सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 536, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५०६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
|---|
न्तरापेक्षत्वेऽपि सुषुप्तिपूर्वज्ञानध्वंसस्य तदनपेक्षत्ववच्च मूलाज्ञानानिवर्तक- ज्ञानध्वंसस्य कारणान्तरसापेक्षत्वेऽपि तन्निवर्तकज्ञानध्वंसस्य तदनपेक्षत्वो- पपत्तेः । नापि कारणान्तरनैरपेक्ष्ये स्वोत्पत्त्युत्तरक्षणे एव नाशः स्यादित्य- तिप्रसङ्गः । इष्टापत्तेः, तदुत्पत्त्युत्तरक्षणे एव ब्रह्माध्यस्तनिखिलप्रपञ्चदाहेन तदन्तर्गतस्य तस्यापि तदैव दाहाभ्युपगमात् । निरिन्धनदहनध्वंसन्यायेन ब्रह्मज्ञानध्वंसस्यापि कालादृष्टेश्वरेच्छादिकारणान्तरजन्यत्वेऽप्यविरोधाच्च । सर्वप्रपञ्चनिवृत्यनन्तरमेकशेषस्य ब्रह्मज्ञानस्य निवृत्तिरित्यनभ्युपगमेन युगपत्
गुणोंकी अपेक्षा होनेपर भी सुषुप्तिके पूर्वकालीन ज्ञानध्वंसके प्रति उनकी अपेक्षा नहीं होती है, वैसे ही मूलाज्ञानके अनिवर्तक ज्ञानके ध्वंसके प्रति-कारणान्तरकी अपेक्षा होनेपर भी मूलाज्ञानके निवर्तक ज्ञानके ध्वंसके प्रति कारणान्तरकी अपेक्षा न मानना युक्तियुक्त ही है। और यह भी अतिप्रसङ्ग नहीं हो सकता है कि ब्रह्मज्ञानके ध्वंसके प्रति कारणान्तरकी अपेक्षा न मानी जाय, तो ब्रह्मज्ञानकी उत्पत्तिके उत्तरक्षणमें ही नाशकी उसके प्रसक्ति होगी, क्योंकि यह तो इष्ट ही है, कारण कि ब्रह्मज्ञानकी उत्पत्तिके द्वितीय क्षणमें ही ब्रह्ममें अध्यस्त सकल प्रपञ्चका दाह होनेसे प्रपञ्चके अन्तर्गत ब्रह्मज्ञानका भी उसी उत्तरक्षणमें विनाश माना जाता है। और इन्धनशून्य अग्निके ध्वंसके उदाहरणसे यह भी मान लिया जाय कि ब्रह्मज्ञानके ध्वंसके प्रति * काल, अदृष्ट, ईश्वरकी इच्छा आदि अन्य कारण हैं, तो भी कोई विरोध नहीं है। कारण कि सब प्रपञ्चकी निवृत्तिके बाद एक अवशिष्ट ब्रह्मज्ञानकी निवृत्ति होती है, ऐसा स्वीकार न होनेसे एक ही कालमें सब
* कार्यमात्रके प्रति काल, अदृष्ट आदि कारण होते हैं, अतः ब्रह्मज्ञानके ध्वंसके प्रति यदि वे कारण मानें जांय, तो कोई हानि नहीं है, यदि यहां पर यह शङ्का हो कि पहले ब्रह्मज्ञानकी उत्पत्ति हुई, पीछे वासनासहित अविद्याकी निवृत्ति और इसके बाद तृतीय क्षणमें ब्रह्मज्ञानकी निवृत्ति होगी, इस प्रकार यदि क्रम स्वीकार किया जाय, तो ब्रह्मज्ञाननाशके पूर्वक्षणमें काल आदिकी अवस्थिति न होनेके कारण ब्रह्मज्ञानके नाशके प्रति उनमें हेतुता कैसे आ सकती है, तो यह शङ्का युक्त नहीं है, कारण कि 'सब प्रपञ्चकी निवृत्तिके पीछे एक ब्रह्मज्ञान बचता है' इस प्रकार नहीं माना जाता है, किन्तु ब्रह्मज्ञानसे एक ही क्षणमें सभीका विनाश होता है, ऐसा माना जाता है, इसलिए पूर्वक्षणमें काल, अदृष्ट आदि अवश्य कारणरूपसे रह सकते हैं, यह भाव है।