सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
अज्ञानके निवर्त्तकका निरूपण] भाषानुवादसहित ४९५
तस्याः स्वयंप्रकाशमानचित्संवलिताचिदंशमात्रविषयत्वात् । ‘सोऽहम्’ इति प्रत्यभिज्ञाया अपि स्वयम्प्रकाशचैतन्ये अन्तःकरणवैशिष्ट्येन सह पूर्वापरकालवैशिष्ट्यमात्रविषयत्वेन चैतन्यविषयत्वाभावादिति ।
केचिच्छ्रोतव्यनियमाद्दृष्टदोषक्षयान्वितम् ।
वाक्यजं ज्ञानमेवाहुर्मूलाज्ञाननिवर्हणम् ॥ ३१ ॥
कुछ लोग कहते हैं कि श्रोतव्यवाक्यनियमजन्य अदृष्टसे जन्य दोषके विनाशसे युक्त तत्त्वमस्यादि वाक्यजन्य ज्ञान ही मूलाज्ञानका विनाशक है ॥ ३१ ॥
केचित्तु घटादिवृत्तीनां तत्तदवच्छिन्नचैतन्यविषयत्वमभ्युपगम्य—
‘सर्वमानप्रसक्तौ च सर्वमानफलाश्रयात् ।
श्रोतव्येति वचः प्राह वेदान्तावरुरुत्सया ॥’
इति वार्त्तिकोक्तेः श्रोतव्यवाक्यार्थवेदान्तनियमविध्यनुसारेण वेदान्तजन्य-
वृत्ति स्वयंप्रकाशमान चित्संवलित अचिदंशमात्रका ही अवगाहन करती है, और ‘सोऽहम्’ (वही मैं हूँ) इस प्रकारकी प्रत्यभिज्ञा भी स्वयंप्रकाशमान चैतन्यमें अन्तःकरणके सम्बन्धके साथ पूर्वापरकालके सम्बन्धमात्रको विषय करती है, अतः वह भी चैतन्यविषयक नहीं है ।
कुछ † लोग घटादि वृत्तियोंमें तत्-तत् विषयोंसे अवच्छिन्न चैतन्य-विषयकत्वका अङ्गीकार करके ‡ ‘सर्वमानप्रसक्तौ च०’ (सभी प्रमाणोंके चैतन्यविषयक होनेसे ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति सम्पूर्ण प्रमाणोंकी कारणता प्रसक्त होनेसे वेदान्तोंकी नियमेच्छासे ‘श्रोतव्यः’ यह वाक्य ‘वेदान्तोंका ही विचार करना चाहिए’ ऐसा प्रतिपादन करता है) इस प्रकारकी वार्त्तिकोक्तिसे
† घटादिविषयक वृत्तियोंके चैतन्यविषयक होनेसे वेदान्तजन्य ज्ञानके समान उनसे भी मूलाज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त होगी, ऐसा पूर्वपक्ष करके उसके समाधानमें हेत्वसिद्धिप्रयुक्त अतिप्रसङ्ग पूर्वमें दिखलाया गया है, अब उन वृत्तियोंको यदि चैतन्यविषयक माना जाय, तो भी कोई हानि नहीं है, इस प्रकार ‘केचित्तु’ मत कहते हैं ।
‡ इसमें यदि शङ्का की जाय कि चैतन्यको चक्षु आदिसे जन्य वृत्तिका विषय यदि माना जाय, तो चैतन्यमें चक्षु आदि इन्द्रियोंसे जन्य वृत्ति विषयताका श्रुतियोंसे जो निषेध किया गया है, उनके साथ विरोध होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उन श्रुतियोंसे चक्षुरादिजन्य-वृत्तियोंमें निरुपाधिक चैतन्यविषयकत्वका निषेध किया गया है, इसलिए अवच्छिन्नचैतन्यको विषय माननेमें कोई विरोध नहीं है ।
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मेव नियमादृष्टसहितं ब्रह्मज्ञानमप्रतिबद्धं ब्रह्मज्ञाननिवर्तकमिति घटादिज्ञानान्न तन्निवृत्तिप्रसङ्ग इत्याहुः ।
अन्ये स्वरूपसम्बन्धाद्वैजात्याद्वाऽपि वाक्यजात् ।
अखण्डाकारकं ज्ञानमाचख्युस्तन्निवर्तकम् ॥ ३२ ॥
कुछ लोग कहते हैं कि वाक्यजन्य स्वरूपसम्बन्धविशेषरूप अथवा वैजात्यसे उपलक्षित अखण्डाकारक ज्ञान मूलाज्ञानका निवर्तक है ॥ ३२ ॥
अन्ये तु तत्त्वमस्यादिवाक्यजन्यं जीवब्रह्माभेदगोचरमेव ज्ञानं मूलाज्ञाननिवर्तकम्, मूलाज्ञानस्य तदभेदगोचरत्वादिति न चैतन्यस्वरूपमात्रगोचराद् घटादिज्ञानात् तन्निवृत्तिप्रसङ्गः । न चाऽभेदस्य तत्त्वावेदकप्रमाणबोध्यस्य चैतन्यातिरेके द्वैतापत्तेः 'चैतन्यमात्रमभेदः' इति तद्गोचरं घटा-
श्रोतव्य वाक्यके अर्थभूतवेदान्तनियम विधिके अनुसार वेदान्तजन्यनियमादृष्टसे युक्त अप्रतिबद्ध ब्रह्मज्ञान ही * ब्रह्मविषयक अज्ञानका निवर्तक है, इसलिए घटादि ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त नहीं है—यह कहते हैं ।
† और कुछ लोग कहते हैं कि 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यसे उत्पन्न जीव और ब्रह्मके अभेदको विषय करनेवाला ज्ञान ही मूलभूत अज्ञानका निवर्तक है, क्योंकि मूलाज्ञान जीव और ब्रह्मके अभेदको विषय करता है, इसलिए केवल चैतन्यस्वरूपको अवगाहन करनेवाले घटादिविषयक ज्ञानसे मूलाज्ञानकी निवृत्ति नहीं हो सकती है । यदि शङ्का हो कि तत्त्वावेदक प्रमाणसे बोध्य जीव और ब्रह्मका अभेद चैतन्यसे अतिरिक्त माना जाय, तो द्वैतकी प्रसक्ति होनेसे
* अर्थात् नियमादृष्टसे प्रतिबन्धकीभूत दुरितका विनाश होता है, इसलिए अप्रतिबद्ध ब्रह्मज्ञानका निवर्तक है, यह भाव है ।
† 'तत्त्वमस्यादिवाक्योत्थं ज्ञानं मोक्षस्य साधनम्' अर्थात् 'तत्त्वमसि' (वह तू है) इत्यादि महावाक्यजन्य ज्ञान मोक्षका साधन है, इत्यादि नारदजीके वचनके दर्शनसे और—
तत्त्वमस्यादिवाक्योत्थं यज्जीवपरमात्मनोः ।
तादात्म्यविषयं ज्ञानं तदिदं मुक्तिसाधनम् ॥
अर्थात् तत्त्वमस्यादिवाक्यसे होनेवाला जो जीव और परमात्माका तादात्म्यविषयक विज्ञान है, वही मुक्तिका साधन है, इत्यादि भगवत्पादके वचनके दर्शनसे और मूलाज्ञान जीव और ब्रह्मके अभेदको ही आवृत करता है, इससे जीव और ब्रह्मका ऐक्यलक्षणतादात्म्यविषयक जो विज्ञान है, वही मुक्तिका साधन है, अतः पूर्वोक्त अतिप्रसङ्ग नहीं है, इस अभिप्रायसे यह मत है ।
अज्ञानके निवर्तकका निरूपण ] भाषानुवादसहित ४९७
दिज्ञानमप्यभेदगोचरमिति वाच्यम्। नह्यभेदज्ञानमिति विषयतो विशेषं ब्रूमः, किन्तु तत्त्वंपदवाच्यार्थधर्मिद्वयपरामर्शादिरूपकारणविशेषाधीनेन
केवल चैतन्य ही अभेद होगा, अतः परमार्थ वस्तुका अवगाहन करनेवाला घटादिविषयक ज्ञान भी ‡ अभेदविषयक है, इससे घटादि ज्ञानसे भी मूलाज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जीव-ब्रह्माभेदविषयक ज्ञानकी विषयप्रयुक्त विशेषता नहीं है ×। किन्तु तत् और
‡ अर्थात् अभेद और चैतन्यके एक होनेसे घटज्ञान यदि चैतन्यविषयक हुआ, तो जीव और ब्रह्मका अभेदविषयक भी हुआ, इसलिए अभेदावगाही घटके ज्ञानसे भी अज्ञानकी निवृत्ति हो सकती है, यह प्रश्नका आशय है।
× घटादिज्ञानमें विषयरूपसे चैतन्य भासता है, अभेद नहीं भासता है और महावाक्यजन्य ज्ञानमें तो जीव और ब्रह्मका अभेद भासता है। इस प्रकार घटादिज्ञानकी अपेक्षासे महावाक्यजन्य ज्ञानकी विषयप्रयुक्त विशेषता नहीं है, जिससे कि उक्त अतिप्रसङ्ग हो, क्योंकि अभेद और चैतन्यके एक होनेसे घट आदि ज्ञानमें यदि चैतन्य विषय हुआ, तो अभेद भी विषय हुआ ही, अन्यथा द्वैतापत्ति होगी। यदि शङ्का हो कि ‘इदं रजतम्’ इस भ्रममें जितना अधिष्ठानांश भासता है, उसकी अपेक्षासे अधिक शुक्तित्व आदि विशेषको विषय करनेवाले शुक्त्यादिविषयक ज्ञानमें ही रजतादिभ्रमकी विरोधिता देखी जाती है, इसलिए ‘सन् घटः’ ‘स्फुरति घटः’ इत्यादि भ्रमोंमें जितना, अधिष्ठानभूत चैतन्य विषय है उसकी अपेक्षा अधिक अभेदको विषय करनेवाला वाक्यजन्य ज्ञान न माना जाय, तो उसमें भ्रमनिवर्तकत्व हो ही न सकेगा, इसलिए विषयप्रयुक्त भेद अवश्य मानना चाहिए, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि भ्रमसे अधिकविषयक ज्ञान ही अज्ञानके निवर्तक हैं, ऐसा नियम नहीं है, क्योंकि ऐसे अनेक स्थल देखे जाते हैं, जो भ्रमसे अधिकविषयक यद्यपि नहीं हैं, तथापि भ्रमके निवर्तक हैं, जैसे कि वस्तुतः घोषका आधारभूत ही गङ्गाका तीर है, तथापि किसीको उसमें तटाकतीरत्वके भ्रमसे ‘तटाक्तीरे घोषः’ ऐसा भ्रम होता है, उस पुरुषके प्रति ‘गङ्गायां घोषः’ इस प्रकारके वाक्यप्रयोगके होनेपर उसको ‘गङ्गातीरे घोषः’ इस प्रकारका ज्ञान होता है और तटाकतीरत्वका भ्रम भी निवृत्त होता है। इसमें भ्रमविषयकी अपेक्षा वाक्यजन्यज्ञानमें कोई अधिक विषय नहीं भासता है। यदि शङ्का हो कि वाक्यजन्य ज्ञानमें तटाकतीरत्वकी व्यावृत्ति करनेवाला गङ्गातीरत्वरूप विशेष भासता है, अतः विशेष विषय नहीं भासता है, यह कहना * असङ्गत है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जहांपर तीरत्वमात्र विशेषणके तात्पर्यसे ‘गङ्गायां घोषः’ इस शब्दका प्रयोग किया, और उसी प्रकारका भ्रान्त पुरुषको तात्पर्यज्ञान हुआ, उस स्थलमें गङ्गातीरत्वप्रकारक बोध यद्यपि नहीं है, तथापि भ्रमकी निवृत्ति देखी जाती है, इसलिए व्यभिचार तदवस्थ ही है। तथा किसी भी कपालसे तुषोंका उपवाप करना चाहिए, इस प्रकार जिस पुरुषको भ्रम है उस पुरुषके प्रति कपालत्वमात्रविशेषणके तात्पर्यसे प्रयुक्त और उसी तात्पर्यसे गृहीत ‘पुरोडाशकपालेन तुषानुपवपति’ इस वाक्यसे कपालसे तुषका उपवाप करना
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४९८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ तृतीय परिच्छेद
स्वरूपसंबन्धविशेषेण चैतन्यविषयत्वमेव तदभेदज्ञानत्वम् । यथा हि
त्वं पदके वाक्यार्थभूत जो जीव और ईश्वर दो धर्मी हैं, उनके परामर्श आदि कारणविशेषके अधीन स्वरूपसम्बन्धविशेषसे चैतन्यविषयकता ही
चाहिए, ऐसा ही उस पुरुषको बोध होता है। इसमें कपालांशमें कपालान्तरव्यावर्त्तकविशेषके गृहीत न होनेपर भी पुरोडाशकपालसे अतिरिक्त कपालोंमें तुषोपवापसाधनत्वकी निवृत्ति देखी जाती है, इसलिए अमाधिकविषयक ज्ञानमें भ्रमनिवर्तकत्व नियम यदि माना जाय, तो इस स्थलमें भी व्यभिचार हो सकता है। इससे 'तीरे घोषः' ( तीरमें घोष है ) इस शाब्दबोधमें गङ्गातीरत्वरूप विशेषविषयत्वके न होनेपर भी उसके हेतुभूत पदार्थोपस्थितिके समयमें गङ्गा-सम्बन्धित्वरूपसे तीरकी उपस्थिति रहनेके कारण उपस्थितिकी सामर्थ्यसे वस्तुतः गङ्गातीर-विषयक ज्ञान जो कि अमाधिकविषयक नहीं है, वह भ्रमका निवर्तक है, ऐसा कहना होगा। इसी प्रकार 'कपालसे तुषोंका उपवाप करना चाहिए' इत्यादि शाब्दबोधके स्वतः कपालान्तरकी व्यावृत्ति करनेवाले विशेषविषयक न होनेपर भी उक्त शाब्दबोधके हेतुभूत पदार्थकी उपस्थिति-कालमें पुरोडाशकी सम्बन्धितारूपसे कपालकी उपस्थिति होनेसे उपस्थितिकी सामर्थ्यसे उसके अमाधिकविषयक न होनेपर भी भ्रमनिवर्तकत्वका अङ्गीकार करना होगा, इस परिस्थितिमें ज्ञानकी भ्रमविरोधितामें सामग्रीविशेषाधीनत्व ही प्रयोजक मानना होगा, अमाधिकविषयत्व नहीं, क्योंकि उक्त स्थलमें व्यभिचार है। किञ्च, महावाक्यजन्य जो ज्ञान है, उसमें संसारके मूलभूत अज्ञानकी विरोधिता श्रुति, स्मृति और अनुभवसे सिद्ध है, महावाक्योंसे चैतन्यस्वरूप मात्रका बोध होता है, इसका द्वितीय परिच्छेदमें साधन किया जा चुका है और अन्य निबन्धोंमें विस्तार भी किया गया है, इसलिए जैसे शुक्तिरजतादिस्थलमें भ्रमविरोधी अमाधिकविषयक शुक्तिज्ञानादिमें अमाधिकविषयता है, वैसे ही दोषाभाव आदिसे घटित सामग्रीविशेषाधीनत्वसे, अखण्डार्थक वेदान्तके अनुसारसे और पूर्वके उदाहृत व्यभिचार-स्थलोंके अनुरोधसे भी ज्ञानकी भ्रमविरोधितामें सामग्रीविशेषाधीनत्व को ही अनुगत प्रयोजक कहना होगा, अमाधिकविषयत्वका अङ्गीकार करके अमाधिकविषयकत्वसे रहित महावाक्यार्थ ज्ञान भ्रमनिवर्तक नहीं हो सकता है, इसी अभिप्रायसे 'किन्तु' इत्यादि ग्रन्थ है, तात्पर्य यह है कि 'तत्' और त्वम् शब्दके वाच्यभूत जो ईश्वर और जीव दो धर्मी हैं, उन दो धर्मियोंका पहले 'तत्' और 'त्वम्' शब्दसे शक्तिवृत्तिसे स्मृतिरूप परामर्श होता है, उसके बाद तत् और त्वम्पदके सामानाधिकरण्यसे जीव ईश्वरसे अभिन्न है, इस प्रकार उनकी (जीव और ईश्वरकी) विशेषण और विशेष्यभावसे अवगति होती है, अनन्तर 'तत्' और 'त्वम्' पदसे वाच्य अर्थभूत जो विशिष्ट हैं उनमें से विशेष्यरूप अभेदके योग्य जो चैतन्य हैं। उनकी लक्षणासे प्रतीति होती है, इसके बाद दोनों विशेष्यके अभेदको विषय करनेवाले शाब्दबोधका उदय होता है। इस क्रमसे होनेवाला महावाक्यजन्य ज्ञानका अपने विषयके साथ जो स्वरूप-सम्बन्ध है, उस सम्बन्धसे चैतन्यविषयत्व ही घटादिज्ञानव्यावृत्त वाक्यजन्य जीव और ब्रह्मका अभेदज्ञान है, इसके बलसे वह अभेदज्ञान मूलाज्ञान और. मिथ्याज्ञानका विरोधी होता है।
अज्ञानके निवर्तकका निरूपण ] भाषानुवादसहित ४९९
विशेषणविशेष्यतत्सम्बन्धगोचरत्वाविशेषेऽपि विशिष्टज्ञानस्य विशेषणज्ञानादिकारणविशेषाधीनस्वरूपसम्बन्धविशेषेण तत्रितयगोचरत्वमेव समूहालम्बनव्यावृत्तं विशिष्टज्ञानत्वम्, यथा वा 'स्थाणुत्वपुरुषत्ववान्' इति आहार्यवृत्त्यावृत्तं संशयत्वं विषयतो विशेषाानिरूपणात्, तथा घटादावपि 'सोऽयं घटः' इत्यादिज्ञानस्य स्वरूपसम्बन्धविशेषेण घटादिविषयत्वमेव
वाक्यजन्य जीवब्रह्माभेदविषयक ज्ञानत्व है, क्योंकि * जैसे विशेषण, विशेष्य और उनके संसर्गविषयताकी बराबरी होनेपर भी विशेषणज्ञान आदि कारणविशेषके अधीन स्वरूपसम्बन्धविशेषसे उक्त त्रितयविषयता ही समूहालम्बनव्यावृत्त विशिष्टज्ञानत्व है अथवा जैसे 'स्थाणुत्वपुरुषत्ववान्' इस प्रकार आहार्यवृत्तिसे व्यावृत्त † संशयत्व है, क्योंकि विशिष्टज्ञानमें और 'स्थाणुर्वा पुरुषो वा' इस प्रकारके संशयात्मक ज्ञानमें विषयतः विशेषका निरूपण नहीं हो सकता है, वैसे ‡ घटादिस्थलमें भी 'सोऽयं घटः' ( वही यह घट है) इत्यादि ज्ञानमें
* महावाक्यजन्य ज्ञानके घटादिज्ञानकी अपेक्षासे चैतन्य अंशमें विषयप्रयुक्त विशेषके न होनेपर भी सामग्रीविशेषसे घटादिज्ञानकी अपेक्षा वैलक्षण्य है, उसका इस ग्रन्थसे स्पष्टीकरण करते हैं, 'दण्डी पुरुषः' ( दण्डवान् पुरुष है ) इस प्रकारके विशिष्ट ज्ञानमें तीन विषय हैं, इसी प्रकार 'दण्डपुरुषसंयोगाः' इस प्रकारके समूहालम्बन ज्ञानमें भी ये तीन विषय हैं, इसलिए उक्त विशिष्ट ज्ञान और समूहालम्बनात्मक ज्ञानका परस्पर विषय भेद नहीं कर सकते हैं। क्योकि विषय तो समान हैं, इसलिए विशेषण, विशेष्य और संसर्गके ज्ञान आदि कारण विशेषके अधीन स्वरूपसम्बन्धविशेषसे विशेषणादित्रयविषयकत्व ही समूहालम्बनज्ञानव्यावृत्त विशिष्टज्ञानत्व है, इस प्रकार सामग्रीविशेषसे उक्त विशिष्टज्ञान और समूहालम्बनात्मक ज्ञानमें वैलक्षण्य मानना होगा, इसी प्रकार तत्त्वमस्यादि वाक्यजन्य ज्ञानमें भी सामग्रीप्रयुक्त ही वैलक्षण्य है, यह भाव है ।
† 'स्थाणुत्वविरुद्धपुरुषत्ववान्' ( स्थाणुत्वसे विरुद्ध जो पुरुषत्व, तद्वान् ) इस प्रकारका निश्चय संशयसमानविषयक आहार्यवृत्तिरूप कहलाता है, इससे व्यावृत्त संशयत्व भी विषयप्रयुक्त नहीं है, किन्तु सामग्रीविशेषप्रयुक्त है, क्योंकि विषयकृत भेद तो आहार्यवृत्तिसे संशयमें नहीं आ सकता है, क्योंकि विषय समान है, यह भाव है ।
‡ उक्त प्रकारकी व्यवस्था केवल 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यजन्य ज्ञानके अभेद ज्ञानत्वमें ही नहीं है, किन्तु 'सोऽयं घटः' 'सोऽयं देवदत्तः' ( यही यह घट है और वही यह देवदत्त है ) इत्यादि वाक्यजन्य ज्ञानके केवल घटशब्द और देवदत्तशब्दसे होनेवाले ज्ञानसे व्यावृत्त अभेद-
५०० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [तृतीय परिच्छेद]
केवलघटशब्दादिजन्यज्ञानव्यावृत्तं तदभेदज्ञानत्वम् । अतिरिक्ताभेदानि- रूपणात् । अभावसादृश्यादीनामधिकरणप्रतियोग्यादिभिः स्वरूपसम्बन्ध- युक्तानामधिकरणेनाऽऽधाराधेयभावरूपः स्वरूपसम्बन्धविशेषः प्रतियोगिना प्रतियोग्यनुयोगिभावरूप इत्यादिप्रकारेण स्वरूपसम्बन्धे अवान्तरविशेष- कल्पनावद् वृत्तीनां विषयेऽपि संयोगतादात्म्ययोरतिप्रसक्त्या विषयैर्विषय-
स्वरूपसम्बन्धविशेषसे घटादिविषयकत्व ही केवल घटशब्द आदिसे होनेवाले ज्ञानसे भिन्न घटाभेदविषयक ज्ञानत्व है, क्योंकि अतिरिक्त अभेदका निरूपण नहीं हो सकता है । और × अभाव एवं सादृश्य आदिका, जो कि अधिकरण और प्रतियोगी आदिके साथ स्वरूपसम्बन्धसे युक्त हैं, अधिकरणके साथ आधाराधेयभावरूप स्वरूपसम्बन्धविशेष है और प्रतियोगीके साथ प्रतियोग्यनुयोगिभावरूप स्वरूपसम्बन्धविशेष है, इस प्रकारसे जैसे स्वरूपसम्बन्धमें अवान्तर भेदोंकी कल्पना की जाती है, वैसे ही वृत्तियोंके विषयीभूत निर्विशेष-चैतन्यमें भी संयोग ❊ और तादात्म्यसंसर्गकी अतिप्रसक्ति होनेके कारण
ज्ञानत्वमें भी वही व्यवस्था है, इसे इस ग्रन्थसे कहते हैं । तात्पर्य यह है केवल घट आदि शब्दसे जन्य ज्ञानके विषयभूत घट आदिके स्वरूपकी अपेक्षा 'सोऽयं घटः' इत्यादि वाक्यसे बोधित अभेद अतिरिक्त नहीं है, क्योंकि भिन्न माननेमें प्रमाण नहीं है, इसलिए 'घटः' और 'सोऽयं घटः' इनमें विषयप्रयुक्त वैलक्षण्यके न होनेसे 'सोऽयं घटः' इत्यादि स्थलमें भी 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्यके समान 'सः' और 'अयम्' इन दो पदोंके वाक्यार्थरूप दो धर्मोंके परामर्श आदि कारणविशेषके अधीन स्वरूपसम्बन्ध विशेषसे घटादिस्वरूपविषयकत्व ही घटाद्यभेद-ज्ञानत्व होगा, दूसरा नहीं, इसीका सर्वत्र अनुसरण करना चाहिए ।
× प्रकृतमें वक्तव्य यह है कि केवल घटादिशब्दजन्य ज्ञानका भी विषयके साथ स्वरूप सम्बन्ध ही है, इस अवस्था में स्वरूप सम्बन्धको लेकर अभेद ज्ञानत्वादिकी व्यवस्था कैसे कर सकते हैं। यदि इसमें शङ्का हो कि वृत्त्यात्मक ज्ञानोंका विषयोंके साथ विषयविषयिभाव प्रयोजक स्वरूपसम्बन्धोंके साधारण होनेपर भी उनमें विषय और उनके ज्ञानके स्वरूपात्मक सम्बन्धोंमें सामग्रीविशेषके प्रभावसे परस्पर वैलक्षण्यकी कल्पनासे व्यवस्थाकी उपपत्ति कर सकते हैं, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि स्वरूपसम्बन्धोंका कहींपर भी वैलक्षण्य देखनेमें नहीं आता है, इसलिए वैसी कल्पना नहीं कर सकते हैं, इसपर 'अभाव सादृश्यं' इत्यादि ग्रन्थसे स्वरूपसंसर्गोंके भेदका उपपादन करते हैं ।
❊ तात्पर्य यह है कि यहाँ किसीको शङ्का हो कि वृत्तियोंका विषयके साथ विषयविषयिभाव स्वरूपसम्बन्धप्रयुक्त नहीं है, किन्तु संयोगादिप्रयुक्त है, अतः वृत्तियोंका विषयोंके साथ स्वरूपसम्बन्धके असिद्ध होनेसे उन सम्बन्धोंमें वैलक्षण्यात्मक विषयकी कल्पना अयुक्त है,
अज्ञानके निवर्तकका निरूपण ] भाषानुवादसहित ५०१
विषयिभावरूपस्वरूपसम्बन्धवतीनां विषयविशेषनिरूपणासम्भवे क्लृप्ते एव स्वरूपसम्बन्धे अवान्तरविशेषकल्पनेनाभेदज्ञानत्वादिपरस्परवैलक्षण्यनिर्वाहाच्च । एवं च ब्रह्मज्ञानस्याभेदाख्यकिञ्चित्संसर्गगोचरत्वानभ्युपगमान् न वेदान्तानामखण्डार्थत्वहानिरपीत्याहुः ।
ननु स्वहेतुमज्ञानं विरोधात्सा कथं हरेत् ।
वृत्तिर्नैवं विरुद्धत्वाद्वह्निसंयोगवत् पटे ॥ ३३ ॥
अत्र शङ्का होती है कि ब्रह्मज्ञानसे, जिसका उपादान अज्ञान है, विरोध होनेसे अविद्याका विनाश कैसे हो सकता है, क्योंकि कार्यका उपादानके साथ विरोध नहीं हो सकता है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि ब्रह्माकार अखण्ड वृत्तिके साथ अज्ञानका पटमें वह्निसंयोगके समान विरोध है, अतः ज्ञानसे अज्ञानका विनाश हो सकता है ॥ ३३ ॥
ननु घटादिज्ञानवद् ब्रह्मज्ञानस्यापि न मूलाज्ञाननिवर्तकत्वं युक्तम् ,
विषयविशेषका निरूपण न होनेसे परिशेषसे विषयोंके साथ विषयविषयिभावरूप स्वरूपसम्बन्धसे युक्त उन वृत्तियोंके † क्लृप्त स्वरूपसम्बन्धके अवान्तर विशेषकी कल्पनासे अभेदज्ञानत्व आदि परस्परविलक्षणत्वकी भी कल्पना कर सकते हैं । एवञ्च, ‡ ब्रह्मज्ञानकी अभेदरूप किसी संसर्गविषयताका स्वीकार न होनेसे वेदान्तोंकी अखण्डार्थताकी हानि भी नहीं है ।
यदि शङ्का हो कि जैसे घट आदिका ज्ञान मूलभूत अज्ञानका निवर्तक नहीं है, वैसे ब्रह्मज्ञान भी मूलभूत अज्ञानका निवर्तक नहीं हो सकता है, क्योंकि
तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि यदि वृत्तिका संयोग वृत्तिविषयत्वमें प्रयोजक माना जायगा, तो चक्षुके गोलक आदिका भी घटादिवृत्तिके साथ संयोग होनेसे उसमें वृत्तिविषयत्वकी प्रसक्ति होगी, यदि वृत्तिके तादात्म्यको वृत्तिविषयत्वमें प्रयोजक मानें, तो वृत्तिके अधिष्ठानत्वरूपसे वृत्तिके साथ तादात्म्यापन्न घटाद्यवच्छिन्न चैतन्यमें घटाद्याकारवृत्तिविषयत्वका सम्भव होनेपर भी वृत्तितादात्म्यसे रहित घट आदिमें वृत्तिविषयत्वकी प्रसक्ति न होगी, और वृत्तिके परिणामी अन्तःकरणमें घटादिवृत्तिविषयत्वका प्रसङ्ग होगा, क्योंकि परिणाम और परिणामीका परस्पर तादात्म्य होता है ।
† स्वरूपसम्बन्ध वृत्ति आदिका स्वरूप है, इसलिए वह क्लृप्त है, अतः क्लृप्त सम्बन्धके विशेषकी कल्पनामें लाघव है, अन्य सम्बन्धकी कल्पना करके उसमें—सम्बन्धान्तरमें अभेद ज्ञानत्वादिका निर्वाहकविशेष माना जाय, तो गौरवमात्र है, इसलिए वृत्तियोंका विषयोंके साथ स्वरूपसम्बन्ध ही है, संयोग, तादात्म्यादि नहीं है ।
‡ अर्थात् महावाक्यजन्य ज्ञानमें रहनेवाले अभेदज्ञानत्वका प्रकारान्तरसे उपपादन किया गया है, अतः अभेदसंसर्गभानकी अपेक्षा नहीं है, यह भाव है ।
५०२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद
निवर्तकत्वे तदवस्थानासहिष्णुत्वरूपस्य विरोधस्य तन्त्रत्वात्, कार्यस्य चोपादानेन सह तादृशविरोधाभावादिति चेत्, न; कार्यकारणयोरन्यत्र तादृशविरोधादर्शनेऽपि एकविषयज्ञानाज्ञानप्रयुक्तस्य तादृशविरोधस्याऽत्र सत्त्वात्, कार्यकारणयोरप्यग्निसंयोगपटयोस्तादृशविरोधस्य दृष्टेश्च। न चाऽग्निसंयोगादवयवविभागप्रक्रियया असमवायिकारणसंयोगनाशादेव पटनाशः, नाऽग्निसंयोगादिति वाच्यम्, दग्धपटेऽपि पूर्वसंस्थानानुवृत्तिदर्शनेन मुद्गरचूर्णीकृतघटवद् अवयवविभागादर्शनात्। तत्राऽवयवविभागादिकल्पनाया अप्रामाणिकत्वात्। नाऽपि तत्र तन्तूनामपि दाहेन समवायिकारण-
निवर्तकत्वमें तदवस्थानासहिष्णुत्वरूप $\times$ विरोध कारण है और कार्यका अपने उपादानके साथ उक्त विरोध नहीं देखा जाता है, तो यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि कार्य और कारणका अन्य स्थलमें यद्यपि उक्त विरोध नहीं देखा जाता है, तथापि प्रकृतमें समानविषयक ज्ञान और अज्ञानप्रयुक्त उक्त विरोध विद्यमान है, और कार्यकारणात्मक अग्निसंयोग और पटमें उक्त विरोध देखा जाता है। यदि इसमें शङ्का हो कि अग्निके संयोगसे होनेवाले अवयवविभागकी प्रक्रिया द्वारा * असमवायिकारणभूत तन्तुसंयोगके नाशसे ही पटका नाश होता है, अग्निके संयोगके नाशसे नहीं होता, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि दग्ध वस्त्रमें भी पूर्वकी संयुक्तावस्थाकी अनुवृत्ति होनेसे जैसे मुद्गरसे चूर्णित घटमें अवयवोंका विभाग देखा जाता है, वैसे ही पटके दग्ध होनेके पश्चात् दग्ध तन्तुओंमें अवयवविभागके दृष्ट न होनेसे पटके दाहस्थलमें अवयवविभागकी कल्पना अप्रामाणिक है। और उक्त स्थलमें यह भी नहीं कह सकते हैं कि तन्तुओंका भी दाहसे अर्थात् अपने समवायिकारणका नाश होनेके कारण पट-
$\times$ निवर्त्य और निवर्तकका सहावस्थान अपेक्षित नहीं होता है, क्योंकि वे ही पदार्थ विरोधी होते हैं, जो सहावस्थानको सहन नहीं करते हैं, प्रकृतमें ब्रह्मज्ञान और मूलाज्ञानका तत्त्वशब्दसे निवर्त्य सहावस्थानासहिष्णुत्वलक्षण विरोध न होनेसे निवर्त्यनिवर्तकभाव नहीं हो सकता है, यह भाव है।
* अग्निके संयोगसे तन्तुमें क्रिया, उसके बाद तन्तुओंमें विभाग, उसके बाद पटके प्रति असमवायिकारणभूत तन्तुसंयोगका नाश, अनन्तर पटका विनाश, इस प्रकारकी वैशेषिक प्रक्रिया द्वारा, यह भाव है।
ब्रह्मज्ञानके नाशकका विचार ] भाषाानुवादसहित ५०३
नाशात् पटनाश इति युक्तम्। अंशुतन्त्वादिभिस्सह युगपदेव पटस्य दाहदर्शनेन क्रमकल्पनायोगात्। यतोऽधस्तान्नावयवनाशः, तत्राऽवयवे अग्निसंयोगादेव नाशस्य वाच्यत्वात् ॥ ११ ॥
नन्वस्त्वेतदेवम्, तथाऽपि सविलासाज्ञाननाशकमिदं ब्रह्मज्ञानं कथं नश्येद्, नाशकान्तरस्याऽभावादिति चेद्,
हत्वा मोहं विनश्येत् सा कतकाम्बुविन्दुवद्वहयः।
पङ्कवाह्नितृणानीव चास्तप्तायसभूमिषु ॥ ३४ ॥
अज्ञानका विनाश करके ब्रह्माकार वृत्ति भी उसी प्रकार स्वयं नष्ट हो जाती है, जैसे कि जलमें प्रक्षिप्त निर्मली जलके मलिन भागको अलग कर स्वयं अलग हो जाती है तप्तलोहापिण्डके ऊपर गिरे हुए जलके बिन्दु अग्निको शान्तकर स्वयं शान्त हो जाते हैं और अग्नि भूमिके तृणोंको नष्ट करके स्वयं नष्ट हो जाती है ॥ ३४ ॥
यथा कतकरजः सलिलेन संयुज्य पूर्वयुक्तरजोऽन्तरविश्लेषं जनयत्
नाश हुआ है, क्योंकि अंशु और तन्तु आदिके साथ एक ही समयमें पटनाशके देखे जानेसे क्रमकी कल्पना अयुक्त है, और † जिस द्व्यणुकावयव परमाणुका नाश नहीं होता है, उस अवयवका अग्निसंयोगसे ही नाश मानना होगा ॥ ११ ॥
अब शङ्का करते हैं कि उक्त प्रकारसे यद्यपि ब्रह्मज्ञान ही अन्तःकरण द्वारा अपने उपादानभूत अज्ञानका नाशक भले ही हो, तथापि अपने विलास सहित अज्ञानका विनाशक ब्रह्मज्ञान कैसे नष्ट होगा ? क्योंकि ब्रह्मज्ञानके सिवा अन्य कोई नाशक नहीं है।
इस * प्रकारकी शङ्काके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि जैसे कतकरज जलके साथ सम्बन्ध पाकर अपने संयोगसे पूर्व जलके साथ सम्पृक्त अन्य
† तात्पर्य यह है कि द्व्यणुकनाशके प्रति परमाणुनाश प्रयोजक नहीं हो सकता है, क्योंकि परमाणु नित्य है, इसलिए द्व्यणुकमें विद्यमान अग्निके संयोगसे ही द्व्यणुकका विनाश मानना होगा। अवयवविभागकी प्रक्रियाका अवलम्बन करके प्रकृतमें समाधान नहीं हो सकता है, क्योंकि अवयवविभागकी प्रक्रियाका पहले निरास किया जा चुका है। इसलिए अग्निसंयोगमें अपने उपादानभूत पटकी नाशकता भ्रान्त नहीं है।
* समाधानका तात्पर्य यह है कि ब्रह्मज्ञानसे व्यतिरिक्त समस्त पदार्थका ब्रह्मज्ञानसे नाश होगा, पीछे अवशिष्ट ब्रह्मज्ञानका नाश होगा, इस प्रकार क्रम नहीं माना जाता है, किन्तु ब्रह्मज्ञानसे जब अपने विलासके सहित अविद्याका विनाश प्रसक्त होगा उसीके साथ साथ ब्रह्मज्ञानका भी नाश होगा अपने नाशके प्रति ब्रह्मज्ञान भी कारण माना जाता है। यह भी
| ५०४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
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स्वविश्लेषमपि जनयति, तथाऽऽत्मन्यध्यस्यमानं ब्रह्मज्ञानं पूर्वाध्यस्तसर्वप्रपञ्चं निवर्तयत् स्वात्मानमपि निवर्तयतीति केचित् ।
अन्ये तु अन्यन्निवर्त्य स्वयमपि निवृत्तौ दग्धलोहपीताम्बुन्यायमुदाहरन्ति ।
अपरे त्वत्र दग्धतृणकूटदहनोदाहरणमाहुः । न च ध्वंसस्य प्रतियोग्यतिरिक्तजन्यत्वनियमः, अप्रयोजकत्वात् । निरिन्धनदहनादिध्वंसे व्यभिचाराच्च । न च ध्वंसस्य प्रतियोगिमात्रजन्यत्वेऽतिप्रसङ्गात् कारणा-
रजका पृथक्करण करके अपने विश्लेषको भी उत्पन्न करता है, वैसे ही आत्मामें अध्यस्त ब्रह्मज्ञान पूर्वके अध्यस्त समस्त प्रपञ्चकी निवृत्ति करके अपने आपकी भी निवृत्ति करता है।
कुछ लोग तो इस विषयमें अन्यकी निवृत्ति करके अपनी निवृत्तिमें दग्धलोहपीताम्बुन्यायको † दृष्टान्तरूपसे देते हैं ।
अन्य कुछ लोग दग्धतृणकूटदहनको * दृष्टान्तरूपसे कहते हैं । यदि शङ्का हो कि ध्वंस प्रतियोगीसे भिन्न कारणसे उत्पन्न होता है, यह नियम है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त नियमके अङ्गीकारमें कोई प्रमाण नहीं है, और इन्धनशून्य अग्नि आदिके ध्वंसमें व्यभिचार भी है । (तात्पर्य यह है इन्धनोंका निःशेष ध्वंस होनेके पश्चात् अग्निका स्वतः ही नाश देखा जाता है, एवं सुषुप्तिके अव्यवहित पूर्वकालमें जो ज्ञानका विनाश होता है, वह भी प्रतियोगिमात्रसे होता है, अतः उक्त नियममें व्यभिचार दोष है, अतः प्रयोजकशून्य निरर्थक नियमका अङ्गीकार नहीं करना चाहिए) । यदि शङ्का हो कि
शङ्का नहीं हो सकती है कि एक वस्तु अपने और दूसरेके नाशके प्रति कारण कैसे हो सकती है, क्योंकि कतकरजमें (निर्मली जिससे मलिन जल साफ होता है) स्व और परकी विरोधिता देखी जाती है, अतः यह पूर्वपक्ष युक्त नहीं है कि सब प्रपञ्चका ब्रह्मज्ञानसे भले ही नाश हो परन्तु ब्रह्मज्ञानका नाश नहीं होगा, क्योंकि अन्य नाशक नहीं है, क्योंकि ब्रह्मज्ञानका ब्रह्मज्ञानसे ही नाश उक्त रीतिसे हो सकता है ।
† 'दग्धलोहपीताम्बुन्याय' यह न्याय इस प्रकारका है कि जैसे अग्निसे तपे हुए लोहेके गोलेमें पानी यदि फेंका जाय, तो उस जलका लोहेमें रहनेवाला अग्नि नाश करता है और स्वयं भी नष्ट हो जाता है, वैसे ही प्रकृतमें ब्रह्मज्ञान भी अपनेसे व्यतिरिक्त सम्पूर्ण प्रपञ्चका विनाश करता है और स्वयं भी नष्ट हो जाता है ।
* जैसे अग्नि तृणके समुदायको नष्ट करती है, और स्वयं भी नष्ट हो जाती है, वैसे ही ब्रह्मज्ञान सम्पूर्ण प्रपञ्चका विनाश करके स्वयं भी नष्ट हो जाता है, यह तात्पर्य है ।
ब्रह्मज्ञानके नाशकका विचार ] भाषानुवादसहित ५०५
न्तरमवश्यं वाच्यम्, निरिन्धनदहनादिध्वंसेऽपि कालादृष्टेश्वरेच्छादिकार- णान्तरमस्तीति वाच्यम्, अतिप्रसङ्गापरिज्ञानात् । न च घटादिध्वंस- स्यापि कारणान्तरनिरपेक्षत्वं स्यादित्यतिप्रसङ्गः, ध्वंसमात्रे कारणान्तर- नैरपेक्ष्यानभिधानात् । न च घटध्वंसदृष्टान्तेन ब्रह्मज्ञानध्वंसस्य कारणान्तरा- पेक्षासाधनम्, तद्दृष्टान्तेन मुद्गरपतनापेक्षाया अपि साधनापत्तेः । नापि ज्ञानध्वंसत्वसाम्याद् घटज्ञानादिध्वंसस्यापि कारणान्तरनैरपेक्ष्यं स्यादित्य- तिप्रसङ्गः, सेन्धनानलध्वंसस्य जलसेकाद्यदृष्टकारणापेक्षत्वेऽपि निरि- न्धनानलध्वंसस्य तदनपेक्षत्ववद्, जाग्रज्ज्ञानध्वंसस्य विरोधिविशेषगुणा-
ध्वंसको केवल प्रतियोगिजन्य माना जायगा, तो अतिप्रसङ्ग होगा, इसलिए उसके प्रति अवश्य कारणान्तर भी मानना चाहिए, और निरिन्धन दहन आदिके ध्वंसमें भी काल, अदृष्ट, ईश्वर आदि अन्य कारण हैं ही, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अतिप्रसङ्गोंका † परिज्ञान हो ही नहीं सकता है । यदि कहें कि घट आदिके ध्वंसको भी कारणान्तरनिरपेक्षत्व प्रसक्त होगा, यही अतिप्रसङ्ग है, तो यह भी अयुक्त है, क्योंकि हम सम्पूर्ण ध्वंसके प्रति कारणान्तरकी निरपेक्षता नहीं कहते हैं, और यदि घटध्वंसके दृष्टान्तसे ब्रह्मज्ञानध्वंसको कारणान्तरकी अपेक्षा मानें, तो उसी घटध्वंसके दृष्टान्तसे मुद्गरपातकी अपेक्षाका भी साधन प्रसक्त होगा । और ज्ञानध्वंसत्वके दृष्टान्तसे घटज्ञानध्वंसके प्रति भी अन्य कारणकी निरपेक्षता प्रसक्त होगी, इस प्रकार भी अतिप्रसङ्ग नहीं दे सकते हैं, क्योंकि जैसे इन्धनसे युक्त वह्निके ध्वंसके प्रति जलसिञ्चन आदि अन्य कारणकी अपेक्षा होनेपर भी इन्धनरहित अग्निध्वंसके प्रति कारणान्तरकी आवश्यकता नहीं होती है और जैसे जाग्रत्कालीन ज्ञानध्वंसोंके प्रति विरोधी अन्य विशेष
† यदि कोई शङ्का करे कि अतिप्रसङ्गोंका परिज्ञान क्यों नहीं होता है, तो इसपर कहना चाहिये कि ब्रह्मज्ञानका ध्वंस यदि प्रतियोगीसे अतिरिक्त कारणसे जन्य न हो, तो घटादिध्वंस भी, प्रतियोगीसे अतिरिक्त कारणसापेक्ष नहीं होगा, इस प्रकारका अतिप्रसङ्ग है अथवा घटादिध्वंसके समान ब्रह्मज्ञानका ध्वंस भी प्रतियोगीसे अतिरिक्त कारणसे सापेक्ष होगा, यह अतिप्रसङ्ग है अथवा ब्रह्मज्ञानके ध्वंसके समान घटादिज्ञानका ध्वंस भी कारणान्तरसे निरपेक्ष होगा यह अतिप्रसङ्ग है अथवा ब्रह्मज्ञानका अपनी उत्पत्तिके द्वितीय क्षणमें नाश होगा, यह अतिप्रसङ्ग है, इनमें से प्रत्येकका अग्रिम ग्रन्थसे खण्डन किया गया है ।
६४
| ५०६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
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न्तरापेक्षत्वेऽपि सुषुप्तिपूर्वज्ञानध्वंसस्य तदनपेक्षत्ववच्च मूलाज्ञानानिवर्तक- ज्ञानध्वंसस्य कारणान्तरसापेक्षत्वेऽपि तन्निवर्तकज्ञानध्वंसस्य तदनपेक्षत्वो- पपत्तेः । नापि कारणान्तरनैरपेक्ष्ये स्वोत्पत्त्युत्तरक्षणे एव नाशः स्यादित्य- तिप्रसङ्गः । इष्टापत्तेः, तदुत्पत्त्युत्तरक्षणे एव ब्रह्माध्यस्तनिखिलप्रपञ्चदाहेन तदन्तर्गतस्य तस्यापि तदैव दाहाभ्युपगमात् । निरिन्धनदहनध्वंसन्यायेन ब्रह्मज्ञानध्वंसस्यापि कालादृष्टेश्वरेच्छादिकारणान्तरजन्यत्वेऽप्यविरोधाच्च । सर्वप्रपञ्चनिवृत्यनन्तरमेकशेषस्य ब्रह्मज्ञानस्य निवृत्तिरित्यनभ्युपगमेन युगपत्
गुणोंकी अपेक्षा होनेपर भी सुषुप्तिके पूर्वकालीन ज्ञानध्वंसके प्रति उनकी अपेक्षा नहीं होती है, वैसे ही मूलाज्ञानके अनिवर्तक ज्ञानके ध्वंसके प्रति-कारणान्तरकी अपेक्षा होनेपर भी मूलाज्ञानके निवर्तक ज्ञानके ध्वंसके प्रति कारणान्तरकी अपेक्षा न मानना युक्तियुक्त ही है। और यह भी अतिप्रसङ्ग नहीं हो सकता है कि ब्रह्मज्ञानके ध्वंसके प्रति कारणान्तरकी अपेक्षा न मानी जाय, तो ब्रह्मज्ञानकी उत्पत्तिके उत्तरक्षणमें ही नाशकी उसके प्रसक्ति होगी, क्योंकि यह तो इष्ट ही है, कारण कि ब्रह्मज्ञानकी उत्पत्तिके द्वितीय क्षणमें ही ब्रह्ममें अध्यस्त सकल प्रपञ्चका दाह होनेसे प्रपञ्चके अन्तर्गत ब्रह्मज्ञानका भी उसी उत्तरक्षणमें विनाश माना जाता है। और इन्धनशून्य अग्निके ध्वंसके उदाहरणसे यह भी मान लिया जाय कि ब्रह्मज्ञानके ध्वंसके प्रति * काल, अदृष्ट, ईश्वरकी इच्छा आदि अन्य कारण हैं, तो भी कोई विरोध नहीं है। कारण कि सब प्रपञ्चकी निवृत्तिके बाद एक अवशिष्ट ब्रह्मज्ञानकी निवृत्ति होती है, ऐसा स्वीकार न होनेसे एक ही कालमें सब
* कार्यमात्रके प्रति काल, अदृष्ट आदि कारण होते हैं, अतः ब्रह्मज्ञानके ध्वंसके प्रति यदि वे कारण मानें जांय, तो कोई हानि नहीं है, यदि यहां पर यह शङ्का हो कि पहले ब्रह्मज्ञानकी उत्पत्ति हुई, पीछे वासनासहित अविद्याकी निवृत्ति और इसके बाद तृतीय क्षणमें ब्रह्मज्ञानकी निवृत्ति होगी, इस प्रकार यदि क्रम स्वीकार किया जाय, तो ब्रह्मज्ञाननाशके पूर्वक्षणमें काल आदिकी अवस्थिति न होनेके कारण ब्रह्मज्ञानके नाशके प्रति उनमें हेतुता कैसे आ सकती है, तो यह शङ्का युक्त नहीं है, कारण कि 'सब प्रपञ्चकी निवृत्तिके पीछे एक ब्रह्मज्ञान बचता है' इस प्रकार नहीं माना जाता है, किन्तु ब्रह्मज्ञानसे एक ही क्षणमें सभीका विनाश होता है, ऐसा माना जाता है, इसलिए पूर्वक्षणमें काल, अदृष्ट आदि अवश्य कारणरूपसे रह सकते हैं, यह भाव है।
ब्रह्मज्ञानके नाशंका विचार ] भाषानुवादसहित ५०७
सर्वदाहे पूर्वक्षणे चिदविद्यासम्बन्धरूपस्य द्रव्यान्तररूपस्य वा कालस्य, ईश्वरप्रसादरूपस्यान्तःकरणगुणविशेषस्य वाऽदृष्टस्य, अन्येषां च सत्त्वात् । न च तत्र ज्ञानातिरिक्तकारणापेक्षे ब्रह्मज्ञानस्यामिथ्यात्वप्रसङ्गः, ज्ञानैक-निवर्त्यत्वं मिथ्यात्वमित्यभ्युपगमादिति वाच्यम्; ज्ञानाघटितसामग्र्यनि-वर्त्यत्वे सति ज्ञाननिवर्त्यत्वस्य तदर्थत्वात् । 'नान्यः पन्थाः' इति श्रुतेरपि तत्रैव तात्पर्यात् । अतो युक्त एव दग्धदाह्यदहनादिन्यायः ।
प्रपञ्चके विनाशके प्रति पूर्वकालमें चित् और अविद्याका सम्बन्धरूप अथवा द्रव्या-न्तररूप काल, ईश्वरका प्रसादरूप अथवा अन्तःकरणका गुणविशेषरूप अदृष्ट, ईश्वर और दिशा आदि साधारण कारण विद्यमान हैं । यदि शङ्का हो कि ब्रह्मज्ञानके ध्वंसमें ज्ञानसे अतिरिक्त कारणकी अपेक्षा मानी जाय, तो ब्रह्मज्ञानमें सत्यत्वकी प्रसक्ति होगी ? क्योंकि मिथ्यात्वका लक्षण यही माना गया है कि जो केवल ज्ञानसे निवर्त्यमान हो वह मिथ्यात्व है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि मिथ्या-त्वका लक्षण यही है—ज्ञानसे अघटित सामग्रीसे * अनिवर्त्य होकर जो ज्ञानसे निवर्त्य हो, 'नान्यः पन्थाः०' (ज्ञानको छोड़कर मुक्तिके लिए अन्य मार्ग नहीं है) इस श्रुतिका भी उसीमें तात्पर्य है, इसलिए दग्धदाह्यदहनादिन्याय युक्त ही है ।
* ज्ञानसे अघटित जो सामग्री उससे निवर्त्य न हो करके जो ज्ञानसे निवृत्त होता हो, वही मिथ्या है, जो लोग प्रपञ्चको सत्य मानते हैं उनके मतमें भी ज्ञानसे घटादिकी निवृत्ति होती है, क्योंकि 'मैं घटका विनाश करता हूं' इस प्रकारके ज्ञानके अनन्तर ही मुद्गरके प्रहारसे घटका विनाश देखा जाता है, अतः उनके प्रपञ्चके मिथ्यात्वके परिहारके लिए प्रथम सत्यन्त पद दिया गया है, उनके मतमें घटादिके विनाशमें नियमतः ज्ञानपूर्वकत्वके न होनेसे ज्ञानाघटित सामग्रीसे निवृत्त होनेवाले घटादिमें ज्ञानाघटितसामग्रीसे अनिवर्त्यत्व नहीं है । यदि शङ्का हो कि प्रपञ्च-सत्यवादियोंके मतमें नाशमात्र ईश्वरीयज्ञानघटित सामग्रीजन्य है, अतः ईश्वरके ज्ञानको लेकर कार्यमात्रमें ज्ञानाघटितसामग्र्यनिवर्त्यत्वे सति ज्ञाननिवर्त्यत्वरूप मिथ्यात्व है, इसलिए इस प्रकारका मिथ्यात्व भी युक्तिमुक्त नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'ज्ञानाघटित' इत्यादि लक्षणमें जो ज्ञानपद है, वह जीवके ज्ञानके अभिप्रायसे कहा गया है अतः उक्त दोष नहीं है । विशेष्य दल दिया है—आत्मामें दोषके निवारणके लिए है, इसीलिए 'नान्यः पन्थाः' इत्यादि श्रुतिका तात्पर्य यह नहीं है कि मोक्षके प्रति केवल ज्ञान ही कारण है और अन्य कारण नहीं है, किन्तु जो कारण है, वह ज्ञानसे अघटित नहीं है, किन्तु ज्ञानघटित है, अतः कार्यमात्रके प्रति कालादिके कारण होनेसे मूलाज्ञानध्वंसरूप मोक्षमें भी उनको कारण माना जाय, तो भी इस श्रुतिके साथ विरोध नहीं है, यह भाव है ।
५०८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ तृतीय परिच्छेद
आहुरन्ये तु वृत्तीद्ध आत्मैवाज्ञानतत्कृतम् ।
प्रदहेत्सूर्यकान्तेद्धा सूर्यकान्तिस्तृणं यथा ॥ ३५ ॥
कुछ लोग कहते हैं कि वृत्तिमें आरूढ़ आत्मा ही अज्ञान और अज्ञानकृत प्रपञ्चका निवर्तक है, जैसे किं सूर्यकान्त मणिके ऊपर आरूढ़ सूर्यकी किरणें तृणको दग्ध करती हैं ॥ ३५ ॥
केचित्तु वृत्तिरूपं ब्रह्मज्ञानं नाज्ञानतन्मूलप्रपञ्चनिवर्हकम्, अज्ञानस्य प्रकाशनिवर्त्यत्वनियमेन जडरूपवृत्तिनिवर्त्यत्वायोगात् । किन्तु तदारूढचैतन्यप्रकाशस्तन्निवर्तकः, स्वरूपेण तस्याज्ञानादिसाक्षितया तदनिवर्तकत्वेऽप्यखण्डाकारवृत्त्युपारूढस्य तस्य तन्निवर्तकत्वोपपत्तेः ।
'तृणादेर्भासिकाऽप्येषा सूर्यदीप्तिस्तृणं दहेत् ।
सूर्यकान्तमुपारुह्य तन्न्यायं तत्र योजयेत् ॥'
इत्यभियुक्तोक्तेः । एवं च यथा किञ्चित् काष्ठमुपारुह्य ग्रामनगरादिकं दहन् वह्निर्दहत्येव तदपि काष्ठम्, तथा चरमवृत्तिमुपारुह्य निखिलप्रपञ्च-
कुछ लोग कहते हैं कि वृत्तिरूप ब्रह्मज्ञान अज्ञान और अज्ञानमूलक प्रपञ्चका विनाशक नहीं है, क्योंकि अज्ञानकी निवृत्ति प्रकाशसे होती है, इसलिए जडरूप वृत्तिसे अज्ञानकी निवृत्ति हो नहीं सकती, किन्तु वृत्तिमें आरूढ़ जो चैतन्यात्मक प्रकाश है, वह उसका निवर्तक है, यद्यपि स्वरूपतः चैतन्य अज्ञान आदिका साक्षी है, अतः अज्ञानका निवर्तक नहीं है, तथापि अखण्डाकार वृत्तिमें आरूढ़ होकर वह अज्ञानका निवर्तक होता है ।
'तृणादेः०' (यद्यपि सूर्यकी कान्ति तृण आदिकी प्रकाशिका है, तथापि सूर्यकान्तमणिमें आरूढ़ होकर तृण आदिको दग्ध करती है, यही न्याय प्रकृतमें भी लगाना चाहिए, इस प्रकारकी पण्डितोंकी उक्ति भी है । एवञ्च ⁕ जैसे किसी काष्ठका अवलम्बन कर अग्नि ग्राम, नगर आदिका दाह करता हुआ उस काष्ठका भी दाह करता है, वैसे चरमवृत्तिका अवलम्बनका
⁕ कुछ लोग शङ्का करते हैं कि सूर्यकान्तमणिमें आरूढ सूर्यकी कान्ति उस मणिसे भिन्न तृण आदिका जैसे विनाश करती है, मणिका विनाश नहीं करती है, वैसे ही वृत्तिमें आरूढ चैतन्य वृत्तिसे व्यतिरिक्त अज्ञान आदिका विनाश करता है, वृत्तिको नहीं, इसलिए ब्रह्मज्ञानका नाश कैसे हो सकता है, क्योंकि अन्य नाशक नहीं है—इस शङ्काका समाधान करनेके लिए 'प्रपञ्च' यह ग्रन्थ है ।
[ ब्रह्मज्ञानके नाशकका विचार ] भाषानुवादसहित ५०९
मुन्मूलयन्नखण्डचैतन्यप्रकाशस्तन्निवर्तनेऽपि प्रकल्पते इति न तन्नाशे काचिदनुपपत्तिरित्याहुः ।
उपादानक्षयादन्ये विश्वोच्छेदं प्रचक्षते ।
जीवन्मुक्तस्य भोगोऽत्राविद्यालेशेन युज्यते ॥ ३६ ॥
अन्य लोग कहते हैं कि उपादानके नष्ट होनेसे ही सम्पूर्ण प्रपञ्चका नाश होता है और जीवन्मुक्त पुरुषको अविद्याके लेशसे भोग हो सकता है ॥ ३६ ॥
इति श्रीगङ्गाधरसरस्वतीविरचितवेदान्तसिद्धान्तसूक्तिमञ्जर्यां
तृतीयः परिच्छेदः ।
अन्ये तु ब्रह्मज्ञानमज्ञानस्यैव निवर्तकम्, ज्ञानाज्ञानयोरेव साक्षाद्विरोधात् । प्रपञ्चस्य तूपादाननाशान्नाश इति प्रपञ्चान्तर्गतस्य ब्रह्मज्ञानस्यापि तत एव नाशः । न च प्रपञ्चस्य ज्ञानानिवर्त्यत्वे मिथ्यात्वानुपपत्तिः । प्रपञ्चनिवृत्तेस्साक्षाद् ज्ञानजन्यत्वाभावेऽपि ज्ञानजन्याज्ञाननाशजन्यत्वात् । 'साक्षात् परम्परया वा ज्ञानैकनिवर्त्यत्वं मिथ्यात्वम्' इत्यङ्गीकारात् । एवं च तत्त्वसाक्षात्कारोदयेऽपि जीवन्मुक्तस्य देहादिप्रतिभास उपपद्यते । प्रारब्धकर्मणा प्रतिबन्धेन तत्त्वसाक्षात्कारोदयेऽपि प्रारब्धकर्मतत्कार्यदेहादि-
कर सम्पूर्ण प्रपञ्चका उच्छेद करता हुआ चैतन्यात्मक प्रकाश चरमवृत्तिके विनाश करनेमें भी समर्थ होता है, इसलिए उसके विनाशमें कोई अनुपपत्ति नहीं है ।
अन्य कुछ लोग कहते हैं कि ब्रह्मज्ञान अज्ञानका ही निवर्तक है । क्योंकि ज्ञान और अज्ञानका साक्षात् विरोध है, प्रपञ्चका तो उपादानके नाशसे नाश होता है, इसलिए प्रपञ्चके अन्तर्गत ब्रह्मज्ञानका भी उपादानके नाशसे नाश होता है । यदि शङ्का हो कि प्रपञ्चकी निवृत्ति ज्ञानसे न मानी जाय, तो मिथ्यात्वकी अनुपपत्ति होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रपञ्चनिवृत्ति यद्यपि साक्षात् ज्ञानजन्य नहीं है, तथापि ज्ञानजन्य अज्ञान नाशसे जन्य है, अतः मिथ्यात्वकी उपपत्ति हो सकती है, क्योंकि साक्षात् अथवा परम्परया केवल ज्ञाननिवर्त्यत्वको मिथ्यात्वका अङ्गीकार किया जाता है, एवञ्च * तत्त्वसाक्षात्कारके उत्पन्न होनेपर भी जीवन्मुक्त पुरुषको
| ५१० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
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प्रतिभासानुवृत्त्योपादानावियालेशानुकृत्त्युपपत्तेः। अज्ञानवत् प्रपञ्चस्यापि साक्षाद् ब्रह्मसाक्षात्कारनिवर्त्यत्वे नायमुपपद्यते । विरोधिनेि ब्रह्मसाक्षात्कारे सति प्रारब्धकर्मणः स्वयमेवावस्थानासम्भवेनाविद्यालेशनिवृत्तिप्रतिबन्धकत्वायोगादित्याहुः ।
इति श्रीसिद्धान्तलेशसंग्रहे तृतीयः परिच्छेदः समाप्तः ।
देहादिप्रतिभासकी उपपत्ति हो सकती है, कारण कि प्रारब्ध कर्मके † प्रतिबन्धक होनेके कारण तत्त्वसाक्षात्कारके उदित होनेपर भी प्रारब्ध कर्म और उसके कार्य देहादिप्रतिभासकी अनुवृत्तिसे उपादानभूत अविद्यालेशकी अनुवृत्ति उपपन्न हो सकती है। यदि अज्ञानके समान प्रपञ्चको भी ब्रह्मसाक्षात्कारसे साक्षात् निवर्त्य माना जाय, तो जीवन्मुक्तके देहादि प्रतिभासकी उपपत्ति नहीं हो सकेगी, क्योंकि ब्रह्मसाक्षात्काररूप विरोधीके होनेसे प्रारब्ध कर्मकी स्वतः अवस्थिति न होनेके कारण अविद्यालेशनिवृत्तिके प्रति प्रतिबन्धकत्वका सम्भव नहीं है ।
श्रीसिद्धान्तलेशके वेदान्ताचार्य श्री पं० मूलशङ्करव्यासविरचित भाषानुवादमें तृतीय परिच्छेद समाप्त ।
चतुर्थः परिच्छेदः ।
अविद्यालेशका निरूपण ] भाषानुवादसहित ५११
ॐ नमः परमात्मने चतुर्थः परिच्छेदः ।
अथ कोऽयमविद्याया लेशो यदनुवर्तनात् ।
देहादेः प्रतिभासेन जीवन्मुक्तिरिहोच्यते ॥ १ ॥
अब शङ्का होती है कि यह अविद्यालेश क्या चीज है, जिसके अनुवर्तनसे देह आदिका प्रतिभास होनेसे यहाँ जीवन्मुक्ति कही जाती है ॥ १ ॥
अथ कोऽयमविद्यालेशः, यदनुवृत्त्या जीवन्मुक्तिः ? ।
ज्ञानेनावरणे नष्टे विक्षेपांशोऽनुवर्तते ।
प्रारब्धप्रतिबन्धेन स लेशस्तेन जीवनम् ॥ २ ॥
ज्ञानसे आवरणके नष्ट होनेपर भी प्रारब्ध कर्मसे जो अज्ञानका विक्षेपांश अनुवृत्त होता है, वही अविद्याका लेश है, और उसीसे जीवन है ॥ २ ॥
आवरणविक्षेपशक्तिमत्या मूलाविद्यायाः प्रारब्धकर्मवर्तमानदेहाद्यनुवृत्तिप्रयोजको विक्षेपशक्त्यंश इति केचित् ।
✻ अब यह अविद्यालेश क्या चीज है, जिसके अनुवर्तनसे जीवन्मुक्ति कहलाती है ।
† इस प्रश्नके उत्तरमें कुछ लोग कहते हैं कि आवरण और विक्षेप-शक्तिसे युक्त मूलाविद्याका—प्रारब्ध कर्म और वर्तमान शरीर आदिकी अनुवृत्तिमें प्रयोजकीभूत—जो विक्षेपशक्ति अंश है, वही अविद्याका लेश है ।
* तृतीय परिच्छेदमें मुक्तिके साधन ब्रह्मज्ञानका निरूपण बड़े ऊहापोहके साथ किया गया है, इस चतुर्थ परिच्छेदमें ब्रह्मज्ञानकी फलभूत मुक्तिका निरूपण किया जाता है, इसलिए 'अथ कोऽयम्' इस मूल ग्रन्थमें पढ़े हुए अथशब्दका साधननिरूपणके लिए प्रस्तुत तृतीय परिच्छेदके अनन्तर—यह अर्थ है । शङ्काका तात्पर्य यह है कि 'अविद्यालेश' शब्दमें लेशशब्दका अवयव अर्थ है, परन्तु अविद्याका अवयव नहीं हो सकता है, क्योंकि अविद्या सावयव नहीं है, कारण कि जो कार्य होता है, वही सावयव होता है, इसलिए अविद्यालेश हो ही नहीं सकता है ।
† अविद्यामें दो प्रकार की शक्तियाँ होती हैं, एक तो आवरणशक्ति और दूसरी विक्षेपशक्ति, उनमेंसे वृत्त्यात्मक आत्मसाक्षात्कारसे अविद्याकी आवरणशक्तिका विनाश होता है, और जो
५१२ : सिद्धान्तलेशसंग्रह [ चतुर्थ परिच्छेद
क्षालितेष्विव हिङ्ग्वादिपात्रेष्वन्ये तु वासना ।
कुछ लोग कहते हैं कि हिंग आदिके पात्रोंके धोनेपर भी जैसे उसकी वासना रह जाती है, वैसे ही अज्ञान की वासना का रहना ही अविद्याका लेश है ।
क्षालितलशुनभाण्डानुवृत्तलशुनवासनाकल्पोऽविद्यासंस्कार इत्यन्ये ।
‡ कुछ लोग कहते हैं कि अत्यन्त स्वच्छ किये हुए लशुनके पात्रमें अनुवर्तमान लशुनकी वासनाके समान अनुवर्तमान अविद्याकी वासना ( संस्कार ) ही अविद्याका लेश है ।
विक्षेपशक्तियुक्त अविद्या है, उसका—प्रतिबन्धकीभूत प्रारब्धकर्मके क्षीण होनेपर पूर्वमें अनावृतरूपसे अवस्थित चैतन्य ही—विनाशक है, ऐसा स्वीकार होनेसे तत्त्वज्ञानसे विक्षेपशक्तियुक्त अविद्यारूप अविद्यालेशकी निवृत्ति न होनेसे उसका विनाशक कौन है, इस प्रकारकी शङ्का ही नहीं हो सकती है, यह तात्पर्य है ।
‡ तात्पर्य यह है कि तत्त्वज्ञानसे अन्तःकरणकी उपादानभूत अविद्याकी निवृत्ति होनेपर भी अविद्याजन्य कोई देहकी अवस्थितिमें प्रयोजक वासनाविशेष रहता है, उसी वासनाविशेषको अविद्यालेश कहा जाता है । यदि इसमें शङ्का की जाय कि उपादानभूत अविद्याका नाश होनेपर कार्यका अवस्थान कैसे होगा ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे अन्य मतावलम्बी पटके नाशक्षणमें पटके रूपादिककी अवस्थिति मानते हैं, वैसे ही हमारे मतमें भी उपादानके नाश होनेपर भी वासनाविशेषकी अवस्थिति माननेमें कोई हानि नहीं है। यदि शङ्का हो कि समवायिकारणका नाशरूप जो अनवस्थितिमें कारण है, उसकी प्रतीक्षासे उपादानके अभावकालमें भी रूपादिककी अवस्थिति हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस परिस्थितिमें तो प्रकृतमें भी तत्त्वज्ञानसे उत्पन्न देहादिके प्रति उपादानभूत अविद्याका विनाश, जो देहादिके विनाशमें कारणभूत है, प्रारब्धकर्मसे प्रतिवद्ध है, इसलिए प्रतिबन्धकरहित अविद्याके विनाशकी प्रतीक्षासे देह आदिकी भी अवस्थिति हो सकती है । यदि शङ्का हो कि प्रारब्धकर्मको प्रतिबन्धक मानना प्रमाणशून्य है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जीवन्मुक्तिप्रतिपादक शास्त्र और तत्त्ववेत्ताओंका अनुभव उसमें प्रमाण है । किञ्च, पट और उसके रूपकी एक ही क्षणमें निवृत्ति देखनेमें आती है, अतः परमतमें ही तथाविध अनियमस्वीकारमें प्रमाण नहीं है, इसीलिए विद्यारण्य स्वामीजीने कहा है कि
विना क्षोदक्षमं मानं तैर्वृथा परिकल्प्यते ।
श्रुतियुक्त्यनुभूतिभ्यो वदतां किं नु दुःशकम् ॥
: अर्थात् अन्यमतावलम्बी किसी प्रमाणविशेषके बिना वृथा ही वस्तुका अङ्गीकार करते हैं, तो हम लोगोंके लिए, जो कि श्रुति, युक्ति और अनुभवके अनुसार वस्तुकी सिद्धि कहते हैं, क्या असाध्य है ।
अविद्यालेशका निरूपण] भाषानुवादसहित ५१३
नष्टानुवृत्तिमाचख्युरन्ये दग्धपटे यथा ॥ ३ ॥
जैसे दग्धपट में उसके आकारकी अनुवृत्ति होती है, वैसे कार्याक्षम मूलाविद्या ही अविद्याका लेश कहलाता है ॥ ३ ॥
दग्धपटन्यायेनानुवृत्ता मूलाविद्यैवेत्यपरे ।
विरोधिन्युदिते शेषासम्भवादर्थवादताम् ।
सर्वज्ञात्मगुरुः प्राह जीवन्मुक्तिश्रुतेः स्फुटम् ॥ ४ ॥
सर्वज्ञात्मगुरु कहते हैं कि विरोधी ब्रह्मज्ञानके उदित होनेपर कुछ भी अज्ञान आदि अवशिष्ट नहीं रह सकता, जीवन्मुक्तिप्रतिपादक श्रुति अर्थवादमात्र है ॥ ४ ॥
सर्वज्ञात्मगुरुवस्तु—विरोधिसाक्षात्कारोदये लेशतोऽप्यविद्याऽनुवृत्त्य-
✕ दग्धपटन्यायसे अनुवर्तमान मूलाविद्या ही अविद्याका लेश है ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ।
※ सर्वज्ञात्मगुरु तो इस प्रकारके पक्षको भी कहते हैं कि अविद्याके विरोधी तत्त्वसाक्षात्कारके उदित होनेपर लेशरूपसे भी अविद्याकी अनुवृत्ति
✕ 'दग्धपटन्यायेन' दग्धपटन्याय उसको कहते हैं—किसी वस्त्रके अग्निमें जल जानेपर भी उसका आकार पूर्ववत् ज्योंका त्यों देखा जाता है, परन्तु उससे परिधान आदि क्रिया नहीं हो सकती है, इसी प्रकार तत्त्वज्ञानसे मूलाविद्याका विनाश हो गया है, परन्तु वह दग्धपटके समान अनुवर्तमान और अपने कार्यमें असमर्थ है, अतः यही अनुवर्तमान अविद्या अविद्यालेश कही जाती है, यही इस मतका भाव है ।
- इन सर्वज्ञात्म गुरुके मतमें जीवन्मुक्ति है ही नहीं, क्योंकि अज्ञानके विरोधी ज्ञानके होनेपर उस अज्ञानका अपने कार्यके साथ नाश होनेसे उसका अंश भी नहीं रह सकता है, जीवन्मुक्तिके प्रतिपादक जो 'तस्य तावदेव चिरम्' (उसको—तत्त्वज्ञानीको—मुक्त होनेके लिए उतनी ही देर है, जबतक कि उसकी शरीरसे मुक्ति न हो ) इत्यादि शास्त्र हैं, वे तो केवल श्रवण आदिमें प्रवृत्ति करानेके लिए हैं, अतः जीवन्मुक्तिके लिए अविद्याका लेश मानना या उसका निर्वचन करना सर्वथा अशक्य है, यह भाव है । वस्तुतस्तु 'तस्य तावदेव चिरम्' इत्यादि जीवन्मुक्तिके प्रतिपादक शास्त्र श्रवणादिके अर्थवाद हैं, तथापि वे सालम्बन हैं, क्योंकि निरालम्बन अर्थवाद नहीं हो सकता है, अतः अर्थवादके आलम्बनत्वरूपसे जीवन्मुक्तिका अङ्गीकार अवश्य करना होगा, और लोकमें रज्जुमें उत्पन्न हुए सर्पभ्रमकी रज्जुतत्त्वके साक्षात्कारसे निवृत्ति होनेपर भी उस सर्पभ्रमके अभ्याससंस्कारसे फिर भी कुछ काल तक जैसे भय आदिकी अनुवृत्ति देखी जाती है, वैसे ही तत्त्वज्ञानसे अविद्याका विनाश होनेपर भी अविद्याके संस्कार कुछ काल तक रहते हैं, अतः उन संस्कारोंसे शरीरादिकी अनुवृत्ति होनेसे जीवन्मुक्तिकी
| ५१४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ चतुर्थ परिच्छेद |
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सम्भवाद् जीवन्मुक्तिशास्त्रं श्रवणादिविध्यर्थवादमात्रम् । शास्त्रस्य जीवन्मुक्तिप्रतिपादने प्रयोजनाभावात् । अतः कृतनिदिध्यासनस्य ब्रह्मसाक्षात्कारोदयमात्रेण सविलासवासनाऽविद्यानिवृत्तिरित्यपि कश्चित् पक्षमाहुः ॥ १ ॥
का निवृत्तिरविद्यायाः ? ब्रह्मसिद्धिकृतां नये ।
- आत्मैव, तदभावो हि मोहस्तत्संक्षयश्च सः ॥ ५ ॥
अविद्याकी निवृत्ति किसे कहते हैं ? इस प्रश्नके उत्तरमें ब्रह्मसिद्धिकार कहते हैं कि आत्मा ही अविद्याकी निवृत्ति है, अविद्यानिवृत्तिका अभाव मोह है और मोहका विनाश आत्मा है ॥ ५ ॥
अथ केयमविद्यानिवृत्तिः ? आत्मैवेति ब्रह्मसिद्धिकाराः ॥
न च तस्य नित्यसिद्धत्वाद् ज्ञानवैय्यर्थ्यम् , असति ज्ञानेऽनर्थहेत्व-
नहीं हो सकती है, इसलिए जीवन्मुक्तिका प्रतिपादक शास्त्र श्रवण आदि विधिक केवल अर्थवाद है, क्योंकि जीवन्मुक्तिके प्रतिपादनमें शास्त्रका कुछ भी प्रयोजन नहीं है, इससे जिस पुरुषने निदिध्यासन किया है, उस पुरुषको ब्रह्मसाक्षात्कारकी उत्पत्तिमात्रसे विलास ( कार्य ) और वासनाके साथ अविद्याकी निवृत्ति हो ही जाती है ॥ १ ॥
† अब शङ्का होती है कि अविद्याकी निवृत्ति क्या है ? [ अर्थात् प्रकृतमें अविद्याकी निवृत्तिका स्वरूप क्या है, यह प्रश्नका भाव है ] .
इस आक्षेपके समाधानमें ब्रह्मसिद्धिकार कहते हैं कि आत्मा ही अविद्याकी निवृत्ति है ।
यदि शङ्का हो कि आत्मा ही यदि अविद्याकी निवृत्ति है, तो उसकी स्वतःसिद्धि होनेसे अविद्याकी निवृत्तिके लिए तत्त्वज्ञान निरर्थक ही है ?
उपपत्ति हो सकती है, इसी गूढ़ अभिप्रायसे 'इत्यपि कश्चित्पक्षमाहुः' इसमें अपि शब्दका प्रयोग किया गया है ।
: † शङ्काका भाव है—यदि अविद्यानिवृत्ति पदार्थ आत्मरूप माना जाय, तो अविद्यानिवृत्ति ज्ञानजन्य नहीं होगी, क्योंकि वह नित्य ठहरी, यदि उसको अतिरिक्त मानें तो द्वैतापत्ति होगी, अतः अविद्यानिवृत्तिका स्वरूप क्या है, यह प्रश्नकर्ता पूछता है ।