सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 534, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५०४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
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स्वविश्लेषमपि जनयति, तथाऽऽत्मन्यध्यस्यमानं ब्रह्मज्ञानं पूर्वाध्यस्तसर्वप्रपञ्चं निवर्तयत् स्वात्मानमपि निवर्तयतीति केचित् ।
अन्ये तु अन्यन्निवर्त्य स्वयमपि निवृत्तौ दग्धलोहपीताम्बुन्यायमुदाहरन्ति ।
अपरे त्वत्र दग्धतृणकूटदहनोदाहरणमाहुः । न च ध्वंसस्य प्रतियोग्यतिरिक्तजन्यत्वनियमः, अप्रयोजकत्वात् । निरिन्धनदहनादिध्वंसे व्यभिचाराच्च । न च ध्वंसस्य प्रतियोगिमात्रजन्यत्वेऽतिप्रसङ्गात् कारणा-
रजका पृथक्करण करके अपने विश्लेषको भी उत्पन्न करता है, वैसे ही आत्मामें अध्यस्त ब्रह्मज्ञान पूर्वके अध्यस्त समस्त प्रपञ्चकी निवृत्ति करके अपने आपकी भी निवृत्ति करता है।
कुछ लोग तो इस विषयमें अन्यकी निवृत्ति करके अपनी निवृत्तिमें दग्धलोहपीताम्बुन्यायको † दृष्टान्तरूपसे देते हैं ।
अन्य कुछ लोग दग्धतृणकूटदहनको * दृष्टान्तरूपसे कहते हैं । यदि शङ्का हो कि ध्वंस प्रतियोगीसे भिन्न कारणसे उत्पन्न होता है, यह नियम है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त नियमके अङ्गीकारमें कोई प्रमाण नहीं है, और इन्धनशून्य अग्नि आदिके ध्वंसमें व्यभिचार भी है । (तात्पर्य यह है इन्धनोंका निःशेष ध्वंस होनेके पश्चात् अग्निका स्वतः ही नाश देखा जाता है, एवं सुषुप्तिके अव्यवहित पूर्वकालमें जो ज्ञानका विनाश होता है, वह भी प्रतियोगिमात्रसे होता है, अतः उक्त नियममें व्यभिचार दोष है, अतः प्रयोजकशून्य निरर्थक नियमका अङ्गीकार नहीं करना चाहिए) । यदि शङ्का हो कि
शङ्का नहीं हो सकती है कि एक वस्तु अपने और दूसरेके नाशके प्रति कारण कैसे हो सकती है, क्योंकि कतकरजमें (निर्मली जिससे मलिन जल साफ होता है) स्व और परकी विरोधिता देखी जाती है, अतः यह पूर्वपक्ष युक्त नहीं है कि सब प्रपञ्चका ब्रह्मज्ञानसे भले ही नाश हो परन्तु ब्रह्मज्ञानका नाश नहीं होगा, क्योंकि अन्य नाशक नहीं है, क्योंकि ब्रह्मज्ञानका ब्रह्मज्ञानसे ही नाश उक्त रीतिसे हो सकता है ।
† 'दग्धलोहपीताम्बुन्याय' यह न्याय इस प्रकारका है कि जैसे अग्निसे तपे हुए लोहेके गोलेमें पानी यदि फेंका जाय, तो उस जलका लोहेमें रहनेवाला अग्नि नाश करता है और स्वयं भी नष्ट हो जाता है, वैसे ही प्रकृतमें ब्रह्मज्ञान भी अपनेसे व्यतिरिक्त सम्पूर्ण प्रपञ्चका विनाश करता है और स्वयं भी नष्ट हो जाता है ।
* जैसे अग्नि तृणके समुदायको नष्ट करती है, और स्वयं भी नष्ट हो जाती है, वैसे ही ब्रह्मज्ञान सम्पूर्ण प्रपञ्चका विनाश करके स्वयं भी नष्ट हो जाता है, यह तात्पर्य है ।