सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५०२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद
निवर्तकत्वे तदवस्थानासहिष्णुत्वरूपस्य विरोधस्य तन्त्रत्वात्, कार्यस्य चोपादानेन सह तादृशविरोधाभावादिति चेत्, न; कार्यकारणयोरन्यत्र तादृशविरोधादर्शनेऽपि एकविषयज्ञानाज्ञानप्रयुक्तस्य तादृशविरोधस्याऽत्र सत्त्वात्, कार्यकारणयोरप्यग्निसंयोगपटयोस्तादृशविरोधस्य दृष्टेश्च। न चाऽग्निसंयोगादवयवविभागप्रक्रियया असमवायिकारणसंयोगनाशादेव पटनाशः, नाऽग्निसंयोगादिति वाच्यम्, दग्धपटेऽपि पूर्वसंस्थानानुवृत्तिदर्शनेन मुद्गरचूर्णीकृतघटवद् अवयवविभागादर्शनात्। तत्राऽवयवविभागादिकल्पनाया अप्रामाणिकत्वात्। नाऽपि तत्र तन्तूनामपि दाहेन समवायिकारण-
निवर्तकत्वमें तदवस्थानासहिष्णुत्वरूप $\times$ विरोध कारण है और कार्यका अपने उपादानके साथ उक्त विरोध नहीं देखा जाता है, तो यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि कार्य और कारणका अन्य स्थलमें यद्यपि उक्त विरोध नहीं देखा जाता है, तथापि प्रकृतमें समानविषयक ज्ञान और अज्ञानप्रयुक्त उक्त विरोध विद्यमान है, और कार्यकारणात्मक अग्निसंयोग और पटमें उक्त विरोध देखा जाता है। यदि इसमें शङ्का हो कि अग्निके संयोगसे होनेवाले अवयवविभागकी प्रक्रिया द्वारा * असमवायिकारणभूत तन्तुसंयोगके नाशसे ही पटका नाश होता है, अग्निके संयोगके नाशसे नहीं होता, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि दग्ध वस्त्रमें भी पूर्वकी संयुक्तावस्थाकी अनुवृत्ति होनेसे जैसे मुद्गरसे चूर्णित घटमें अवयवोंका विभाग देखा जाता है, वैसे ही पटके दग्ध होनेके पश्चात् दग्ध तन्तुओंमें अवयवविभागके दृष्ट न होनेसे पटके दाहस्थलमें अवयवविभागकी कल्पना अप्रामाणिक है। और उक्त स्थलमें यह भी नहीं कह सकते हैं कि तन्तुओंका भी दाहसे अर्थात् अपने समवायिकारणका नाश होनेके कारण पट-
$\times$ निवर्त्य और निवर्तकका सहावस्थान अपेक्षित नहीं होता है, क्योंकि वे ही पदार्थ विरोधी होते हैं, जो सहावस्थानको सहन नहीं करते हैं, प्रकृतमें ब्रह्मज्ञान और मूलाज्ञानका तत्त्वशब्दसे निवर्त्य सहावस्थानासहिष्णुत्वलक्षण विरोध न होनेसे निवर्त्यनिवर्तकभाव नहीं हो सकता है, यह भाव है।
* अग्निके संयोगसे तन्तुमें क्रिया, उसके बाद तन्तुओंमें विभाग, उसके बाद पटके प्रति असमवायिकारणभूत तन्तुसंयोगका नाश, अनन्तर पटका विनाश, इस प्रकारकी वैशेषिक प्रक्रिया द्वारा, यह भाव है।