भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 537, कुल 590 में से

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पृष्ठ 537

ब्रह्मज्ञानके नाशंका विचार ] भाषानुवादसहित ५०७


सर्वदाहे पूर्वक्षणे चिदविद्यासम्बन्धरूपस्य द्रव्यान्तररूपस्य वा कालस्य, ईश्वरप्रसादरूपस्यान्तःकरणगुणविशेषस्य वाऽदृष्टस्य, अन्येषां च सत्त्वात् । न च तत्र ज्ञानातिरिक्तकारणापेक्षे ब्रह्मज्ञानस्यामिथ्यात्वप्रसङ्गः, ज्ञानैक-निवर्त्यत्वं मिथ्यात्वमित्यभ्युपगमादिति वाच्यम्; ज्ञानाघटितसामग्र्यनि-वर्त्यत्वे सति ज्ञाननिवर्त्यत्वस्य तदर्थत्वात् । 'नान्यः पन्थाः' इति श्रुतेरपि तत्रैव तात्पर्यात् । अतो युक्त एव दग्धदाह्यदहनादिन्यायः ।


प्रपञ्चके विनाशके प्रति पूर्वकालमें चित् और अविद्याका सम्बन्धरूप अथवा द्रव्या-न्तररूप काल, ईश्वरका प्रसादरूप अथवा अन्तःकरणका गुणविशेषरूप अदृष्ट, ईश्वर और दिशा आदि साधारण कारण विद्यमान हैं । यदि शङ्का हो कि ब्रह्मज्ञानके ध्वंसमें ज्ञानसे अतिरिक्त कारणकी अपेक्षा मानी जाय, तो ब्रह्मज्ञानमें सत्यत्वकी प्रसक्ति होगी ? क्योंकि मिथ्यात्वका लक्षण यही माना गया है कि जो केवल ज्ञानसे निवर्त्यमान हो वह मिथ्यात्व है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि मिथ्या-त्वका लक्षण यही है—ज्ञानसे अघटित सामग्रीसे * अनिवर्त्य होकर जो ज्ञानसे निवर्त्य हो, 'नान्यः पन्थाः०' (ज्ञानको छोड़कर मुक्तिके लिए अन्य मार्ग नहीं है) इस श्रुतिका भी उसीमें तात्पर्य है, इसलिए दग्धदाह्यदहनादिन्याय युक्त ही है ।


* ज्ञानसे अघटित जो सामग्री उससे निवर्त्य न हो करके जो ज्ञानसे निवृत्त होता हो, वही मिथ्या है, जो लोग प्रपञ्चको सत्य मानते हैं उनके मतमें भी ज्ञानसे घटादिकी निवृत्ति होती है, क्योंकि 'मैं घटका विनाश करता हूं' इस प्रकारके ज्ञानके अनन्तर ही मुद्गरके प्रहारसे घटका विनाश देखा जाता है, अतः उनके प्रपञ्चके मिथ्यात्वके परिहारके लिए प्रथम सत्यन्त पद दिया गया है, उनके मतमें घटादिके विनाशमें नियमतः ज्ञानपूर्वकत्वके न होनेसे ज्ञानाघटित सामग्रीसे निवृत्त होनेवाले घटादिमें ज्ञानाघटितसामग्रीसे अनिवर्त्यत्व नहीं है । यदि शङ्का हो कि प्रपञ्च-सत्यवादियोंके मतमें नाशमात्र ईश्वरीयज्ञानघटित सामग्रीजन्य है, अतः ईश्वरके ज्ञानको लेकर कार्यमात्रमें ज्ञानाघटितसामग्र्यनिवर्त्यत्वे सति ज्ञाननिवर्त्यत्वरूप मिथ्यात्व है, इसलिए इस प्रकारका मिथ्यात्व भी युक्तिमुक्त नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'ज्ञानाघटित' इत्यादि लक्षणमें जो ज्ञानपद है, वह जीवके ज्ञानके अभिप्रायसे कहा गया है अतः उक्त दोष नहीं है । विशेष्य दल दिया है—आत्मामें दोषके निवारणके लिए है, इसीलिए 'नान्यः पन्थाः' इत्यादि श्रुतिका तात्पर्य यह नहीं है कि मोक्षके प्रति केवल ज्ञान ही कारण है और अन्य कारण नहीं है, किन्तु जो कारण है, वह ज्ञानसे अघटित नहीं है, किन्तु ज्ञानघटित है, अतः कार्यमात्रके प्रति कालादिके कारण होनेसे मूलाज्ञानध्वंसरूप मोक्षमें भी उनको कारण माना जाय, तो भी इस श्रुतिके साथ विरोध नहीं है, यह भाव है ।