सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ५४० | सिद्धान्तलेशसंग्रहे | [ चतुर्थ परिच्छेद |
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प्रत्याययितुं नटवदीश्वरस्य तदभिनयमात्रपरत्वात् । अन्यथा तस्य नित्यमुक्तत्वनिरवग्रहस्वातन्त्र्यसमाभ्यधिकराहित्यादिश्रुतिविरोधात् । तस्माद्यावत्सर्वमुक्ति परमेश्वरभावो मुक्तस्येति बिम्बेश्वरभावे न कश्चिद्दोषः ।
अभिनयमात्र करता है, इसके सूचनके लिए ही रामादि अवतारोंमें अज्ञानका कथन है, वस्तुतः नहीं। † यदि ऐसा न माना जाय, तो उस परमात्मामें नित्यमुक्तत्व, निरवग्रहस्वातन्त्र्य एवं सम और अभ्यधिकके राहित्य आदिका जो श्रुतिने प्रतिपादन किया है, उसका विरोध हो जायगा । इससे जब तक सभी जीवोंकी मुक्ति नहीं होती, तब तक मुक्त पुरुषका परमेश्वरके साथ तादात्म्य-रूपसे अवस्थान होता है, अतः बिम्बभूत ईश्वरभावमें कोई दोष नहीं है ।
और वह दशरथके प्रति दुर्वासासे कही गई है—
एक समय देवताओंका और असुरोंका परस्पर भयङ्कर युद्ध हुआ, उस युद्धमें देवताओंने असुरोंका पराजय किया। असुर लोग अपनी रक्षाके लिए भृगु ऋषिकी पत्नीकी शरणमें गये, उसने असुरोंको अभयप्रदान किया और निर्भय होकर वे रहने लगे। भगवान्को जब यह मालूम हुआ तब उन्होंने क्रुद्ध होकर अपने चक्रसे भृगुपत्नीका माथा काट डाला। अपनी पत्नीका शिरच्छेद देखकर भृगुने विष्णुको सहसा शाप दिया कि अरे विष्णु ! तुमने मेरी पत्नीका वध किया है, इसलिए तुम मनुष्ययोनिमें जन्म पाकर अपनी पत्नीके वियोगमें अनेक वर्षतक दुःख भोगोगे । परन्तु भगवान्की अमोघशक्तिसे वह शाप भगवान्को नहीं लगा, बल्कि वापस आकर भृगुको ही सताने लगा । जब उन्होंने इस शापसे अत्यन्त दुःखी होकर शापसे मुक्त होनेके लिए अन्य ऋषियोंकी प्रार्थना की तब उन्होंने विष्णुकी उपासनाके लिए सलाह दी । सलाहके अनुसार भृगुने विष्णुकी उपासना की । फलतः भगवान् प्रसन्न हुए और कहा कि हे भृगु, तुम दुःखी मत होओ, तुम्हारा दिया हुआ शाप मैं वापिस ले लेता हूँ और तुम्हारे शापकी सत्यताके लिए मैं मनुष्य भी होऊँगा और पत्नीवियोगका कष्ट भी सहन करूँगा । तब भृगुने अनेक प्रकारसे भगवान्की अर्चना और स्तुति की । इस प्रकार शापकी रक्षाके लिए भगवान्ने नर बनकर यह सब अभिनय किया, यह भाव है ।
† 'एष त आत्मा सर्वान्तर्र्याम्यमृतः, एष सर्वेश्वरः, न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते, सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्' ( यही तुम्हारा आत्मा अमृत ( नित्य ) और सबका अन्तर्यामी है, यही सबका नियामक है, इस आत्माकी बराबरी करनेवाला और इससे अधिक दूसरा नहीं है, निर्गुणोपासक संसारसे तर जाता है, वही परमपद है ) इत्यादि श्रुतियोंसे 'नारायणात् ब्रह्मा जायते, अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः' ( नारायणसे ब्रह्मा हुआ, बाहर और भीतर सबको व्याप्त करके नारायण अवस्थित है ) इत्यादि अनेक श्रुतियोंसे सिद्ध ईश्वरमें नित्यमुक्तत्व आदि धर्म सुने जाते हैं, यह भाव है ।