सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 544, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५१४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ चतुर्थ परिच्छेद |
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सम्भवाद् जीवन्मुक्तिशास्त्रं श्रवणादिविध्यर्थवादमात्रम् । शास्त्रस्य जीवन्मुक्तिप्रतिपादने प्रयोजनाभावात् । अतः कृतनिदिध्यासनस्य ब्रह्मसाक्षात्कारोदयमात्रेण सविलासवासनाऽविद्यानिवृत्तिरित्यपि कश्चित् पक्षमाहुः ॥ १ ॥
का निवृत्तिरविद्यायाः ? ब्रह्मसिद्धिकृतां नये ।
- आत्मैव, तदभावो हि मोहस्तत्संक्षयश्च सः ॥ ५ ॥
अविद्याकी निवृत्ति किसे कहते हैं ? इस प्रश्नके उत्तरमें ब्रह्मसिद्धिकार कहते हैं कि आत्मा ही अविद्याकी निवृत्ति है, अविद्यानिवृत्तिका अभाव मोह है और मोहका विनाश आत्मा है ॥ ५ ॥
अथ केयमविद्यानिवृत्तिः ? आत्मैवेति ब्रह्मसिद्धिकाराः ॥
न च तस्य नित्यसिद्धत्वाद् ज्ञानवैय्यर्थ्यम् , असति ज्ञानेऽनर्थहेत्व-
नहीं हो सकती है, इसलिए जीवन्मुक्तिका प्रतिपादक शास्त्र श्रवण आदि विधिक केवल अर्थवाद है, क्योंकि जीवन्मुक्तिके प्रतिपादनमें शास्त्रका कुछ भी प्रयोजन नहीं है, इससे जिस पुरुषने निदिध्यासन किया है, उस पुरुषको ब्रह्मसाक्षात्कारकी उत्पत्तिमात्रसे विलास ( कार्य ) और वासनाके साथ अविद्याकी निवृत्ति हो ही जाती है ॥ १ ॥
† अब शङ्का होती है कि अविद्याकी निवृत्ति क्या है ? [ अर्थात् प्रकृतमें अविद्याकी निवृत्तिका स्वरूप क्या है, यह प्रश्नका भाव है ] .
इस आक्षेपके समाधानमें ब्रह्मसिद्धिकार कहते हैं कि आत्मा ही अविद्याकी निवृत्ति है ।
यदि शङ्का हो कि आत्मा ही यदि अविद्याकी निवृत्ति है, तो उसकी स्वतःसिद्धि होनेसे अविद्याकी निवृत्तिके लिए तत्त्वज्ञान निरर्थक ही है ?
उपपत्ति हो सकती है, इसी गूढ़ अभिप्रायसे 'इत्यपि कश्चित्पक्षमाहुः' इसमें अपि शब्दका प्रयोग किया गया है ।
: † शङ्काका भाव है—यदि अविद्यानिवृत्ति पदार्थ आत्मरूप माना जाय, तो अविद्यानिवृत्ति ज्ञानजन्य नहीं होगी, क्योंकि वह नित्य ठहरी, यदि उसको अतिरिक्त मानें तो द्वैतापत्ति होगी, अतः अविद्यानिवृत्तिका स्वरूप क्या है, यह प्रश्नकर्ता पूछता है ।