भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 533

ब्रह्मज्ञानके नाशकका विचार ] भाषाानुवादसहित ५०३


नाशात् पटनाश इति युक्तम्। अंशुतन्त्वादिभिस्सह युगपदेव पटस्य दाहदर्शनेन क्रमकल्पनायोगात्। यतोऽधस्तान्नावयवनाशः, तत्राऽवयवे अग्निसंयोगादेव नाशस्य वाच्यत्वात् ॥ ११ ॥

नन्वस्त्वेतदेवम्, तथाऽपि सविलासाज्ञाननाशकमिदं ब्रह्मज्ञानं कथं नश्येद्, नाशकान्तरस्याऽभावादिति चेद्,

हत्वा मोहं विनश्येत् सा कतकाम्बुविन्दुवद्वहयः।
पङ्कवाह्नितृणानीव चास्तप्तायसभूमिषु ॥ ३४ ॥

अज्ञानका विनाश करके ब्रह्माकार वृत्ति भी उसी प्रकार स्वयं नष्ट हो जाती है, जैसे कि जलमें प्रक्षिप्त निर्मली जलके मलिन भागको अलग कर स्वयं अलग हो जाती है तप्तलोहापिण्डके ऊपर गिरे हुए जलके बिन्दु अग्निको शान्तकर स्वयं शान्त हो जाते हैं और अग्नि भूमिके तृणोंको नष्ट करके स्वयं नष्ट हो जाती है ॥ ३४ ॥

यथा कतकरजः सलिलेन संयुज्य पूर्वयुक्तरजोऽन्तरविश्लेषं जनयत्


नाश हुआ है, क्योंकि अंशु और तन्तु आदिके साथ एक ही समयमें पटनाशके देखे जानेसे क्रमकी कल्पना अयुक्त है, और † जिस द्व्यणुकावयव परमाणुका नाश नहीं होता है, उस अवयवका अग्निसंयोगसे ही नाश मानना होगा ॥ ११ ॥

अब शङ्का करते हैं कि उक्त प्रकारसे यद्यपि ब्रह्मज्ञान ही अन्तःकरण द्वारा अपने उपादानभूत अज्ञानका नाशक भले ही हो, तथापि अपने विलास सहित अज्ञानका विनाशक ब्रह्मज्ञान कैसे नष्ट होगा ? क्योंकि ब्रह्मज्ञानके सिवा अन्य कोई नाशक नहीं है।

इस * प्रकारकी शङ्काके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि जैसे कतकरज जलके साथ सम्बन्ध पाकर अपने संयोगसे पूर्व जलके साथ सम्पृक्त अन्य


† तात्पर्य यह है कि द्व्यणुकनाशके प्रति परमाणुनाश प्रयोजक नहीं हो सकता है, क्योंकि परमाणु नित्य है, इसलिए द्व्यणुकमें विद्यमान अग्निके संयोगसे ही द्व्यणुकका विनाश मानना होगा। अवयवविभागकी प्रक्रियाका अवलम्बन करके प्रकृतमें समाधान नहीं हो सकता है, क्योंकि अवयवविभागकी प्रक्रियाका पहले निरास किया जा चुका है। इसलिए अग्निसंयोगमें अपने उपादानभूत पटकी नाशकता भ्रान्त नहीं है।

* समाधानका तात्पर्य यह है कि ब्रह्मज्ञानसे व्यतिरिक्त समस्त पदार्थका ब्रह्मज्ञानसे नाश होगा, पीछे अवशिष्ट ब्रह्मज्ञानका नाश होगा, इस प्रकार क्रम नहीं माना जाता है, किन्तु ब्रह्मज्ञानसे जब अपने विलासके सहित अविद्याका विनाश प्रसक्त होगा उसीके साथ साथ ब्रह्मज्ञानका भी नाश होगा अपने नाशके प्रति ब्रह्मज्ञान भी कारण माना जाता है। यह भी

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