भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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५०८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ तृतीय परिच्छेद


आहुरन्ये तु वृत्तीद्ध आत्मैवाज्ञानतत्कृतम् ।
प्रदहेत्सूर्यकान्तेद्धा सूर्यकान्तिस्तृणं यथा ॥ ३५ ॥

कुछ लोग कहते हैं कि वृत्तिमें आरूढ़ आत्मा ही अज्ञान और अज्ञानकृत प्रपञ्चका निवर्तक है, जैसे किं सूर्यकान्त मणिके ऊपर आरूढ़ सूर्यकी किरणें तृणको दग्ध करती हैं ॥ ३५ ॥

केचित्तु वृत्तिरूपं ब्रह्मज्ञानं नाज्ञानतन्मूलप्रपञ्चनिवर्हकम्, अज्ञानस्य प्रकाशनिवर्त्यत्वनियमेन जडरूपवृत्तिनिवर्त्यत्वायोगात् । किन्तु तदारूढचैतन्यप्रकाशस्तन्निवर्तकः, स्वरूपेण तस्याज्ञानादिसाक्षितया तदनिवर्तकत्वेऽप्यखण्डाकारवृत्त्युपारूढस्य तस्य तन्निवर्तकत्वोपपत्तेः ।

'तृणादेर्भासिकाऽप्येषा सूर्यदीप्तिस्तृणं दहेत् ।
सूर्यकान्तमुपारुह्य तन्न्यायं तत्र योजयेत् ॥'

इत्यभियुक्तोक्तेः । एवं च यथा किञ्चित् काष्ठमुपारुह्य ग्रामनगरादिकं दहन् वह्निर्दहत्येव तदपि काष्ठम्, तथा चरमवृत्तिमुपारुह्य निखिलप्रपञ्च-


कुछ लोग कहते हैं कि वृत्तिरूप ब्रह्मज्ञान अज्ञान और अज्ञानमूलक प्रपञ्चका विनाशक नहीं है, क्योंकि अज्ञानकी निवृत्ति प्रकाशसे होती है, इसलिए जडरूप वृत्तिसे अज्ञानकी निवृत्ति हो नहीं सकती, किन्तु वृत्तिमें आरूढ़ जो चैतन्यात्मक प्रकाश है, वह उसका निवर्तक है, यद्यपि स्वरूपतः चैतन्य अज्ञान आदिका साक्षी है, अतः अज्ञानका निवर्तक नहीं है, तथापि अखण्डाकार वृत्तिमें आरूढ़ होकर वह अज्ञानका निवर्तक होता है ।

'तृणादेः०' (यद्यपि सूर्यकी कान्ति तृण आदिकी प्रकाशिका है, तथापि सूर्यकान्तमणिमें आरूढ़ होकर तृण आदिको दग्ध करती है, यही न्याय प्रकृतमें भी लगाना चाहिए, इस प्रकारकी पण्डितोंकी उक्ति भी है । एवञ्च ⁕ जैसे किसी काष्ठका अवलम्बन कर अग्नि ग्राम, नगर आदिका दाह करता हुआ उस काष्ठका भी दाह करता है, वैसे चरमवृत्तिका अवलम्बनका


⁕ कुछ लोग शङ्का करते हैं कि सूर्यकान्तमणिमें आरूढ सूर्यकी कान्ति उस मणिसे भिन्न तृण आदिका जैसे विनाश करती है, मणिका विनाश नहीं करती है, वैसे ही वृत्तिमें आरूढ चैतन्य वृत्तिसे व्यतिरिक्त अज्ञान आदिका विनाश करता है, वृत्तिको नहीं, इसलिए ब्रह्मज्ञानका नाश कैसे हो सकता है, क्योंकि अन्य नाशक नहीं है—इस शङ्काका समाधान करनेके लिए 'प्रपञ्च' यह ग्रन्थ है ।