सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 543, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंअविद्यालेशका निरूपण] भाषानुवादसहित ५१३
नष्टानुवृत्तिमाचख्युरन्ये दग्धपटे यथा ॥ ३ ॥
जैसे दग्धपट में उसके आकारकी अनुवृत्ति होती है, वैसे कार्याक्षम मूलाविद्या ही अविद्याका लेश कहलाता है ॥ ३ ॥
दग्धपटन्यायेनानुवृत्ता मूलाविद्यैवेत्यपरे ।
विरोधिन्युदिते शेषासम्भवादर्थवादताम् ।
सर्वज्ञात्मगुरुः प्राह जीवन्मुक्तिश्रुतेः स्फुटम् ॥ ४ ॥
सर्वज्ञात्मगुरु कहते हैं कि विरोधी ब्रह्मज्ञानके उदित होनेपर कुछ भी अज्ञान आदि अवशिष्ट नहीं रह सकता, जीवन्मुक्तिप्रतिपादक श्रुति अर्थवादमात्र है ॥ ४ ॥
सर्वज्ञात्मगुरुवस्तु—विरोधिसाक्षात्कारोदये लेशतोऽप्यविद्याऽनुवृत्त्य-
✕ दग्धपटन्यायसे अनुवर्तमान मूलाविद्या ही अविद्याका लेश है ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ।
※ सर्वज्ञात्मगुरु तो इस प्रकारके पक्षको भी कहते हैं कि अविद्याके विरोधी तत्त्वसाक्षात्कारके उदित होनेपर लेशरूपसे भी अविद्याकी अनुवृत्ति
✕ 'दग्धपटन्यायेन' दग्धपटन्याय उसको कहते हैं—किसी वस्त्रके अग्निमें जल जानेपर भी उसका आकार पूर्ववत् ज्योंका त्यों देखा जाता है, परन्तु उससे परिधान आदि क्रिया नहीं हो सकती है, इसी प्रकार तत्त्वज्ञानसे मूलाविद्याका विनाश हो गया है, परन्तु वह दग्धपटके समान अनुवर्तमान और अपने कार्यमें असमर्थ है, अतः यही अनुवर्तमान अविद्या अविद्यालेश कही जाती है, यही इस मतका भाव है ।
- इन सर्वज्ञात्म गुरुके मतमें जीवन्मुक्ति है ही नहीं, क्योंकि अज्ञानके विरोधी ज्ञानके होनेपर उस अज्ञानका अपने कार्यके साथ नाश होनेसे उसका अंश भी नहीं रह सकता है, जीवन्मुक्तिके प्रतिपादक जो 'तस्य तावदेव चिरम्' (उसको—तत्त्वज्ञानीको—मुक्त होनेके लिए उतनी ही देर है, जबतक कि उसकी शरीरसे मुक्ति न हो ) इत्यादि शास्त्र हैं, वे तो केवल श्रवण आदिमें प्रवृत्ति करानेके लिए हैं, अतः जीवन्मुक्तिके लिए अविद्याका लेश मानना या उसका निर्वचन करना सर्वथा अशक्य है, यह भाव है । वस्तुतस्तु 'तस्य तावदेव चिरम्' इत्यादि जीवन्मुक्तिके प्रतिपादक शास्त्र श्रवणादिके अर्थवाद हैं, तथापि वे सालम्बन हैं, क्योंकि निरालम्बन अर्थवाद नहीं हो सकता है, अतः अर्थवादके आलम्बनत्वरूपसे जीवन्मुक्तिका अङ्गीकार अवश्य करना होगा, और लोकमें रज्जुमें उत्पन्न हुए सर्पभ्रमकी रज्जुतत्त्वके साक्षात्कारसे निवृत्ति होनेपर भी उस सर्पभ्रमके अभ्याससंस्कारसे फिर भी कुछ काल तक जैसे भय आदिकी अनुवृत्ति देखी जाती है, वैसे ही तत्त्वज्ञानसे अविद्याका विनाश होनेपर भी अविद्याके संस्कार कुछ काल तक रहते हैं, अतः उन संस्कारोंसे शरीरादिकी अनुवृत्ति होनेसे जीवन्मुक्तिकी