भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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४९४सिद्धान्तलेशसंग्रह :[तृतीय परिच्छेद]

नावस्थाऽज्ञाननिवर्तकत्वे काचिदनुपपत्तिः । न वा मूलाज्ञाननिवर्तकत्वापत्तिः ।

साक्षिणः स्वप्रकाशत्वान्नाहंवृत्त्याऽपि तत्क्षयः ।
तथा कालादिवैशिष्ट्यगोचरप्रत्यभिज्ञया ॥ ३० ॥

साक्षीके स्वप्रकाश होनेसे अहंवृत्तिसे भी मूलाज्ञानका नाश नहीं होता है, तथा काल आदिसे सम्बन्धका अवगाहन करनेवाली प्रत्यभिज्ञासे भी मूलाज्ञानका विनाश नहीं होता है ॥ ३० ॥

न चैवमपि जीवविषयाया अहमाकारवृत्तेर्मूलाज्ञाननिवर्तकत्वापत्तिः ।

तत्-तत् जड़विषयक है, अतः घटादिवृत्तियोंके अवस्थारूप अज्ञाननिवर्तकत्वमें ‡ कोई अनुपपत्ति नहीं है, और घटादि वृत्तियोंके अथवा मूलाज्ञान निवर्तकत्वकी भी प्रसक्ति नहीं है, क्योंकि वे चैतन्यविषयक नहीं हैं ।

यदि शङ्का हो कि ऐसा * माननेपर भी अहमाकार वृत्तिमें मूलाज्ञान निवर्तकत्वकी प्रसक्ति होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अहमाकार


‡ तात्पर्य यह है कि घटादिवृत्तियोंके चैतन्यविषयक न होनेसे ज्ञान और अज्ञानमें परस्परविरोधप्रयोजक समानविषयकत्व नहीं है, क्योंकि घटादिवृत्तियाँ केवल जड़पदार्थ-विषयक है और अज्ञान केवल चैतन्यविषयक है, इसी प्रकार जड़में आवरण माननेपर भी अपसिद्धान्तकी आपत्ति नहीं हो सकती है, क्योंकि जड़में आवरणका अनभ्युपगम मूलाज्ञान-विषयक है । वैसे तत्-तत् जड़ पदार्थोंके आवारक अज्ञान यदि अनेक माने जायें, तो भी उनके एकत्वसिद्धान्तका विरोध नहीं है, क्योंकि वस्तुतः वह एक ही है, इसी अभिप्रायसे कोई आपत्ति नहीं है, ऐसा कहते हैं, घटादिवृत्तियाँ मूलाज्ञानविषयभूतब्रह्मविषयक नहीं हैं, अतः घटादिवृत्तियोंमें अज्ञाननिवर्तकत्व नहीं हैं, अतः पूर्वपक्षियोंका मत सर्वथा अनुपपन्न है । इसलिए ब्रह्मचैतन्यमें सर्वप्रत्ययवेद्यत्वप्रतिपादक पूर्वमें उदाहृत वार्त्तिकवाक्यकी भी उपपत्ति हो सकती है ।

* घटादिवृत्तियोंके चैतन्यविषयक न होनेपर भी अहंशब्दका अर्थभूत जो जीव है, वह चित् और अचित्से सम्पृक्त है, इससे अहंवृत्तिके चैतन्यविषयक होनेसे उससे अज्ञानकी निवृत्ति हो सकती है, यह पूर्वपक्षीका तात्पर्य है, इसपर सिद्धान्तीका कहना है कि स्वप्रकाश होनेके कारण प्रकाशमान चैतन्यमें चित्तादात्म्यरूपसे अध्यस्यमान अचिदंशमात्रका ही अवगाहन करनेसे अहमाकार वृत्ति भी चैतन्यावगाहिनी नहीं है । अन्यथा केवल उपनिषद्गम्यत्वका विरोध प्रसक्त होगा । इसी प्रकार 'जिस मैंने स्वप्नमें श्रीकृष्णका अनुभव किया, वही मैं जागरणमें उसका स्मरण करता हूँ' इत्यादि प्रत्यभिज्ञा भी जैसे 'अहम्' इत्याकारक वृत्ति स्वप्रकाश चैतन्यमें अन्तःकरणतादात्म्यका अवगाहन करती है, वैसे ही . तत्तादिविशिष्टका भी अवगाहन करती है, स्वप्रकाश चैतन्यका अवगाहन नहीं करती है, यह भाव है ।

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