सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ५१० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
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प्रतिभासानुवृत्त्योपादानावियालेशानुकृत्त्युपपत्तेः। अज्ञानवत् प्रपञ्चस्यापि साक्षाद् ब्रह्मसाक्षात्कारनिवर्त्यत्वे नायमुपपद्यते । विरोधिनेि ब्रह्मसाक्षात्कारे सति प्रारब्धकर्मणः स्वयमेवावस्थानासम्भवेनाविद्यालेशनिवृत्तिप्रतिबन्धकत्वायोगादित्याहुः ।
इति श्रीसिद्धान्तलेशसंग्रहे तृतीयः परिच्छेदः समाप्तः ।
देहादिप्रतिभासकी उपपत्ति हो सकती है, कारण कि प्रारब्ध कर्मके † प्रतिबन्धक होनेके कारण तत्त्वसाक्षात्कारके उदित होनेपर भी प्रारब्ध कर्म और उसके कार्य देहादिप्रतिभासकी अनुवृत्तिसे उपादानभूत अविद्यालेशकी अनुवृत्ति उपपन्न हो सकती है। यदि अज्ञानके समान प्रपञ्चको भी ब्रह्मसाक्षात्कारसे साक्षात् निवर्त्य माना जाय, तो जीवन्मुक्तके देहादि प्रतिभासकी उपपत्ति नहीं हो सकेगी, क्योंकि ब्रह्मसाक्षात्काररूप विरोधीके होनेसे प्रारब्ध कर्मकी स्वतः अवस्थिति न होनेके कारण अविद्यालेशनिवृत्तिके प्रति प्रतिबन्धकत्वका सम्भव नहीं है ।
श्रीसिद्धान्तलेशके वेदान्ताचार्य श्री पं० मूलशङ्करव्यासविरचित भाषानुवादमें तृतीय परिच्छेद समाप्त ।