भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 525

अज्ञानके निवर्त्तकका निरूपण] भाषानुवादसहित ४९५

तस्याः स्वयंप्रकाशमानचित्संवलिताचिदंशमात्रविषयत्वात् । ‘सोऽहम्’ इति प्रत्यभिज्ञाया अपि स्वयम्प्रकाशचैतन्ये अन्तःकरणवैशिष्ट्येन सह पूर्वापरकालवैशिष्ट्यमात्रविषयत्वेन चैतन्यविषयत्वाभावादिति ।

केचिच्छ्रोतव्यनियमाद्दृष्टदोषक्षयान्वितम् ।
वाक्यजं ज्ञानमेवाहुर्मूलाज्ञाननिवर्हणम् ॥ ३१ ॥

कुछ लोग कहते हैं कि श्रोतव्यवाक्यनियमजन्य अदृष्टसे जन्य दोषके विनाशसे युक्त तत्त्वमस्यादि वाक्यजन्य ज्ञान ही मूलाज्ञानका विनाशक है ॥ ३१ ॥

केचित्तु घटादिवृत्तीनां तत्तदवच्छिन्नचैतन्यविषयत्वमभ्युपगम्य—
‘सर्वमानप्रसक्तौ च सर्वमानफलाश्रयात् ।
श्रोतव्येति वचः प्राह वेदान्तावरुरुत्सया ॥’
इति वार्त्तिकोक्तेः श्रोतव्यवाक्यार्थवेदान्तनियमविध्यनुसारेण वेदान्तजन्य-

वृत्ति स्वयंप्रकाशमान चित्संवलित अचिदंशमात्रका ही अवगाहन करती है, और ‘सोऽहम्’ (वही मैं हूँ) इस प्रकारकी प्रत्यभिज्ञा भी स्वयंप्रकाशमान चैतन्यमें अन्तःकरणके सम्बन्धके साथ पूर्वापरकालके सम्बन्धमात्रको विषय करती है, अतः वह भी चैतन्यविषयक नहीं है ।

कुछ † लोग घटादि वृत्तियोंमें तत्-तत् विषयोंसे अवच्छिन्न चैतन्य-विषयकत्वका अङ्गीकार करके ‡ ‘सर्वमानप्रसक्तौ च०’ (सभी प्रमाणोंके चैतन्यविषयक होनेसे ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति सम्पूर्ण प्रमाणोंकी कारणता प्रसक्त होनेसे वेदान्तोंकी नियमेच्छासे ‘श्रोतव्यः’ यह वाक्य ‘वेदान्तोंका ही विचार करना चाहिए’ ऐसा प्रतिपादन करता है) इस प्रकारकी वार्त्तिकोक्तिसे


† घटादिविषयक वृत्तियोंके चैतन्यविषयक होनेसे वेदान्तजन्य ज्ञानके समान उनसे भी मूलाज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त होगी, ऐसा पूर्वपक्ष करके उसके समाधानमें हेत्वसिद्धिप्रयुक्त अतिप्रसङ्ग पूर्वमें दिखलाया गया है, अब उन वृत्तियोंको यदि चैतन्यविषयक माना जाय, तो भी कोई हानि नहीं है, इस प्रकार ‘केचित्तु’ मत कहते हैं ।

‡ इसमें यदि शङ्का की जाय कि चैतन्यको चक्षु आदिसे जन्य वृत्तिका विषय यदि माना जाय, तो चैतन्यमें चक्षु आदि इन्द्रियोंसे जन्य वृत्ति विषयताका श्रुतियोंसे जो निषेध किया गया है, उनके साथ विरोध होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उन श्रुतियोंसे चक्षुरादिजन्य-वृत्तियोंमें निरुपाधिक चैतन्यविषयकत्वका निषेध किया गया है, इसलिए अवच्छिन्नचैतन्यको विषय माननेमें कोई विरोध नहीं है ।

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