भारतकोश
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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

अज्ञानके निवर्तकका निरूपण ] भाषानुवादसहित ५०१


विषयिभावरूपस्वरूपसम्बन्धवतीनां विषयविशेषनिरूपणासम्भवे क्लृप्ते एव स्वरूपसम्बन्धे अवान्तरविशेषकल्पनेनाभेदज्ञानत्वादिपरस्परवैलक्षण्यनिर्वाहाच्च । एवं च ब्रह्मज्ञानस्याभेदाख्यकिञ्चित्संसर्गगोचरत्वानभ्युपगमान् न वेदान्तानामखण्डार्थत्वहानिरपीत्याहुः ।

ननु स्वहेतुमज्ञानं विरोधात्सा कथं हरेत् ।
वृत्तिर्नैवं विरुद्धत्वाद्वह्निसंयोगवत् पटे ॥ ३३ ॥

अत्र शङ्का होती है कि ब्रह्मज्ञानसे, जिसका उपादान अज्ञान है, विरोध होनेसे अविद्याका विनाश कैसे हो सकता है, क्योंकि कार्यका उपादानके साथ विरोध नहीं हो सकता है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि ब्रह्माकार अखण्ड वृत्तिके साथ अज्ञानका पटमें वह्निसंयोगके समान विरोध है, अतः ज्ञानसे अज्ञानका विनाश हो सकता है ॥ ३३ ॥

ननु घटादिज्ञानवद् ब्रह्मज्ञानस्यापि न मूलाज्ञाननिवर्तकत्वं युक्तम् ,

विषयविशेषका निरूपण न होनेसे परिशेषसे विषयोंके साथ विषयविषयिभावरूप स्वरूपसम्बन्धसे युक्त उन वृत्तियोंके † क्लृप्त स्वरूपसम्बन्धके अवान्तर विशेषकी कल्पनासे अभेदज्ञानत्व आदि परस्परविलक्षणत्वकी भी कल्पना कर सकते हैं । एवञ्च, ‡ ब्रह्मज्ञानकी अभेदरूप किसी संसर्गविषयताका स्वीकार न होनेसे वेदान्तोंकी अखण्डार्थताकी हानि भी नहीं है ।

यदि शङ्का हो कि जैसे घट आदिका ज्ञान मूलभूत अज्ञानका निवर्तक नहीं है, वैसे ब्रह्मज्ञान भी मूलभूत अज्ञानका निवर्तक नहीं हो सकता है, क्योंकि


तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि यदि वृत्तिका संयोग वृत्तिविषयत्वमें प्रयोजक माना जायगा, तो चक्षुके गोलक आदिका भी घटादिवृत्तिके साथ संयोग होनेसे उसमें वृत्तिविषयत्वकी प्रसक्ति होगी, यदि वृत्तिके तादात्म्यको वृत्तिविषयत्वमें प्रयोजक मानें, तो वृत्तिके अधिष्ठानत्वरूपसे वृत्तिके साथ तादात्म्यापन्न घटाद्यवच्छिन्न चैतन्यमें घटाद्याकारवृत्तिविषयत्वका सम्भव होनेपर भी वृत्तितादात्म्यसे रहित घट आदिमें वृत्तिविषयत्वकी प्रसक्ति न होगी, और वृत्तिके परिणामी अन्तःकरणमें घटादिवृत्तिविषयत्वका प्रसङ्ग होगा, क्योंकि परिणाम और परिणामीका परस्पर तादात्म्य होता है ।

† स्वरूपसम्बन्ध वृत्ति आदिका स्वरूप है, इसलिए वह क्लृप्त है, अतः क्लृप्त सम्बन्धके विशेषकी कल्पनामें लाघव है, अन्य सम्बन्धकी कल्पना करके उसमें—सम्बन्धान्तरमें अभेद ज्ञानत्वादिका निर्वाहकविशेष माना जाय, तो गौरवमात्र है, इसलिए वृत्तियोंका विषयोंके साथ स्वरूपसम्बन्ध ही है, संयोग, तादात्म्यादि नहीं है ।

‡ अर्थात् महावाक्यजन्य ज्ञानमें रहनेवाले अभेदज्ञानत्वका प्रकारान्तरसे उपपादन किया गया है, अतः अभेदसंसर्गभानकी अपेक्षा नहीं है, यह भाव है ।

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५०२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद

निवर्तकत्वे तदवस्थानासहिष्णुत्वरूपस्य विरोधस्य तन्त्रत्वात्, कार्यस्य चोपादानेन सह तादृशविरोधाभावादिति चेत्, न; कार्यकारणयोरन्यत्र तादृशविरोधादर्शनेऽपि एकविषयज्ञानाज्ञानप्रयुक्तस्य तादृशविरोधस्याऽत्र सत्त्वात्, कार्यकारणयोरप्यग्निसंयोगपटयोस्तादृशविरोधस्य दृष्टेश्च। न चाऽग्निसंयोगादवयवविभागप्रक्रियया असमवायिकारणसंयोगनाशादेव पटनाशः, नाऽग्निसंयोगादिति वाच्यम्, दग्धपटेऽपि पूर्वसंस्थानानुवृत्तिदर्शनेन मुद्गरचूर्णीकृतघटवद् अवयवविभागादर्शनात्। तत्राऽवयवविभागादिकल्पनाया अप्रामाणिकत्वात्। नाऽपि तत्र तन्तूनामपि दाहेन समवायिकारण-


निवर्तकत्वमें तदवस्थानासहिष्णुत्वरूप $\times$ विरोध कारण है और कार्यका अपने उपादानके साथ उक्त विरोध नहीं देखा जाता है, तो यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि कार्य और कारणका अन्य स्थलमें यद्यपि उक्त विरोध नहीं देखा जाता है, तथापि प्रकृतमें समानविषयक ज्ञान और अज्ञानप्रयुक्त उक्त विरोध विद्यमान है, और कार्यकारणात्मक अग्निसंयोग और पटमें उक्त विरोध देखा जाता है। यदि इसमें शङ्का हो कि अग्निके संयोगसे होनेवाले अवयवविभागकी प्रक्रिया द्वारा * असमवायिकारणभूत तन्तुसंयोगके नाशसे ही पटका नाश होता है, अग्निके संयोगके नाशसे नहीं होता, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि दग्ध वस्त्रमें भी पूर्वकी संयुक्तावस्थाकी अनुवृत्ति होनेसे जैसे मुद्गरसे चूर्णित घटमें अवयवोंका विभाग देखा जाता है, वैसे ही पटके दग्ध होनेके पश्चात् दग्ध तन्तुओंमें अवयवविभागके दृष्ट न होनेसे पटके दाहस्थलमें अवयवविभागकी कल्पना अप्रामाणिक है। और उक्त स्थलमें यह भी नहीं कह सकते हैं कि तन्तुओंका भी दाहसे अर्थात् अपने समवायिकारणका नाश होनेके कारण पट-


$\times$ निवर्त्य और निवर्तकका सहावस्थान अपेक्षित नहीं होता है, क्योंकि वे ही पदार्थ विरोधी होते हैं, जो सहावस्थानको सहन नहीं करते हैं, प्रकृतमें ब्रह्मज्ञान और मूलाज्ञानका तत्त्वशब्दसे निवर्त्य सहावस्थानासहिष्णुत्वलक्षण विरोध न होनेसे निवर्त्यनिवर्तकभाव नहीं हो सकता है, यह भाव है।

* अग्निके संयोगसे तन्तुमें क्रिया, उसके बाद तन्तुओंमें विभाग, उसके बाद पटके प्रति असमवायिकारणभूत तन्तुसंयोगका नाश, अनन्तर पटका विनाश, इस प्रकारकी वैशेषिक प्रक्रिया द्वारा, यह भाव है।

ब्रह्मज्ञानके नाशकका विचार ] भाषाानुवादसहित ५०३


नाशात् पटनाश इति युक्तम्। अंशुतन्त्वादिभिस्सह युगपदेव पटस्य दाहदर्शनेन क्रमकल्पनायोगात्। यतोऽधस्तान्नावयवनाशः, तत्राऽवयवे अग्निसंयोगादेव नाशस्य वाच्यत्वात् ॥ ११ ॥

नन्वस्त्वेतदेवम्, तथाऽपि सविलासाज्ञाननाशकमिदं ब्रह्मज्ञानं कथं नश्येद्, नाशकान्तरस्याऽभावादिति चेद्,

हत्वा मोहं विनश्येत् सा कतकाम्बुविन्दुवद्वहयः।
पङ्कवाह्नितृणानीव चास्तप्तायसभूमिषु ॥ ३४ ॥

अज्ञानका विनाश करके ब्रह्माकार वृत्ति भी उसी प्रकार स्वयं नष्ट हो जाती है, जैसे कि जलमें प्रक्षिप्त निर्मली जलके मलिन भागको अलग कर स्वयं अलग हो जाती है तप्तलोहापिण्डके ऊपर गिरे हुए जलके बिन्दु अग्निको शान्तकर स्वयं शान्त हो जाते हैं और अग्नि भूमिके तृणोंको नष्ट करके स्वयं नष्ट हो जाती है ॥ ३४ ॥

यथा कतकरजः सलिलेन संयुज्य पूर्वयुक्तरजोऽन्तरविश्लेषं जनयत्


नाश हुआ है, क्योंकि अंशु और तन्तु आदिके साथ एक ही समयमें पटनाशके देखे जानेसे क्रमकी कल्पना अयुक्त है, और † जिस द्व्यणुकावयव परमाणुका नाश नहीं होता है, उस अवयवका अग्निसंयोगसे ही नाश मानना होगा ॥ ११ ॥

अब शङ्का करते हैं कि उक्त प्रकारसे यद्यपि ब्रह्मज्ञान ही अन्तःकरण द्वारा अपने उपादानभूत अज्ञानका नाशक भले ही हो, तथापि अपने विलास सहित अज्ञानका विनाशक ब्रह्मज्ञान कैसे नष्ट होगा ? क्योंकि ब्रह्मज्ञानके सिवा अन्य कोई नाशक नहीं है।

इस * प्रकारकी शङ्काके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि जैसे कतकरज जलके साथ सम्बन्ध पाकर अपने संयोगसे पूर्व जलके साथ सम्पृक्त अन्य


† तात्पर्य यह है कि द्व्यणुकनाशके प्रति परमाणुनाश प्रयोजक नहीं हो सकता है, क्योंकि परमाणु नित्य है, इसलिए द्व्यणुकमें विद्यमान अग्निके संयोगसे ही द्व्यणुकका विनाश मानना होगा। अवयवविभागकी प्रक्रियाका अवलम्बन करके प्रकृतमें समाधान नहीं हो सकता है, क्योंकि अवयवविभागकी प्रक्रियाका पहले निरास किया जा चुका है। इसलिए अग्निसंयोगमें अपने उपादानभूत पटकी नाशकता भ्रान्त नहीं है।

* समाधानका तात्पर्य यह है कि ब्रह्मज्ञानसे व्यतिरिक्त समस्त पदार्थका ब्रह्मज्ञानसे नाश होगा, पीछे अवशिष्ट ब्रह्मज्ञानका नाश होगा, इस प्रकार क्रम नहीं माना जाता है, किन्तु ब्रह्मज्ञानसे जब अपने विलासके सहित अविद्याका विनाश प्रसक्त होगा उसीके साथ साथ ब्रह्मज्ञानका भी नाश होगा अपने नाशके प्रति ब्रह्मज्ञान भी कारण माना जाता है। यह भी

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५०४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

स्वविश्लेषमपि जनयति, तथाऽऽत्मन्यध्यस्यमानं ब्रह्मज्ञानं पूर्वाध्यस्तसर्वप्रपञ्चं निवर्तयत् स्वात्मानमपि निवर्तयतीति केचित् ।

अन्ये तु अन्यन्निवर्त्य स्वयमपि निवृत्तौ दग्धलोहपीताम्बुन्यायमुदाहरन्ति ।

अपरे त्वत्र दग्धतृणकूटदहनोदाहरणमाहुः । न च ध्वंसस्य प्रतियोग्यतिरिक्तजन्यत्वनियमः, अप्रयोजकत्वात् । निरिन्धनदहनादिध्वंसे व्यभिचाराच्च । न च ध्वंसस्य प्रतियोगिमात्रजन्यत्वेऽतिप्रसङ्गात् कारणा-


रजका पृथक्करण करके अपने विश्लेषको भी उत्पन्न करता है, वैसे ही आत्मामें अध्यस्त ब्रह्मज्ञान पूर्वके अध्यस्त समस्त प्रपञ्चकी निवृत्ति करके अपने आपकी भी निवृत्ति करता है।

कुछ लोग तो इस विषयमें अन्यकी निवृत्ति करके अपनी निवृत्तिमें दग्धलोहपीताम्बुन्यायको † दृष्टान्तरूपसे देते हैं ।

अन्य कुछ लोग दग्धतृणकूटदहनको * दृष्टान्तरूपसे कहते हैं । यदि शङ्का हो कि ध्वंस प्रतियोगीसे भिन्न कारणसे उत्पन्न होता है, यह नियम है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त नियमके अङ्गीकारमें कोई प्रमाण नहीं है, और इन्धनशून्य अग्नि आदिके ध्वंसमें व्यभिचार भी है । (तात्पर्य यह है इन्धनोंका निःशेष ध्वंस होनेके पश्चात् अग्निका स्वतः ही नाश देखा जाता है, एवं सुषुप्तिके अव्यवहित पूर्वकालमें जो ज्ञानका विनाश होता है, वह भी प्रतियोगिमात्रसे होता है, अतः उक्त नियममें व्यभिचार दोष है, अतः प्रयोजकशून्य निरर्थक नियमका अङ्गीकार नहीं करना चाहिए) । यदि शङ्का हो कि


शङ्का नहीं हो सकती है कि एक वस्तु अपने और दूसरेके नाशके प्रति कारण कैसे हो सकती है, क्योंकि कतकरजमें (निर्मली जिससे मलिन जल साफ होता है) स्व और परकी विरोधिता देखी जाती है, अतः यह पूर्वपक्ष युक्त नहीं है कि सब प्रपञ्चका ब्रह्मज्ञानसे भले ही नाश हो परन्तु ब्रह्मज्ञानका नाश नहीं होगा, क्योंकि अन्य नाशक नहीं है, क्योंकि ब्रह्मज्ञानका ब्रह्मज्ञानसे ही नाश उक्त रीतिसे हो सकता है ।

† 'दग्धलोहपीताम्बुन्याय' यह न्याय इस प्रकारका है कि जैसे अग्निसे तपे हुए लोहेके गोलेमें पानी यदि फेंका जाय, तो उस जलका लोहेमें रहनेवाला अग्नि नाश करता है और स्वयं भी नष्ट हो जाता है, वैसे ही प्रकृतमें ब्रह्मज्ञान भी अपनेसे व्यतिरिक्त सम्पूर्ण प्रपञ्चका विनाश करता है और स्वयं भी नष्ट हो जाता है ।

* जैसे अग्नि तृणके समुदायको नष्ट करती है, और स्वयं भी नष्ट हो जाती है, वैसे ही ब्रह्मज्ञान सम्पूर्ण प्रपञ्चका विनाश करके स्वयं भी नष्ट हो जाता है, यह तात्पर्य है ।

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ब्रह्मज्ञानके नाशकका विचार ] भाषानुवादसहित ५०५


न्तरमवश्यं वाच्यम्, निरिन्धनदहनादिध्वंसेऽपि कालादृष्टेश्वरेच्छादिकार- णान्तरमस्तीति वाच्यम्, अतिप्रसङ्गापरिज्ञानात् । न च घटादिध्वंस- स्यापि कारणान्तरनिरपेक्षत्वं स्यादित्यतिप्रसङ्गः, ध्वंसमात्रे कारणान्तर- नैरपेक्ष्यानभिधानात् । न च घटध्वंसदृष्टान्तेन ब्रह्मज्ञानध्वंसस्य कारणान्तरा- पेक्षासाधनम्, तद्दृष्टान्तेन मुद्गरपतनापेक्षाया अपि साधनापत्तेः । नापि ज्ञानध्वंसत्वसाम्याद् घटज्ञानादिध्वंसस्यापि कारणान्तरनैरपेक्ष्यं स्यादित्य- तिप्रसङ्गः, सेन्धनानलध्वंसस्य जलसेकाद्यदृष्टकारणापेक्षत्वेऽपि निरि- न्धनानलध्वंसस्य तदनपेक्षत्ववद्, जाग्रज्ज्ञानध्वंसस्य विरोधिविशेषगुणा-


ध्वंसको केवल प्रतियोगिजन्य माना जायगा, तो अतिप्रसङ्ग होगा, इसलिए उसके प्रति अवश्य कारणान्तर भी मानना चाहिए, और निरिन्धन दहन आदिके ध्वंसमें भी काल, अदृष्ट, ईश्वर आदि अन्य कारण हैं ही, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अतिप्रसङ्गोंका † परिज्ञान हो ही नहीं सकता है । यदि कहें कि घट आदिके ध्वंसको भी कारणान्तरनिरपेक्षत्व प्रसक्त होगा, यही अतिप्रसङ्ग है, तो यह भी अयुक्त है, क्योंकि हम सम्पूर्ण ध्वंसके प्रति कारणान्तरकी निरपेक्षता नहीं कहते हैं, और यदि घटध्वंसके दृष्टान्तसे ब्रह्मज्ञानध्वंसको कारणान्तरकी अपेक्षा मानें, तो उसी घटध्वंसके दृष्टान्तसे मुद्गरपातकी अपेक्षाका भी साधन प्रसक्त होगा । और ज्ञानध्वंसत्वके दृष्टान्तसे घटज्ञानध्वंसके प्रति भी अन्य कारणकी निरपेक्षता प्रसक्त होगी, इस प्रकार भी अतिप्रसङ्ग नहीं दे सकते हैं, क्योंकि जैसे इन्धनसे युक्त वह्निके ध्वंसके प्रति जलसिञ्चन आदि अन्य कारणकी अपेक्षा होनेपर भी इन्धनरहित अग्निध्वंसके प्रति कारणान्तरकी आवश्यकता नहीं होती है और जैसे जाग्रत्कालीन ज्ञानध्वंसोंके प्रति विरोधी अन्य विशेष


† यदि कोई शङ्का करे कि अतिप्रसङ्गोंका परिज्ञान क्यों नहीं होता है, तो इसपर कहना चाहिये कि ब्रह्मज्ञानका ध्वंस यदि प्रतियोगीसे अतिरिक्त कारणसे जन्य न हो, तो घटादिध्वंस भी, प्रतियोगीसे अतिरिक्त कारणसापेक्ष नहीं होगा, इस प्रकारका अतिप्रसङ्ग है अथवा घटादिध्वंसके समान ब्रह्मज्ञानका ध्वंस भी प्रतियोगीसे अतिरिक्त कारणसे सापेक्ष होगा, यह अतिप्रसङ्ग है अथवा ब्रह्मज्ञानके ध्वंसके समान घटादिज्ञानका ध्वंस भी कारणान्तरसे निरपेक्ष होगा यह अतिप्रसङ्ग है अथवा ब्रह्मज्ञानका अपनी उत्पत्तिके द्वितीय क्षणमें नाश होगा, यह अतिप्रसङ्ग है, इनमें से प्रत्येकका अग्रिम ग्रन्थसे खण्डन किया गया है ।

६४

५०६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

न्तरापेक्षत्वेऽपि सुषुप्तिपूर्वज्ञानध्वंसस्य तदनपेक्षत्ववच्च मूलाज्ञानानिवर्तक- ज्ञानध्वंसस्य कारणान्तरसापेक्षत्वेऽपि तन्निवर्तकज्ञानध्वंसस्य तदनपेक्षत्वो- पपत्तेः । नापि कारणान्तरनैरपेक्ष्ये स्वोत्पत्त्युत्तरक्षणे एव नाशः स्यादित्य- तिप्रसङ्गः । इष्टापत्तेः, तदुत्पत्त्युत्तरक्षणे एव ब्रह्माध्यस्तनिखिलप्रपञ्चदाहेन तदन्तर्गतस्य तस्यापि तदैव दाहाभ्युपगमात् । निरिन्धनदहनध्वंसन्यायेन ब्रह्मज्ञानध्वंसस्यापि कालादृष्टेश्वरेच्छादिकारणान्तरजन्यत्वेऽप्यविरोधाच्च । सर्वप्रपञ्चनिवृत्यनन्तरमेकशेषस्य ब्रह्मज्ञानस्य निवृत्तिरित्यनभ्युपगमेन युगपत्


गुणोंकी अपेक्षा होनेपर भी सुषुप्तिके पूर्वकालीन ज्ञानध्वंसके प्रति उनकी अपेक्षा नहीं होती है, वैसे ही मूलाज्ञानके अनिवर्तक ज्ञानके ध्वंसके प्रति-कारणान्तरकी अपेक्षा होनेपर भी मूलाज्ञानके निवर्तक ज्ञानके ध्वंसके प्रति कारणान्तरकी अपेक्षा न मानना युक्तियुक्त ही है। और यह भी अतिप्रसङ्ग नहीं हो सकता है कि ब्रह्मज्ञानके ध्वंसके प्रति कारणान्तरकी अपेक्षा न मानी जाय, तो ब्रह्मज्ञानकी उत्पत्तिके उत्तरक्षणमें ही नाशकी उसके प्रसक्ति होगी, क्योंकि यह तो इष्ट ही है, कारण कि ब्रह्मज्ञानकी उत्पत्तिके द्वितीय क्षणमें ही ब्रह्ममें अध्यस्त सकल प्रपञ्चका दाह होनेसे प्रपञ्चके अन्तर्गत ब्रह्मज्ञानका भी उसी उत्तरक्षणमें विनाश माना जाता है। और इन्धनशून्य अग्निके ध्वंसके उदाहरणसे यह भी मान लिया जाय कि ब्रह्मज्ञानके ध्वंसके प्रति * काल, अदृष्ट, ईश्वरकी इच्छा आदि अन्य कारण हैं, तो भी कोई विरोध नहीं है। कारण कि सब प्रपञ्चकी निवृत्तिके बाद एक अवशिष्ट ब्रह्मज्ञानकी निवृत्ति होती है, ऐसा स्वीकार न होनेसे एक ही कालमें सब


* कार्यमात्रके प्रति काल, अदृष्ट आदि कारण होते हैं, अतः ब्रह्मज्ञानके ध्वंसके प्रति यदि वे कारण मानें जांय, तो कोई हानि नहीं है, यदि यहां पर यह शङ्का हो कि पहले ब्रह्मज्ञानकी उत्पत्ति हुई, पीछे वासनासहित अविद्याकी निवृत्ति और इसके बाद तृतीय क्षणमें ब्रह्मज्ञानकी निवृत्ति होगी, इस प्रकार यदि क्रम स्वीकार किया जाय, तो ब्रह्मज्ञाननाशके पूर्वक्षणमें काल आदिकी अवस्थिति न होनेके कारण ब्रह्मज्ञानके नाशके प्रति उनमें हेतुता कैसे आ सकती है, तो यह शङ्का युक्त नहीं है, कारण कि 'सब प्रपञ्चकी निवृत्तिके पीछे एक ब्रह्मज्ञान बचता है' इस प्रकार नहीं माना जाता है, किन्तु ब्रह्मज्ञानसे एक ही क्षणमें सभीका विनाश होता है, ऐसा माना जाता है, इसलिए पूर्वक्षणमें काल, अदृष्ट आदि अवश्य कारणरूपसे रह सकते हैं, यह भाव है।

ब्रह्मज्ञानके नाशंका विचार ] भाषानुवादसहित ५०७


सर्वदाहे पूर्वक्षणे चिदविद्यासम्बन्धरूपस्य द्रव्यान्तररूपस्य वा कालस्य, ईश्वरप्रसादरूपस्यान्तःकरणगुणविशेषस्य वाऽदृष्टस्य, अन्येषां च सत्त्वात् । न च तत्र ज्ञानातिरिक्तकारणापेक्षे ब्रह्मज्ञानस्यामिथ्यात्वप्रसङ्गः, ज्ञानैक-निवर्त्यत्वं मिथ्यात्वमित्यभ्युपगमादिति वाच्यम्; ज्ञानाघटितसामग्र्यनि-वर्त्यत्वे सति ज्ञाननिवर्त्यत्वस्य तदर्थत्वात् । 'नान्यः पन्थाः' इति श्रुतेरपि तत्रैव तात्पर्यात् । अतो युक्त एव दग्धदाह्यदहनादिन्यायः ।


प्रपञ्चके विनाशके प्रति पूर्वकालमें चित् और अविद्याका सम्बन्धरूप अथवा द्रव्या-न्तररूप काल, ईश्वरका प्रसादरूप अथवा अन्तःकरणका गुणविशेषरूप अदृष्ट, ईश्वर और दिशा आदि साधारण कारण विद्यमान हैं । यदि शङ्का हो कि ब्रह्मज्ञानके ध्वंसमें ज्ञानसे अतिरिक्त कारणकी अपेक्षा मानी जाय, तो ब्रह्मज्ञानमें सत्यत्वकी प्रसक्ति होगी ? क्योंकि मिथ्यात्वका लक्षण यही माना गया है कि जो केवल ज्ञानसे निवर्त्यमान हो वह मिथ्यात्व है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि मिथ्या-त्वका लक्षण यही है—ज्ञानसे अघटित सामग्रीसे * अनिवर्त्य होकर जो ज्ञानसे निवर्त्य हो, 'नान्यः पन्थाः०' (ज्ञानको छोड़कर मुक्तिके लिए अन्य मार्ग नहीं है) इस श्रुतिका भी उसीमें तात्पर्य है, इसलिए दग्धदाह्यदहनादिन्याय युक्त ही है ।


* ज्ञानसे अघटित जो सामग्री उससे निवर्त्य न हो करके जो ज्ञानसे निवृत्त होता हो, वही मिथ्या है, जो लोग प्रपञ्चको सत्य मानते हैं उनके मतमें भी ज्ञानसे घटादिकी निवृत्ति होती है, क्योंकि 'मैं घटका विनाश करता हूं' इस प्रकारके ज्ञानके अनन्तर ही मुद्गरके प्रहारसे घटका विनाश देखा जाता है, अतः उनके प्रपञ्चके मिथ्यात्वके परिहारके लिए प्रथम सत्यन्त पद दिया गया है, उनके मतमें घटादिके विनाशमें नियमतः ज्ञानपूर्वकत्वके न होनेसे ज्ञानाघटित सामग्रीसे निवृत्त होनेवाले घटादिमें ज्ञानाघटितसामग्रीसे अनिवर्त्यत्व नहीं है । यदि शङ्का हो कि प्रपञ्च-सत्यवादियोंके मतमें नाशमात्र ईश्वरीयज्ञानघटित सामग्रीजन्य है, अतः ईश्वरके ज्ञानको लेकर कार्यमात्रमें ज्ञानाघटितसामग्र्यनिवर्त्यत्वे सति ज्ञाननिवर्त्यत्वरूप मिथ्यात्व है, इसलिए इस प्रकारका मिथ्यात्व भी युक्तिमुक्त नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'ज्ञानाघटित' इत्यादि लक्षणमें जो ज्ञानपद है, वह जीवके ज्ञानके अभिप्रायसे कहा गया है अतः उक्त दोष नहीं है । विशेष्य दल दिया है—आत्मामें दोषके निवारणके लिए है, इसीलिए 'नान्यः पन्थाः' इत्यादि श्रुतिका तात्पर्य यह नहीं है कि मोक्षके प्रति केवल ज्ञान ही कारण है और अन्य कारण नहीं है, किन्तु जो कारण है, वह ज्ञानसे अघटित नहीं है, किन्तु ज्ञानघटित है, अतः कार्यमात्रके प्रति कालादिके कारण होनेसे मूलाज्ञानध्वंसरूप मोक्षमें भी उनको कारण माना जाय, तो भी इस श्रुतिके साथ विरोध नहीं है, यह भाव है ।

५०८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ तृतीय परिच्छेद


आहुरन्ये तु वृत्तीद्ध आत्मैवाज्ञानतत्कृतम् ।
प्रदहेत्सूर्यकान्तेद्धा सूर्यकान्तिस्तृणं यथा ॥ ३५ ॥

कुछ लोग कहते हैं कि वृत्तिमें आरूढ़ आत्मा ही अज्ञान और अज्ञानकृत प्रपञ्चका निवर्तक है, जैसे किं सूर्यकान्त मणिके ऊपर आरूढ़ सूर्यकी किरणें तृणको दग्ध करती हैं ॥ ३५ ॥

केचित्तु वृत्तिरूपं ब्रह्मज्ञानं नाज्ञानतन्मूलप्रपञ्चनिवर्हकम्, अज्ञानस्य प्रकाशनिवर्त्यत्वनियमेन जडरूपवृत्तिनिवर्त्यत्वायोगात् । किन्तु तदारूढचैतन्यप्रकाशस्तन्निवर्तकः, स्वरूपेण तस्याज्ञानादिसाक्षितया तदनिवर्तकत्वेऽप्यखण्डाकारवृत्त्युपारूढस्य तस्य तन्निवर्तकत्वोपपत्तेः ।

'तृणादेर्भासिकाऽप्येषा सूर्यदीप्तिस्तृणं दहेत् ।
सूर्यकान्तमुपारुह्य तन्न्यायं तत्र योजयेत् ॥'

इत्यभियुक्तोक्तेः । एवं च यथा किञ्चित् काष्ठमुपारुह्य ग्रामनगरादिकं दहन् वह्निर्दहत्येव तदपि काष्ठम्, तथा चरमवृत्तिमुपारुह्य निखिलप्रपञ्च-


कुछ लोग कहते हैं कि वृत्तिरूप ब्रह्मज्ञान अज्ञान और अज्ञानमूलक प्रपञ्चका विनाशक नहीं है, क्योंकि अज्ञानकी निवृत्ति प्रकाशसे होती है, इसलिए जडरूप वृत्तिसे अज्ञानकी निवृत्ति हो नहीं सकती, किन्तु वृत्तिमें आरूढ़ जो चैतन्यात्मक प्रकाश है, वह उसका निवर्तक है, यद्यपि स्वरूपतः चैतन्य अज्ञान आदिका साक्षी है, अतः अज्ञानका निवर्तक नहीं है, तथापि अखण्डाकार वृत्तिमें आरूढ़ होकर वह अज्ञानका निवर्तक होता है ।

'तृणादेः०' (यद्यपि सूर्यकी कान्ति तृण आदिकी प्रकाशिका है, तथापि सूर्यकान्तमणिमें आरूढ़ होकर तृण आदिको दग्ध करती है, यही न्याय प्रकृतमें भी लगाना चाहिए, इस प्रकारकी पण्डितोंकी उक्ति भी है । एवञ्च ⁕ जैसे किसी काष्ठका अवलम्बन कर अग्नि ग्राम, नगर आदिका दाह करता हुआ उस काष्ठका भी दाह करता है, वैसे चरमवृत्तिका अवलम्बनका


⁕ कुछ लोग शङ्का करते हैं कि सूर्यकान्तमणिमें आरूढ सूर्यकी कान्ति उस मणिसे भिन्न तृण आदिका जैसे विनाश करती है, मणिका विनाश नहीं करती है, वैसे ही वृत्तिमें आरूढ चैतन्य वृत्तिसे व्यतिरिक्त अज्ञान आदिका विनाश करता है, वृत्तिको नहीं, इसलिए ब्रह्मज्ञानका नाश कैसे हो सकता है, क्योंकि अन्य नाशक नहीं है—इस शङ्काका समाधान करनेके लिए 'प्रपञ्च' यह ग्रन्थ है ।

[ ब्रह्मज्ञानके नाशकका विचार ] भाषानुवादसहित ५०९


मुन्मूलयन्नखण्डचैतन्यप्रकाशस्तन्निवर्तनेऽपि प्रकल्पते इति न तन्नाशे काचिदनुपपत्तिरित्याहुः ।

उपादानक्षयादन्ये विश्वोच्छेदं प्रचक्षते ।
जीवन्मुक्तस्य भोगोऽत्राविद्यालेशेन युज्यते ॥ ३६ ॥

अन्य लोग कहते हैं कि उपादानके नष्ट होनेसे ही सम्पूर्ण प्रपञ्चका नाश होता है और जीवन्मुक्त पुरुषको अविद्याके लेशसे भोग हो सकता है ॥ ३६ ॥

इति श्रीगङ्गाधरसरस्वतीविरचितवेदान्तसिद्धान्तसूक्तिमञ्जर्यां
तृतीयः परिच्छेदः ।

अन्ये तु ब्रह्मज्ञानमज्ञानस्यैव निवर्तकम्, ज्ञानाज्ञानयोरेव साक्षाद्विरोधात् । प्रपञ्चस्य तूपादाननाशान्नाश इति प्रपञ्चान्तर्गतस्य ब्रह्मज्ञानस्यापि तत एव नाशः । न च प्रपञ्चस्य ज्ञानानिवर्त्यत्वे मिथ्यात्वानुपपत्तिः । प्रपञ्चनिवृत्तेस्साक्षाद् ज्ञानजन्यत्वाभावेऽपि ज्ञानजन्याज्ञाननाशजन्यत्वात् । 'साक्षात् परम्परया वा ज्ञानैकनिवर्त्यत्वं मिथ्यात्वम्' इत्यङ्गीकारात् । एवं च तत्त्वसाक्षात्कारोदयेऽपि जीवन्मुक्तस्य देहादिप्रतिभास उपपद्यते । प्रारब्धकर्मणा प्रतिबन्धेन तत्त्वसाक्षात्कारोदयेऽपि प्रारब्धकर्मतत्कार्यदेहादि-


कर सम्पूर्ण प्रपञ्चका उच्छेद करता हुआ चैतन्यात्मक प्रकाश चरमवृत्तिके विनाश करनेमें भी समर्थ होता है, इसलिए उसके विनाशमें कोई अनुपपत्ति नहीं है ।

अन्य कुछ लोग कहते हैं कि ब्रह्मज्ञान अज्ञानका ही निवर्तक है । क्योंकि ज्ञान और अज्ञानका साक्षात् विरोध है, प्रपञ्चका तो उपादानके नाशसे नाश होता है, इसलिए प्रपञ्चके अन्तर्गत ब्रह्मज्ञानका भी उपादानके नाशसे नाश होता है । यदि शङ्का हो कि प्रपञ्चकी निवृत्ति ज्ञानसे न मानी जाय, तो मिथ्यात्वकी अनुपपत्ति होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रपञ्चनिवृत्ति यद्यपि साक्षात् ज्ञानजन्य नहीं है, तथापि ज्ञानजन्य अज्ञान नाशसे जन्य है, अतः मिथ्यात्वकी उपपत्ति हो सकती है, क्योंकि साक्षात् अथवा परम्परया केवल ज्ञाननिवर्त्यत्वको मिथ्यात्वका अङ्गीकार किया जाता है, एवञ्च * तत्त्वसाक्षात्कारके उत्पन्न होनेपर भी जीवन्मुक्त पुरुषको

५१०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

प्रतिभासानुवृत्त्योपादानावियालेशानुकृत्त्युपपत्तेः। अज्ञानवत् प्रपञ्चस्यापि साक्षाद् ब्रह्मसाक्षात्कारनिवर्त्यत्वे नायमुपपद्यते । विरोधिनेि ब्रह्मसाक्षात्कारे सति प्रारब्धकर्मणः स्वयमेवावस्थानासम्भवेनाविद्यालेशनिवृत्तिप्रतिबन्धकत्वायोगादित्याहुः ।

इति श्रीसिद्धान्तलेशसंग्रहे तृतीयः परिच्छेदः समाप्तः ।


देहादिप्रतिभासकी उपपत्ति हो सकती है, कारण कि प्रारब्ध कर्मके † प्रतिबन्धक होनेके कारण तत्त्वसाक्षात्कारके उदित होनेपर भी प्रारब्ध कर्म और उसके कार्य देहादिप्रतिभासकी अनुवृत्तिसे उपादानभूत अविद्यालेशकी अनुवृत्ति उपपन्न हो सकती है। यदि अज्ञानके समान प्रपञ्चको भी ब्रह्मसाक्षात्कारसे साक्षात् निवर्त्य माना जाय, तो जीवन्मुक्तके देहादि प्रतिभासकी उपपत्ति नहीं हो सकेगी, क्योंकि ब्रह्मसाक्षात्काररूप विरोधीके होनेसे प्रारब्ध कर्मकी स्वतः अवस्थिति न होनेके कारण अविद्यालेशनिवृत्तिके प्रति प्रतिबन्धकत्वका सम्भव नहीं है ।

श्रीसिद्धान्तलेशके वेदान्ताचार्य श्री पं० मूलशङ्करव्यासविरचित भाषानुवादमें तृतीय परिच्छेद समाप्त ।

चतुर्थः परिच्छेदः ।

अविद्यालेशका निरूपण ] भाषानुवादसहित ५११


ॐ नमः परमात्मने चतुर्थः परिच्छेदः ।


अथ कोऽयमविद्याया लेशो यदनुवर्तनात् ।
देहादेः प्रतिभासेन जीवन्मुक्तिरिहोच्यते ॥ १ ॥

अब शङ्का होती है कि यह अविद्यालेश क्या चीज है, जिसके अनुवर्तनसे देह आदिका प्रतिभास होनेसे यहाँ जीवन्मुक्ति कही जाती है ॥ १ ॥

अथ कोऽयमविद्यालेशः, यदनुवृत्त्या जीवन्मुक्तिः ? ।
ज्ञानेनावरणे नष्टे विक्षेपांशोऽनुवर्तते ।
प्रारब्धप्रतिबन्धेन स लेशस्तेन जीवनम् ॥ २ ॥

ज्ञानसे आवरणके नष्ट होनेपर भी प्रारब्ध कर्मसे जो अज्ञानका विक्षेपांश अनुवृत्त होता है, वही अविद्याका लेश है, और उसीसे जीवन है ॥ २ ॥

आवरणविक्षेपशक्तिमत्या मूलाविद्यायाः प्रारब्धकर्मवर्तमानदेहाद्यनुवृत्तिप्रयोजको विक्षेपशक्त्यंश इति केचित् ।


✻ अब यह अविद्यालेश क्या चीज है, जिसके अनुवर्तनसे जीवन्मुक्ति कहलाती है ।

† इस प्रश्नके उत्तरमें कुछ लोग कहते हैं कि आवरण और विक्षेप-शक्तिसे युक्त मूलाविद्याका—प्रारब्ध कर्म और वर्तमान शरीर आदिकी अनुवृत्तिमें प्रयोजकीभूत—जो विक्षेपशक्ति अंश है, वही अविद्याका लेश है ।


* तृतीय परिच्छेदमें मुक्तिके साधन ब्रह्मज्ञानका निरूपण बड़े ऊहापोहके साथ किया गया है, इस चतुर्थ परिच्छेदमें ब्रह्मज्ञानकी फलभूत मुक्तिका निरूपण किया जाता है, इसलिए 'अथ कोऽयम्' इस मूल ग्रन्थमें पढ़े हुए अथशब्दका साधननिरूपणके लिए प्रस्तुत तृतीय परिच्छेदके अनन्तर—यह अर्थ है । शङ्काका तात्पर्य यह है कि 'अविद्यालेश' शब्दमें लेशशब्दका अवयव अर्थ है, परन्तु अविद्याका अवयव नहीं हो सकता है, क्योंकि अविद्या सावयव नहीं है, कारण कि जो कार्य होता है, वही सावयव होता है, इसलिए अविद्यालेश हो ही नहीं सकता है ।

† अविद्यामें दो प्रकार की शक्तियाँ होती हैं, एक तो आवरणशक्ति और दूसरी विक्षेपशक्ति, उनमेंसे वृत्त्यात्मक आत्मसाक्षात्कारसे अविद्याकी आवरणशक्तिका विनाश होता है, और जो

५१२ : सिद्धान्तलेशसंग्रह [ चतुर्थ परिच्छेद

क्षालितेष्विव हिङ्ग्वादिपात्रेष्वन्ये तु वासना ।

कुछ लोग कहते हैं कि हिंग आदिके पात्रोंके धोनेपर भी जैसे उसकी वासना रह जाती है, वैसे ही अज्ञान की वासना का रहना ही अविद्याका लेश है ।

क्षालितलशुनभाण्डानुवृत्तलशुनवासनाकल्पोऽविद्यासंस्कार इत्यन्ये ।


‡ कुछ लोग कहते हैं कि अत्यन्त स्वच्छ किये हुए लशुनके पात्रमें अनुवर्तमान लशुनकी वासनाके समान अनुवर्तमान अविद्याकी वासना ( संस्कार ) ही अविद्याका लेश है ।


विक्षेपशक्तियुक्त अविद्या है, उसका—प्रतिबन्धकीभूत प्रारब्धकर्मके क्षीण होनेपर पूर्वमें अनावृतरूपसे अवस्थित चैतन्य ही—विनाशक है, ऐसा स्वीकार होनेसे तत्त्वज्ञानसे विक्षेपशक्तियुक्त अविद्यारूप अविद्यालेशकी निवृत्ति न होनेसे उसका विनाशक कौन है, इस प्रकारकी शङ्का ही नहीं हो सकती है, यह तात्पर्य है ।

‡ तात्पर्य यह है कि तत्त्वज्ञानसे अन्तःकरणकी उपादानभूत अविद्याकी निवृत्ति होनेपर भी अविद्याजन्य कोई देहकी अवस्थितिमें प्रयोजक वासनाविशेष रहता है, उसी वासनाविशेषको अविद्यालेश कहा जाता है । यदि इसमें शङ्का की जाय कि उपादानभूत अविद्याका नाश होनेपर कार्यका अवस्थान कैसे होगा ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे अन्य मतावलम्बी पटके नाशक्षणमें पटके रूपादिककी अवस्थिति मानते हैं, वैसे ही हमारे मतमें भी उपादानके नाश होनेपर भी वासनाविशेषकी अवस्थिति माननेमें कोई हानि नहीं है। यदि शङ्का हो कि समवायिकारणका नाशरूप जो अनवस्थितिमें कारण है, उसकी प्रतीक्षासे उपादानके अभावकालमें भी रूपादिककी अवस्थिति हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस परिस्थितिमें तो प्रकृतमें भी तत्त्वज्ञानसे उत्पन्न देहादिके प्रति उपादानभूत अविद्याका विनाश, जो देहादिके विनाशमें कारणभूत है, प्रारब्धकर्मसे प्रतिवद्ध है, इसलिए प्रतिबन्धकरहित अविद्याके विनाशकी प्रतीक्षासे देह आदिकी भी अवस्थिति हो सकती है । यदि शङ्का हो कि प्रारब्धकर्मको प्रतिबन्धक मानना प्रमाणशून्य है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जीवन्मुक्तिप्रतिपादक शास्त्र और तत्त्ववेत्ताओंका अनुभव उसमें प्रमाण है । किञ्च, पट और उसके रूपकी एक ही क्षणमें निवृत्ति देखनेमें आती है, अतः परमतमें ही तथाविध अनियमस्वीकारमें प्रमाण नहीं है, इसीलिए विद्यारण्य स्वामीजीने कहा है कि

विना क्षोदक्षमं मानं तैर्वृथा परिकल्प्यते ।
श्रुतियुक्त्यनुभूतिभ्यो वदतां किं नु दुःशकम् ॥

: अर्थात् अन्यमतावलम्बी किसी प्रमाणविशेषके बिना वृथा ही वस्तुका अङ्गीकार करते हैं, तो हम लोगोंके लिए, जो कि श्रुति, युक्ति और अनुभवके अनुसार वस्तुकी सिद्धि कहते हैं, क्या असाध्य है ।

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अविद्यालेशका निरूपण] भाषानुवादसहित ५१३


नष्टानुवृत्तिमाचख्युरन्ये दग्धपटे यथा ॥ ३ ॥

जैसे दग्धपट में उसके आकारकी अनुवृत्ति होती है, वैसे कार्याक्षम मूलाविद्या ही अविद्याका लेश कहलाता है ॥ ३ ॥

दग्धपटन्यायेनानुवृत्ता मूलाविद्यैवेत्यपरे ।
विरोधिन्युदिते शेषासम्भवादर्थवादताम् ।
सर्वज्ञात्मगुरुः प्राह जीवन्मुक्तिश्रुतेः स्फुटम् ॥ ४ ॥

सर्वज्ञात्मगुरु कहते हैं कि विरोधी ब्रह्मज्ञानके उदित होनेपर कुछ भी अज्ञान आदि अवशिष्ट नहीं रह सकता, जीवन्मुक्तिप्रतिपादक श्रुति अर्थवादमात्र है ॥ ४ ॥

सर्वज्ञात्मगुरुवस्तु—विरोधिसाक्षात्कारोदये लेशतोऽप्यविद्याऽनुवृत्त्य-


✕ दग्धपटन्यायसे अनुवर्तमान मूलाविद्या ही अविद्याका लेश है ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ।
※ सर्वज्ञात्मगुरु तो इस प्रकारके पक्षको भी कहते हैं कि अविद्याके विरोधी तत्त्वसाक्षात्कारके उदित होनेपर लेशरूपसे भी अविद्याकी अनुवृत्ति


✕ 'दग्धपटन्यायेन' दग्धपटन्याय उसको कहते हैं—किसी वस्त्रके अग्निमें जल जानेपर भी उसका आकार पूर्ववत् ज्योंका त्यों देखा जाता है, परन्तु उससे परिधान आदि क्रिया नहीं हो सकती है, इसी प्रकार तत्त्वज्ञानसे मूलाविद्याका विनाश हो गया है, परन्तु वह दग्धपटके समान अनुवर्तमान और अपने कार्यमें असमर्थ है, अतः यही अनुवर्तमान अविद्या अविद्यालेश कही जाती है, यही इस मतका भाव है ।

  • इन सर्वज्ञात्म गुरुके मतमें जीवन्मुक्ति है ही नहीं, क्योंकि अज्ञानके विरोधी ज्ञानके होनेपर उस अज्ञानका अपने कार्यके साथ नाश होनेसे उसका अंश भी नहीं रह सकता है, जीवन्मुक्तिके प्रतिपादक जो 'तस्य तावदेव चिरम्' (उसको—तत्त्वज्ञानीको—मुक्त होनेके लिए उतनी ही देर है, जबतक कि उसकी शरीरसे मुक्ति न हो ) इत्यादि शास्त्र हैं, वे तो केवल श्रवण आदिमें प्रवृत्ति करानेके लिए हैं, अतः जीवन्मुक्तिके लिए अविद्याका लेश मानना या उसका निर्वचन करना सर्वथा अशक्य है, यह भाव है । वस्तुतस्तु 'तस्य तावदेव चिरम्' इत्यादि जीवन्मुक्तिके प्रतिपादक शास्त्र श्रवणादिके अर्थवाद हैं, तथापि वे सालम्बन हैं, क्योंकि निरालम्बन अर्थवाद नहीं हो सकता है, अतः अर्थवादके आलम्बनत्वरूपसे जीवन्मुक्तिका अङ्गीकार अवश्य करना होगा, और लोकमें रज्जुमें उत्पन्न हुए सर्पभ्रमकी रज्जुतत्त्वके साक्षात्कारसे निवृत्ति होनेपर भी उस सर्पभ्रमके अभ्याससंस्कारसे फिर भी कुछ काल तक जैसे भय आदिकी अनुवृत्ति देखी जाती है, वैसे ही तत्त्वज्ञानसे अविद्याका विनाश होनेपर भी अविद्याके संस्कार कुछ काल तक रहते हैं, अतः उन संस्कारोंसे शरीरादिकी अनुवृत्ति होनेसे जीवन्मुक्तिकी

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५१४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ चतुर्थ परिच्छेद

सम्भवाद् जीवन्मुक्तिशास्त्रं श्रवणादिविध्यर्थवादमात्रम् । शास्त्रस्य जीवन्मुक्तिप्रतिपादने प्रयोजनाभावात् । अतः कृतनिदिध्यासनस्य ब्रह्मसाक्षात्कारोदयमात्रेण सविलासवासनाऽविद्यानिवृत्तिरित्यपि कश्चित् पक्षमाहुः ॥ १ ॥

का निवृत्तिरविद्यायाः ? ब्रह्मसिद्धिकृतां नये ।

  • आत्मैव, तदभावो हि मोहस्तत्संक्षयश्च सः ॥ ५ ॥

अविद्याकी निवृत्ति किसे कहते हैं ? इस प्रश्नके उत्तरमें ब्रह्मसिद्धिकार कहते हैं कि आत्मा ही अविद्याकी निवृत्ति है, अविद्यानिवृत्तिका अभाव मोह है और मोहका विनाश आत्मा है ॥ ५ ॥

अथ केयमविद्यानिवृत्तिः ? आत्मैवेति ब्रह्मसिद्धिकाराः ॥
न च तस्य नित्यसिद्धत्वाद् ज्ञानवैय्यर्थ्यम् , असति ज्ञानेऽनर्थहेत्व-


नहीं हो सकती है, इसलिए जीवन्मुक्तिका प्रतिपादक शास्त्र श्रवण आदि विधिक केवल अर्थवाद है, क्योंकि जीवन्मुक्तिके प्रतिपादनमें शास्त्रका कुछ भी प्रयोजन नहीं है, इससे जिस पुरुषने निदिध्यासन किया है, उस पुरुषको ब्रह्मसाक्षात्कारकी उत्पत्तिमात्रसे विलास ( कार्य ) और वासनाके साथ अविद्याकी निवृत्ति हो ही जाती है ॥ १ ॥

† अब शङ्का होती है कि अविद्याकी निवृत्ति क्या है ? [ अर्थात् प्रकृतमें अविद्याकी निवृत्तिका स्वरूप क्या है, यह प्रश्नका भाव है ] .
इस आक्षेपके समाधानमें ब्रह्मसिद्धिकार कहते हैं कि आत्मा ही अविद्याकी निवृत्ति है ।

यदि शङ्का हो कि आत्मा ही यदि अविद्याकी निवृत्ति है, तो उसकी स्वतःसिद्धि होनेसे अविद्याकी निवृत्तिके लिए तत्त्वज्ञान निरर्थक ही है ?


उपपत्ति हो सकती है, इसी गूढ़ अभिप्रायसे 'इत्यपि कश्चित्पक्षमाहुः' इसमें अपि शब्दका प्रयोग किया गया है ।
: † शङ्काका भाव है—यदि अविद्यानिवृत्ति पदार्थ आत्मरूप माना जाय, तो अविद्यानिवृत्ति ज्ञानजन्य नहीं होगी, क्योंकि वह नित्य ठहरी, यदि उसको अतिरिक्त मानें तो द्वैतापत्ति होगी, अतः अविद्यानिवृत्तिका स्वरूप क्या है, यह प्रश्नकर्ता पूछता है ।

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अविद्यानिवृत्तिके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहित ५१५

विद्याया विद्यमानतया अनर्थमपि तिष्ठेदिति तदन्वेषणात् । 'यस्मिन् सति अग्रिमक्षणे यस्य सत्त्वम्, यद्व्यतिरेके चाऽभावः, तत् तत्साध्यम्' इति

तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ज्ञानके न होनेपर अनर्थकी कारणीभूत अविद्याके विद्यमान होनेसे अनर्थकी अवस्थिति अवश्य होगी, इसलिए अनर्थ-निवृत्तिकी अभिलाषा करके ज्ञानकी अन्वेषणा हो सकती है [ पूर्वपक्ष तथा समाधानका तात्पर्य यह है कि यदि अविद्याकी निवृत्ति आत्मस्वरूप मानी जाय, तो अविद्यानिवृत्तिरूप आत्माके सर्वदा प्राप्त होनेसे उसकी प्राप्तिके लिए कोई भी यत्न करनेकी आवश्यकता नहीं है, इसलिए अविद्याकी निवृत्तिका हेतुभूत तत्त्वज्ञान व्यर्थ ही है। यह पूर्वपक्षीका कहना है । इसपर समाधान कर्ता पूर्वपक्षीसे पूछता है कि तत्त्वज्ञानको व्यर्थ बतलानेके पहले तुम्हें कहना चाहिए कि तत्त्वज्ञान क्यों व्यर्थ है, क्या तत्त्वज्ञानका कुछ प्रयोजन नहीं है, इसलिए तत्त्वज्ञान व्यर्थ है अथवा अविद्यानिवृत्तिके आत्मस्वरूप होनेपर उसके अनादि होनेसे ज्ञानके बिना भी वह सिद्ध है, अतः अविद्यानिवृत्ति ज्ञानसाध्य नहीं हो सकती इसलिए तत्त्वज्ञान व्यर्थ है ? इसमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि अनर्थनिवृत्तिके उद्देश्यसे ज्ञानसाधनके अनुष्ठानमें प्रवृत्ति हो सकती है, क्योंकि ज्ञानके न रहनेपर अनर्थकी हेतुभूत अविद्याके रहनेसे अनर्थका भी अवस्थान हो सकता है, इस प्रकार ज्ञानाभावदशामें अनर्थका सम्भव हो सकता है, इसलिए अनर्थनिवृत्तिके उद्देश्यसे ज्ञानके साधनोंके अनुष्ठानमें भी पुरुषकी प्रवृत्ति होती है, अतः प्रयोजनके अभावसे ज्ञान- व्यर्थ है, ऐसा नहीं कह सकते हो । द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि ]* जिसके रहनेपर उत्तर क्षणमें जिसकी सत्ता हो और जिसका अभाव होनेपर जिसका अभाव हो, वह उससे साध्य होता है, इस प्रकारके साध्यलक्षणके अनुरोधसे आत्मस्वरूप


* साध्यका लक्षण दो प्रकारका होता है, एक तो केवल सादिपदार्थके लिए जन्यत्वरूप और दूसरा सादि और अनादि पदार्थोंके लिए 'यस्मिन्सति' इत्यादिरूप, इसलिए आत्मस्वरूप अविद्यानिवृत्तिमें जन्यत्वरूप प्रथम लक्षणके न होनेपर भी द्वितीय लक्षण है, अतः अविद्यानिवृत्तिमें ज्ञानसाध्यत्वकी उपपत्ति हो सकती है। जैसे घटके प्रति मृत्तिका कारण है और घट मृत्तिकासे साध्य है, इसमें यह लक्षण घटता है, क्योंकि मृत्तिकाके रहनेपर उत्तरक्षणमें घटकी सत्ता है और मृत्तिकाके अभावमें घटका भी अभाव है, इसलिए घट मृत्तिकासे साध्य कहलाता है, इस प्रकार लक्षणसमन्वय करना चाहिए, यह भाव है।

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५१६सिद्धान्तलेशसंग्रहे[ चतुर्थ परिच्छेद

लक्षणानुरोधेनाऽऽत्मरूपाया अप्यविद्यानिवृत्तेः ज्ञानसाध्यत्वाच्च। ज्ञाने सति अग्रिमक्षणे आत्मरूपाविद्यानिवृत्तिसत्त्वम्, तद्व्यतिरेके तत्प्रतियोग्य- विद्यारूपस्तदभाव इति उक्तलक्षणसत्त्वात्।

आनन्दबोधाचार्यास्तु युक्तिभिः पञ्चमीं विधाम्। सदसत्सदसन्मिथ्याभिन्नामात्मनि तां विदुः॥ ६॥

आनन्दबोधाचार्य कहते हैं कि अविद्याकी निवृत्तिका पञ्चम प्रकार ही युक्तियोंसे सिद्ध होता है अर्थात् अविद्यानिवृत्ति सत्, असत्, सदसत् और अनिर्वचनीयसे भिन्न ही है ॥ ६ ॥

आत्मान्यैवाऽविद्यानिवृत्तिः। सा च न सती, अद्वैतहानेः। नाऽप्य- सती, ज्ञानसाध्यत्वायोगात्। नाऽपि सदसद्रूपा, विरोधात्। नाऽप्यनिर्वाच्या, अनिर्वाच्यस्य सादेरज्ञानोपादानकत्वनियमेन मुक्तावपि तदुपादानाज्ञाना- नुवृत्त्यापत्तेः, ज्ञाननिवर्त्यत्वापत्तेश्च। किन्तु उक्तप्रकारचतुष्टयोत्तीर्णा पञ्चमप्रकारेत्यानन्दबोधाचार्याः।

अविद्यानिवृत्ति ज्ञानसाध्य हो सकती है, क्योंकि ज्ञानके होनेपर उससे उत्तर क्षणमें आत्मरूप अविद्यानिवृत्तिकी सत्ता है और ज्ञानके न रहनेपर अविद्या- निवृत्तिकी प्रतियोगिभूत जो अविद्या है तद्रूप अभाव है अर्थात् अविद्या- निवृत्तिका अभाव है, इसलिए 'साध्यत्वका' उक्त लक्षण अविद्यानिवृत्तिमें घट जाता है।

आत्मासे भिन्न ही अविद्यानिवृत्ति पदार्थ है, और वह अविद्यानिवृत्ति पदार्थ सत्य नहीं है, क्योंकि उसे सत्य माननेसे अद्वैतकी हानि होगी, और असत् भी नहीं मान सकते, क्योंकि ऐसा माननेसे उसमें ज्ञानसाध्यत्व नहीं हो सकेगा, और सत् और असत्रूप भी नहीं मान सकते, क्योंकि सत्त्व और असत्त्वका विरोध होनेसे एकमें उन विरुद्ध दो धर्मोंका समावेश नहीं हो सकता है। और अज्ञाननिवृत्तिको अनिर्वचनीय भी नहीं मान सकते हैं, क्योंकि सादि अनिर्वाचनीय पदार्थोंके प्रति अज्ञान ही उपादानकारण होता है, ऐसा नियम होनेके कारण मुक्तिमें भी अपने उपादानकारण अविद्याकी अनुवृत्ति प्रसक्त होगी और मुक्तिमें ज्ञाननिवर्त्यत्वका भी प्रसङ्ग होगा। इसलिए उक्त चार प्रकारोंसे (सत्, असत्, सदसत् और अनिर्वचनीय इन चार प्रकारोंसे)

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अविद्यानिवृत्तिके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहित ५१७


उत्पत्तिरिव नाशोऽपि क्षणिका भावविक्रिया ।
अद्वैतविद्याचार्यास्तद्वृत्तिकालेति तां विदुः ॥ ७ ॥

उत्पत्तिके समान विनाश भी अविद्यावृत्तिकालिक क्षणिक भावका विकार ही है, अतः अनिर्वचनीय है, ऐसा अद्वैतविद्याचार्य कहते हैं ॥ ७ ॥

अविद्यावत्तन्निवृत्तिरप्यनिर्वाच्यैव । न च तदनुवृत्तौ तदुपादानाज्ञानस्याप्यनुवृत्तिनियमाद् अनिर्मोक्षप्रसङ्गः, तदनुवृत्तौ प्रमाणाभावात्; उत्पत्तेः

विलक्षण कोई पञ्चम प्रकार ही अविद्यानिवृत्ति है, ऐसा आनन्दबोधाचार्य * कहते हैं ।

अविद्या जैसे अनिर्वचनीय है, वैसे ही अविद्याकी निवृत्ति भी अनिर्वचनीय है । यदि शङ्का हो कि मुक्तिमें अविद्यानिवृत्तिकी अनुवृत्ति होगी, तो उसके उपादानभूत अविद्याकी भी अनुवृत्ति होनेसे अनिर्मोक्षकी प्रसक्ति होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अज्ञाननिवृत्तिकी अनुवृत्तिमें कोई प्रमाण ही नहीं है, कारण कि जैसे † घटादि पदार्थोंकी उत्पत्ति केवल


* इस विषयमें आनन्दबोधाचार्यजीका विस्तृत विचार उनके बनाये हुए न्यायमकरन्द ग्रन्थमें देखना चाहिए [ पृ० ३५२ काशी चौखम्भा मुद्रित ] उसका कुछ अंश इस प्रकार है:—

नन्विद्याक्षतेः सत्त्वे सद्वितीयत्वमात्मनः ।
मिथ्याभावे त्वनिर्मोक्षो मूलाविद्याव्यवस्थितेः ॥

उक्तमेतदविद्यास्तमयो मोक्ष इति । तत्रैतद्विचायते—स किं सत्यो मिथ्या वेति..................... अतः कथमविद्याव्यावृत्तिमोंक्ष इति ।

न सन्नासन्न सदसन्नानिर्वाच्योऽपि तत्क्षयः ।
यक्षानुरूपो हि बलिरित्याचार्या व्यचीचरन् ॥

अर्थात् अविद्यानिवृत्तिको सत्य मानें, तो द्वैतापत्ति होगी, उसे मिथ्या मानें, तो अविद्याका अवस्थान प्रसक्त होगा क्योंकि मिथ्याभाव अविद्या अथवा अविद्याका कार्य होता है, इसलिए अनिर्मोक्ष प्रसक्त होगा, पूर्वमें जो अविद्यास्तमय मोक्ष कहा गया है उसके वारेमें विचार किया जाता है कि वह सत्य है या मिथ्या........................इस प्रकारके अनेक सत्यत्वादि विकल्पोंसे अविद्यानिवृत्तिका निर्वचन नहीं हो सकता, इसलिए अविद्यानिवृत्ति मोक्ष कैसे हो सकती है । इसपर कहते हैं—अविद्यानिवृत्ति सत् नहीं है, असत् नहीं है, सदसत् नहीं है और अनिर्वाच्य भी नहीं है, किन्तु इन चार कल्पोंसे भिन्न पञ्चम प्रकार ही अविद्यानिवृत्ति है, यह भाव है ।

† भाव यह है कि जो पदार्थ उत्पन्न होते हैं, उनमें उत्पत्ति नामका एक भावरूप विकार है, जो केवल एक ही क्षणमें याने उत्पत्त्यवच्छिन्न कालमें ही रहता है, सर्वदा नहीं रहता, यह अनुभवसिद्ध है, वैसे ही निवृत्ति भी (विनाश भी) पदार्थोंका भावरूप धर्म ही है, जो

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प्रथमसमयमात्रसंसर्गीभावविकारत्ववद् निवृत्तेरपि चरमसमयमात्रसंसर्गी-

५१८ : सिद्धान्तलेशसंग्रह [ चतुर्थ परिच्छेद


प्रथमसमयमात्रसंसर्गीभावविकारत्ववद् निवृत्तेरपि चरमसमयमात्रसंसर्गी- भावविकारत्वोपपत्तेः। अत एव यथा पूर्वं पश्चाच्च 'उत्पत्स्यते, उत्पन्नः' इति भाविभूतभावेन व्यवह्रियमाणाया उत्पत्तेः प्रथमसमयमात्रे 'उत्पद्यते' इति वर्तमानव्यवहारः, तथा पूर्वं पश्चाच्च 'निवर्तिष्यते, निवृत्तः' इति भाविभूतभावेन व्यवह्रियमाणाया निवृत्तेश्चरमसमयमात्रे 'निवर्तते, नश्यति, ध्वंसते' इति वर्तमानव्यपदेशः। निवृत्तेरनुवृत्तौ तु चिरशकलितेऽपि घटे 'इदानीं निवर्तते' इत्यादिव्यवहारः स्यात्, आख्यातानां प्रकृत्यर्थगतवर्त- मानत्वार्थाभिधायित्वात्।


प्रथम क्षणमात्रमें सम्बन्ध रखनेवाला भावविकार है, वैसे ही विनाश भी अन्तिम क्षणमात्रके साथ सम्बन्ध रखनेवाला भावभूत विकार ही है, अभावभूत नहीं है, इसीसे अर्थात् निवृत्तिको क्षणिक भावविकार माननेसे ही जैसे उत्पत्तिके पूर्वमें 'घट उत्पन्न होगा' और उत्पत्तिके पीछे 'घट उत्पन्न हुआ' इस प्रकार भावी और भूतरूपसे व्यवह्रियमाण उत्पत्तिमें केवल प्रथम समयमें ही 'उत्पन्न होता है' इस प्रकार वर्तमानव्यवहार होता है और यह उत्पत्तिके क्षणिक भावविकारमें प्रयोजक है, वैसे ही निवृत्तिके पूर्वमें और निवृत्तिके उत्तरकालमें 'निवृत्त होगा और निवृत्त हुआ' इस प्रकार भावी और भूतरूपसे व्यवह्रियमाण निवृत्तिमें भी अन्तिम समयमात्रमें 'निवृत्त होता है' 'नष्ट होता है' 'ध्वस्त होता है' इस प्रकारका वर्तमानव्यवहार क्षणिकत्वका भी साधन करता है, निवृत्ति स्थायी मानी जाय, तो चिरकालसे ध्वस्त हुए घटमें भी 'अभी घट निवृत्त होता है, ऐसा व्यवहार प्रसक्त होगा। क्योंकि जितने आख्यात हैं, वे सबके सब अपने * प्रकृत्यर्थमें रहनेवाले वर्तमानत्व आदिका ही अभिधान करते हैं।


निवृत्त्यवच्छिन्न कालमें ही रहता है, अन्यत्र नहीं रहता। उत्पत्ति और निवृत्ति आद्य और चरम कालको छोड़कर अन्य कालमें भी यदि रहें, तो चिरकालोत्पन्न घटमें और चिरशकलित घटमें 'उत्पन्न होता है और नष्ट होता है', ऐसा व्यवहार प्रसक्त होगा, अतः अविद्यानिवृत्ति, जो अत्यन्त क्षणिक पदार्थ है, उसकी अनुवृत्ति मोक्षकालमें नहीं हो सकती है, अतः अनिर्मोक्षका प्रसङ्ग नहीं है।
* प्रकृत्यर्थ अर्थात् धातुका अर्थ, उसमें रहनेवाले वर्तमानत्व, अतीतत्व, भविष्यत्त्वका ज्ञान आख्यातसे (तिबादिसे) होता है, यह भाव है।


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अविद्यानिवृत्तिके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहित ५१९


ननु च. तेषां स्वाभिहितसङ्ख्याश्रयप्रकृत्यर्थकर्तृकर्मगतवर्तमानत्वाद्यर्थाभिधायकत्वम्, स्वाभिहितप्रकृत्यर्थानुकूलव्यापारगतवर्तमानत्वाद्यर्थाभिधायकत्वं वाऽस्तु । तथा च. निवृत्तिक्रियाकर्तुश्चिरचूर्णितस्य घटस्य, तद्गतनिवृत्त्यनुकूलव्यापारस्य चाऽवर्तमानत्वाद् नोक्तातिप्रसङ्ग इति चेद्; न; आद्ये उत्पन्नेऽपि घटे ‘उत्पद्यते’ इति व्यवहारापत्तेः । उत्पत्तिक्रियाकर्तुर्घटस्य वर्तमानत्वात् । द्वितीये आमवातजडीकृतकलेवरे उत्थानानुकूलयत्नवति उत्थानानुदयेऽपि ‘उत्तिष्ठति’ इति व्यवहारापत्तेः । आख्यातार्थस्य प्रकृत्यर्थभूतोत्थानानुकूलस्य यत्नरूपव्यापारस्य वर्तमानत्वात् ।


* यदि शङ्का हो कि वे आख्यात ( तिप् आदि ) अपने से अभिहित सङ्ख्याके आश्रयीभूत प्रकृत्यर्थ क्रियाके कर्ता, कर्म आदिमें रहनेवाले वर्तमानत्व आदिका अथवा अपनेसे अभिहित प्रकृत्यर्थके अनुकूल व्यापारमें रहनेवाले वर्तमानत्व आदिका अभिधान करते हैं, इसलिए निवृत्तिरूप क्रियाके कर्ता चिरकालसे चूर्णित घटमें और उसमें रहनेवाले निवृत्तिके अनुकूल व्यापारमें वर्तमानत्वके न होनेसे उक्त आपत्ति अर्थात् चिरशकलित घटको लेकर अभी घट निवृत्त होता है, इस प्रकारकी आपत्ति नहीं आ सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि तथोक्त दो अर्थोंमें से पूर्वके अर्थमें उत्पन्न घटको लेकर घट उत्पन्न होता है, ऐसा व्यवहार प्रसक्त होगा, क्योंकि उत्पत्तिक्रूप क्रियाका कर्ता घट वर्तमान है । और दूसरे पक्षमें यह दोष होगा कि आमवातसे जिसका कलेवर अकड़ गया है, ऐसा पुरुष उठनेके अनुकूल यत्न करता है, तथापि उत्थान नहीं होता, परन्तु ‘उत्तिष्ठति’ ( उठता है ) ऐसा व्यवहार प्रसक्त होगा, क्योंकि प्रकृत्यर्थभूत उत्थानके अनुकूल यत्नरूप


* आख्यात—प्रकृत्यर्थमें रहनेवाले वर्तमानत्व आदिका बोध नहीं करते हैं, किन्तु अन्यगत वर्तमानत्व आदिके बोधक हैं, इस प्रकार आशङ्का करते हैं, तात्पर्य यह है कि स्वाभिहित—एकवचनत्व आदिरूपसे आख्यातोंसे अभिहित—जो सङ्ख्या, उस सङ्ख्याके आश्रयभूत—‘घटो निवर्तते, देवदत्तः पचति, तण्डुलाः पच्यन्ते’ इत्यादि प्रयोगोंमें प्रकृत्यर्थभूत निवृत्त्यादि क्रियाओंका कर्तृकर्मादिरूप—जो घटादि हैं, उन घटादिमें रहनेवाले वर्तमानत्व आदिका आख्यात बोध कराते हैं अथवा ‘घटो निवर्तते’ ( घट विनष्ट होता है ) इत्यादि प्रयोगोंमें आख्यातसे अभिहित प्रकृत्यर्थभूत निवृत्तिके अनुकूल जो व्यापार है उस व्यापारमें रहनेवाले वर्तमानत्व आदिका आख्यात बोधक है, परन्तु प्रकृत्यर्थगत वर्तमानत्व आदिका बोधक नहीं है।

५२०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ चतुर्थ परिच्छेद

तस्मात् प्रकृत्यर्थगतमेव वर्त्तमानत्वादि आख्यातार्थ इति ध्वंसस्य स्थायित्वे चिरनिवृत्तेऽपि घटे 'निवर्तते' इति व्यवहारो दुर्वारः ।

यदि च मुद्गरादिशकलिते घटे ध्वंसो नाम कश्चिदभावस्तत्प्रतियोगिकः स्थायी भूतलाद्याश्रित उपेयते, तदा कपालमालापसरणे तदनपसरणेऽपि मणिकशरावादिकपालव्यावृत्तकपालसंस्थानविशेषादर्शने च किमिति स


व्यापार, जो कि आख्यातार्थ है, वर्त्तमान है । इससे अर्थात् किसी अर्थान्तरके न होनेसे प्रकृत्यर्थगत वर्त्तमानत्व आदि ही आख्यातार्थ है, इससे ध्वंसको स्थायी माननेमें चिरनिवृत्त घटमें 'निवर्तते' (अब निवृत्त होता है) ऐसा व्यवहार अवश्य होगा ।

* मुद्गर आदिसे घटके शकलित (खण्डित) होनेपर ध्वंस नामका घटप्रतियोगिक स्थायी और भूतलमें रहनेवाला अभाव यदि माना जाय, तो † कपालमालाके अपसरणमें और अपसरणके अभावमें मणिक, शराव आदिके कपालोंसे व्यावृत्त कपालके संस्थान विशेषका दर्शन न होनेपर भी वह ध्वंस क्यों नहीं प्रत्यक्ष देखा जाता है। यदि शङ्का हो कि कपालोंके


* जो लोग अतिरिक्त अभावरूप ध्वंसका अङ्गीकार करते हैं, वह ध्वंस क्या प्रत्यक्ष है या अनुमेय है, इस प्रकारके दो विकल्प करके क्रमशः उन विकल्पोंका अग्रिम ग्रन्थसे निरास करते हैं, यहाँ समझना चाहिए कि घटके ध्वंसके अनन्तर कपालमें जैसे घटध्वंसकी प्रतीति होती है, वैसे ही खण्डित घटके अधिकरण भूतलमें भी 'यहाँ घट ध्वस्त हुआ' इस प्रतीतिके आधारपर भूतल आदि भी घटध्वंसके अधिकरण होते हैं, ऐसा कुछ तार्किक मानते हैं, उन्हींके अनुसार यह पूर्वपक्ष है ।

† समाधानका तात्पर्य यह है कि यदि घटध्वंस भूतल आदिमें प्रत्यक्ष मानते हो, तो जहाँपर कपालोंकी कतार है, वहाँसे उस कतारको हटा देनेपर 'यहाँ घटका ध्वंस है' ऐसा प्रत्यक्ष होना चाहिए, परन्तु होता तो है नहीं, अतः ध्वंसका प्रत्यक्ष नहीं होता है, यह मानना चाहिए । यदि शङ्का हो कि घटध्वंसके प्रत्यक्षके प्रति कपालमालाका प्रत्यक्ष भी कारण है, अतः घटध्वंसका प्रत्यक्ष नहीं होता, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि तुम्हारे कथनके अनुसार कपालमालाका अपसरण न करनेपर भी मणिक (मिट्टीका बड़ा पात्र) आदि अन्य पात्रोंसे व्यावृत्त भूतलगत कपालोंमें घटके कपालोंका असाधारण रूप गृहीत जिस कालमें नहीं हुआ उस कालमें भी घटध्वंसका प्रत्यक्ष होना चाहिए, क्योंकि कपालमालाका प्रत्यक्ष विद्यमान है, अतः ध्वंस प्रत्यक्ष है, यह मत अनादरणीय है । वस्तुतस्तु प्रध्वंसाभावके प्रत्यक्षमें इन्द्रियका सन्निकर्ष निरूपित नहीं होता, अतः प्रत्यक्ष नहीं होता, यह भाव है।

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