आदि द्रव्य गगनके अवच्छेदक होते हैं, इससे उनके भेदसे गगनका भेद होता है, परन्तु गन्ध गगनका अवच्छेदक नहीं होता, वैसे ही गन्ध चैतन्यका भी अवच्छेदक नहीं होता । जिससे कि गन्धादिके भेदसे चैतन्यका भी भेद प्रसक्त हो ।

† अर्थात् शुक्तिके इदमंशावच्छिन्न चैतन्यमें रजतका अध्यास होनेसे रजतका शुक्तिके इदमंशावच्छिन्न चैतन्यसे अवभास होता है, उससे अतिरिक्त चैतन्यसे अवभास नहीं होता है, वैसे ही द्रव्यावच्छिन्न चैतन्यमें कल्पितरूप आदिका भी द्रव्यावच्छिन्न चैतन्यसे भी अवभास होता है, यह भाव है।

अज्ञानके निवर्त्तकका निरूपण] भाषानुवादसहित ४९३


अप्रकाशमानत्वकल्पनस्य विरुद्धत्वात् । अभिव्यक्तस्य गन्धोपादानचैतन्यस्य गन्धासंसर्गोक्त्यसम्भवात् । तस्माद् यथा चैत्रस्य घटवृत्तौ तं प्रत्यावरकस्यैवाज्ञानस्य निवृत्तिरिति तस्यैव विषयप्रकाशो, नान्यस्य, तथा तत्तद्विपयाकारवृत्त्या तत्तदावरकाज्ञानस्यैव निवृत्तेर्न विषयान्तरस्यापरोक्ष्यम्, 'अनावृतार्थस्यैव संविद्भेदाद् आपरोक्ष्यम्' इत्यभ्युपगमादिति । प्रमातृभेदेनेव विषयभेदेनाप्येकत्र चैतन्ये अवस्थाऽज्ञानभेदस्य वक्तव्यतया अवस्थाऽज्ञानानां तत्तज्जडविषयकत्वमिति घटादिवृत्तीनां


होनेसे गन्धाकार वृत्तिके न होनेपर भी अनावृत प्रकाशके संसर्गसे अप्रकाशमानत्वकी कल्पना हो ही नहीं सकती है, कारण कि अभिव्यक्त गन्धोपादान चैतन्य गन्धका संसर्गी नहीं है, इत्याकारक उक्तिका असम्भव ही है । इससे जैसे चैत्रकी घटाकार वृत्ति होनेपर चैत्रके प्रति आवारण करनेवाले अज्ञानकी ही निवृत्ति होती है, इससे चैत्रको ही घटका प्रकाश होता है, अन्यको नहीं होता, वैसे ही तत्-तत् विषयाकार वृत्तिसे तत्-तत् विषयोंके आवारक अज्ञानकी ही निवृत्ति होती है, अतः अन्य विषयोंके अपरोक्षत्वकी प्रसक्ति नहीं है, क्योंकि अनावृत अर्थ ही चैतन्यसे अभिन्न होनेसे अपरोक्ष होता है, ऐसा सिद्धान्त है *। प्रमातृचैतन्यके भेदसे जैसे एक विषयमें अनेक अज्ञान माने जाते हैं † वैसे ही विषयके भेदसे भी एक चैतन्यमें अवस्थारूप अज्ञानोंका भेद कहना होगा, इससे अवस्थारूप अज्ञान


* तात्पर्य यह है कि जड़में आवरणकी सिद्धि होनेसे जैसे चैत्रके घटविषयक अज्ञानकी निवृत्ति चैत्रके घटविषयक ज्ञानसे ही होती है, अन्यके ज्ञानसे नहीं होती, वैसे ही गुण और गुणीका तादात्म्य होनेपर भी भेदके भी अवस्थित होनेसे चन्दनविषयक चाक्षुषवृत्तिसे गन्धविषयक अपरोक्ष ज्ञानकी प्रसक्ति नहीं होती, क्योंकि जो अज्ञानकृत आवरणसे रहित अर्थ होता है, वही चैतन्यसे अभिन्न होता है, यह नियम है ।

† तात्पर्य यह है कि जैसे एक ही विषयमें चैत्र, मैत्र, देवदत्त आदि अनेक प्रमाताओंके भेदसे अज्ञान अनेक हैं, वैसे ही एक ही चन्दनादिविषयावच्छिन्न चैतन्यमें गन्ध आदि विषयोंके भी भेदसे अज्ञान अनेक हैं, अतः चन्दनकी अपरोक्षतादशामें गन्धका अवभास न होनेके कारण उस कालमें गन्ध आदिमें आवरण है, यह अवश्य मानना होगा, इसलिए चन्दनके चाक्षुष प्रत्यक्षकालमें गन्धका प्रत्यक्ष नहीं होता है ।

४९४सिद्धान्तलेशसंग्रह :[तृतीय परिच्छेद]

नावस्थाऽज्ञाननिवर्तकत्वे काचिदनुपपत्तिः । न वा मूलाज्ञाननिवर्तकत्वापत्तिः ।

साक्षिणः स्वप्रकाशत्वान्नाहंवृत्त्याऽपि तत्क्षयः ।
तथा कालादिवैशिष्ट्यगोचरप्रत्यभिज्ञया ॥ ३० ॥

साक्षीके स्वप्रकाश होनेसे अहंवृत्तिसे भी मूलाज्ञानका नाश नहीं होता है, तथा काल आदिसे सम्बन्धका अवगाहन करनेवाली प्रत्यभिज्ञासे भी मूलाज्ञानका विनाश नहीं होता है ॥ ३० ॥

न चैवमपि जीवविषयाया अहमाकारवृत्तेर्मूलाज्ञाननिवर्तकत्वापत्तिः ।

तत्-तत् जड़विषयक है, अतः घटादिवृत्तियोंके अवस्थारूप अज्ञाननिवर्तकत्वमें ‡ कोई अनुपपत्ति नहीं है, और घटादि वृत्तियोंके अथवा मूलाज्ञान निवर्तकत्वकी भी प्रसक्ति नहीं है, क्योंकि वे चैतन्यविषयक नहीं हैं ।

यदि शङ्का हो कि ऐसा * माननेपर भी अहमाकार वृत्तिमें मूलाज्ञान निवर्तकत्वकी प्रसक्ति होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अहमाकार


‡ तात्पर्य यह है कि घटादिवृत्तियोंके चैतन्यविषयक न होनेसे ज्ञान और अज्ञानमें परस्परविरोधप्रयोजक समानविषयकत्व नहीं है, क्योंकि घटादिवृत्तियाँ केवल जड़पदार्थ-विषयक है और अज्ञान केवल चैतन्यविषयक है, इसी प्रकार जड़में आवरण माननेपर भी अपसिद्धान्तकी आपत्ति नहीं हो सकती है, क्योंकि जड़में आवरणका अनभ्युपगम मूलाज्ञान-विषयक है । वैसे तत्-तत् जड़ पदार्थोंके आवारक अज्ञान यदि अनेक माने जायें, तो भी उनके एकत्वसिद्धान्तका विरोध नहीं है, क्योंकि वस्तुतः वह एक ही है, इसी अभिप्रायसे कोई आपत्ति नहीं है, ऐसा कहते हैं, घटादिवृत्तियाँ मूलाज्ञानविषयभूतब्रह्मविषयक नहीं हैं, अतः घटादिवृत्तियोंमें अज्ञाननिवर्तकत्व नहीं हैं, अतः पूर्वपक्षियोंका मत सर्वथा अनुपपन्न है । इसलिए ब्रह्मचैतन्यमें सर्वप्रत्ययवेद्यत्वप्रतिपादक पूर्वमें उदाहृत वार्त्तिकवाक्यकी भी उपपत्ति हो सकती है ।

* घटादिवृत्तियोंके चैतन्यविषयक न होनेपर भी अहंशब्दका अर्थभूत जो जीव है, वह चित् और अचित्से सम्पृक्त है, इससे अहंवृत्तिके चैतन्यविषयक होनेसे उससे अज्ञानकी निवृत्ति हो सकती है, यह पूर्वपक्षीका तात्पर्य है, इसपर सिद्धान्तीका कहना है कि स्वप्रकाश होनेके कारण प्रकाशमान चैतन्यमें चित्तादात्म्यरूपसे अध्यस्यमान अचिदंशमात्रका ही अवगाहन करनेसे अहमाकार वृत्ति भी चैतन्यावगाहिनी नहीं है । अन्यथा केवल उपनिषद्गम्यत्वका विरोध प्रसक्त होगा । इसी प्रकार 'जिस मैंने स्वप्नमें श्रीकृष्णका अनुभव किया, वही मैं जागरणमें उसका स्मरण करता हूँ' इत्यादि प्रत्यभिज्ञा भी जैसे 'अहम्' इत्याकारक वृत्ति स्वप्रकाश चैतन्यमें अन्तःकरणतादात्म्यका अवगाहन करती है, वैसे ही . तत्तादिविशिष्टका भी अवगाहन करती है, स्वप्रकाश चैतन्यका अवगाहन नहीं करती है, यह भाव है ।

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अज्ञानके निवर्त्तकका निरूपण] भाषानुवादसहित ४९५

तस्याः स्वयंप्रकाशमानचित्संवलिताचिदंशमात्रविषयत्वात् । ‘सोऽहम्’ इति प्रत्यभिज्ञाया अपि स्वयम्प्रकाशचैतन्ये अन्तःकरणवैशिष्ट्येन सह पूर्वापरकालवैशिष्ट्यमात्रविषयत्वेन चैतन्यविषयत्वाभावादिति ।

केचिच्छ्रोतव्यनियमाद्दृष्टदोषक्षयान्वितम् ।
वाक्यजं ज्ञानमेवाहुर्मूलाज्ञाननिवर्हणम् ॥ ३१ ॥

कुछ लोग कहते हैं कि श्रोतव्यवाक्यनियमजन्य अदृष्टसे जन्य दोषके विनाशसे युक्त तत्त्वमस्यादि वाक्यजन्य ज्ञान ही मूलाज्ञानका विनाशक है ॥ ३१ ॥

केचित्तु घटादिवृत्तीनां तत्तदवच्छिन्नचैतन्यविषयत्वमभ्युपगम्य—
‘सर्वमानप्रसक्तौ च सर्वमानफलाश्रयात् ।
श्रोतव्येति वचः प्राह वेदान्तावरुरुत्सया ॥’
इति वार्त्तिकोक्तेः श्रोतव्यवाक्यार्थवेदान्तनियमविध्यनुसारेण वेदान्तजन्य-

वृत्ति स्वयंप्रकाशमान चित्संवलित अचिदंशमात्रका ही अवगाहन करती है, और ‘सोऽहम्’ (वही मैं हूँ) इस प्रकारकी प्रत्यभिज्ञा भी स्वयंप्रकाशमान चैतन्यमें अन्तःकरणके सम्बन्धके साथ पूर्वापरकालके सम्बन्धमात्रको विषय करती है, अतः वह भी चैतन्यविषयक नहीं है ।

कुछ † लोग घटादि वृत्तियोंमें तत्-तत् विषयोंसे अवच्छिन्न चैतन्य-विषयकत्वका अङ्गीकार करके ‡ ‘सर्वमानप्रसक्तौ च०’ (सभी प्रमाणोंके चैतन्यविषयक होनेसे ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति सम्पूर्ण प्रमाणोंकी कारणता प्रसक्त होनेसे वेदान्तोंकी नियमेच्छासे ‘श्रोतव्यः’ यह वाक्य ‘वेदान्तोंका ही विचार करना चाहिए’ ऐसा प्रतिपादन करता है) इस प्रकारकी वार्त्तिकोक्तिसे


† घटादिविषयक वृत्तियोंके चैतन्यविषयक होनेसे वेदान्तजन्य ज्ञानके समान उनसे भी मूलाज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त होगी, ऐसा पूर्वपक्ष करके उसके समाधानमें हेत्वसिद्धिप्रयुक्त अतिप्रसङ्ग पूर्वमें दिखलाया गया है, अब उन वृत्तियोंको यदि चैतन्यविषयक माना जाय, तो भी कोई हानि नहीं है, इस प्रकार ‘केचित्तु’ मत कहते हैं ।

‡ इसमें यदि शङ्का की जाय कि चैतन्यको चक्षु आदिसे जन्य वृत्तिका विषय यदि माना जाय, तो चैतन्यमें चक्षु आदि इन्द्रियोंसे जन्य वृत्ति विषयताका श्रुतियोंसे जो निषेध किया गया है, उनके साथ विरोध होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उन श्रुतियोंसे चक्षुरादिजन्य-वृत्तियोंमें निरुपाधिक चैतन्यविषयकत्वका निषेध किया गया है, इसलिए अवच्छिन्नचैतन्यको विषय माननेमें कोई विरोध नहीं है ।

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४९६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

मेव नियमादृष्टसहितं ब्रह्मज्ञानमप्रतिबद्धं ब्रह्मज्ञाननिवर्तकमिति घटादिज्ञानान्न तन्निवृत्तिप्रसङ्ग इत्याहुः ।

अन्ये स्वरूपसम्बन्धाद्वैजात्याद्वाऽपि वाक्यजात् ।
अखण्डाकारकं ज्ञानमाचख्युस्तन्निवर्तकम् ॥ ३२ ॥

कुछ लोग कहते हैं कि वाक्यजन्य स्वरूपसम्बन्धविशेषरूप अथवा वैजात्यसे उपलक्षित अखण्डाकारक ज्ञान मूलाज्ञानका निवर्तक है ॥ ३२ ॥

अन्ये तु तत्त्वमस्यादिवाक्यजन्यं जीवब्रह्माभेदगोचरमेव ज्ञानं मूलाज्ञाननिवर्तकम्, मूलाज्ञानस्य तदभेदगोचरत्वादिति न चैतन्यस्वरूपमात्रगोचराद् घटादिज्ञानात् तन्निवृत्तिप्रसङ्गः । न चाऽभेदस्य तत्त्वावेदकप्रमाणबोध्यस्य चैतन्यातिरेके द्वैतापत्तेः 'चैतन्यमात्रमभेदः' इति तद्गोचरं घटा-


श्रोतव्य वाक्यके अर्थभूतवेदान्तनियम विधिके अनुसार वेदान्तजन्यनियमादृष्टसे युक्त अप्रतिबद्ध ब्रह्मज्ञान ही * ब्रह्मविषयक अज्ञानका निवर्तक है, इसलिए घटादि ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त नहीं है—यह कहते हैं ।

† और कुछ लोग कहते हैं कि 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यसे उत्पन्न जीव और ब्रह्मके अभेदको विषय करनेवाला ज्ञान ही मूलभूत अज्ञानका निवर्तक है, क्योंकि मूलाज्ञान जीव और ब्रह्मके अभेदको विषय करता है, इसलिए केवल चैतन्यस्वरूपको अवगाहन करनेवाले घटादिविषयक ज्ञानसे मूलाज्ञानकी निवृत्ति नहीं हो सकती है । यदि शङ्का हो कि तत्त्वावेदक प्रमाणसे बोध्य जीव और ब्रह्मका अभेद चैतन्यसे अतिरिक्त माना जाय, तो द्वैतकी प्रसक्ति होनेसे


* अर्थात् नियमादृष्टसे प्रतिबन्धकीभूत दुरितका विनाश होता है, इसलिए अप्रतिबद्ध ब्रह्मज्ञानका निवर्तक है, यह भाव है ।

† 'तत्त्वमस्यादिवाक्योत्थं ज्ञानं मोक्षस्य साधनम्' अर्थात् 'तत्त्वमसि' (वह तू है) इत्यादि महावाक्यजन्य ज्ञान मोक्षका साधन है, इत्यादि नारदजीके वचनके दर्शनसे और—

तत्त्वमस्यादिवाक्योत्थं यज्जीवपरमात्मनोः ।
तादात्म्यविषयं ज्ञानं तदिदं मुक्तिसाधनम् ॥

अर्थात् तत्त्वमस्यादिवाक्यसे होनेवाला जो जीव और परमात्माका तादात्म्यविषयक विज्ञान है, वही मुक्तिका साधन है, इत्यादि भगवत्पादके वचनके दर्शनसे और मूलाज्ञान जीव और ब्रह्मके अभेदको ही आवृत करता है, इससे जीव और ब्रह्मका ऐक्यलक्षणतादात्म्यविषयक जो विज्ञान है, वही मुक्तिका साधन है, अतः पूर्वोक्त अतिप्रसङ्ग नहीं है, इस अभिप्रायसे यह मत है ।

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अज्ञानके निवर्तकका निरूपण ] भाषानुवादसहित ४९७


दिज्ञानमप्यभेदगोचरमिति वाच्यम्। नह्यभेदज्ञानमिति विषयतो विशेषं ब्रूमः, किन्तु तत्त्वंपदवाच्यार्थधर्मिद्वयपरामर्शादिरूपकारणविशेषाधीनेन

केवल चैतन्य ही अभेद होगा, अतः परमार्थ वस्तुका अवगाहन करनेवाला घटादिविषयक ज्ञान भी ‡ अभेदविषयक है, इससे घटादि ज्ञानसे भी मूलाज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जीव-ब्रह्माभेदविषयक ज्ञानकी विषयप्रयुक्त विशेषता नहीं है ×। किन्तु तत् और


‡ अर्थात् अभेद और चैतन्यके एक होनेसे घटज्ञान यदि चैतन्यविषयक हुआ, तो जीव और ब्रह्मका अभेदविषयक भी हुआ, इसलिए अभेदावगाही घटके ज्ञानसे भी अज्ञानकी निवृत्ति हो सकती है, यह प्रश्नका आशय है।

× घटादिज्ञानमें विषयरूपसे चैतन्य भासता है, अभेद नहीं भासता है और महावाक्यजन्य ज्ञानमें तो जीव और ब्रह्मका अभेद भासता है। इस प्रकार घटादिज्ञानकी अपेक्षासे महावाक्यजन्य ज्ञानकी विषयप्रयुक्त विशेषता नहीं है, जिससे कि उक्त अतिप्रसङ्ग हो, क्योंकि अभेद और चैतन्यके एक होनेसे घट आदि ज्ञानमें यदि चैतन्य विषय हुआ, तो अभेद भी विषय हुआ ही, अन्यथा द्वैतापत्ति होगी। यदि शङ्का हो कि ‘इदं रजतम्’ इस भ्रममें जितना अधिष्ठानांश भासता है, उसकी अपेक्षासे अधिक शुक्तित्व आदि विशेषको विषय करनेवाले शुक्त्यादिविषयक ज्ञानमें ही रजतादिभ्रमकी विरोधिता देखी जाती है, इसलिए ‘सन् घटः’ ‘स्फुरति घटः’ इत्यादि भ्रमोंमें जितना, अधिष्ठानभूत चैतन्य विषय है उसकी अपेक्षा अधिक अभेदको विषय करनेवाला वाक्यजन्य ज्ञान न माना जाय, तो उसमें भ्रमनिवर्तकत्व हो ही न सकेगा, इसलिए विषयप्रयुक्त भेद अवश्य मानना चाहिए, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि भ्रमसे अधिकविषयक ज्ञान ही अज्ञानके निवर्तक हैं, ऐसा नियम नहीं है, क्योंकि ऐसे अनेक स्थल देखे जाते हैं, जो भ्रमसे अधिकविषयक यद्यपि नहीं हैं, तथापि भ्रमके निवर्तक हैं, जैसे कि वस्तुतः घोषका आधारभूत ही गङ्गाका तीर है, तथापि किसीको उसमें तटाकतीरत्वके भ्रमसे ‘तटाक्तीरे घोषः’ ऐसा भ्रम होता है, उस पुरुषके प्रति ‘गङ्गायां घोषः’ इस प्रकारके वाक्यप्रयोगके होनेपर उसको ‘गङ्गातीरे घोषः’ इस प्रकारका ज्ञान होता है और तटाकतीरत्वका भ्रम भी निवृत्त होता है। इसमें भ्रमविषयकी अपेक्षा वाक्यजन्यज्ञानमें कोई अधिक विषय नहीं भासता है। यदि शङ्का हो कि वाक्यजन्य ज्ञानमें तटाकतीरत्वकी व्यावृत्ति करनेवाला गङ्गातीरत्वरूप विशेष भासता है, अतः विशेष विषय नहीं भासता है, यह कहना * असङ्गत है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जहांपर तीरत्वमात्र विशेषणके तात्पर्यसे ‘गङ्गायां घोषः’ इस शब्दका प्रयोग किया, और उसी प्रकारका भ्रान्त पुरुषको तात्पर्यज्ञान हुआ, उस स्थलमें गङ्गातीरत्वप्रकारक बोध यद्यपि नहीं है, तथापि भ्रमकी निवृत्ति देखी जाती है, इसलिए व्यभिचार तदवस्थ ही है। तथा किसी भी कपालसे तुषोंका उपवाप करना चाहिए, इस प्रकार जिस पुरुषको भ्रम है उस पुरुषके प्रति कपालत्वमात्रविशेषणके तात्पर्यसे प्रयुक्त और उसी तात्पर्यसे गृहीत ‘पुरोडाशकपालेन तुषानुपवपति’ इस वाक्यसे कपालसे तुषका उपवाप करना

६३

४९८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ तृतीय परिच्छेद


स्वरूपसंबन्धविशेषेण चैतन्यविषयत्वमेव तदभेदज्ञानत्वम् । यथा हि
त्वं पदके वाक्यार्थभूत जो जीव और ईश्वर दो धर्मी हैं, उनके परामर्श आदि कारणविशेषके अधीन स्वरूपसम्बन्धविशेषसे चैतन्यविषयकता ही


चाहिए, ऐसा ही उस पुरुषको बोध होता है। इसमें कपालांशमें कपालान्तरव्यावर्त्तकविशेषके गृहीत न होनेपर भी पुरोडाशकपालसे अतिरिक्त कपालोंमें तुषोपवापसाधनत्वकी निवृत्ति देखी जाती है, इसलिए अमाधिकविषयक ज्ञानमें भ्रमनिवर्तकत्व नियम यदि माना जाय, तो इस स्थलमें भी व्यभिचार हो सकता है। इससे 'तीरे घोषः' ( तीरमें घोष है ) इस शाब्दबोधमें गङ्गातीरत्वरूप विशेषविषयत्वके न होनेपर भी उसके हेतुभूत पदार्थोपस्थितिके समयमें गङ्गा-सम्बन्धित्वरूपसे तीरकी उपस्थिति रहनेके कारण उपस्थितिकी सामर्थ्यसे वस्तुतः गङ्गातीर-विषयक ज्ञान जो कि अमाधिकविषयक नहीं है, वह भ्रमका निवर्तक है, ऐसा कहना होगा। इसी प्रकार 'कपालसे तुषोंका उपवाप करना चाहिए' इत्यादि शाब्दबोधके स्वतः कपालान्तरकी व्यावृत्ति करनेवाले विशेषविषयक न होनेपर भी उक्त शाब्दबोधके हेतुभूत पदार्थकी उपस्थिति-कालमें पुरोडाशकी सम्बन्धितारूपसे कपालकी उपस्थिति होनेसे उपस्थितिकी सामर्थ्यसे उसके अमाधिकविषयक न होनेपर भी भ्रमनिवर्तकत्वका अङ्गीकार करना होगा, इस परिस्थितिमें ज्ञानकी भ्रमविरोधितामें सामग्रीविशेषाधीनत्व ही प्रयोजक मानना होगा, अमाधिकविषयत्व नहीं, क्योंकि उक्त स्थलमें व्यभिचार है। किञ्च, महावाक्यजन्य जो ज्ञान है, उसमें संसारके मूलभूत अज्ञानकी विरोधिता श्रुति, स्मृति और अनुभवसे सिद्ध है, महावाक्योंसे चैतन्यस्वरूप मात्रका बोध होता है, इसका द्वितीय परिच्छेदमें साधन किया जा चुका है और अन्य निबन्धोंमें विस्तार भी किया गया है, इसलिए जैसे शुक्तिरजतादिस्थलमें भ्रमविरोधी अमाधिकविषयक शुक्तिज्ञानादिमें अमाधिकविषयता है, वैसे ही दोषाभाव आदिसे घटित सामग्रीविशेषाधीनत्वसे, अखण्डार्थक वेदान्तके अनुसारसे और पूर्वके उदाहृत व्यभिचार-स्थलोंके अनुरोधसे भी ज्ञानकी भ्रमविरोधितामें सामग्रीविशेषाधीनत्व को ही अनुगत प्रयोजक कहना होगा, अमाधिकविषयत्वका अङ्गीकार करके अमाधिकविषयकत्वसे रहित महावाक्यार्थ ज्ञान भ्रमनिवर्तक नहीं हो सकता है, इसी अभिप्रायसे 'किन्तु' इत्यादि ग्रन्थ है, तात्पर्य यह है कि 'तत्' और त्वम् शब्दके वाच्यभूत जो ईश्वर और जीव दो धर्मी हैं, उन दो धर्मियोंका पहले 'तत्' और 'त्वम्' शब्दसे शक्तिवृत्तिसे स्मृतिरूप परामर्श होता है, उसके बाद तत् और त्वम्पदके सामानाधिकरण्यसे जीव ईश्वरसे अभिन्न है, इस प्रकार उनकी (जीव और ईश्वरकी) विशेषण और विशेष्यभावसे अवगति होती है, अनन्तर 'तत्' और 'त्वम्' पदसे वाच्य अर्थभूत जो विशिष्ट हैं उनमें से विशेष्यरूप अभेदके योग्य जो चैतन्य हैं। उनकी लक्षणासे प्रतीति होती है, इसके बाद दोनों विशेष्यके अभेदको विषय करनेवाले शाब्दबोधका उदय होता है। इस क्रमसे होनेवाला महावाक्यजन्य ज्ञानका अपने विषयके साथ जो स्वरूप-सम्बन्ध है, उस सम्बन्धसे चैतन्यविषयत्व ही घटादिज्ञानव्यावृत्त वाक्यजन्य जीव और ब्रह्मका अभेदज्ञान है, इसके बलसे वह अभेदज्ञान मूलाज्ञान और. मिथ्याज्ञानका विरोधी होता है।

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अज्ञानके निवर्तकका निरूपण ] भाषानुवादसहित ४९९


विशेषणविशेष्यतत्सम्बन्धगोचरत्वाविशेषेऽपि विशिष्टज्ञानस्य विशेषणज्ञानादिकारणविशेषाधीनस्वरूपसम्बन्धविशेषेण तत्रितयगोचरत्वमेव समूहालम्बनव्यावृत्तं विशिष्टज्ञानत्वम्, यथा वा 'स्थाणुत्वपुरुषत्ववान्' इति आहार्यवृत्त्यावृत्तं संशयत्वं विषयतो विशेषाानिरूपणात्, तथा घटादावपि 'सोऽयं घटः' इत्यादिज्ञानस्य स्वरूपसम्बन्धविशेषेण घटादिविषयत्वमेव


वाक्यजन्य जीवब्रह्माभेदविषयक ज्ञानत्व है, क्योंकि * जैसे विशेषण, विशेष्य और उनके संसर्गविषयताकी बराबरी होनेपर भी विशेषणज्ञान आदि कारणविशेषके अधीन स्वरूपसम्बन्धविशेषसे उक्त त्रितयविषयता ही समूहालम्बनव्यावृत्त विशिष्टज्ञानत्व है अथवा जैसे 'स्थाणुत्वपुरुषत्ववान्' इस प्रकार आहार्यवृत्तिसे व्यावृत्त † संशयत्व है, क्योंकि विशिष्टज्ञानमें और 'स्थाणुर्वा पुरुषो वा' इस प्रकारके संशयात्मक ज्ञानमें विषयतः विशेषका निरूपण नहीं हो सकता है, वैसे ‡ घटादिस्थलमें भी 'सोऽयं घटः' ( वही यह घट है) इत्यादि ज्ञानमें


* महावाक्यजन्य ज्ञानके घटादिज्ञानकी अपेक्षासे चैतन्य अंशमें विषयप्रयुक्त विशेषके न होनेपर भी सामग्रीविशेषसे घटादिज्ञानकी अपेक्षा वैलक्षण्य है, उसका इस ग्रन्थसे स्पष्टीकरण करते हैं, 'दण्डी पुरुषः' ( दण्डवान् पुरुष है ) इस प्रकारके विशिष्ट ज्ञानमें तीन विषय हैं, इसी प्रकार 'दण्डपुरुषसंयोगाः' इस प्रकारके समूहालम्बन ज्ञानमें भी ये तीन विषय हैं, इसलिए उक्त विशिष्ट ज्ञान और समूहालम्बनात्मक ज्ञानका परस्पर विषय भेद नहीं कर सकते हैं। क्योकि विषय तो समान हैं, इसलिए विशेषण, विशेष्य और संसर्गके ज्ञान आदि कारण विशेषके अधीन स्वरूपसम्बन्धविशेषसे विशेषणादित्रयविषयकत्व ही समूहालम्बनज्ञानव्यावृत्त विशिष्टज्ञानत्व है, इस प्रकार सामग्रीविशेषसे उक्त विशिष्टज्ञान और समूहालम्बनात्मक ज्ञानमें वैलक्षण्य मानना होगा, इसी प्रकार तत्त्वमस्यादि वाक्यजन्य ज्ञानमें भी सामग्रीप्रयुक्त ही वैलक्षण्य है, यह भाव है ।

† 'स्थाणुत्वविरुद्धपुरुषत्ववान्' ( स्थाणुत्वसे विरुद्ध जो पुरुषत्व, तद्वान् ) इस प्रकारका निश्चय संशयसमानविषयक आहार्यवृत्तिरूप कहलाता है, इससे व्यावृत्त संशयत्व भी विषयप्रयुक्त नहीं है, किन्तु सामग्रीविशेषप्रयुक्त है, क्योंकि विषयकृत भेद तो आहार्यवृत्तिसे संशयमें नहीं आ सकता है, क्योंकि विषय समान है, यह भाव है ।

‡ उक्त प्रकारकी व्यवस्था केवल 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यजन्य ज्ञानके अभेद ज्ञानत्वमें ही नहीं है, किन्तु 'सोऽयं घटः' 'सोऽयं देवदत्तः' ( यही यह घट है और वही यह देवदत्त है ) इत्यादि वाक्यजन्य ज्ञानके केवल घटशब्द और देवदत्तशब्दसे होनेवाले ज्ञानसे व्यावृत्त अभेद-

५०० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [तृतीय परिच्छेद]

केवलघटशब्दादिजन्यज्ञानव्यावृत्तं तदभेदज्ञानत्वम् । अतिरिक्ताभेदानि- रूपणात् । अभावसादृश्यादीनामधिकरणप्रतियोग्यादिभिः स्वरूपसम्बन्ध- युक्तानामधिकरणेनाऽऽधाराधेयभावरूपः स्वरूपसम्बन्धविशेषः प्रतियोगिना प्रतियोग्यनुयोगिभावरूप इत्यादिप्रकारेण स्वरूपसम्बन्धे अवान्तरविशेष- कल्पनावद् वृत्तीनां विषयेऽपि संयोगतादात्म्ययोरतिप्रसक्त्या विषयैर्विषय-


स्वरूपसम्बन्धविशेषसे घटादिविषयकत्व ही केवल घटशब्द आदिसे होनेवाले ज्ञानसे भिन्न घटाभेदविषयक ज्ञानत्व है, क्योंकि अतिरिक्त अभेदका निरूपण नहीं हो सकता है । और × अभाव एवं सादृश्य आदिका, जो कि अधिकरण और प्रतियोगी आदिके साथ स्वरूपसम्बन्धसे युक्त हैं, अधिकरणके साथ आधाराधेयभावरूप स्वरूपसम्बन्धविशेष है और प्रतियोगीके साथ प्रतियोग्यनुयोगिभावरूप स्वरूपसम्बन्धविशेष है, इस प्रकारसे जैसे स्वरूपसम्बन्धमें अवान्तर भेदोंकी कल्पना की जाती है, वैसे ही वृत्तियोंके विषयीभूत निर्विशेष-चैतन्यमें भी संयोग ❊ और तादात्म्यसंसर्गकी अतिप्रसक्ति होनेके कारण


ज्ञानत्वमें भी वही व्यवस्था है, इसे इस ग्रन्थसे कहते हैं । तात्पर्य यह है केवल घट आदि शब्दसे जन्य ज्ञानके विषयभूत घट आदिके स्वरूपकी अपेक्षा 'सोऽयं घटः' इत्यादि वाक्यसे बोधित अभेद अतिरिक्त नहीं है, क्योंकि भिन्न माननेमें प्रमाण नहीं है, इसलिए 'घटः' और 'सोऽयं घटः' इनमें विषयप्रयुक्त वैलक्षण्यके न होनेसे 'सोऽयं घटः' इत्यादि स्थलमें भी 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्यके समान 'सः' और 'अयम्' इन दो पदोंके वाक्यार्थरूप दो धर्मोंके परामर्श आदि कारणविशेषके अधीन स्वरूपसम्बन्ध विशेषसे घटादिस्वरूपविषयकत्व ही घटाद्यभेद-ज्ञानत्व होगा, दूसरा नहीं, इसीका सर्वत्र अनुसरण करना चाहिए ।

× प्रकृतमें वक्तव्य यह है कि केवल घटादिशब्दजन्य ज्ञानका भी विषयके साथ स्वरूप सम्बन्ध ही है, इस अवस्था में स्वरूप सम्बन्धको लेकर अभेद ज्ञानत्वादिकी व्यवस्था कैसे कर सकते हैं। यदि इसमें शङ्का हो कि वृत्त्यात्मक ज्ञानोंका विषयोंके साथ विषयविषयिभाव प्रयोजक स्वरूपसम्बन्धोंके साधारण होनेपर भी उनमें विषय और उनके ज्ञानके स्वरूपात्मक सम्बन्धोंमें सामग्रीविशेषके प्रभावसे परस्पर वैलक्षण्यकी कल्पनासे व्यवस्थाकी उपपत्ति कर सकते हैं, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि स्वरूपसम्बन्धोंका कहींपर भी वैलक्षण्य देखनेमें नहीं आता है, इसलिए वैसी कल्पना नहीं कर सकते हैं, इसपर 'अभाव सादृश्यं' इत्यादि ग्रन्थसे स्वरूपसंसर्गोंके भेदका उपपादन करते हैं ।

❊ तात्पर्य यह है कि यहाँ किसीको शङ्का हो कि वृत्तियोंका विषयके साथ विषयविषयिभाव स्वरूपसम्बन्धप्रयुक्त नहीं है, किन्तु संयोगादिप्रयुक्त है, अतः वृत्तियोंका विषयोंके साथ स्वरूपसम्बन्धके असिद्ध होनेसे उन सम्बन्धोंमें वैलक्षण्यात्मक विषयकी कल्पना अयुक्त है,

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अज्ञानके निवर्तकका निरूपण ] भाषानुवादसहित ५०१


विषयिभावरूपस्वरूपसम्बन्धवतीनां विषयविशेषनिरूपणासम्भवे क्लृप्ते एव स्वरूपसम्बन्धे अवान्तरविशेषकल्पनेनाभेदज्ञानत्वादिपरस्परवैलक्षण्यनिर्वाहाच्च । एवं च ब्रह्मज्ञानस्याभेदाख्यकिञ्चित्संसर्गगोचरत्वानभ्युपगमान् न वेदान्तानामखण्डार्थत्वहानिरपीत्याहुः ।

ननु स्वहेतुमज्ञानं विरोधात्सा कथं हरेत् ।
वृत्तिर्नैवं विरुद्धत्वाद्वह्निसंयोगवत् पटे ॥ ३३ ॥

अत्र शङ्का होती है कि ब्रह्मज्ञानसे, जिसका उपादान अज्ञान है, विरोध होनेसे अविद्याका विनाश कैसे हो सकता है, क्योंकि कार्यका उपादानके साथ विरोध नहीं हो सकता है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि ब्रह्माकार अखण्ड वृत्तिके साथ अज्ञानका पटमें वह्निसंयोगके समान विरोध है, अतः ज्ञानसे अज्ञानका विनाश हो सकता है ॥ ३३ ॥

ननु घटादिज्ञानवद् ब्रह्मज्ञानस्यापि न मूलाज्ञाननिवर्तकत्वं युक्तम् ,

विषयविशेषका निरूपण न होनेसे परिशेषसे विषयोंके साथ विषयविषयिभावरूप स्वरूपसम्बन्धसे युक्त उन वृत्तियोंके † क्लृप्त स्वरूपसम्बन्धके अवान्तर विशेषकी कल्पनासे अभेदज्ञानत्व आदि परस्परविलक्षणत्वकी भी कल्पना कर सकते हैं । एवञ्च, ‡ ब्रह्मज्ञानकी अभेदरूप किसी संसर्गविषयताका स्वीकार न होनेसे वेदान्तोंकी अखण्डार्थताकी हानि भी नहीं है ।

यदि शङ्का हो कि जैसे घट आदिका ज्ञान मूलभूत अज्ञानका निवर्तक नहीं है, वैसे ब्रह्मज्ञान भी मूलभूत अज्ञानका निवर्तक नहीं हो सकता है, क्योंकि


तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि यदि वृत्तिका संयोग वृत्तिविषयत्वमें प्रयोजक माना जायगा, तो चक्षुके गोलक आदिका भी घटादिवृत्तिके साथ संयोग होनेसे उसमें वृत्तिविषयत्वकी प्रसक्ति होगी, यदि वृत्तिके तादात्म्यको वृत्तिविषयत्वमें प्रयोजक मानें, तो वृत्तिके अधिष्ठानत्वरूपसे वृत्तिके साथ तादात्म्यापन्न घटाद्यवच्छिन्न चैतन्यमें घटाद्याकारवृत्तिविषयत्वका सम्भव होनेपर भी वृत्तितादात्म्यसे रहित घट आदिमें वृत्तिविषयत्वकी प्रसक्ति न होगी, और वृत्तिके परिणामी अन्तःकरणमें घटादिवृत्तिविषयत्वका प्रसङ्ग होगा, क्योंकि परिणाम और परिणामीका परस्पर तादात्म्य होता है ।

† स्वरूपसम्बन्ध वृत्ति आदिका स्वरूप है, इसलिए वह क्लृप्त है, अतः क्लृप्त सम्बन्धके विशेषकी कल्पनामें लाघव है, अन्य सम्बन्धकी कल्पना करके उसमें—सम्बन्धान्तरमें अभेद ज्ञानत्वादिका निर्वाहकविशेष माना जाय, तो गौरवमात्र है, इसलिए वृत्तियोंका विषयोंके साथ स्वरूपसम्बन्ध ही है, संयोग, तादात्म्यादि नहीं है ।

‡ अर्थात् महावाक्यजन्य ज्ञानमें रहनेवाले अभेदज्ञानत्वका प्रकारान्तरसे उपपादन किया गया है, अतः अभेदसंसर्गभानकी अपेक्षा नहीं है, यह भाव है ।

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५०२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद

निवर्तकत्वे तदवस्थानासहिष्णुत्वरूपस्य विरोधस्य तन्त्रत्वात्, कार्यस्य चोपादानेन सह तादृशविरोधाभावादिति चेत्, न; कार्यकारणयोरन्यत्र तादृशविरोधादर्शनेऽपि एकविषयज्ञानाज्ञानप्रयुक्तस्य तादृशविरोधस्याऽत्र सत्त्वात्, कार्यकारणयोरप्यग्निसंयोगपटयोस्तादृशविरोधस्य दृष्टेश्च। न चाऽग्निसंयोगादवयवविभागप्रक्रियया असमवायिकारणसंयोगनाशादेव पटनाशः, नाऽग्निसंयोगादिति वाच्यम्, दग्धपटेऽपि पूर्वसंस्थानानुवृत्तिदर्शनेन मुद्गरचूर्णीकृतघटवद् अवयवविभागादर्शनात्। तत्राऽवयवविभागादिकल्पनाया अप्रामाणिकत्वात्। नाऽपि तत्र तन्तूनामपि दाहेन समवायिकारण-


निवर्तकत्वमें तदवस्थानासहिष्णुत्वरूप $\times$ विरोध कारण है और कार्यका अपने उपादानके साथ उक्त विरोध नहीं देखा जाता है, तो यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि कार्य और कारणका अन्य स्थलमें यद्यपि उक्त विरोध नहीं देखा जाता है, तथापि प्रकृतमें समानविषयक ज्ञान और अज्ञानप्रयुक्त उक्त विरोध विद्यमान है, और कार्यकारणात्मक अग्निसंयोग और पटमें उक्त विरोध देखा जाता है। यदि इसमें शङ्का हो कि अग्निके संयोगसे होनेवाले अवयवविभागकी प्रक्रिया द्वारा * असमवायिकारणभूत तन्तुसंयोगके नाशसे ही पटका नाश होता है, अग्निके संयोगके नाशसे नहीं होता, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि दग्ध वस्त्रमें भी पूर्वकी संयुक्तावस्थाकी अनुवृत्ति होनेसे जैसे मुद्गरसे चूर्णित घटमें अवयवोंका विभाग देखा जाता है, वैसे ही पटके दग्ध होनेके पश्चात् दग्ध तन्तुओंमें अवयवविभागके दृष्ट न होनेसे पटके दाहस्थलमें अवयवविभागकी कल्पना अप्रामाणिक है। और उक्त स्थलमें यह भी नहीं कह सकते हैं कि तन्तुओंका भी दाहसे अर्थात् अपने समवायिकारणका नाश होनेके कारण पट-


$\times$ निवर्त्य और निवर्तकका सहावस्थान अपेक्षित नहीं होता है, क्योंकि वे ही पदार्थ विरोधी होते हैं, जो सहावस्थानको सहन नहीं करते हैं, प्रकृतमें ब्रह्मज्ञान और मूलाज्ञानका तत्त्वशब्दसे निवर्त्य सहावस्थानासहिष्णुत्वलक्षण विरोध न होनेसे निवर्त्यनिवर्तकभाव नहीं हो सकता है, यह भाव है।

* अग्निके संयोगसे तन्तुमें क्रिया, उसके बाद तन्तुओंमें विभाग, उसके बाद पटके प्रति असमवायिकारणभूत तन्तुसंयोगका नाश, अनन्तर पटका विनाश, इस प्रकारकी वैशेषिक प्रक्रिया द्वारा, यह भाव है।

ब्रह्मज्ञानके नाशकका विचार ] भाषाानुवादसहित ५०३


नाशात् पटनाश इति युक्तम्। अंशुतन्त्वादिभिस्सह युगपदेव पटस्य दाहदर्शनेन क्रमकल्पनायोगात्। यतोऽधस्तान्नावयवनाशः, तत्राऽवयवे अग्निसंयोगादेव नाशस्य वाच्यत्वात् ॥ ११ ॥

नन्वस्त्वेतदेवम्, तथाऽपि सविलासाज्ञाननाशकमिदं ब्रह्मज्ञानं कथं नश्येद्, नाशकान्तरस्याऽभावादिति चेद्,

हत्वा मोहं विनश्येत् सा कतकाम्बुविन्दुवद्वहयः।
पङ्कवाह्नितृणानीव चास्तप्तायसभूमिषु ॥ ३४ ॥

अज्ञानका विनाश करके ब्रह्माकार वृत्ति भी उसी प्रकार स्वयं नष्ट हो जाती है, जैसे कि जलमें प्रक्षिप्त निर्मली जलके मलिन भागको अलग कर स्वयं अलग हो जाती है तप्तलोहापिण्डके ऊपर गिरे हुए जलके बिन्दु अग्निको शान्तकर स्वयं शान्त हो जाते हैं और अग्नि भूमिके तृणोंको नष्ट करके स्वयं नष्ट हो जाती है ॥ ३४ ॥

यथा कतकरजः सलिलेन संयुज्य पूर्वयुक्तरजोऽन्तरविश्लेषं जनयत्


नाश हुआ है, क्योंकि अंशु और तन्तु आदिके साथ एक ही समयमें पटनाशके देखे जानेसे क्रमकी कल्पना अयुक्त है, और † जिस द्व्यणुकावयव परमाणुका नाश नहीं होता है, उस अवयवका अग्निसंयोगसे ही नाश मानना होगा ॥ ११ ॥

अब शङ्का करते हैं कि उक्त प्रकारसे यद्यपि ब्रह्मज्ञान ही अन्तःकरण द्वारा अपने उपादानभूत अज्ञानका नाशक भले ही हो, तथापि अपने विलास सहित अज्ञानका विनाशक ब्रह्मज्ञान कैसे नष्ट होगा ? क्योंकि ब्रह्मज्ञानके सिवा अन्य कोई नाशक नहीं है।

इस * प्रकारकी शङ्काके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि जैसे कतकरज जलके साथ सम्बन्ध पाकर अपने संयोगसे पूर्व जलके साथ सम्पृक्त अन्य


† तात्पर्य यह है कि द्व्यणुकनाशके प्रति परमाणुनाश प्रयोजक नहीं हो सकता है, क्योंकि परमाणु नित्य है, इसलिए द्व्यणुकमें विद्यमान अग्निके संयोगसे ही द्व्यणुकका विनाश मानना होगा। अवयवविभागकी प्रक्रियाका अवलम्बन करके प्रकृतमें समाधान नहीं हो सकता है, क्योंकि अवयवविभागकी प्रक्रियाका पहले निरास किया जा चुका है। इसलिए अग्निसंयोगमें अपने उपादानभूत पटकी नाशकता भ्रान्त नहीं है।

* समाधानका तात्पर्य यह है कि ब्रह्मज्ञानसे व्यतिरिक्त समस्त पदार्थका ब्रह्मज्ञानसे नाश होगा, पीछे अवशिष्ट ब्रह्मज्ञानका नाश होगा, इस प्रकार क्रम नहीं माना जाता है, किन्तु ब्रह्मज्ञानसे जब अपने विलासके सहित अविद्याका विनाश प्रसक्त होगा उसीके साथ साथ ब्रह्मज्ञानका भी नाश होगा अपने नाशके प्रति ब्रह्मज्ञान भी कारण माना जाता है। यह भी

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५०४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

स्वविश्लेषमपि जनयति, तथाऽऽत्मन्यध्यस्यमानं ब्रह्मज्ञानं पूर्वाध्यस्तसर्वप्रपञ्चं निवर्तयत् स्वात्मानमपि निवर्तयतीति केचित् ।

अन्ये तु अन्यन्निवर्त्य स्वयमपि निवृत्तौ दग्धलोहपीताम्बुन्यायमुदाहरन्ति ।

अपरे त्वत्र दग्धतृणकूटदहनोदाहरणमाहुः । न च ध्वंसस्य प्रतियोग्यतिरिक्तजन्यत्वनियमः, अप्रयोजकत्वात् । निरिन्धनदहनादिध्वंसे व्यभिचाराच्च । न च ध्वंसस्य प्रतियोगिमात्रजन्यत्वेऽतिप्रसङ्गात् कारणा-


रजका पृथक्करण करके अपने विश्लेषको भी उत्पन्न करता है, वैसे ही आत्मामें अध्यस्त ब्रह्मज्ञान पूर्वके अध्यस्त समस्त प्रपञ्चकी निवृत्ति करके अपने आपकी भी निवृत्ति करता है।

कुछ लोग तो इस विषयमें अन्यकी निवृत्ति करके अपनी निवृत्तिमें दग्धलोहपीताम्बुन्यायको † दृष्टान्तरूपसे देते हैं ।

अन्य कुछ लोग दग्धतृणकूटदहनको * दृष्टान्तरूपसे कहते हैं । यदि शङ्का हो कि ध्वंस प्रतियोगीसे भिन्न कारणसे उत्पन्न होता है, यह नियम है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त नियमके अङ्गीकारमें कोई प्रमाण नहीं है, और इन्धनशून्य अग्नि आदिके ध्वंसमें व्यभिचार भी है । (तात्पर्य यह है इन्धनोंका निःशेष ध्वंस होनेके पश्चात् अग्निका स्वतः ही नाश देखा जाता है, एवं सुषुप्तिके अव्यवहित पूर्वकालमें जो ज्ञानका विनाश होता है, वह भी प्रतियोगिमात्रसे होता है, अतः उक्त नियममें व्यभिचार दोष है, अतः प्रयोजकशून्य निरर्थक नियमका अङ्गीकार नहीं करना चाहिए) । यदि शङ्का हो कि


शङ्का नहीं हो सकती है कि एक वस्तु अपने और दूसरेके नाशके प्रति कारण कैसे हो सकती है, क्योंकि कतकरजमें (निर्मली जिससे मलिन जल साफ होता है) स्व और परकी विरोधिता देखी जाती है, अतः यह पूर्वपक्ष युक्त नहीं है कि सब प्रपञ्चका ब्रह्मज्ञानसे भले ही नाश हो परन्तु ब्रह्मज्ञानका नाश नहीं होगा, क्योंकि अन्य नाशक नहीं है, क्योंकि ब्रह्मज्ञानका ब्रह्मज्ञानसे ही नाश उक्त रीतिसे हो सकता है ।

† 'दग्धलोहपीताम्बुन्याय' यह न्याय इस प्रकारका है कि जैसे अग्निसे तपे हुए लोहेके गोलेमें पानी यदि फेंका जाय, तो उस जलका लोहेमें रहनेवाला अग्नि नाश करता है और स्वयं भी नष्ट हो जाता है, वैसे ही प्रकृतमें ब्रह्मज्ञान भी अपनेसे व्यतिरिक्त सम्पूर्ण प्रपञ्चका विनाश करता है और स्वयं भी नष्ट हो जाता है ।

* जैसे अग्नि तृणके समुदायको नष्ट करती है, और स्वयं भी नष्ट हो जाती है, वैसे ही ब्रह्मज्ञान सम्पूर्ण प्रपञ्चका विनाश करके स्वयं भी नष्ट हो जाता है, यह तात्पर्य है ।

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