सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 541, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंअविद्यालेशका निरूपण ] भाषानुवादसहित ५११
ॐ नमः परमात्मने चतुर्थः परिच्छेदः ।
अथ कोऽयमविद्याया लेशो यदनुवर्तनात् ।
देहादेः प्रतिभासेन जीवन्मुक्तिरिहोच्यते ॥ १ ॥
अब शङ्का होती है कि यह अविद्यालेश क्या चीज है, जिसके अनुवर्तनसे देह आदिका प्रतिभास होनेसे यहाँ जीवन्मुक्ति कही जाती है ॥ १ ॥
अथ कोऽयमविद्यालेशः, यदनुवृत्त्या जीवन्मुक्तिः ? ।
ज्ञानेनावरणे नष्टे विक्षेपांशोऽनुवर्तते ।
प्रारब्धप्रतिबन्धेन स लेशस्तेन जीवनम् ॥ २ ॥
ज्ञानसे आवरणके नष्ट होनेपर भी प्रारब्ध कर्मसे जो अज्ञानका विक्षेपांश अनुवृत्त होता है, वही अविद्याका लेश है, और उसीसे जीवन है ॥ २ ॥
आवरणविक्षेपशक्तिमत्या मूलाविद्यायाः प्रारब्धकर्मवर्तमानदेहाद्यनुवृत्तिप्रयोजको विक्षेपशक्त्यंश इति केचित् ।
✻ अब यह अविद्यालेश क्या चीज है, जिसके अनुवर्तनसे जीवन्मुक्ति कहलाती है ।
† इस प्रश्नके उत्तरमें कुछ लोग कहते हैं कि आवरण और विक्षेप-शक्तिसे युक्त मूलाविद्याका—प्रारब्ध कर्म और वर्तमान शरीर आदिकी अनुवृत्तिमें प्रयोजकीभूत—जो विक्षेपशक्ति अंश है, वही अविद्याका लेश है ।
* तृतीय परिच्छेदमें मुक्तिके साधन ब्रह्मज्ञानका निरूपण बड़े ऊहापोहके साथ किया गया है, इस चतुर्थ परिच्छेदमें ब्रह्मज्ञानकी फलभूत मुक्तिका निरूपण किया जाता है, इसलिए 'अथ कोऽयम्' इस मूल ग्रन्थमें पढ़े हुए अथशब्दका साधननिरूपणके लिए प्रस्तुत तृतीय परिच्छेदके अनन्तर—यह अर्थ है । शङ्काका तात्पर्य यह है कि 'अविद्यालेश' शब्दमें लेशशब्दका अवयव अर्थ है, परन्तु अविद्याका अवयव नहीं हो सकता है, क्योंकि अविद्या सावयव नहीं है, कारण कि जो कार्य होता है, वही सावयव होता है, इसलिए अविद्यालेश हो ही नहीं सकता है ।
† अविद्यामें दो प्रकार की शक्तियाँ होती हैं, एक तो आवरणशक्ति और दूसरी विक्षेपशक्ति, उनमेंसे वृत्त्यात्मक आत्मसाक्षात्कारसे अविद्याकी आवरणशक्तिका विनाश होता है, और जो