सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 531, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंअज्ञानके निवर्तकका निरूपण ] भाषानुवादसहित ५०१
विषयिभावरूपस्वरूपसम्बन्धवतीनां विषयविशेषनिरूपणासम्भवे क्लृप्ते एव स्वरूपसम्बन्धे अवान्तरविशेषकल्पनेनाभेदज्ञानत्वादिपरस्परवैलक्षण्यनिर्वाहाच्च । एवं च ब्रह्मज्ञानस्याभेदाख्यकिञ्चित्संसर्गगोचरत्वानभ्युपगमान् न वेदान्तानामखण्डार्थत्वहानिरपीत्याहुः ।
ननु स्वहेतुमज्ञानं विरोधात्सा कथं हरेत् ।
वृत्तिर्नैवं विरुद्धत्वाद्वह्निसंयोगवत् पटे ॥ ३३ ॥
अत्र शङ्का होती है कि ब्रह्मज्ञानसे, जिसका उपादान अज्ञान है, विरोध होनेसे अविद्याका विनाश कैसे हो सकता है, क्योंकि कार्यका उपादानके साथ विरोध नहीं हो सकता है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि ब्रह्माकार अखण्ड वृत्तिके साथ अज्ञानका पटमें वह्निसंयोगके समान विरोध है, अतः ज्ञानसे अज्ञानका विनाश हो सकता है ॥ ३३ ॥
ननु घटादिज्ञानवद् ब्रह्मज्ञानस्यापि न मूलाज्ञाननिवर्तकत्वं युक्तम् ,
विषयविशेषका निरूपण न होनेसे परिशेषसे विषयोंके साथ विषयविषयिभावरूप स्वरूपसम्बन्धसे युक्त उन वृत्तियोंके † क्लृप्त स्वरूपसम्बन्धके अवान्तर विशेषकी कल्पनासे अभेदज्ञानत्व आदि परस्परविलक्षणत्वकी भी कल्पना कर सकते हैं । एवञ्च, ‡ ब्रह्मज्ञानकी अभेदरूप किसी संसर्गविषयताका स्वीकार न होनेसे वेदान्तोंकी अखण्डार्थताकी हानि भी नहीं है ।
यदि शङ्का हो कि जैसे घट आदिका ज्ञान मूलभूत अज्ञानका निवर्तक नहीं है, वैसे ब्रह्मज्ञान भी मूलभूत अज्ञानका निवर्तक नहीं हो सकता है, क्योंकि
तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि यदि वृत्तिका संयोग वृत्तिविषयत्वमें प्रयोजक माना जायगा, तो चक्षुके गोलक आदिका भी घटादिवृत्तिके साथ संयोग होनेसे उसमें वृत्तिविषयत्वकी प्रसक्ति होगी, यदि वृत्तिके तादात्म्यको वृत्तिविषयत्वमें प्रयोजक मानें, तो वृत्तिके अधिष्ठानत्वरूपसे वृत्तिके साथ तादात्म्यापन्न घटाद्यवच्छिन्न चैतन्यमें घटाद्याकारवृत्तिविषयत्वका सम्भव होनेपर भी वृत्तितादात्म्यसे रहित घट आदिमें वृत्तिविषयत्वकी प्रसक्ति न होगी, और वृत्तिके परिणामी अन्तःकरणमें घटादिवृत्तिविषयत्वका प्रसङ्ग होगा, क्योंकि परिणाम और परिणामीका परस्पर तादात्म्य होता है ।
† स्वरूपसम्बन्ध वृत्ति आदिका स्वरूप है, इसलिए वह क्लृप्त है, अतः क्लृप्त सम्बन्धके विशेषकी कल्पनामें लाघव है, अन्य सम्बन्धकी कल्पना करके उसमें—सम्बन्धान्तरमें अभेद ज्ञानत्वादिका निर्वाहकविशेष माना जाय, तो गौरवमात्र है, इसलिए वृत्तियोंका विषयोंके साथ स्वरूपसम्बन्ध ही है, संयोग, तादात्म्यादि नहीं है ।
‡ अर्थात् महावाक्यजन्य ज्ञानमें रहनेवाले अभेदज्ञानत्वका प्रकारान्तरसे उपपादन किया गया है, अतः अभेदसंसर्गभानकी अपेक्षा नहीं है, यह भाव है ।