सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 526, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४९६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
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मेव नियमादृष्टसहितं ब्रह्मज्ञानमप्रतिबद्धं ब्रह्मज्ञाननिवर्तकमिति घटादिज्ञानान्न तन्निवृत्तिप्रसङ्ग इत्याहुः ।
अन्ये स्वरूपसम्बन्धाद्वैजात्याद्वाऽपि वाक्यजात् ।
अखण्डाकारकं ज्ञानमाचख्युस्तन्निवर्तकम् ॥ ३२ ॥
कुछ लोग कहते हैं कि वाक्यजन्य स्वरूपसम्बन्धविशेषरूप अथवा वैजात्यसे उपलक्षित अखण्डाकारक ज्ञान मूलाज्ञानका निवर्तक है ॥ ३२ ॥
अन्ये तु तत्त्वमस्यादिवाक्यजन्यं जीवब्रह्माभेदगोचरमेव ज्ञानं मूलाज्ञाननिवर्तकम्, मूलाज्ञानस्य तदभेदगोचरत्वादिति न चैतन्यस्वरूपमात्रगोचराद् घटादिज्ञानात् तन्निवृत्तिप्रसङ्गः । न चाऽभेदस्य तत्त्वावेदकप्रमाणबोध्यस्य चैतन्यातिरेके द्वैतापत्तेः 'चैतन्यमात्रमभेदः' इति तद्गोचरं घटा-
श्रोतव्य वाक्यके अर्थभूतवेदान्तनियम विधिके अनुसार वेदान्तजन्यनियमादृष्टसे युक्त अप्रतिबद्ध ब्रह्मज्ञान ही * ब्रह्मविषयक अज्ञानका निवर्तक है, इसलिए घटादि ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त नहीं है—यह कहते हैं ।
† और कुछ लोग कहते हैं कि 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यसे उत्पन्न जीव और ब्रह्मके अभेदको विषय करनेवाला ज्ञान ही मूलभूत अज्ञानका निवर्तक है, क्योंकि मूलाज्ञान जीव और ब्रह्मके अभेदको विषय करता है, इसलिए केवल चैतन्यस्वरूपको अवगाहन करनेवाले घटादिविषयक ज्ञानसे मूलाज्ञानकी निवृत्ति नहीं हो सकती है । यदि शङ्का हो कि तत्त्वावेदक प्रमाणसे बोध्य जीव और ब्रह्मका अभेद चैतन्यसे अतिरिक्त माना जाय, तो द्वैतकी प्रसक्ति होनेसे
* अर्थात् नियमादृष्टसे प्रतिबन्धकीभूत दुरितका विनाश होता है, इसलिए अप्रतिबद्ध ब्रह्मज्ञानका निवर्तक है, यह भाव है ।
† 'तत्त्वमस्यादिवाक्योत्थं ज्ञानं मोक्षस्य साधनम्' अर्थात् 'तत्त्वमसि' (वह तू है) इत्यादि महावाक्यजन्य ज्ञान मोक्षका साधन है, इत्यादि नारदजीके वचनके दर्शनसे और—
तत्त्वमस्यादिवाक्योत्थं यज्जीवपरमात्मनोः ।
तादात्म्यविषयं ज्ञानं तदिदं मुक्तिसाधनम् ॥
अर्थात् तत्त्वमस्यादिवाक्यसे होनेवाला जो जीव और परमात्माका तादात्म्यविषयक विज्ञान है, वही मुक्तिका साधन है, इत्यादि भगवत्पादके वचनके दर्शनसे और मूलाज्ञान जीव और ब्रह्मके अभेदको ही आवृत करता है, इससे जीव और ब्रह्मका ऐक्यलक्षणतादात्म्यविषयक जो विज्ञान है, वही मुक्तिका साधन है, अतः पूर्वोक्त अतिप्रसङ्ग नहीं है, इस अभिप्रायसे यह मत है ।