भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 569, कुल 590 में से

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पृष्ठ 569

[मुक्तके स्वरूपका विचार] भाषानुवादसहित ५३९


महतो विशेषस्य सद्भावात् । न च परमेश्वरस्य रघुनाथाद्यवतारे तमस्वित्वदुःखसंसर्गादिश्रवणाद् मुक्तानामीश्वरभावे पुनर्बन्धापत्तिः, तस्य विप्रशापामोघत्वादित्वकृतमर्यादापरिपालनाय कथंचिद् भृगुशापादिसत्यत्वं


आदि सभी विद्यमान हैं, अतः महान् अन्तर है। × यदि शङ्का हो कि परमेश्वरको रामचन्द्र आदि अवतारोंमें अज्ञान और दुःखसम्बन्ध आदि सुने जाते हैं, इसलिए मुक्त पुरुषोंका ईश्वरभाव होनेपर भी फिर बन्धकी आपत्ति हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ब्राह्मणों द्वारा दिये गये शापोंमें अमोघत्व आदि स्वकृत मर्यादाके परिपालनके लिए और किसी प्रकारसे भृगुऋषिके शापादिके ❊ सत्यत्वप्रख्यापनके लिए नरके समान वह केवल


× शङ्काका तात्पर्य यह है कि रामचन्द्र, श्रीकृष्ण आदि जितने ईश्वरके अवतार हैं, उनमें अज्ञान आदि वर्तमान हैं, क्योंकि इस अर्थमें उन्हींके वाक्य उपलब्ध होते हैं, जैसे कि—
'आत्मानं मानुषं मन्ये रामं दशरथात्मजम्' अर्थात् रामचन्द्रजी अपनेको दशरथका पुरुषरूप पुत्र समझने लगे, और—
'राज्यनाशो वने वासः सीता नष्टा द्विजो हतः ।
ईदृशीयं ममालक्ष्मीर्निर्दहेदपि पावकम् ॥'
'न मद्विधो दुष्कृतकर्मकारी'
अर्थात् राज्यनाश, वनमें वास, सीताका नाश, ब्राह्मणका ( रावणका ) विनाश आदि मेरे महापातक अग्निको भी दग्ध कर सकते हैं, मेरे जैसा संसारमें अन्य कोई दुष्कृत कर्म करनेवाला नहीं है, इत्यादि वाक्य रामचन्द्रजीको अत्यन्त दुःखी सूचन करते हैं और 'सुग्रीवं शरणं गतः' इत्यादिसे उनकी दीनता भी सूचित होती है। उत्तरका तात्पर्य यह है कि यद्यपि अज्ञान आदिका उक्त वचनोंसे ईश्वरावतारमें श्रवण होता है, तथापि वह श्रवण केवल ईश्वरका नटके समान अभिनयमात्र बोधक है अर्थात् ईश्वरने संसारके निर्माणके समयमें उसकी ठीक ठीक व्यवस्था रहे इसलिए मर्यादा बनाई है, जैसे ब्राह्मणोंके शापमें अवन्ध्यत्व आदि । उस मर्यादाका परिपालन करनेके लिए उसको भी वैसा ही आचरण लोकमें करना चाहिए जिससे कि मर्यादाका भङ्ग न हो । और श्रीरामचन्द्र स्वयं सर्वज्ञ एवं साक्षात् ईश्वर थे, तथापि महादेव; इन्द्र आदिके सामने विनयको सूचन करनेके लिए ही अपने आपको मनुष्य बतलाते हैं और अपनी उद्दण्डताका खण्डन करते हैं । यदि अपने आप अपना अभिमान प्रकट करते, तो लोकमें भी इसका बुरा प्रभाव पड़ता और लोकमें एक प्रकारसे अनर्थ फैलता, अतः लोककी शिक्षाके लिए वैसे वचन हैं, यह समझना चाहिए । इसी प्रकार अनेक मर्यादाओंके परिपालनके लिए तत्-तत् वचनोंकी सङ्गति लगानी चाहिए, यह भाव है ।

❊ भृगुशापका अङ्गीकार और उसकी सत्यताको लोकमें बतलानेके लिए ईश्वरका मनुष्य-रूपसे अवतार है, यह भाव है, इस विषयमें उत्तररामायणमें एक कथा उपलब्ध होती है


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