सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 527, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंअज्ञानके निवर्तकका निरूपण ] भाषानुवादसहित ४९७
दिज्ञानमप्यभेदगोचरमिति वाच्यम्। नह्यभेदज्ञानमिति विषयतो विशेषं ब्रूमः, किन्तु तत्त्वंपदवाच्यार्थधर्मिद्वयपरामर्शादिरूपकारणविशेषाधीनेन
केवल चैतन्य ही अभेद होगा, अतः परमार्थ वस्तुका अवगाहन करनेवाला घटादिविषयक ज्ञान भी ‡ अभेदविषयक है, इससे घटादि ज्ञानसे भी मूलाज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जीव-ब्रह्माभेदविषयक ज्ञानकी विषयप्रयुक्त विशेषता नहीं है ×। किन्तु तत् और
‡ अर्थात् अभेद और चैतन्यके एक होनेसे घटज्ञान यदि चैतन्यविषयक हुआ, तो जीव और ब्रह्मका अभेदविषयक भी हुआ, इसलिए अभेदावगाही घटके ज्ञानसे भी अज्ञानकी निवृत्ति हो सकती है, यह प्रश्नका आशय है।
× घटादिज्ञानमें विषयरूपसे चैतन्य भासता है, अभेद नहीं भासता है और महावाक्यजन्य ज्ञानमें तो जीव और ब्रह्मका अभेद भासता है। इस प्रकार घटादिज्ञानकी अपेक्षासे महावाक्यजन्य ज्ञानकी विषयप्रयुक्त विशेषता नहीं है, जिससे कि उक्त अतिप्रसङ्ग हो, क्योंकि अभेद और चैतन्यके एक होनेसे घट आदि ज्ञानमें यदि चैतन्य विषय हुआ, तो अभेद भी विषय हुआ ही, अन्यथा द्वैतापत्ति होगी। यदि शङ्का हो कि ‘इदं रजतम्’ इस भ्रममें जितना अधिष्ठानांश भासता है, उसकी अपेक्षासे अधिक शुक्तित्व आदि विशेषको विषय करनेवाले शुक्त्यादिविषयक ज्ञानमें ही रजतादिभ्रमकी विरोधिता देखी जाती है, इसलिए ‘सन् घटः’ ‘स्फुरति घटः’ इत्यादि भ्रमोंमें जितना, अधिष्ठानभूत चैतन्य विषय है उसकी अपेक्षा अधिक अभेदको विषय करनेवाला वाक्यजन्य ज्ञान न माना जाय, तो उसमें भ्रमनिवर्तकत्व हो ही न सकेगा, इसलिए विषयप्रयुक्त भेद अवश्य मानना चाहिए, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि भ्रमसे अधिकविषयक ज्ञान ही अज्ञानके निवर्तक हैं, ऐसा नियम नहीं है, क्योंकि ऐसे अनेक स्थल देखे जाते हैं, जो भ्रमसे अधिकविषयक यद्यपि नहीं हैं, तथापि भ्रमके निवर्तक हैं, जैसे कि वस्तुतः घोषका आधारभूत ही गङ्गाका तीर है, तथापि किसीको उसमें तटाकतीरत्वके भ्रमसे ‘तटाक्तीरे घोषः’ ऐसा भ्रम होता है, उस पुरुषके प्रति ‘गङ्गायां घोषः’ इस प्रकारके वाक्यप्रयोगके होनेपर उसको ‘गङ्गातीरे घोषः’ इस प्रकारका ज्ञान होता है और तटाकतीरत्वका भ्रम भी निवृत्त होता है। इसमें भ्रमविषयकी अपेक्षा वाक्यजन्यज्ञानमें कोई अधिक विषय नहीं भासता है। यदि शङ्का हो कि वाक्यजन्य ज्ञानमें तटाकतीरत्वकी व्यावृत्ति करनेवाला गङ्गातीरत्वरूप विशेष भासता है, अतः विशेष विषय नहीं भासता है, यह कहना * असङ्गत है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जहांपर तीरत्वमात्र विशेषणके तात्पर्यसे ‘गङ्गायां घोषः’ इस शब्दका प्रयोग किया, और उसी प्रकारका भ्रान्त पुरुषको तात्पर्यज्ञान हुआ, उस स्थलमें गङ्गातीरत्वप्रकारक बोध यद्यपि नहीं है, तथापि भ्रमकी निवृत्ति देखी जाती है, इसलिए व्यभिचार तदवस्थ ही है। तथा किसी भी कपालसे तुषोंका उपवाप करना चाहिए, इस प्रकार जिस पुरुषको भ्रम है उस पुरुषके प्रति कपालत्वमात्रविशेषणके तात्पर्यसे प्रयुक्त और उसी तात्पर्यसे गृहीत ‘पुरोडाशकपालेन तुषानुपवपति’ इस वाक्यसे कपालसे तुषका उपवाप करना
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