भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 523, कुल 590 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 523

अज्ञानके निवर्त्तकका निरूपण] भाषानुवादसहित ४९३


अप्रकाशमानत्वकल्पनस्य विरुद्धत्वात् । अभिव्यक्तस्य गन्धोपादानचैतन्यस्य गन्धासंसर्गोक्त्यसम्भवात् । तस्माद् यथा चैत्रस्य घटवृत्तौ तं प्रत्यावरकस्यैवाज्ञानस्य निवृत्तिरिति तस्यैव विषयप्रकाशो, नान्यस्य, तथा तत्तद्विपयाकारवृत्त्या तत्तदावरकाज्ञानस्यैव निवृत्तेर्न विषयान्तरस्यापरोक्ष्यम्, 'अनावृतार्थस्यैव संविद्भेदाद् आपरोक्ष्यम्' इत्यभ्युपगमादिति । प्रमातृभेदेनेव विषयभेदेनाप्येकत्र चैतन्ये अवस्थाऽज्ञानभेदस्य वक्तव्यतया अवस्थाऽज्ञानानां तत्तज्जडविषयकत्वमिति घटादिवृत्तीनां


होनेसे गन्धाकार वृत्तिके न होनेपर भी अनावृत प्रकाशके संसर्गसे अप्रकाशमानत्वकी कल्पना हो ही नहीं सकती है, कारण कि अभिव्यक्त गन्धोपादान चैतन्य गन्धका संसर्गी नहीं है, इत्याकारक उक्तिका असम्भव ही है । इससे जैसे चैत्रकी घटाकार वृत्ति होनेपर चैत्रके प्रति आवारण करनेवाले अज्ञानकी ही निवृत्ति होती है, इससे चैत्रको ही घटका प्रकाश होता है, अन्यको नहीं होता, वैसे ही तत्-तत् विषयाकार वृत्तिसे तत्-तत् विषयोंके आवारक अज्ञानकी ही निवृत्ति होती है, अतः अन्य विषयोंके अपरोक्षत्वकी प्रसक्ति नहीं है, क्योंकि अनावृत अर्थ ही चैतन्यसे अभिन्न होनेसे अपरोक्ष होता है, ऐसा सिद्धान्त है *। प्रमातृचैतन्यके भेदसे जैसे एक विषयमें अनेक अज्ञान माने जाते हैं † वैसे ही विषयके भेदसे भी एक चैतन्यमें अवस्थारूप अज्ञानोंका भेद कहना होगा, इससे अवस्थारूप अज्ञान


* तात्पर्य यह है कि जड़में आवरणकी सिद्धि होनेसे जैसे चैत्रके घटविषयक अज्ञानकी निवृत्ति चैत्रके घटविषयक ज्ञानसे ही होती है, अन्यके ज्ञानसे नहीं होती, वैसे ही गुण और गुणीका तादात्म्य होनेपर भी भेदके भी अवस्थित होनेसे चन्दनविषयक चाक्षुषवृत्तिसे गन्धविषयक अपरोक्ष ज्ञानकी प्रसक्ति नहीं होती, क्योंकि जो अज्ञानकृत आवरणसे रहित अर्थ होता है, वही चैतन्यसे अभिन्न होता है, यह नियम है ।

† तात्पर्य यह है कि जैसे एक ही विषयमें चैत्र, मैत्र, देवदत्त आदि अनेक प्रमाताओंके भेदसे अज्ञान अनेक हैं, वैसे ही एक ही चन्दनादिविषयावच्छिन्न चैतन्यमें गन्ध आदि विषयोंके भी भेदसे अज्ञान अनेक हैं, अतः चन्दनकी अपरोक्षतादशामें गन्धका अवभास न होनेके कारण उस कालमें गन्ध आदिमें आवरण है, यह अवश्य मानना होगा, इसलिए चन्दनके चाक्षुष प्रत्यक्षकालमें गन्धका प्रत्यक्ष नहीं होता है ।